पुरूषवादी चेहरे पर महिलावादी मुखौटा – डॉ. रमेश यादव

आठ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के 100 वें साल के अवसर पर यूपीए सरकार ने महिलाओं को तैंतीस फीसदी आरक्षण का तोहफा देने में असफल रही। यह दिन भारत के इतिहास में दर्ज होते-होते रह गया। लेकिन दूसरे दिन ताकत के बल राज्यसभा में उक्त बिल को पास कराने में सरकार सफल रही।

जदयू, राजद, सपा, बसपा जैसी राजनैतिक पार्टियों नें आरक्षण के मूल स्वरूप पर विरोध किया लेकिन सरकार ने उसे ताकत के आहे अनसुना कर दिया।

बहुसंख्यक वर्ग यह जानना चाहता है कि जब सरकार महिलाओं को तैंतीस फीसदी आरक्षण देने के लिए बिल ला रही है तो उसमें दलित, पिछड़ी और अल्संख्यक वर्ग की महिलाओं को बराबरी के आधार पर आरक्षण देने में उसे क्या अपत्ति है।

अब तक जिनको आरक्षण दिया गया है वह काफी दोषपूर्ण है। आरक्षण का आधार आर्थिक और सामाजिक आधार बनाने की वजाय जाति आधार बनाया गया जिसका फायदा जरूरतमंद और समग्र समाज को नहीं मिल पाया।

पूर्व की गलती को सुधारने की वजाय सरकार ने एक और दोषपूर्ण कदम उठा लिया। सरकार के पास एक बड़ा अवसर था। इस बिल में सभी वर्गों के महिलाओं को समान अवसर देकर सरकार अपनी छवि अधिक समतावादी और न्यायप्रिय बना सकती है।

देर-सबेर जब यह आरक्षण कानून का रूप ले लेगा तब इसका सर्वाधिक फायदा वे लोग लेंगे जो हत्या,बलात्कार,भ्रष्टचार और अपराध की खेती करते हैं और जिनका समाज में भय व आतंक है। ऐसे लोग सीधे चुनाव में लड़ने की वजाय अपने परिवार और रिश्तेदारों को खड़ा करेंगे और चुनाव जीताने के लिए हर षड्यंत्र करेंगे।

हालांकि जहां तक सरकार के रवैये का सवाल है तो यह कभी भी साफ नहीं रहा। जब आजादी के इतने दशक बाद भी संविधान में दी गयी प्रतिबद्धताओं को ईमानदारी से जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया जा सका तो क्या आरक्षण का झुनझुना पकड़ा देने मात्र से महिलाओं से जुड़ी सारी समस्याओं का समाधान एक झटके में हल हो जायेगा।

पंचायतों में लंबे समय से महिलाओं के लिए आरक्षण लागू है। लेकिन वहां सही मायने में किसका राज चल रहा है। कितनी प्रतिशत महिलाएं स्वतंत्र व स्वतः निर्णय लेने में सक्षम हैं।

सरकारी महकमा पूरी की पूरी नेतृत्वकारी जमात को भ्रष्ट, निकम्मा और जनविरोधी बनाने में अहम भूमिका अदा कर रहा है। महिला चाहे अगड़ी हो, पिछड़ी हो, दलित हो या अल्पसंख्यक उनका राजनीतिक क्षेत्रों में स्वतंत्र अस्तित्व नहीं के बराबर है।

इसकी आड़ में पुरूषवादी ताकत है जो उन्हें पिछे से संचालित करता है। दरअसल, जो दिखता है वैसा होता नहीं। यह ठीक वैसे ही है जैसे हाथी के दांत खाने और दिखाने के अलग-अलग होते हैं। व्यवस्था सुधारने की तो जरूरत यहां पर है।

आज के युग में यदि आम महिला सत्ता में भागीदारी चाहती है, तो उसके लिए यह डगर कितना मुश्किल भरा है। जिस तरह से राजनीति को उत्पादन और उगाही का केंद्र बनाया जा रहा है उसमें सफल होने के लिए जो तामझाम चाहिए उसका इंतजाम ईमानदारी के रास्ते नहीं हो सकता है। जिस रास्ते से यह इंतजाम होता है उसे सही रास्ता नहीं कहा जा सकता है। जाहिर है ऐसे रास्ते के सही भविष्य के बारे में भी घोषणा नहीं की जा सकती है।

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में विधान परिषद का चुनाव हुआ था। सभी पार्टियों ने जीताऊं प्रत्याशियों को मैदान में उतारा। लेकिन जीत सर्वाधिक सीटों पर बसपा की हुई। यानी करीब 36 में से 34 सीट बसपा के खाते में गयी और बाकी एक-एक सीट कांग्रेस और सपा के झोली में।

हुआ यह की बहन जी ने बड़ी संख्या में उन प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा जिनका परिवार कई पुश्तों से अपराध, धन उगाही, हत्या-लूट,गुंडई और इसी तरह के अन्य फसलों की खेती-बाड़ी के पेशे से जुड़ा रहा है।

