लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


-राकेश कुमार आर्य-
history

जब विदेशियों ने भारत के इतिहास लेखन के लिए लेखनी उठाई तो उन्होंने भारतीय समाज की तत्कालीन कई दुर्बलताओं को दुर्बलता के रूप में स्थापित ना करके उन्हें भारतीय संस्कृति का अविभाज्य अंग मानकर स्थापित किया। जैसे भारत में मूर्तिपूजा ने भारत के लोगों को भाग्यवादी बनाने में सहयोग दिया, यद्यपि मूलरूप में भारत भाग्यवादी नहीं रहा है, यहां प्राचीन काल से ही कर्मशीलता को मनुष्य के लिए आवश्यक माना गया है। जब सोमनाथ का मंदिर लूटा जा रहा था तो बहुत से भक्तों की मान्यता थी कि मंदिर में स्थित मूर्ति हमारी सबकी रक्षा कर लेगी। दुष्ट आक्रांता जैसे ही मंदिर में प्रवेश करेगा वैसे ही शिव का तीसरा नेत्र खुलेगा और शत्रु को भस्म कर देगा। विदेशी इतिहासकारों ने भारतीयों की ऐसी मान्यताओं को भारतीय धर्म की दुर्बलता के रूप में स्थापित किया। उन्होंने वेद और वैदिक साहित्य की ओर देखने का प्रयास जान बूझकर नही किया। जहां ईश्वर को निराकार माना गया है, और कहा गया है कि ईश्वर एक है, विप्र लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं, जो उसके गुण, कर्म, स्वभाव के वाचक हैं। इसलिए ईश्वर की कोई प्रतिमा ही नहीं हो सकती। वेद के इस सिद्धांत को विदेशी इतिहासकारों ने भारतीय धर्म के विषय में जानबूझकर प्रकट नहीं किया। इसका कारण यह था जिससे कि भारतीयों के भीतर अपने प्रति ही हीनभावना उत्पन्न की जा सके। इतिहास में हमें बताया जाता है कि भारतीयों के भीतर आदि काल से धार्मिक अंधविश्वासों की भरमार रही है, और वे किसी भी विपरीत परिस्थिति का सामना करने के लिए अपने देवी देवताओं का आह्वान करने लगते थे, कि हमें इस आपदा से बचाओ।

हमारा मानना है कि ऐसी कुछ धार्मिक अंधविश्वासों की घटनाएं उस समय कई बार घटित हुई। परंतु ध्यान देने योग्य तथ्य ये नहीं है कि इन अंधविश्वासों के कारण हमारी सैनिक क्षति हुई, अपितु ये तथ्यात्मक है कि हमने किसी भी परिस्थिति में समय आने पर अपने बलिदान से मुंह नहीं मोड़ा।

गंग सर्वज्ञ का बलिदान

सोमनाथ के मंदिर का ही उदाहरण आप ले सकते हैं। यहां का महंत उस समय गंग सर्वज्ञ था जिसकी वीरता को निरा अंधविश्वास नहीं कहा जा सकता। जिस समय महमूद गजनवी सोमनाथ के मंदिर में लोगों का नरसंहार कर रहा था, उस समय वहां का महंत गंग सर्वज्ञ भी वीभत्स दृश्य को देख रहा था। गंग सर्वज्ञ उन दृश्यों को देखकर जिनमें भारतीयों का बड़ी निर्ममता से वध किया जा रहा था, वह पूर्णत: आंदोलित हुआ खड़ा था। तभी गंग सर्वज्ञ को महमूद गजनवी ने अपने समक्ष नतमस्तक होने के लिए आदेशित किया। महंत ने भली प्रकार देख लिया था कि एक ओर मृत्यु उसके सामने साक्षात खड़ी थी तो दूसरी ओर उसके एक प्रमुख मंदिर का महंत होने के कारण राष्ट्र और हिंदू आर्य जाति का स्वाभिमान बहुत बड़े प्रश्नचिन्ह के रूप में खड़ा था। महंत ने समझ लिया कि अब अंतिम समय आ चुका है, और अंतिम समय में किसी भी प्रकार की भीरूता या कायरता को दिखाने से काम नही चलने वाला। इसलिए महंत ने उन अंतिम क्षणों में अपने जातीय स्वाभिमान को प्राथमिकता देते हुए साहस के साथ महमूद से कह दिया कि वह उसके चरणों में मस्तक कदापि नही झुकाएगा, क्योंकि उसके मस्तक झुकाने का अभिप्राय होगा संपूर्ण हिंदू समाज का अपमान कराना। उसने यह भी कह दिया कि उसके इस कृत्य का चाहे जो परिणाम हो, वह उसे भुगतने के लिए तत्पर है।

