लेखक परिचय

इक़बाल हिंदुस्तानी

इक़बाल हिंदुस्तानी

लेखक 13 वर्षों से हिंदी पाक्षिक पब्लिक ऑब्ज़र्वर का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं। दैनिक बिजनौर टाइम्स ग्रुप में तीन साल संपादन कर चुके हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अब तक 1000 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी नजीबाबाद पर एक दशक से अधिक अस्थायी कम्पेयर और एनाउंसर रह चुके हैं। रेडियो जर्मनी की हिंदी सेवा में इराक युद्ध पर भारत के युवा पत्रकार के रूप में 15 मिनट के विशेष कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में जानेमाने हिंदी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिंदी ग़ज़लकार के रूप में दुष्यंत त्यागी एवार्ड से सम्मानित किये जा चुके हैं। स्थानीय नगरपालिका और विधानसभा चुनाव में 1991 से मतगणना पूर्व चुनावी सर्वे और संभावित परिणाम सटीक साबित होते रहे हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के लिये होली मिलन और ईद मिलन का 1992 से संयोजन और सफल संचालन कर रहे हैं। मोबाइल न. 09412117990

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0 जिसका डर था वो ही बात हो गयी अब अमेरिका चुप क्यों!

इक़बाल हिंदुस्तानी

अमेरिका और नाटो देशों ने ईराक़ और अफगानिस्तान से ऐसा लगता है कि कोई सबक नहीं लिया है। पहले अफगानिस्तान से रूस को बाहर करने के लिये उसने जिन कट्टरपंथियों का सहारा लिया था उनको निशस्त्र किये बिना वह वहां से बाहर निकल आया था। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान ने इस भस्मासुर को पहले भारत और एक दिन बढ़ते बढ़ते खुद अमेरिका के खिलाफ मोर्चा खोलने लायक बनाकर बेकाबू करके छोड़ दिया। अभी अमेरिका इसकी कीमत आतंकवाद, मंदी और सियासी उथल पुथल के रूप में चुका ही रहा था कि अब उसने लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी को विद्रोहियों के हाथों ठिकाने लगवाकर अपने हाल पर छोड़ने का एक और कारनामा अंजाम दे दिया है। यह बात हम इस आधार पर कह रहे हैं कि सब जानते हैं कि यूएनओ और नाटो में अमेरिका जो चाहता है वही होता है क्योंकि अगर वहां वह नहीं होता है तो खुद अकेले अमेरिका वह करके ही दम लेता रहा है जो वह विश्व बिरादरी से कराना चाहता है।

हम बात कर रहे थे उस डर की जो लीबिया में कर्नल मुअम्मर गद्दाफी को सत्ता से हटाने के बाद सामने आने का अंदेशा जानकारों ने पहले ही ज़ाहिर कर दिया था। लीबिया में एक तानाशाह को ख़त्म करना वहां के संकट के ख़ात्मे की नहीं बल्कि शुरूआत की पहचान है। वहां नेशनल ट्रांजीशनल काउंसिल की अंतरिम सरकार के प्रेसीडेंट मुस्तफा जलील का कहना है कि देश के पुनर्गठन में शरई कानून का पालन किया जायेगा। इसका मतलब लीबिया कट्टरपंथ का एक और नया केंद्र हो सकता है। इसके तहत एक से अधिक विवाह पर लगी पाबंदी हटेगी और बैंकों से ब्याज का लेनदेन ख़त्म किया जायेगा। बात इतनी ही होती तो समझा जा सकता था लेकिन बात बहुत दूर तक जायेगी जिसको अमेरिका अपने तेल के खेल के चक्कर में नज़रअंदाज़ करता नज़र आ रहा है।

दरअसल गद्दाफी से लेकर सद्दाम तक के सफाये को अमेरिका और पश्चिमी देशांे ने इस आधार पर जायज़ ठहराने की कोशिश की है कि ये दोनों तानाशाह लोकतंत्र नहीं आने दे रहे थे लेकिन यह आधा सच है। इतिहास बताता है कि सन 1961 में कांगो के पहले निर्वाचित प्रधनमंत्री पैट्रिस लुमुंबा को अमेरिका ने दो माह के भीतर अपनी नापसंदगी के कारण न केवल गद्दी से हटवाया बल्कि दुनिया से विदा करा दिया। ऐसे ही चिली के जनतांत्रिक सिस्टम से चुने गये राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंडे जब अपने देश को तानाशाही से आज़ाद रखने की सख़्त नीतियों पर अमल करते हुए उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने लगे तो अमेरिका ने एक षड्यंत्र के तहत उनको ख़त्म कराके फौजी तानाशाह पिनोशे को वहां की सत्ता सौंपने में मदद की। निकारागुआ का 1979 का दौर याद करें तो देश को तानाशाही से मुक्त कराकर जब डेनियल ऑटेर्गा ने सरकार बनाई तो सीआईए ने कॉन्ट्रा विद्रोहियों को न केवल भरपूर आर्थिक सहायता दी बल्कि सीधे हथियार और गोला बारूद देकर उनको सत्ता से बेदख़ल करा दिया।

