मातृभाषाओं को रोज़गार से जोड़ने वाले पहले वैज्ञानिक : दौलत सिंह कोठारी

· डॉ. अमरनाथ

आजादी के बाद जब 1950 में संघ लोक सेवा आयोग की पहली बार परीक्षा हुई तो उसमें 3647 अभ्यर्थी शामिल हुए थे जिनमें से 240 उत्तीर्ण हुए. 1960 में 10000 बैठे थे, 1970 में 11710 बैठे थे और 1979 में यह संख्या बढ़कर एक लाख से ऊपर हो गई. इस वर्ष इस परीक्षा में कुल 1,00742 अभ्यर्थी शामिल हुए जिनमें से 703 उत्तीर्ण हुए. परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों की संख्या इस वर्ष बढ़कर लगभग दसगुनी हो गई. इसका कारण यह था कि इसी वर्ष कोठारी आयोग की सिफारिशें लागू हुई थीं. कोठारी आयोग की इन सिफारिशों में अभ्यर्थियों की उम्र सीमा तो बढ़ाई ही गई थी परीक्षार्थियों को अंग्रेजी सहित संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं में लिखने की छूट भी मिल गई थी. इसका परिणाम यह हुआ कि देश के दूर दराज क्षेत्रों के पिछड़े और गरीब किन्तु प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों को भी इस सर्वाधिक प्रतिष्ठित परीक्षा में शामिल होने का पहली बार अवसर नसीब हुआ था. अपनी भाषाओं में उत्तर लिखने की छूट के कारण सदियों से वंचित दलितों और शोषितों के भीतर आत्मविश्वास तो पैदा हुआ ही, उनके भीतर अपनी भाषाओं के प्रति प्रेम और निष्ठा का भी विकास हुआ. इसके पहले तो आईसीएस करने के लिए अभ्यर्थियों को इंग्लैंड जाना पड़ता था और परीक्षा का माध्यम सिर्फ अंग्रेजी थी.

भारत सरकार ने उच्च प्रशासनिक सेवाओं के लिये आयोजित सिविल सेवा परीक्षा की रिव्यू के लिए सन् 1974 में प्रो. डी.एस कोठारी ( 6.7.1906- 4.2.1993) की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई. इस कमेटी ने 1976 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी और उसी के आधार पर 1979 में भारत सरकार के उच्च पदों जैसे आईएएस, आईपीएस और बीस दूसरे विभागों के लिए एक सामान्य परीक्षा का आयोजन आरंभ हुआ. इसमें सबसे क्रान्तिकारी सुझाव अंग्रेजी सहित भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने का विकल्प था. देश भर में परीक्षा केन्द्र भी बढ़ाए गए जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों और कस्बों में रहने वाले पिछड़े और वंचित अभ्यर्थी भी इस परीक्षा में शामिल हो सकें. इसका जो तत्काल परिणाम आया उसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. बाद में दिन प्रति दिन हिन्दी सहित दूसरी भारतीय भाषाओं के माध्यम वाले अभ्यर्थी बढ़ते गए और ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभाशाली अभ्यर्थी भी इस प्रतिष्ठित सेवा में आने लगे. हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के क्षेत्र में यह ऐतिहासिक घटना थी जिसका व्यापक और दूरगामी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था.

कोठारी आयोग ने सुक्षाव दिया कि, “हम पूरे विश्वास से यह कहना चाहते हैं जो अभ्यर्थी अखिल भारतीय सेवाओं की नौकरी में आना चाहते हैं उन्हें आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं का ज्ञान होना अनिवार्य है. जिन्हें ये भाषाएँ नहीं आतीं वे सरकारी सेवाओं के लिए कत्तई उपयुक्त नहीं हैं. वास्तव में एक सही व्यक्तित्व के विकास के लिए यह जरूरी है कि हमारे नौजवानों को हमारी भाषाओं और उसके साहित्य का ज्ञान हो. इसलिए हमारी जोरदार सिफारिश है कि पहले और दूसरे चरण दोनों पर ही आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं की परीक्षा अनिवार्य हो.”(पैरा 3.22)

आयोग ने कहा कि, “हमने परीक्षाओं के संदर्भ में अंग्रेजी की बात पर भी विचार किया. अंग्रेजी का हमारे देश में एक महत्वपूर्ण स्थान है. यह अखिल भारतीय स्तर के प्रशासन के लिए संपर्क भाषा भी है. बहुत सारे विश्वविद्यालयों में शिक्षा का माध्यम भी अंग्रेजी ही है. दुनिया भर के ताजा हालातों और विशेषकर विज्ञान और तकनीकी ज्ञान के लिए अंग्रेजी बहुत जरूरी भी है और इसीलिए अंग्रेजी का भी अनिवार्य पेपर होना चाहिए.” (पैरा 3.23)

