फिर से ज़ख़्मी म्यांमार

● श्याम सुंदर भाटिया
दुनिया को जैसा अंदेशा था, बिल्कुल वैसा ही हुआ, लेकिन नोबल पुरस्कार विजेता एवम् डेमोक्रेसी की प्रबल प्रहरी आन सान सू की सेना के इस खतरनाक इरादों को सूंघ नहीं पाईं। पड़ोसी मुल्क म्यांमार में अंततः लोकतंत्र फिर से चोटिल हो गया है। बेइंतहा ताकतवर सेना के तख्तापलट के बाद नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी-एनएलडी की सुप्रीमो अब सेना के कब्जे में हैं। राष्ट्रपति यू विन मिंट को पदाच्युत करके सत्ता सेना प्रमुख मिन आंग लाइंग को सौंप दी गई है। उपराष्ट्रयपति मिंट स्वे की कार्यकारी राष्ट्रेपति के लिए ताजपोशी कर दी गई है। पांच दशक तक सत्ता में रहने के बाद म्यांमार एक बार फिर सेना की गिरफ़्त में है। वहां एक साल के लिए आपातकाल घोषित कर दिया गया है। 2015 में उम्मीद जगी थी, लोकतंत्र का उदय हो गया है। संसदीय चुनाव में आन सान सू की की पार्टी एनएलडी बहुमत से सत्तारूढ़ तो हो गई, लेकिन 2008 के संविधान की जड़ों में गहरी सैन्य प्रावधान होने से न तो आन सान सू की राष्ट्रपति बन पाईं और न ही एनएलडी सरकार के 2020 में सौ से अधिक संवैधानिक संशोधनों प्रस्तावों को कानून में तब्दील करा पाईं। इन संशोधनों में वे अनुच्छेद भी शामिल थे, जिनकी वजह से आन सान सू की राष्ट्रपति पद के लिए अयोग्य करार दे दी गईं थीं। इन मसौदों पर सेना के प्रतिनिधियों का विरोध स्वाभाविक था। सच में हुआ भी ऐसा। सैन्य प्रतिनिधियों की मुखालफत के चलते कोई भी प्रस्ताव मंजूर नहीं हो सका।

कभी बर्मा नाम से पहचाने जाने वाले म्यांमार में सेना और लोकतंत्र गाड़ी के दो पहियों के मानिंद नहीं हो पाए। नतीजन लोकतंत्र बेपटरी हो गया। म्यांमार में तख्तापलट सियासत को समझने के लिए 2008 के संविधान के पन्नों को पलटना जरूरी है। वहां के सैन्य तानाशाहों की नीयत यह नहीं रही, म्यांमार की माटी में लोकतंत्र पुष्पित -पल्लवित हो। संसद की 25 प्रतिशत सीटें वहां की सेना के लिए आरक्षित हैं। ये सीटें 2008 के संविधान के मुताबिक रिजर्व हैं। इसके अलावा सेना के प्रतिनिधियों के लिए तीन अहम मंत्रालय – गृह, रक्षा और सीमा मामलों से जुड़ा मंत्रालय भी शामिल है। इसी वजह से सरकार वहां के संविधान में कोई भी सुधार करने में नाकाम रहती है। म्यांमार के संविधान की जड़ों में सेना की गहरी पैठ है। यूं तो म्यांमार अब संघीय गणराज्य व्यवस्था वाला देश है, जहां पांच साल में एक बार-एक साथ राष्ट्रीय, प्रांतीय और क्षेत्रीय स्तर पर चुनाव होते हैं।

लोकतांत्रिक इतिहास में दूसरी बार हुए चुनाव में वैसे तो करीब सौ सियासी दलों ने भागीदारी की, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दो दलों के बीच ही चुनावी जंग हुई। आन सान सू की की एनएलडी और सेना के पूर्व अफसरों की पार्टी यूएसडीपी में मुख्य मुकाबला हुआ। इसमें आयरन लेडी के दल एनएलडी के हाथों फिर सत्ता की चाबी आ गई। नवंबर 2020 के चुनावी नतीजों को म्यांमार की सेना पचा नहीं पाई। आग बबूला, लेकिन शातिर सैन्य ताकतों ने राष्ट्रपति भवन से लेकर चुनाव आयुक्त तक यह कह कर दस्तक दी, चुनाव नतीजों में बड़े स्तर पर हेराफेरी हुई है। सैन्य ताकतों को इन दोनों उच्च वैधानिक संस्थाओं से मन मुताबिक पॉजिटिव रिस्पॉन्ड नहीं हुआ तो रातों-रात बंदूकों के साए में चुनी हुई सरकार को बंधक बना लिया। सच्चाई यह है, फर्स्ट फरवरी को नई संसद का सत्र का श्रीगणेश होना था, लेकिन अल सुबह आयरन लेडी आन सान सू की , राष्ट्रपति यू विन मिंट समेत एनएलडी दिग्गज नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। दरअसल सैन्य ताकतों ने लोकतंत्र के जनादेश को सैनिकों के जूतों, रायफलों की नोकों और ताकत की मदहोशी में कुचल दिया। सेना की सत्ता की भूख के चलते चंद बरसों बाद म्यांमार में लोकतंत्र फिर लहूलुहान है।

