गांधीवाद की परिकल्पना – 2

गांधीवाद समस्या की इस जड़ को सदैव बनाये रखना चाहता है। गांधीवादी विचारधारा के ध्वजवाहक नेहरू जी ने भारी उद्योगधंधों का प्रचलन भारत में किया। इससे लाखों करोड़ों लोगों के परम्परागत काम धंधे यथा लुहार, बढ़ई, चर्मकार, जुलाहा आदि बेरोजगार हो गये। कुछ लोगों को रोजगार मिला तो आनुपातिक दृष्टिकोण से बहुत से लोगों का धंधा छिना भी-अर्थात वे बेरोजगार हुए। बड़े उद्योगों के स्थान पर लघु उद्योगों और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाता तो हमारी सामाजिक स्थिति आज कुछ दूसरी ही होती।

राकेश कुमार आर्य

उनकी दृष्टि में गोवध बंदी का कानून बनाना अन्याय था। यही उनकी धर्मनिरपेक्षता थी। जो मजहब जैसे चाहे नंगा खेले-यह उनकी सोच थी। इन नंगा खेल खेलने वालों को हिंदू को चुप रहकर सहना है। यह गांधीजी की विचारधारा थी। हिंदू मानवीय रहे, हिंदू का कानून मानवीय रहे, यह उनकी सोच का केन्द्र बिन्दु था। आज राष्ट्र आतंकवाद से ग्रसित है। आतंकवाद और आतंकवादियों से लडऩे के लिए जिस ‘पोटा’ नामक कानून को भाजपानीत राजग सरकार लायी थी-उसमें संप्रग (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) अर्थात यूपीए की कांग्रेसनीत सरकार ने अमानवीयता के लक्षण देखे हैं।
भला अब इन्हें कौन समझाये कि जो दुष्ट प्रवृत्ति के लोग हैं उन्हें समाप्त करना नागरिकों का कल्याण करना होता है। यह सीख हमें गीता ने दी है, वेदों ने दी है। आतंकवादी अमानवीय हो गये। इसलिए उनसे कठोर कानून ही लड़ सकता है। जो लोग आतंकवादियों को मानव मानकर उनकी पैरोकारी करते हैं उनके आचरण संदिग्ध हैं। इसलिए उनकी जांच पड़ताल भी एक असामाजिक व्यक्ति के रूप में की जाए। निस्संदेह गांधीवादी ऐसा नहीं करेंगे। क्योंकि ये लोग गांधीवाद से यही सीख लेते हैं कि अमानवीय लोगों को मानवीय कहते रहिए। साथ ही जो सचमुच में मानव हैं, उन्हें इतना झुकाओ कि अमानवीय लोगों के साथ से तलवार दयालु होकर अपितु थककर अपने आप ही छूट जाए कि देखिये कितने भले लोग हैं, जो कटते पिटते हुए भी कुछ नहीं कर रहे। इसलिए उन्होंने गाय को भी काटने के लिए छोड़ दिया और हिंदुओं से कह दिया कि-

”यदि इस एक प्राणी को तुम्हारे मुस्लिम भाई खा रहे हैं तो उन्हें खाने दो, बस तुम चुप रहो।”

यही है गांधीवादी गौ प्रेम। यही है गौ प्रेम की गांधीजी की मौलिकता, जिसे हमारी सभी कांग्रेसी सरकारों ने पूरी निष्ठा और आस्था के साथ निभाया है। इन्होंने अंग्रेजों के जाने के पश्चात बूचड़खानों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्घि की है। जिसे भाजपा (राजग) ने और भी आगे बढ़ाया। आज गायें कट रही हैं तो गांधीवाद के नाम पर कट रही हैं क्योंकि उनके कटने के लिए इस गांधीवाद में स्थान है, एवं प्रावधान भी उपलब्ध है।
गांधी जी का रामराज्य का सपना

गांधीजी ने अपने कथित गांधीवादी दर्शन में भारत में स्वतंत्रता के उपरांत रामराज्य स्थापित करने का सपना संजोया था। बहुत से लोग इसे श्री रामचंद्र जी महाराज की उस आदर्श राज व्यवस्था से जोडऩे का प्रयास करते हैं जिसमें-