शिक्षा,संस्कृति और धर्म की नगरी के रूप में प्रसिद्ध बनारस की विधान परिषद् सीट पर बसपा से पूर्वांचल के माफिया डान की पत्नी की जीत हुई। जो ‘वोट फला को नहीं देगा, वह सुबह का सूरज’ नहीं देखेगा। जहां इस नारे और धमकी के आधार पर चुनाव-निर्वाचन होता हो वहां हम किस आरक्षण और लोकतंत्र की बात करते हैं।

संविधान में तो सब कुछ दिया गया है लेकिन उसकी जमीनी हकीकत हम सभी जानते हैं। बसपा तो मात्र बानगी भर है। इस संस्कृति को विकसित करने वाली पार्टिंयां तो दशकों से इसका सुख ले रहीं हैं।

जब पूरा का पूरा भारतीय सामाजिक व्यवस्था सामंती नींव पर टिका, मर्दवादी ढांचे में फल-फूल रहा है, तो ऐसी परिस्थिति में राजनीतिक व्यवस्था को बहुत निरपेक्ष और साम्यवादी नजरिए से देखना भ्रम होगी। यहां सभी राजनैतिक दलों के पुरूषवादी चेहरे पर महिलावादी मुखैटा है। यही वजह है कि महिला आरक्षण पर अर्थपूर्ण, निरपेक्ष और संपूर्ण वर्ग की महिलाओं के लिए प्रावधान नहीं है। यही कारण है की यह बिल अभी तक लटका रहा है।

पहली बार 12 सितंबर,1996 को संयुक्त मोर्चा की सरकार में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण संबंधी विधेयक लोक सभा में पेश किया गया। 1998 में एनडीए सरकार में इस बिल को दोबारा पेश किया गया। इसी प्रकार 1999, 2008 और अब 9 मार्च, 2010 को इस बिल को अंततः राज्य सभा में पास कर दिया गया।

शुरू से ही यह विधेयक राजनैतिक खींचतान का शिकार रहा क्योंकि यह असमानता पर आधारित रहा है। दरअसल, पूरी घटनाक्रम से लगता है कि राजनैतिक दल पुरूषवादी चेहरे पर महिलावादी मुखैटा लगाये घूम रहे हैं।

वामपंथियों से लगायत दक्षिणपंथियों तक सभी आरक्षण का रट लगा रहे हैं लेकिन सभी जमात की महिलाओं के प्रति उनका खयाल नहीं है। इस बिल में कई तरह के छिद्र हैं जिस पर बहस होनी चाहिए। मसलन बिल में पिछड़ी, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के महिलाओं के लिए कोई प्रावधान नहीं है।

बिल में हर पांच साल में कुल 543 सींटों के एक तिहाई सीटों को महिलाओं के लिए बारी-बारी से आरक्षित करने के लिए सिफारिश की गयी है। 15 साल के लिए लागू होने के लिए प्रस्तावित महिला आरक्षण विधेयक अगर कानून के शक्ल में लागू हो गया तो देशभर की हर सीट से एक बार महिला चुन कर संसद पहुंचेंगी। जब उन्हें पता होगा कि संबंधित सीट अगली बार किसी पुरूष के हिस्से जायेगी तो ऐसी परिस्थिति में उनका सामाजिक सरोकार कितना ईमानदार और प्रतिबद्ध होगा। आप कल्पना कर सकते हैं।

मौजूदा लोक सभा में कुल 58 महिला सांसद हैं जो अब तक की संसदीय इतिहास में इनकी सर्वाधिक संख्या है।

अब सवाल उठता है कि क्या? यूपीए सरकार संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण से संबंधित बिल पास करा कर समाज के सभी जमात की महिलाओं के साथ बराबरी का न्याय कर पायेगी। क्या? इस आरक्षण से महिलाओं को इज्जत, आजादी और समान अवसर मिल पायेगा। क्या? सामाजिक शोषण का तरीका और घरेलू हिंसा की घटनायें, खत्म हो जायेंगी।

क्या? आरक्षण के सहारे जीत कर संसद और विधान सभाओं में पहुंचने वाली महिलायें परिवार व पतियों से दबाव मुक्त हो कर समाजहित में स्वतंत्र निर्णय ले सकेंगी।

क्या? सरकार आधी आबादी को आरक्षण की बैसाखी देने की वजाय आजादी और बराबरी के लिए समान अवसर देने पर बल नहीं दे सकती।

क्या? जब महिला आजाद और सबल होंगी तो समाज के हर क्षेत्र में स्वतंत्र प्रदर्शन कर पायेंगी।

क्यों न सभी वर्गों की महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा देने के लिए उन्हे तैंतीस की जगह पचास फीसदी आरक्षण दिया जाय।

क्या? सभी राजनैतिक पार्टियां इस एजेंडे पर पहल करने की हिम्मत रखती हैं। यदि हां तो उनके इस कदम का स्वागत है।

-लेखक, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पत्रकारिता एवं नवीन मीडिया अध्ययन विद्यापीठ, सहायक प्रोफेसर हैं।

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