म्यांमार का भारत से गहरा रिश्ता है। 1937 तक बर्मा भी भारत का अभिन्न अंग था। यह बाद दीगर है, ब्रिटिश राज के अधीन था। भारत और म्यांमार की सीमाएं आपस में लगती हैं। पूर्वोत्तर में चार राज्य -अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड की 1600 किमी लम्बी सीमा म्यांमार के साथ लगती है। भारत-म्यांमार के करीब 250 गांव सटे हैं। इनमें तीन लाख से ज्यादा लोग रहते हैं। ये अक्सर बॉर्डर क्रॉस करते हैं। म्यांमार में बौद्धों की संख्या सर्वाधिक है। इस नाते भी भारत का सांस्कृतिक सम्बन्ध बनता है। पड़ोसी देश होने के कारण भारत के लिए म्यांमार का आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक खासा महत्व है। भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी म्यांमार बहुत महत्वपूर्ण है। म्यांमार न केवल सार्क, आसियान का सदस्य है, बल्कि तेजी से बढ़ते दक्षिण पूर्व एशिया की अर्थ व्यवस्था का एक द्वार भी है। भारत के लिए थाईलैंड और वियतनाम सरीखे देशों के बीच वह सेतु के मानिंद भी है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी सरकार के पड़ोसी पहले की नीति के तहत तत्कालीन विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने 2014 में म्यांमार की यात्रा की थी। आन सान सू की से भारत का विशेष रिश्ता है। इस आयरन लेडी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज में अपनी स्टडी की। इनकी माताश्री खिन की भारत में राजदूत भी रही हैं। आन सान सू की को संघर्ष करने का ज़ज़्बा विरासत में मिला है। वह म्यांमार के राष्ट्रपिता आंग सांग की पुत्री है, जिनकी 1947 में राजनीतिक हत्या कर दी गई थी। उन्होंने बरसों-बरस जेल में तो रहना पसंद किया, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। भारत से सू का गहरा नाता है। लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति गहरी आस्था रखने वाली सू की को नोबल शांति पुरस्कार के अलावा भारत का प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार भी मिल चुका है।

सैन्य तख़्तापटल के बाद म्यांमार के हालात नाजुक हैं। बड़े शहरों में मोबाइल, इंटरनेट डाटा और फ़ोन सर्विस बंद कर दी गई है। सरकारी चैनल एमआरटीवी का प्रसारण नहीं हो रहा है। म्यांमार की राजधानी नेपिडॉ के साथ सम्पर्क टूट चुका है। सबसे बड़े शहर यंगून इंटरनेट कनेक्शन तक सीमित है। बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ टीवी समेत अंतर्राष्ट्रीय प्रसारकों को ब्लॉक कर दिया गया है। स्थानीय स्टेशन ऑफ एयर कर दिए गए हैं। बैंकों ने फिलहाल सभी आर्थिक सेवाओं को रोक दिया है। नकदी की कमी न हो, इस आशंका ने मद्देनजर यंगून में एटीएम के बाहर लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। भारत, अमेरिका, यूएनओ, ब्रिटेन समेत दुनिया के बड़े देशों ने म्यांमार के बिगड़ते हालात पर गहरी चिंता जताई है। भारत का विदेश मंत्रालय म्यांमार की स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है। बीबीसी दक्षिण-पूर्व एशिया के संवाददाता जॉनथन हेड ने मौजूदा हालात पर सटीक कमेंट करते हुए कहा, म्यांमार सेना का यह कदम दस साल पहले उसी के बनाए संविधान का उल्लंघन है।

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