-न कोई नंगा था, न भूखा था।

-न अपराध था और न अपराधी थे।

-न राष्ट्रद्रोह था और न राष्ट्रद्रोही थे।

-राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग चलने वालों के लिए कोई स्थान उसमें नही था-अपितु सार्वत्रिक शांति थी।

-दूसरे के अधिकारों का शोषण नहीं था, अबलाओं पर कोई अत्याचार नहीं था।

परंतु इन सबके विपरीत गांधीवाद में इन सबके लिए स्थान है। भाइयो! यह कैसा विचित्र गांधीवाद है? जिसमें आदर्श राजनीतिक सामाजिक व्यवस्था का प्रावधान करके भी राजनीतिक और सामाजिक कुव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलता है, आखिर क्यों?
मजहब की आड़ में गांधीजी

गांधीवाद में ऐसे लोगों के लिए भी स्थान और पूरा सम्मान है जो राष्ट्रद्रोही हैं, समाजद्रोही हैं, अबलाओं पर अत्याचार करते हैं, मात्र मजहब की आड़ लेकर। मजहब का जुनून जिनके सिर पर चढ़ा हुआ है वे अपना निजी कानून रखने के लिए स्वतंत्र हैं। उनके उस निजी कानून से उन्हें खुराक मिलती है-राष्ट्रद्रोह की, समाजद्रोह की और अबलाओं पर अत्याचार करने की।

उस मजहब में आस्था रखने वाले कुछ राष्ट्रभक्त और समाज प्रेमी लोग अपनी भावनाओं को मसलकर शांत कर जाते हैं। उनको कोई उपाय नही सूझता कि करें तो क्यों करें? मजहब का विरोध कर नहीं सकते और मजहबी जुनूनियों को समझा नही सकते। बस! इसी द्वंद्व में फंसकर रह जाते हैं ये लोग। अत: समान नागरिक संहिता के लिए गांधीवाद में कोई स्थान नहीं सम्मान नहीं और उसका कोई प्रावधान नहीं, जबकि सर्वोदय की भावना को क्रियान्वित करने के लिए इस प्रकार की ‘समान नागरिक संहिता’ का होना परमावश्यक है। जिससे किसी भी वर्ग की उन बातों को पूर्णत: प्रतिबंधित कर दिया जाए जिनके कारण समाज और राष्ट्र में अशांति उत्पन्न होने का भय हो।
गांधीवाद समस्या की इस जड़ को सदैव बनाये रखना चाहता है। गांधीवादी विचारधारा के ध्वजवाहक नेहरू जी ने भारी उद्योगधंधों का प्रचलन भारत में किया। इससे लाखों करोड़ों लोगों के परम्परागत काम धंधे यथा लुहार, बढ़ई, चर्मकार, जुलाहा आदि बेरोजगार हो गये। कुछ लोगों को रोजगार मिला तो आनुपातिक दृष्टिकोण से बहुत से लोगों का धंधा छिना भी-अर्थात वे बेरोजगार हुए। बड़े उद्योगों के स्थान पर लघु उद्योगों और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाता तो हमारी सामाजिक स्थिति आज कुछ दूसरी ही होती। किंतु ऐसा नही किया गया, क्योंकि हमारी सरकारों की सोच प्रारंभ से ही यह रही कि भारी भरकम बजट की महत्वाकांक्षी योजनाएं यदि बनाई जाएंगी तो उसमें ‘मोटा कमीशन’ मिलेगा। इस कमीशन के लिए देश के लाखों करोड़ों लोगों के रोजगार छीनकर कुछ लोगों को उनके शोषण का अधिकार दे दिया गया। परिणामस्वरूप स्थिति भयावह हो गयी है। थैलीशाहों के चंगुल में देश फंस गया है। सारी राजनीति इन्हीं शैली शाहों (बड़े व्यापारिक घरानों) के आसपास घूम रही है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

 

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