कहने का मतलब यह है कि जो अमेरिका और पश्चिमी देश अपने पूंजीवादी मीडिया और हर तरह के प्रभाव के ज़रिये पूरी दुनिया में यह प्रचार करके अपने दुश्मनों को निशाना बनाते रहे हैं कि वे तानाशाह हैं, उनकी ज़बान पर लोकतंत्र भले ही हो लेकिन दिमाग़ में हमेशा अपना स्वार्थ रहता है। ऐसा ही कुछ संदेश ट्यूनीशिया और मिस्र का देने की कोशिश की गयी लेकिन यह सच होते हुए भी एक सच और है जो पूरी दुनिया के सामने आना चाहिये कि इन देशों के तानाशाह अमेरिका के इशारों पर नाचते रहे जिससे प्राकृतिक संसाधनों से लब्रेज़ होने के बावजूद पश्चिमी देशों को नाजायज़ लाभ पहुंचाने से इन देशों में बदहाली बढ़ती गयी। इसका नतीजा यह हुआ कि मध्य पूर्व के देशों में बेरोज़गारी दर पिछले साल रिकॉर्ड 25 प्रतिशत तक पहंुचने लगी। मिस्र में बेरोज़गरी दर 34 प्रतिशत तक हो चुकी थी जिसे दुनिया की सबसे ज़्यादा दर माना जा रहा है। 0यह तब और गंभीर बात हो जाती है जबकि पूरी दुनिया की आबादी का सबसे अधिक यानी 70 प्रतिशत हिस्सा युवाओं का अरब मुल्कों में माना जाता है। बेरोज़गारी के संग बेतहाशा बढ़ती ज़रूरी चीज़ों की महंगाई और जमाखोरों व मुनाफाखोरों पर सरकार का नियंत्रण न होना वहां भ्रष्टाचार को खुलकर खेलने का मौका दे रहा था। यानी ऐसी ख़तरनाक बगावत की हालत पैदा होने के बावजूद वहां के तानाशाह शासकों ने अमेरिका को कभी नाराज़ नहीं किया जिससे जनता का गुस्सा दिन पर दिन बढ़ता ही गया। इस तरह से देखा जाये तो जिसे इन्क़लाब समझा जा रहा है वह नागनाथ को हटाकर सांपनाथ को सत्ता सौंपने का तेल का अमेरिकी खेल ही अधिक नज़र आता है। वहां विद्रोहियों के पास अमेरिकी ही नहीं सरकारी कब्ज़े से लूटे हथियार इतने अधिक मौजूद हैं कि वे किसी न किसी रूप में सालों तक हिंसा करते रहेंगे।

कम लोगों को पता होगा कि लीबिया में कर्नल गद्दाफी का सत्ता में आना अमेरिका और यूरूपीय देशों को कितना नागवार गुज़रा था लेकिन घाटे का सौदा होने के बावजूद वे कुछ कर नहीं पा रहे थे। गद्दाफी के नेतृत्व में लीबिया हमेशा अमेरिका के साम्राज्यवाद के खिलाफ मज़बूती से खड़ा रहा । तेल की ताकत से लीबिया की बात पूरी दुनिया में गंभीरता से सुनी जाती रही है। कर्नल गद्दाफी ने अपनी ग्रीन बुक और गैर वामपंथी गैर पूंजीवादी तीसरी अंतर्राष्ट्रीय नई नीति से इस्लाम की कुछ प्रगतिशील बातों को शामिल कर लीबिया के कबीलाई गुटों और जनतंत्र के कुछ उसूलांे को लेकर जो सपना देखा था वह 42 साल के लंबे शासन के बाद भी अधूरा रहा और लीबिया विकास को लेकर पक्षपात और अन्याय के आरोपोें से दो हिस्सों में बंटकर खानाजंगी का शिकार हो गया। साथ ही अमेरिका ने चीन को लीबिया के ज़रिये यह मैसेज भी दिया है कि उसका प्रतिद्वंद्वी अगर किसी देश को सड़क, पुल और बांध बनाने में मदद कर लीबिया की तरह कोई नया प्रयोग करेगा तो उसका यही हश्र होगा।

इतना ही नहीं चीन के साथ साथ भारत और रूस ने भी लीबिया से जब बेहतर तालमेल बनाकर तेल के कारोबार में कुछ छूट हासिल की तो अमेरिका के अहंकार को चोट पहुुंची। सबको पता है कि विद्रोही तो काफी समय से गद्दाफी को सत्ता से हटाना चाहते थे लेकिन बिना अमेरिका और नाटो की मदद लिये वे कभी ऐसा नहीं कर पाते जिससे अमेरिका ने एक तीर से दो शिकार करते हुए लीबिया के तेल और सूडान व सीरिया के विरोध को अपनी शक्ति से साधने की एक नई चाल चली है। अब यह तो समय ही तय करेगा कि लीबिया गद्दाफी के नेतृत्व में बेहतर और शांत था या फिर अमेरिका की शह पर नई सरकार बनने पर अधिक विकास करेगा।

