विश्व गुरू बनने की आहट देती विदेश नीति

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-प्रवीण दुबे-
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नरेन्द्र मोदी सरकार के गठन को बीस दिन से कुछ अधिक का समय पूर्ण हो चुका है। इस अल्प अवधि में ही प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विदेश नीति से अपने पड़ोसी देशों विशेषकर चीन और पाकिस्तान के ऊपर खासा प्रभाव छोड़ा है। इसका विश्लेषण किया जाए तो मोदी की वैदेशिक कूटनीति के कई मायने नजर आते हैं। एक तरफ नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान को प्रधानमंत्री को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित करके साफ तौर पर संकेत दिए कि भारत युद्ध नहीं शांति का पुजारी है। भारत को दुश्मनी नहीं दोस्ती प्यारी है। लेकिन इसके साथ ही मोदी ने बातों ही बातों में नवाज शरीफ को यह भी समझा दिया कि सीमा पार से आने वाली बम और गोलियों की आवाजों के बीच शांति और दोस्ती की आवाज कहीं दब सी जाती है। संकेत साफ था कि सीमा पार पाकिस्तान से जारी आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाई जाए। इसके साथ ही यह भी साफ था कि जिस कश्मीर को लेकर पाकिस्तान से आतंकी गतिविधियां जारी हैं वह कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है और शांति के लिए पाकिस्तान को कश्मीर में जारी बम और गोलियों का षड्यंत्र भी बंद करना पड़ेगा। अब यह बात अलग है कि नवाज शरीफ ने इस संकेत को कितना और कहां तक समझा और शांति तथा दोस्ती के लिए मोदी की इस शर्त को कितना स्वीकार किया। फिलहाल तो नवाज अकेले नजर आ रहे हैं और पाकिस्तानी सेना उनकी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है। वैसे तो नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान द्वारा भारत में जारी आतंकवाद और उसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार भारत के भगोड़े दाऊद इब्राहिम के बारे में अपनी नीति को चुनाव से पूर्व ही एक साक्षात्कार के दौरान स्पष्ट कर दिया था। मोदी ने साफ तौर पर कहा था कि दाऊद को भारत लाने के हर संभव प्रयास होंगे और इसके लिए उन्होंने लादेन को समाप्त करने वाली अमरीकी योजना का भी अपरोक्ष से समर्थन किया था। मोदी ने कहा था अमेरिका ने लादेन को समाप्त करने से पहले अपनी योजना को सार्वजनिक नहीं किया था। उनका संकेत साफ था कि यदि पाकिस्तान नहीं माना तो अमेरिका की तर्ज पर भारत भी भगोड़े दाऊद को पकडऩे या उसे समाप्त करने की एकतरफा कार्रवाई को भी अंजाम दे सकता है। हालांकि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने अभी तक दाऊद को लेकर कुछ नहीं बोला है, लेकिन मोदी को जानने वालों का यह मानना है कि मोदी इतने महत्वपूर्ण विषय पर चुप नहीं बैठने वाले और इसको लेकर उनका दिमाग रणनीति बनाने में जुटा होगा। इसके संकेत इस बात से भी मिल जाते हैं कि उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में जिन अजित डोभाल की नियुक्ति की है उन्हें पाकिस्तान की अंदरूनी जानकारी का विशेषज्ञ माना जाता है। श्री डोभाल ने आतंकवादी विरोधी ऑपरेशन, आईएसआई पर विशेषज्ञता के साथ पाक परमाणु संयंत्र काहुटा की जासूसी भी की थी। वे लंबे समय तक पाकिस्तान में तैनात रहे और पाकिस्तान की भारत को खुफिया जानकारी देते रहे।

जहां तक चीन का सवाल है तो मोदी प्रधानमंत्री बनने से पूर्व और पश्चात यह कह चुके हैं कि भारत को चीन के समकक्ष खड़ा करना उनकी प्राथमिकता है। मोदी की चीन को लेकर रूचि कितनी अधिक है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मोदी ने तीन बार चीन की यात्रा की।

