गौरी लंकेश : दक्षिणपंथी विरोधी या वामपंथी समर्थक 

एक पत्रकार की हत्या, सवाल कई तरह के
संजय सक्सेना

कर्नाटक के बैंगलुरू में दक्षिणपंथी विचारधारा की विरोधी पत्रकार गौरी लंकेश की र्ददनाक ढंग से गोली मारकर हत्या कर दी गई। कन्नड़ पत्रकार और अैब्लाॅइड ‘ लंकेश’ पत्रिका की संपादक गौरी लंकेश की गिनती प्रखर हिन्दुत्व विरोधी पत्रकारों में होती थी। वह अपना साप्ताहिक समाचार पत्र चलाती थीं तो कई पत्र-पत्रिकाओें में लेखन के अलावा न्यूज चैनलों एवं सोशल नेटवर्क पर भी बहस करते दिखाई पड़ती थी। हत्या किसी की भी हो, इसे किसी भी तरीके से जायज नहीं कहा जा सकता है। न ही इस हत्याकांड को कोई समर्थन कर रहा है। कर्नाटक में कांगे्रस की सरकार है। इस हिसाब से पत्रकार की हत्या कानून व्यवस्था से जुड़ा मामला लगता है और इसकी आंच प्रदेश सरकार पर पड़ना स्वभाविक है। बीजेपी वाले भी ऐसा ही कर रहे हैं, परंतु कांगे्रस, वामपंथियों और कुछ कथित धर्मनिरपेक्ष तथा कभी एवार्ड वापसी अभियान चलाने जैसी शक्तियो को इसके पीछे बीजेपी की साजिश नजर आ रही है। इसका कारण यही है कि गौरी लंकेश की विचारधारा एंटी बीजेपी थी। बीजेपी के एक नेता से लंकेश मानहानि का मुकदमा हार चुकी थीं। उन्हें मुआवजा भरना पड़ा था। गौरी लंकेश की हत्या को लेकर मीडिया जगत स्तब्ध है, लेकिन गौरी की विचारधारा को लेकर दो हिस्सों में बंटा हुआ भी है। पत्रकारों की एक जमात गौरी की हत्या को विचारधारा की हत्या करार दे रही है और इसके पीछे उसे भगवा ब्रिगेड का हाथ नजर आ रहा है,वहीं एक धड़ा ऐसा भी है जो यह मानकर चल रहा है कि गौरी की हत्या के पीछे नक्सली या फिर भ्रष्टाचारी ताकतें भी हो सकती हैं,जिनकी वह लम्बे समय से मुखालफत कर रही थीं। गौरी का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। इस दौरान ‘अमर रहे गौरी लंकेश’ के नारे भी खूब फिजाओं में गंूजे। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया से लेकर तमाम दिग्गज नेता उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए। दरअसल, यह एक पत्रकार की मौत नहीं थी, इसके पीछे वोट बैक की सियासत भी है। कर्नाटक में 18 प्रतिशत आबादी लिंगायत जाति की है। पत्रकार गौरी लंकेश भी इसी वर्ग से ताल्लुक रखती थीं। लिंगायत बिरादरी की गणना अगड़ी जाति में की जाती है। यह लोग अपने आप को हिन्दू होने के बावजूद हिन्दू नहीं मानते हैं।
बहरहाल, लाख टके का सवाल यही है कि गौरी लंकेश सिर्फ पत्रकारिता तक ही सीमित थीं या फिर वह पत्रकारिता के साथ-साथ किसी राजनैतिक विचारधारा को भी आगे बढ़ा रहीं थीं। ऐसा करते समय अन्यास ही उनकी आरएसएस/बीजेपी/ह्रिन्दुत्व विरोधी छवि बन गई थी। कर्नाटक में गौरी की हत्या पहली हत्या नहीं है। इससे पहले भी यहां विचारधारा के नाम पर कई लोगों को जान से हाथ छोना पड़ चुका है। इसमें दक्षिणपंथी भी शामिल हैं और वामपंथी विचारधारा के लोग भी। परंतु अफसोस की बात यह है कर्नाटक में एक विचारधारा की हत्या पर तो सिर आसमान पर उठा लिया जाता है,मगर जब दूसरी विचारधारा को मानने वाला कोई मरता है तो उसे साम्प्रदायिकता से जोड़ दिया जाता है।
कर्नाटक हिन्दुस्तान का एक ऐसा राज्य है, जहां विचारधारा के नाम पर वामपंथियों या कांगे्रसियों से अधिक द़िक्षणपंथियों को मौत के मुंह में ढकेला जाता रहा है। परंतु जब चर्चा होती है तो सिर्फ चंद ऐसे लोंगो का नाम सामने आता है जिनकी सोच का दायरा वामपंथ और कांगे्रस तक सीमित था। यह समझ से परे है कि कर्नाटक में आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या होती है तो चारों तरफ चुप्पी पसरी रहती है। न स्लदबीपदह का हल्ला और न ही स्लदबीपेजंद का शोर। किसी सेक्युलर पत्रकार, संपादक और सामाजिक कार्यकर्ता की जुबान नहीं खुलती है। इतना ही नहीं ऐसे अपराधों के समय अपराधियों को पकड़ने के बजाय कर्नाटक की कांग्रेस सरकार गुनहगारों की गिरफ्तारी की जगह बीजेपी नेताओं को गिरफ्तार करने लग जाति है। कंदुर के रहने वाले आरएसएस कार्यकर्ता शरत माडिवाला पर उस समय हमला हुआ, जब वह अपनी दुकान बंद कर के घर वापस जा रहे थे। हमले के तुरंत बाद उन्हें काफी गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया। 08 जुलाई को मंगलुरु के एक अस्पताल में उनकी मौत हो गई। उनकी हत्या का आरोप एक मुस्लिम संगठन पर लगा। हालात यह थे कि आरएसएस कार्यकर्ता की मौत के बाद दक्षिण कन्नड़ में प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे भाजपा सांसद और नलिन कुमार के खिलाफ एफआइआर दर्ज करा दी गई। नवंबर, 2016 में मैसूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता मगाली रवि की हत्या कर दी गई थी। 2016 के अक्टूबर में ही कर्नाटक के कन्नूर में आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या की गई थी।
गौरी लंकेश पत्रकार थी या फिर किसी विशेष विचारधारा की पोषक इस पर लम्बी बहस हो सकती है। मगर पत्रकारिता का मूल मंत्र भी नहीं भूलना चाहिए। पत्रकार की कोई अपनी विचारधारा नहीं होनी चाहिए। उसे समाज का आइना बनना चाहिए। पत्रकार की कार्यशैली ऐसी होनी चाहिए जिससे देश समृद्ध हो और समाज बेहतर। उसका लेखन पक्षपात रहित और विकासशील होना चाहिए। मानवीय संवेदनों को कभी न भूलना उसका धर्म हो, देश के संविधान की रक्षा करना उसका प्रथम और अंतिम कर्तव्य होना चाहिए। देशभक्ति उसकी रग-रग में बसी हो। पत्रकारिता को एक सार्थक मिशन के रूप में उसे आगे बढ़ाना चाहिए। अगर उक्त उद्देश्यों की पूर्ति करने में कोई पत्रकार पूर्णताः हासिल कर लेता है तो न तो उसे समाज से और न ही किसी विचारधारा से विचलित होने की चिंता रहेगी। मगर अफसोस ऐसा हो नहीं रहा है। कोई राइट विंग का पत्रकार है तो कोई लेफ्ट विंग का। ऐसे पत्रकारों की बड़ी आबादी है जो निष्पक्ष पत्रकारिता करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते हैं। यह उनकी जीविका चलाने की मजबूरी हो सकती हो सकती है, लेकिन, अच्छा होता कि ऐसे लोग पत्रकारिता जगत से दूर ही रहते। पत्रकारिता की दुनिया में आकर अगर कोई वैभव की तलाश करता है तो यह ‘मृग तृष्णा’ है। इसके साथ-साथ अगर कोई पत्रकार निष्पक्ष रहने की बजाये किसी विचारधारा को आगे बढ़ाये तो उसे सबसे पहले पत्रकारिता का चोला उतार के फंेक देना चाहिए। ऐसा न करने वाले पत्रकारों को ही मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उनकी छवि तो धूमिल होती ही है,कभी-कभी जान के भी लाले पड़ जाते हैं। जैसा की पत्रकार गौरी लंकेश के साथ हुआ। भविष्य में किसी पत्रकार के साथ ऐसा कृत्य न दोहराया जाये इसके लिये जरूरी है कि गौरी लंकेश की हत्या की निंदा करने के अलावा हम अपने बीच में मौजूद उन पत्रकारों की भी पहचान उजागर करें,जो पत्रकारिता के नाम पर वह सब कुछ कर रहे हैं जो अनुचित है।
मीडिया जगत को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि राजनेता उनके साथियों की मौत पर सियासी रोटियां न सेंक सके। ताज्जुब होता है कि गौरी की हत्या के चंद मिनटों के भीतर ही बिना जांच पड़ताल के तमाम बीजेपी विरोधी दलों के नेता कैसे इस निष्कर्ष पर पहुंच गये कि उसकी हत्या बीजेपी या आरएसएस वालों ने कराई है। यहां कांगे्रस की बात करना जरूरी है।कर्नाटक में कांगे्रस की सरकार है। कांगे्रस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने गौरी लंकेश की हत्या के तुरंत बाद बीजेपी/ आरएसएस को जब कुसूरवार ठहरा ही दिया है तो गौरी लंकेश हत्याकांड की जांच का उद्देशय ही निरर्थक हो जाता है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने एसआईटी बैठाकर औपचारिता ही पूरी की है। इससे कुछ होने वाला नहीं है।

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