गद्दाफी को तानाशाह बताकर मौत के घाट उतार देना उस कहावत की याद दिलाता है कि किसी कुत्ते को मारना हो तो पहले उसको पागल घाषित कर दो। अमेरिकी प्रसीडेंट रोनाल्ड रीगन ने गद्दाफी की साम्राज्यवाद विरोधी हरकतों से तंग आकर एक बार कहा भी था कि गद्दाफी दुनिया का पागल कुत्ता है। उस समय तो न सही लेकिन आज उनकी यह बात प्रेसिडेंट ओबामा ने अपने शिकार को निशाना बनाकर पूरी कर दी। यह सवाल अब बार बार उठ रहा है कि अमेरिका दुनिया का दारोगा कब तक बना रहेगा? संप्रभु देशों में नागरिक सुरक्षा के बहाने वह कब तक नाजायज़ और गैर कानूनी दख़ल देता रहेगा? दरअसल यह कांटा अमेरिका को तभी से चुभा हुआ था जब गद्दाफी ने 1970 मंे तेल का राष्ट्रीयकरण कर लीबिया को दोनों हाथों से लूट रही अमेरिकी कम्पनियों को देश निकाला दिया था। उन दिनों गद्दाफी सबसे बड़े देशभक्त और अरब के शेर कहलाते थे।

इतना ही नहीं गद्दाफी ने अंतराष्ट्रीय राजनीति में एक हीरो की हैसियत हासिल करने को अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस, रॉबर्ट मुगाबे, सैम निजोमा, योवेरी मुसेविनी और यासर अराफात जैसे तमाम संघर्षशील शक्तियों को नैतिक ही नहीं आर्थिक और सैनिक सहायता लंबे समय तक खुलकर दी। यही वजह थी कि 1990 मंे जब सारी दुनिया ने नेल्सन मंडेला को अमेरिकी शह पर यूएनओ के प्रतिबंध झेल रहे लीबिया जाने से रोका तो भी वह अपने तीन दशकों के सहयोगी गद्दाफी के पास गये। गद्दाफी ने औपनिवेशिक राज से बाहर निकलने मंे कई देशों को खुलकर मदद की थी जिससे अमेरिका उनसे पहले ही ख़फा रहा है। हालांकि गद्दाफी का सत्ता हथियाना और तानाशाह बनकर अपनी ही जनता का खून बहाना किसी तरह से भी न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता लेकिन जब वे लीबिया की सत्ता में आये तो लीबिया बुनियादी सुविधाओं से वंचित एक बंजर भूमि की तरह था। आज लीबिया का जो विकास और प्रगति हुयी है उसमें गद्दाफी का ही दिमाग काम कर रहा था। एक क्रूर तानाशाह होने की सज़ा गद्दाफी को मिलनी ही थी लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी देशों से यह ज़रूर पूछा जाना चाहिये कि वे पाकिस्तान और सउूदी अरब जैसे कट्टरपंथी और आतंकवाद के जनक देशों को कैसे सहन कर लेते हैं?

0 तुम जिस्म के खुशरंग लिबासों पे हो नाज़ां,

मैं रूह को मोहताजे कफ़न देख रहा हूं।।

2 Responses to “गद्दाफी के बाद लीबिया कट्टरपंथ की ओर…”

  1. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    सदियों से इस्लाम सत्ता प्राप्त करने का साधन रहा है पहले अंग्रेजो ने फिर अमेरिका ने इस बात को पहचान कर हवा दी तो उसमे उनकी एक रानीतिक कुशलता ही है लेकिन सभी सम्र्ज्यवादियो व् इस्लाम को हथियार बना कर सत्ता प्राप्त करने वालो को सावरकर जी की ये बात कभी नहीं भुलानी चाहिए की एक बार ये मजहबी जुनूनी हावी हुवे तो सब कुछ अपने मजहब के हिसाब से चलाना चाहेंगे अपने सपोर्ट का हिसाब मंगेनेगे| क्या खुद इस्लाम के मत वाले भी सब कुछ शरियत के अनुसार चलाना चाहेंगे????

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  2. आर. सिंह

    R.Singh

    इक़बाल हिन्दुस्तानी जी इसी सम्बन्ध में एक लेख पहले भी आ चुका है ,जिसके लेखक तनवीर जाफरी जी हैं.उस लेख में भी करीब यही बात दुहराई गयी है या यों कहिये वहां लिखी बातों को ही करीब करीब यहाँ दुहराया गया है.सदाम हो या गद्दाफी.वे दोनों तरक्की पसंद अवश्य थे और दोनों ने ही अपने देशों को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर किया था,पर एक बात दोनों भूल गए थे की अपनी जनता को अपने साथ ले कर चलना बहुत आवश्यक है,खासकर अपने देश के बुद्धि जीवियों को और दोनों ने ही क्या अन्य तानाशाहों ने भी यही गलतियाँ की और तबाही को न्योता दे बैठे..रही अमेरिका या अन्य शक्तिशाली देशों की बात तो वे हमेशा अपना भला सोचते हैं.अब यह तो आगे वालेपर निर्भर करता है की वह उनको किस तरह अपने पर हावी न होने दे तो उसके लिए मेरे विचार से सबसे सरल रास्ता अपनी जनता को साथ लेकर चलना है.

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