किसान आंदोलन और आंदोलनों के पांच ठेकेदार

दीपक उपाध्याय

देश में आंदोलनों की इतिहास बहुत ही पुराना है, लेकिन पिछले कुछ सालों आंदोलन करने के ठेके दिए जाने लगे हैं। नर्मदा बचाओ से अन्ना आंदोलन, जेएनयू आंदोलन, सीएए आंदोलन और अब किसान आंदोलन जैसे प्रमुख इन सभी आंदोलनों में कुछ किरदार ऐसे हैं जोकि पिछले 25 सालों से आंदोलनों के काम पर ही टिके हैं।  हालांकि किसान आंदोलन में सामने दिखाने वाले चेहरे बेशक कुछ किसान यूनियन के हैं, लेकिन इन यूनियन को चलाने वाले ये वही लोग हैं जोकि देश में ख़ासकर मोदी सरकार के हर फैसले के खिलाफ आंदोलन के नाम पर धरने प्रदर्शन करने का काम करते हैं। ये आंदोलन वाले नेता टुकड़े टुकड़े गैंग से लेकर शाहीन बाग के जरिए रास्ते ब्लॉक कराने मे माहिर माने जाते हैं। वैसे तो ये सब छोटे छोटे आंदोलन करते रहते हैं, लेकिन जैसे ही कोई बड़ा आंदोलन होता है तो उनमें ये सभी लोग एकसाथ आ जाते हैं। किसान आंदोलन में किसानों के हमदर्द के तौर पर काम कर रहे इनमें से एक का भी किसानी से कोई संबंध नहीं रहा है। ज्य़ादातर आंदोलन के नाम पर राजनीति करते रहे हैं। चलिए इन आंदोलन वाले नेताओं के पांच प्रमुख लोगों के बारे में हम आपको बताते हैं।

मेधा पाटकर

एक समय नर्मदा आंदोलन का दूसरा नाम मानी जाने वाली मेधा पाटकर और विकास की किसी भी गतिविधि के खिलाफ मज़दरों का मोर्चा निकालने वाली के तौर पर जाना जाता है। इन्होंने नर्मदा आंदोलन चलाया, जिसमें नर्मदा नदी पर बांध बनने के खिलाफ लोगों को भड़काया गया था। इन्होंने वकील प्रशांत भूषण के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न अदालतों में कई केस लगाए। अब जब नर्मदा प्रोजेक्ट पूरा हो गया है तो मध्यप्रदेश से लेकर गुजरात की एक बड़ी आबादी इस प्रोजेक्ट से लाभ ले रही है। लाखों एकड़ खेती को अब पानी मिलने लगा है। जिन 25-30 हज़ार किसानों के नाम पर ये प्रोजेक्ट रोकने के लिए आंदोलन खड़ा किया गया था। उससे कई गुना यानि लाखों किसानों को इस परियोजना से अपने खेतों के लिए पानी मिला है। इस परियोजना से करीब 1.30 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई शुरू हो सकी। मेधा पाटकर भी इसके बाद से अभी तक सभी आंदोलनों में सक्रिय रही है, सीएए आंदोलन में भी इन्हें देखा गया था। फिलहाल इनका नेशनल अलाइंस फॉर प्यूपल मूवमेंट इस किसान आंदोलन का हिस्सा है।

योगेंद्र यादव

हन्नान मोला, वीएम सिंह और योगेंद्र यादव

हरियाणा के रिवाड़ी जिले के योगेंद्र यादव पहले एक सेफोलॉजिस्ट थे। जोकि टीवी चैनलों पर और अखबारों में चुनाव के गणित समझाते थे। बाद में ये साफ्ट लेफ्ट के सदस्य के तौर पर आंदोलनों का हिस्सा बनने लगे। अन्ना आंदोलन के समय ये और वकील प्रशांत भूषण ने मिलकर आंदोलन को बड़ा बनाने में बड़ी भूमिका निभाई और बाद में आम आदमी पार्टी की स्थापना भी की। लेकिन पार्टी पर अरविंद केजरीवाल ने कब्जा कर लिया और ये फिर इन्होंने नए आंदोलनों के लिए में स्वराज इंडिया नाम का संगठन बनाया जिसने दिल्ली में चुनाव लड़ा और असफल रहा। जेएनयू में जब टुकड़े टुकड़े गैंग भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगा रहा था। तब ये इस गैंग के पक्ष में मीडिया में बयान दे रहे थे। बाद में शाहीन बाग आंदोलन को भी इनकी टीम ने ही चलाया। जिसमें उमर खालिद और शरजील शामिल थे। लेकिन वहां भी ये ही तय करते थे कि मीडिया में आंदोलन को बनाए रखने में आज क्या करना है। इनका और वकील प्रशांत भूषण का काफी करीबी रिश्ता है। ख़ास बात ये है कि मेधा पाटकर का भी वकील प्रशांत भूषण के साथ करीबी रिश्ता है।