एक स्वाभिमानी महंत के मुख से ऐसे शब्द सुनकर महमूद को बहुत क्रोध आया। उसने तुरंत उस महंत को आदेशित किया कि यदि वह सिर झुकाने के लिए उद्यत नहीं है, तो सेामनाथ की प्रतिमा पर अपना सिर रख दे, जिससे कि उसका सिर हथौड़े के घातक प्रहार से चीथकर अलग किया जा सके। महंत ने अपने राष्ट्रीय सम्मान और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षार्थ गजनवी के इस आदेश का यथावत पालन किया। उसने अपना सिर सोमनाथ की प्रतिमा पर रख दिया। घातक (कसाई) ने तीव्र प्रहार करते हुए सिर को खण्ड-खण्ड कर दिया।

यह वीरता ही तो थी

इसे आप क्या कहेंगे? गंग की कायरता या उसकी वीरता? निश्चित रूप से यह वीरता थी। ऐसी वीरता के प्रदर्शन हमें भारतीय इतिहास पुरूषों के माध्यम से ही होते हैं। अन्य देशों में ऐसे वीरता प्रदर्शन के दृश्य भला कहां मिलते हैं? अंत समय में भी अपने इष्ट के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रदर्शन करना और उसी समर्पण में अपना प्राणोत्सर्ग कर देना यह भारत की वीर परंपरा का ही लक्षण है। इस घटना का उल्लेख श्री ओमप्रकाश निर्लेपि जी ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय इतिहास के गौरव क्षण’ में किया है।

पुनर्जन्म का सिद्घांत देता था-ऊर्जा

प्राचीन काल से ही भारतीय दर्शन में पुनर्जन्म का सिद्धांत प्रचलित रहा है। इसके अनुसार आत्मा को अजर और अमर माना गया है। जिसके अनुसार चाहे जैसी परिस्थिति आ जाए और चाहे जिस प्रकार से इस शरीर का नाश किया जाए पर यह आत्मा किसी भी स्थिति में नष्ट नहीं होती। वेद (ऋ 1/148/5) में कहा गया है-
न यं रिपवो न रिष्ण्यवो गर्थे
संत रेषणा रेषयन्ति। अर्थात शरीरस्थ आत्मा का न तो रिपु और न हिंसा शक्तिवाले हिंसक लोग ही नाश कर सकते हैं।
इसी बात को गीता (2/23) में श्रीकृष्ण जी ने यों कहा है-
नैनंछिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारूत:।।
अर्थात इसे शस्त्र काट नहीं सकते, ना ही इसे अग्नि जला सकती है, जल इसे गीला नहीं कर सकता, पवन इसे सुखा नहीं सकता।
हजारों लाखों वर्ष से आत्मा संबंधी यह सिद्धांत हमें निर्भीकता और निडरता का पाठ पढ़ाता आ रहा है। समस्त संसार इस नाशवान देह से प्यार करता रहा, परंतु जब समय आया और ये उचित समझा गया कि इस नाशवान देह से किसी का भला हो सकता है तो इसे छोड़ने में या त्यागने में हमारे अनेकों दधीचियों ने ‘सर्वे भवंतु सुखिन:। सर्वे संतु निरामया’ का जाप करते-करते पल भर की भी देरी नहीं की। यहां शरीर को हंसते-हंसते दांव पर रखा गया-बिना किसी मोह के और बिना किसी देरी के। इसलिए गंग सर्वज्ञ ने बिना समय गंवाए अपना सिर सोमनाथ की मूर्ति पर रख दिया और इस नाशवान चोले को छोड़कर वह महावीर देशभक्त महंत अनंत प्रभु की अनंतता में कही विलीन हो गया। पर विलीन होने से पहले अपनी वो कहानी लिख गया जो आज तक हम सबको प्रेरित कर रही है।