सिविल सेवाओं में भारतीय भाषाओं की शुरुआत का असर था कि बाजार में विभिन्न विषयों में हिन्‍दी माध्यम की किताबें उपलब्ध होने लगीं. महत्वपूर्ण पुस्तकों के हिन्‍दी में अनुवाद होने लगे और बाजार ऐसी पुस्तकों से पट गया. राज्यों में विभिन्न भाषाओं की ग्रंथ अकादमियाँ स्थापित और सक्रिय होने लगीं.

हिन्दी के शुभचिन्तक आमतौर पर कहते हैं कि हिन्दी सहित अन्य सभी भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठा तभी मिलेगी जब उन्हें रोजगार से जोड़ा जाएगा. आजाद भारत में प्रो. डी.एस. कोठारी पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने भारतीय भाषाओं को रोजगार से जोड़ने का महान कार्य किया.

  इसके पूर्व प्रो. डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (1964-66) गठित हुआ था. इस शिक्षा आयोग के सचिव थे जे.पी.नायक (पुणे) और सह सचिव थे जे.एफ.मक्डौगल (यूनेस्को). आयोग के सदस्य थे ए.आर.डाउड (नई दिल्ली), एफ.एन.एल्विन (लंदन), आर.ए. गोपालस्वामी ( नई दिल्ली), वी.एस.झा ( लंदन), पी.एन. कृपाल, (शिक्षा सलाहकार, भारत सरकार), एम.वी.माथुर (राजस्थान विश्वविद्यालय), बी.पी. पाल ( नई दिल्ली), एस.पणंडीकर ( धारवाड़), सरोजर रेवेल्ले ( कैलीफोर्निया), के.जी.सईडेन ( शिक्षा सलाहकार, भारत सरकार), टी.सेन ( रेक्टर, यादवपुर यूनिवर्सिटी), जीन थामस ( यूनेस्को), एस.ए.शुमोवस्की ( मास्को) और सादातोशी इहारा( टोकियो). इसके अलावा दुनिया भर से शिक्षा-विशेषज्ञों के 20 सदस्यों का एक पेनल कंसल्टेंट भी नियुक्त था जिनमें जेम्स ई. एलेन ( यूएसए), सी.ई. बीबी ( हारवर्ड), पीएमएस बलैकेट (यूके), क्रिस्टोफर काक्स (यूके), फिलिप एच.कूम्ब्स (पेरिस), आंद्रे देनीरे ( हावर्ड), स्टेवान देदीजेर ( स्वीडेन), निकोलस डेविट (यूएसए) आदि प्रमुख हैं.

29 जून 1966 को इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और उसके बाद भी हर स्तर पर भरपूर चर्चा के बाद 24 जुलाई 1968 को भारत की यह प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की गई. यह पूर्ण रूप से कोठारी आयोग के प्रतिवेदन पर ही आधारित थी. इसका लक्ष्य था सामाजिक दक्षता, राष्ट्रीय एकता एवं समाजवादी समाज की स्थापना. इसमें शिक्षा प्रणाली का रूपान्तरण कर 10+2+3 पद्धति पर कर दिया गया. हिन्दी को सम्पर्क भाषा के रूप में विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया. सबके लिए शिक्षा के समान अवसर की उपलब्धता का ख्याल रखा गया. विज्ञान व तकनीकी शिक्षा के साथ ही नैतिक व सामाजिक मूल्यों के विकास पर जोर दिया गया.

इस शिक्षा नीति की दो बातें बेहद चर्चित रहीं. पहली, समान विद्यालय व्यवस्था (कामन स्कूल सिस्टम) और दूसरी विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा अपनी भाषाओं में देने का प्रस्ताव.