अविक साहा

किसान आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभा रहे अविक साहा पेशे से तो वकील रहे हैं, परिवार भी वकीलों का रहा है। लेकिन आंदोलनों से इनका विशेष लगाव है, आंदोलन कैसा भी हो कहीं भी हो। बस अविक बाबू का काम शुरू हो जाता है। योगेंद्र यादव और अविक साहा के बीच ख़ास दोस्ती है। स्वराज इंडिया में महासचिव होने, किसान संघर्ष समंनवय समिति के कार्डिनेटर के साथ साथ अविक का लेफ्ट पार्टियों के साथ ख़ास संबंध हैं। किसी भी आंदोलन के लिए लेफ्ट पार्टियों के कार्यकर्त्ता इनके कहने से जुट जाते हैं। तमिलनाडू में वेदांता अल्मूनियम प्लांट पर आंदोलन में इनका विशेष प्रभाव रहा है। जोकि बाद में बंद हो गया। दरअसल ये संगठन को जोड़ने की भूमिका में हर आंदोलन से जुड़े रहते हैं। सीएए के खिलाफ आंदोलन में भी ये पर्दे के पीछे विशेष रूप से सक्रिय थे। बंगाल में भी ये ख़ासे सक्रिय हैं।

अतुल अंजान

ये भी लेफ्ट पार्टी के बड़े नेता हैं, सीपीआई आई के राष्ट्रीय सचिव भी ऑल इंडिया किसान सभा के महासचिव भी है। दरअसल ऑल इंडिया किसान सभा दो हैं, एक सीपीएम के पास है तो दूसरी सीपीआई के पास। सीपीआई वाली किसान सभा के आंदोलनों को अतुल अंजान देखते हैं। लेकिन दोनों किसी भी सरकार विरोधी आंदोलन में अक्सर एक साथ ही होते हैं। मेधा पाटकर से लेकर अन्ना आंदोलन तक सभी का समर्थन अतुल अंजान और उनके संगठनों ने किया है। सीएए आंदोलन में भी अंजान ने विभिन्न राज्यों में जाकर सीएए के खिलाफ लोगों को सरकार के कानून के खिलाफ सड़कों पर उतरने के लिए कहा था। धारा 370 के हटने पर भी अंजान ने सरकार के खिलाफ बिगुल बजाया था। मोदी सरकार के हर कदम की खिलाफत करने और उसपर लोगों को सड़कों पर निकालने और धरने-प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करने में अक्सर आगे वाली कतार में होते हैं।

हन्नान मौला

अपनी स्कूल के दिनों से ही लेफ्ट पार्टी सीपीआई के सदस्य रहे हन्नान भी आंदोलन विशेषज्ञ है। ये किसानों के होने वाले सभी आंदोलनों का हिस्सा रहते हैं। लेफ्ट पार्टी सीपीआईएम में पोलित ब्यूरो के सदस्य मौला ऑल इंडिया किसान सभा के महासचिव भी हैं। साथ ही ये इस किसान आंदोलन में केंद्रीय कमेटी के सदस्य भी हैं। आठ बार के सांसद रहे मौल भी नर्मदा बचाओ आंदोलन का सक्रिय हिस्सा रहे हैं। इसके बाद वो राजस्थान,  महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में हुए किसान आंदोलन का भी सक्रिय सदस्य रहे। देश में लेफ्ट समर्थन से जितने भी आंदोलन हुए हैं, उनमें ये अपने ऑल इंडिया किसान सभा के साथ समर्थन के लिए पहुंच जाते हैं। दिल्ली बॉर्डर पर हो रहे आंदोलन में तो ये और इनके संगठन ही बाकी किसान संगठनों को अपने हिसाब से चला रहे हैं। ख़ास बात ये है कि हन्नान मौला का कभी किसानी से संबंध नहीं रहा है।

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