अब यह बात अलग है कि अब वे देश के प्रधानमंत्री हैं और वर्तमान में चीन भारत का सबसे ताकतवर शत्रु देश। इस दृष्टि से मोदी ने पाकिस्तान से थोड़ा अलग हटकर उसे बहुत कुछ संकेत दे दिए हैं। भारत के सबसे निकट और सामरिक, आर्थिक दृष्टि से सबसे कमजोर कहे जा सकने वाले पड़ोसी देश भूटान की यात्रा को प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी द्वारा प्रथम प्राथमिकता देना बहुत कुछ इशारा करता है। भले ही भूटान एक छोटा देश है लेकिन भोगोलिक और सामरिक दृष्टि से वह भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। दक्षिण एशिया स्थित हिमालय पर बसे होने के कारण भूटान भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। दूसरा यह चीन, तिब्बत और भारत के बीच स्थित होने के कारण भूटान से बेहतर संबंध चीन पर नजर रखने के लिए अथवा कई सैन्य कारणों से भारत के लिए बेहद लाभकारी कहे जा सकते हैं। वैसे भी भूटान भले ही सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से तिब्बत से जुड़ा है, जिसे की चीन अपना हिस्सा कहता रहा है, लेकिन भौगोलिक और राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर वर्तमान में यह देश भारत के करीब है। साफ है चीन से विवाद की स्थिति में तिब्बत को लेकर भूटान के साथ यदि भारत की निकटता बनती है तो यह भारत के लिए सैन्य दृष्टि से बहुत अच्छा कहा जा सकता है।

ऐसा लगता है कि नरेन्द्र मोदी चीन से तनावपूर्ण संबंध और तिब्बत पर उसकी दादागिरी की स्थिति में भूटान और तिब्बत से भारत के अच्छे संबंधों के दूरगामी परिणामों को भली प्रकार समझते हैं यही वजह है कि उन्होंने पहले अपने शपथ ग्रहण समारोह में निर्वाचित तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. लोवजंग सांग्ये और उनके गृहमंत्री डोलमा गेयरी को यह जानते हुए भी आमंत्रित किया कि इससे चीन नाराज होगा। यह पहली बार हुआ कि निर्वाचित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री को इस प्रकार के समारोह में आमंत्रित किया गया। स्वयं भूटानी प्रधानमंत्री अपनी इस यात्रा को लेकर कितने निरुत्साहित थे इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके अपने शब्दों में ‘मैंने सोचा था कि मुझे कहीं पीछे की कतारों में बिठा दिया जाएगा ताकि मैं भीड़ में गुम रह सकूं, लेकिन जब मैंने अपना निमंत्रण पत्र दिखाया तो आयोजकों ने मुझे आगे की कतार में बैठने के लिए कहा।’ वास्तव में यह नरेन्द्र मोदी की दूरगामी सोच का ही नतीजा था जिसके मुताबिक तिब्बत को दिए जा रहे महत्व के परिणाम सामने आने ही थे।। ऐसा हुआ भी और सांग्ये को इस समारोह में निमंत्रित किए जाने और उसे आगे की कुर्सी पर स्थान दिए जाने पर चीन ने अपना असंतोष लिखित रूप में दर्ज कराया। साफ है मोदी का तीर निशाने पर लगा। वैसे भी मोदी जो कुछ कर रहे हैं वह अचानक नहीं हो रहा। विदेश नीति को लेकर भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि हम अपने पड़ोसियों के साथ मैत्री संबंध सुदृढ़ करेंगे लेकिन आवश्यकता पडऩे पर सख्त कदम और मजबूत निर्णय लेने में भी नहीं हिचकिचाएंगे। तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. लोवजंग को शपथ ग्रहण समारोह में प्राथमिकता से बुलाकर मोदी ने अपने घोषणापत्र की सार्थकता को स्पष्ट कर दिया है।

मोदी के शुरुआती कदम पर क्या प्रतिक्रिया होगी इसके लिए तो इंतजार करना पड़ेगा लेकिन फिलहाल जो तस्वीर उभर रही है उसे देखकर साफतौर से यह कहा जा सकता है कि भारत दक्षिण एशिया के देशों का नेतृत्व करने की दृष्टि से अपनी जमीन तैयार करता दिखाई दे रहा है और प्रारंभिक रूप से इस कदम में भारत को सफलता मिलती भी दिखाई दे रही है। मोदी की सफल कूटनीतिक चालों के सामने जहां पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ढीले पड़ते दिख रहे हैं वहीं भारत के सबसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी चीन की खिसियाहट भी साफ नजर आ रही है। जैसा कि तिब्बत प्रधानमंत्री को आमंत्रण मामले में उसके द्वारा दर्ज कराए विरोध से परिलक्षित होता है। अब देखना यह होगा कि चीन से जारी सीमा विवाद और पाकिस्तान द्वारा लगातार अलापे जाने वाले राग कश्मीरी से निपटने की रणनीति को मोदी कैसे अंजाम देते हैं। देश इस ओर उत्सुकता भरी नजरें गढ़ाए है।

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