आयोग के सुक्षाव लागू होने के बाद शिक्षा के सभी चरणों में, प्रादेशिक भाषाओं को शिक्षा का माध्‍यम बनाने का प्रयास हुआ. प्राथमिक शिक्षा को सिर्फ मातृभाषाओं के माध्यम से देने पर जोर दिया गया. कोठारी शिक्षा आयोग का सुक्षाव था कि प्राथमिक स्तर तक बच्चों को सिर्फ एक भाषा पढ़ाई जानी चाहिए और वह या तो मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा ही होनी चाहिए. आयोग का सुझाव था कि अंग्रेजी भाषा संसार से हमारे संपर्क का मुख्‍य माध्‍यम है और आधुनिक वैज्ञानिक युग के बढ़ते हुए ज्ञान को प्राप्‍त करने का भी मुख्‍य साधन है. इसलिए अंग्रेजी को प्रोत्‍साहन मिलना चाहिए और उसपर विशेष बल दिया जाना चाहिए. आयोग ने सुक्षाव दिया था कि गैर हिन्‍दी क्षेत्रों में हिन्‍दी के अध्‍ययन को प्रोत्‍साहित किया जाना चाहिए ताकि वह संघ की राजभाषा के रूप में अपना दायित्व निभा पाने में सक्षम हो सके और भारत की सभी भाषाओं के बीच सम्‍पर्क स्‍थापित करने में सहायक हो सके. आयोग ने सुझाव दिया कि पूरे देश में ईमानदारी से त्रिभाषा फार्मूला अपनाया जाना चाहिए.

कोठारी शिक्षा आयोग की शिक्षा नीति में हिन्दी और भारतीय भाषाओं को लेकर स्पष्ट निर्देश है. वहाँ ‘भाषाओं का विकास’ शीर्षक तीसरे अनुच्छेद में क्षेत्रीय भाषाओं, त्रिभाषा फार्मूला, हिन्दी, संस्कृत और अंतरराष्ट्रीय भाषाओं को लेकर अलग- अलग निर्देश है. यहाँ देश में शैक्षिक और सांस्कृतिक विकास के लिए भारतीय भाषाओं और उसके साहित्य के विकास को अनिवार्य शर्त के रूप में रेखांकित किया गया है और कहा गया है कि क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के बिना न तो लोगों की रचनात्मक ऊर्जा निखरेगी, न तो शिक्षा का स्तर उन्नत होगा और न ज्ञान का आम जनता तक प्रसार हो सकेगा. बौद्धिक समुदाय और आम जनता के बीच की खाई भी यथावत बनी रहेगी. वहाँ कहा गया है कि देश में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर शिक्षा के माध्यम के रूप में क्षेत्रीय भाषाएँ पहले से ही प्रयोग में हैं, इन्हें विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है.

त्रिभाषा फार्मूला को लेकर कोठारी शिक्षा आयोग के सुझाव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. त्रिभाषा फार्मूला एक ऐसा प्रावधान है जिसके साथ हिन्दी क्षेत्र ने हमेशा से बेईमानी की है. कोठारी शिक्षा आयोग द्वारा हिन्दी भाषी राज्यों के लिए स्पष्ट निर्देश था कि, “हिन्दी भाषी राज्य के लोग हिन्दी और अंग्रेजी के साथ दक्षिण की कोई एक आधुनिक भाषा अपनाएंगे और इसी के साथ अहिन्दी क्षेत्र के लोग एक अपनी राज्य की भाषा, एक अंग्रेजी और एक संघ की राजभाषा हिन्दी अपनाएंगे.“ किन्तु हिन्दी क्षेत्र के लोगों ने हिन्दी और अंग्रेजी के साथ उर्दू या संस्कृत को अपना लिया और खुद दक्षिण वालों से हिन्दी पढ़ने की अपेक्षा करते रहे. यह गलत था. संस्कृत, चाहे जितनी भी समृद्ध हो किन्तु वह आधुनिक भाषा नहीं है और इसी तरह उर्दू और हिन्दी एक ही भाषा की दो शैलियाँ मात्र हैं. ये अलग- अलग जाति की भाषाएँ नहीं है. कोठारी आयोग द्वारा प्रस्तावित त्रिभाषा फार्मूला हमारे देश की भाषा समस्या को हल करने की दिशा में आज भी सर्वाधिक उपयुक्त फार्मूला है और जरूरत उसपर ईमानदारी से अमल करने की थी किन्तु ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020’ के माध्यम से इसे अब विस्थापित कर दिया गया है.

हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में त्रिभाषा फार्मूले की बात तो बार- बार की गई है किन्तु यहाँ त्रिभाषा से क्या तात्पर्य है- इस संबंध में कुछ भी स्पष्ट नहीं है. हाँ, अनुच्छेद- 4.17 में संस्कृत को ‘महत्वपूर्ण आधुनिक भाषा’ बताते हुए कहा गया है कि, “इस प्रकार संस्कृत को त्रि-भाषा के मुख्यधारा विकल्प के साथ, स्कूल और उच्चतर शिक्षा के सभी स्तरों पर छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण, समृद्ध विकल्प के रूप में पेश किया जाएगा.” ऐसी दशा में यदि बंगाल, गुजरात, केरल या तमिलनाडु के लोग अपने-अपने राज्यों की भाषाएँ क्रमश: बांग्ला, गुजराती, मलयालम और तमिल के साथ संस्कृत और एक विदेशी भाषा (अंग्रेजी) पढ़ें तो त्रिभाषा फार्मूले का समुचित अनुपालन माना जाएगा. इतना ही नहीं, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुच्छेद 4.13 में स्पष्ट कहा गया है कि, “तीन भाषा के इस फार्मूले में काफी लचीलापन रखा जाएगा और किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी.” इस तरह त्रिभाषा फार्मूले में हिन्दी के लिए कोई जगह नहीं है. हिन्दी को उसके स्थान से पदच्युत कर दिया गया है. यह भी उल्लेखनीय है कि थोपी जाने का आरोप हमेशा हिन्दी को लेकर ही लगता रहा है. हम संस्कृत का सम्मान करते हैं. उसमें भारत की सांस्क़तिक विरासत है. उसका अध्ययन होना ही चाहिए किन्तु हिन्दी को हटाकर नहीं. वह हिन्दी का विकल्प नहीं है.

कोठारी शिक्षा आयोग का सुझाव था कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में सम्‍पन्‍न वर्ग और गरीब जनता के बीच गहरी खाई पैदा हो गई है. इसमें एक ओर तो ऐसी शिक्षण संस्‍थाएँ हैं जिनमें अमीरों तथा सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से संपन्न लोगों के बच्‍चे पढ़ते हैं और दूसरी ओर सरकारी शिक्षण संस्‍थाएँ हैं जिनमें गरीब और दलित लोगों के बच्चे पढ़ते हैं. भारतीय सामाज के सर्वांगीण विकास तथा संविधान द्वारा निर्देशित सबको अवसर की समानता उपलब्ध कराने की दृष्टि से यह स्तर-भेद खत्म होना चाहिए. अत: सरकार को चाहिए कि सभी बच्‍चों को स्‍कूलों की एक सामान्‍य प्रणाली में शिक्षा प्राप्‍त करने का अवसर उपलब्ध कराए. प्राथमिक शिक्षा के लिए विशेष रूप से इसे पड़ोसी स्‍कूल का प्रतिमान अपनाना चाहिए, जिसमें सब बच्‍चे- चाहे वे किसी भी जाति, प्रजाति, धर्म, लिंग या वर्ण के हों- मोहल्‍ले के एक सामान्‍य प्राथमिक स्‍कूल में पढ़ने जाएँ.

राजस्थान के उदयपुर में एक निम्न मध्यवर्गीय जैन परिवार में दौलत सिंह कोठारी का जन्म हुआ था. उनके पिता का नाम फतेहलाल कोठारी और माँ का नाम लहर बाई था. पिता प्राइमरी स्कूल के अध्यापक थे. जब दौलतसिंह कोठारी 12 साल के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया. इसके बाद वे अपने पिता के मित्र के पास इंदौर आ गए. यहीं उनकी माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा हुई. इसके आगे की उनकी शिक्षा मेवाड़ के महाराणा द्वारा दी गई छात्रवृति से हुई. उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिकी में एमएससी की. यहाँ उनके गुरु विश्वविख्यात भौतिकविज्ञानी मेघनाथ साहा थे. इसके बाद शोध के लिए वे कैम्ब्रिज चले गए. वहाँ न्यूक्लियर फिजिक्स के फादर कहे जाने वाले लॉर्ड अर्न्स्ट रदरफोर्ड के निर्देशन में उन्होंने डॉक्टोरेट किया. इसके बाद कोठारी भारत लौट आए और 1934 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए.

लार्ड रदरफोर्ड ने दिल्ली विश्‍वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर सर मॉरिस ग्वायर को लिखा था कि “मैं बिना हिचकिचाहट कोठारी को कैम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त करना चाहता हूँ परंतु यह नौजवान पढ़ाई पूरी करके तुरंत देश लौटना चाहता है.”

डॉ. कोठारी 1961 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में रहे. इस दौरान वे कुछ वर्ष तक भौतिकी के विभागाध्यक्ष भी रहे. प्रो. डी.एस. कोठारी भारत के महान वैज्ञानिकों में से थे. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की विज्ञान नीति में जो लोग शामिल थे उनमें होमी भाभा, डॉ. मेघनाथ साहा, सी.वी. रमन के साथ डॉ. डी.एस.कोठारी भी थे. वे 1948 से 1961 तक रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार थे तथा 1961 से 1973 तक यूजीसी के चेयरमैन थे. वे भारत की शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और स्तरीय बनाने के लिए गठित पहले राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के अध्यक्ष थे. वे भारत में रक्षा विज्ञान के वास्तुकार थे. वे नवल कैमिकल एंड मेटैलर्जिकल लेबोरेट्री मुंबई, इंडियन नवल फिजिकल लेबोरेट्री कोच्ची, सेंटर फॉर फायर रिसर्च दिल्ली, सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेट्री दिल्ली, डिफेंन्स फूड रिसर्च लेबोरेट्री मैसूर, डिफेन्स इंस्टीच्यूट ऑफ फिजिओलॉजी एंड एलॉयड साइंस चेन्नई, डाइरेक्टोरेट ऑफ साइकॉलाजिकल रिसर्च नई दिल्ली, डिफेन्स इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रिसर्च लेबोरेट्री हैदराबाद, साइंटिफिक इवेलुएशन ग्रुप दिल्ली, टेक्निकल बैलिस्टिक रिसर्च लैबोरेट्री, चंडीगढ़ आदि भारत के अधिकाँश डीआरडीओ लैब के संस्थापक थे. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा एनसीईआरटी के गठन और स्थापना में उनकी केन्द्रीय भूमिका थी. वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के चांसलर भी थे. इसके अलावा प्रो. कोठारी ने इंडियन साइंस कांग्रेस के गोल्डेन जुबली सेशन 1963 की अध्यक्षता की थी और वे इंडियन नेशनल साइंस अकादमी (1973) के भी अध्यक्ष चुने गए थे.

प्रेमपाल शर्मा ने लिखा है, “गाँधी, लोहिया के बाद आजाद भारत में भारतीय भाषाओं की उन्नति के लिए जितना काम डॉ. कोठारी ने किया उतना किसी अन्य ने नहीं. यदि सिविल सेवाओं की परीक्षा में अपनी भाषाओं में लिखने की छूट न दी जाती तो गाँव, देहात के गरीब और आदिवासी लोग उच्च सेवाओं में कभी नहीं जा पाते ….. शिक्षा आयोग की सिफारिशों के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1971 में यूनेस्को द्वारा डॉ. एडगर फाउर की अध्यक्षता में जब शिक्षा के विकास पर अंतरराष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया तब उन्होंने कोठारी आयोग की रिपोर्ट को ही आधार बनाया था. इस आयोग ने अगले दो दशकों तक दुनिया के विभिन्न देशों में शिक्षा के विकास पर कार्य किया.” ( भाषा का भविष्य, पृष्ठ-112)

प्रो. डी.एस.कोठारी के व्यक्तित्व के बारे में उनकी पौत्री दीपिका कोठारी ने ‘सुनहरी स्मृतियाँ’ नाम से एक पुस्तक लिखी है. इसमें वे अपने दादा के व्यक्तित्व के बारे में कहती हैं कि विश्वविद्यालय में रहते हुए जब भी वेतन बढ़ाने की माँग आती वे अपने सहकर्मियों को यही कहते, “ऐसे अवसर तुम्हें कहाँ मिलेंगे जहाँ तुम्हें अपनी पसंद का कार्य करने के लिए पैसा भी मिलता हो और रुचि का काम भी करने दिया जा रहा हो. उसकी कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी.” शिक्षा को वे अपने जीवन में शायद सबसे उँचा दर्जा देते थे. उन्हीं के शब्दों में “शिक्षण एक उत्कृष्ट कार्य है और किसी विश्वविद्यालय का शिक्षक होना उच्चतम अकादमिक सम्मान है.” इसीलिये जीवन पर्यन्त वे शिक्षा और शिक्षण से जुड़े रहे, कभी गुरू बनकर तो कभी विद्यार्थी बनकर. (उद्धृत, भाषा का भविष्य, पृष्ठ-113)

‘न्यूक्लियर एक्सप्लोजन्स एंड देयर इफेक्ट्स’, ‘ऐटम एंड सेल्फ’, ‘नॉलेज एंड विज्डम’, ‘शिक्षा विज्ञान और मानवीय मूल्य’, ‘विज्ञान और मानवता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं.

अनेक पुरस्कारों के साथ उन्हें भारत सरकार का पद्मभूषण और पद्मविभूषण सम्मान भी प्राप्त हुआ था.

हम प्रो. दौलतसिंह कोठारी की पुण्यतिथि पर उनके द्वारा हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के लिए किए गए उनके कार्यों का स्मरण करते हैं और उन्हे श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.

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