अलबेरूनी लिखता है

उपरोक्त पुस्तक ‘भारतीय इतिहास के गौरव क्षण’ के विद्वान लेखक हमें बताते हैं कि महमूद गजनवी का समकालीन मुस्लिम लेखक अलबेरूनी को एक बार ऐसे किसी नवयुवक के परिजनों से मिलने का अवसर मिला जो देश के लिए बलिदान हो गया था। परंतु उसके परिजनों को उसकी शहादत का कोई दुख नहीं था। उस परिवार के लोग अलबेरूनी से कह रहे थे-देख, तेरे सुल्तान (महमूद) ने हमारे इस प्रिय संतान की अकारण ही हत्या कर दी है। देख, यह सामने पड़ा है। यह कौन सा धर्म है? क्या तेरा सुल्तान यह समझता है कि हमारा यह पुत्र समाप्त हो गया है? यह उसकी भूल है। यह मरा नही है। आत्मा अजर अमर है और इसकी आत्मा ने यह शरीर छोड़ा है। दूसरा शरीर मिलेगा जैसे हम वस्त्र बदलते हैं या मकान बदलते हैं। अलबेरूनी के लिए इस प्रसंग में भी कोई अंधविश्वास हो सकता है। परंतु हमें इसमें अंधविश्वास नही, अपितु उत्कृष्टतम देशभक्ति दीखती है। जिसे इसी रूप में पूजित किया जाना अपेक्षित है। देशभक्ति के समक्ष देहदान को तनिक भी बाधक न मानना राष्ट्रसाधकों की उच्चतम साधना शक्ति का द्योतक है। यही है भारत की पहचान। इस पहचान को बनाये रखने वाले कितने ही गंग सर्वज्ञों के हम उत्तराधिकारी हैं, यह हमारे लिए गर्व और गौरव का विषय है, जो आज तक एक षड्यंत्र के अंतर्गत बनने नहीं दिया गया।

बलिदान के लिए राष्ट्रीय मूल्य ही प्रेरित किया करते हैं

यह सर्वमान्य सत्य है कि जब तक किसी देश के नागरिक अपने देश या राष्ट्र के मूल्यों को विकसित करते-करते उनके प्रति समर्पित नहीं हो जाते हैं, तब तक वो मूल्य उन्हें मर मिटने के लिए प्रेरित नहीं कर पाते हैं। पर जैसे ही किसी देश के निवासी अपने राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति और अपनी संस्कृति व धर्म के प्रति समर्पण भाव से भर जाते हैं, तो वैसे ही वे लोग उन मूल्यों की रक्षार्थ अपना सर्वस्व होम करने के लिए भी संघर्ष हेतु उद्यत हो जाते हैं। भारत की विश्व विरासत की रक्षा इसी उच्च भावना से हो पायी थी कि यहां के निवासी अपने राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति पूर्णत: समर्पण भाव रखते थे।

राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक हांसी व तावड़ी के किले

हांसी का पुराना नाम असिगढ़ है। यहां पर सम्राट पृथ्वीराज चौहान तलवारों का निर्माण कराया करता था। असिगढ़ से बिगड़कर हांसी शब्द हो गया। असि से बिगड़कर ही हंसिया (फसल काटने वाली दरांती) शब्द बन गया। इस असिगढ़ किले से उस समय हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का सीधा संबंध था। इसी प्रकार तरावड़ी का किला था, उसे भी लोग अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते थे। फलस्वरूप गोरी ने जब-जब इन किलों पर आक्रमण किया तब -तब ही देश की जनता ने भी अपने सम्राट पृथ्वीराज चौहान का साथ दिया। क्योंकि देश की जनता अपने सम्राट और उसके सुरक्षा प्रतिष्ठानों अर्थात किलों से असीम स्नेह रखती थी। भटिण्डा के जाट राजा विजयराव को जब गोरी के विषय में जानकारी मिली कि वह सोमनाथ को लूटकर सिंध के रास्ते जा रहा है, तो उसने उसे राजस्थान में जाकर घेर लिया। राजा जानता था कि उसकी अपनी सैन्य क्षमता कितनी है, पर वह यह भी जानता था कि उस समय देश के लिए प्राणोत्सर्ग करना भी कम ही होगा, और यह भी कि विदेशी आक्रांता इस समय प्रमाद में होगा और उसे अचानक घेरने से विजयश्री मिलना अनिवार्य है। इसलिए अदम्य साहस का परिचय देते हुए देशभक्त जाट राजा ने विदेशी आक्रांता को जा घेरा। राष्ट्रवाद की उत्कृष्ट भावना राजा विजयराव ने दिखाई और उसने इस युद्घ में बहुत कम तुर्कों को ही भागने दिया था, अधिकांश तुर्क सेना को गाजर मूली की भांति काटकर फेंक दिया था।
गंग, हांसी, तरावड़ी, विजयराव आज कहां विस्मृति के गड्ढे में विलुप्त हो गये हैं? जिन्होंने हमारे प्रति अपना कत्र्तव्य धर्म निभाया उनके प्रति हमारा क्या कोई भी कत्र्तव्य धर्म नही है?

No Responses to “गंग, हांसी, तरावड़ी और विजयराव के वो अविस्मरणीय बलिदान”

  1. Shekhar

    बहुत ही सुन्दर और जानकारी पूर्ण आलेख.
    जिस देश के प्रथम प्रधान मंत्री कहते हैं की वो गलती से हिन्दू हैं, जिनका पारिवारिक इतिहास मुगलों के खानदान से जाकर मिलता है,
    वो आखिर भारत के गौरव पूर्ण इतिहास को नष्ट करने का ही काम करेंगे. आप समाज वादी विचारधारा को मानते हैं, सो, साम्यवादियों को इतिहास लेखन के ठेका दे दिया. आप की स्वप्निल परियोजना “जे. एन. यू. ” के उग्र कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवी जो हिन्दू धर्म के विरोध को ही अपना धर्म मानते हैं, हिन्दू विरोध की कमाई खाते हैं, उनसे हम भारत वर्ष के गौरव पूर्ण इतिहास लेखन में योगदान चाहते हैं, ये हमारी गलती है.
    जो लोग हमारे देवी देवता के नग्न चित्र बनाते हैं, वो बुद्धि जीवी कहलाते हैं. उनके मानवाधिकार हैं, हमारे नहीं ????????
    ईसाई मिशनरी और मुस्लिम आतंक का विरोध करने वाले जाहिल गंवार कहलाते हैं.
    हिन्दू धर्म को छोड़ कर मुसलमान और ईसाई बन जाने वाले समझदार कहलाते हैं.
    राष्ट्रीय सेवक संघ को देशद्रोही और सिमी के समान बताने वाले लोग आखिर क्यों महान भारत भूमि में श्रद्धा रखेंगे ???
    विश्व गुरु भारत के गौरव शाली इतिहास को झूठ कहने वाले, मुस्लिम आक्रान्ताओं को महान कहने वाले बहुत से विदेशी हैं, पर अफ़सोस उन अपने देशवाशी भाइयों और बहनों के लिए होता है, जो उन दुश्मनों का साथ देते हैं.

    परन्तु, लाख अँधेरा हो,एक दीपक ही उनके लिए बहुत होता है.
    परम आदरणीय लेखक महोदय, आप हमारी जानकारी बढ़ाने के लिए अनवरत लिख हैं, इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *