भारत में आम चुनाव और निर्वाचन आयोग ,भाग —- 3

10 वीं लोकसभा

राकेश कुमार आर्य
कांग्रेस के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के विरुद्ध विद्रोह करके उनकी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे वी पी सिंह ने सत्ता तो प्राप्त कर ली परंतु वह सत्ता को अधिक समय तक चला नहीं पाए । इसका कारण यह रहा कि वी पी सिंह के साथ लोकसभा में अपेक्षित बहुमत नहीं था । तब उन्होंने अपने आप को राजनीति में स्वीकार्य प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित करने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का मन बनाया। इसके लिए उन्होंने देश के पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण लागू किया । 
भाजपा ने वीपी सिंह की मंडल आयोग की राजनीति के प्रत्युत्तर में राम जन्म भूमि मस्जिद विवाद को लेकर अपनी राजनीति को दूसरी दिशा दे दी । जिसके चलते उस समय मंडल – कमंडल की राजनीति पर बहुत सारे लेख समाचार पत्रों में लिखे गए । राजनीति सीधे-सीधे जातिवाद और मजहबी उन्माद का प्रतीक बन गई । जिन चीजों पर अभी तक खुलकर चर्चा नहीं होती थी राजनेता उन पर खुलकर चर्चा करने लगे । देश में मंडल को लेकर भी हिंसा हुई और कमंडल को लेकर भी हिंसा हुई । विकास की बातें कहीं पीछे चली गई और सारा देश मंडल और कमंडल में उलझ कर रह गया । जिनके फलस्वरूप देश में हो रही हिंसा को देखकर ऐसा लगता था कि जैसे हम विकास के स्थान पर विनाश के जंगल में आ घुसे हैं । वी पी सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गई , परंतु उन्हें इसके उपरांत भी पिछड़े वर्ग का उतना समर्थन नहीं मिला जितने की अपेक्षा वीपी सिंह मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके कर रहे थे । 
फलस्वरूप 16 महीने पश्चात ही देश में मध्यावधि चुनाव हुए । यह चुनाव 3 चरणों में संपन्न कराये गए । 20 मई ,12 जून व 15 जून 1991 की तिथियां चुनावों के लिए नियत की गई । भाजपा ,कांग्रेस ,राष्ट्रीय मोर्चा इन तीनों के मध्य त्रिकोणीय संघर्ष हुआ । इसी मध्य 20 मई को कांग्रेस के नेता राजीव गांधी की हत्या श्रीपेरंबदूर तमिलनाडु में लिट्टे द्वारा कर दी गई थी। इस चुनाव में कुल 53 प्रतिशत मतदान हुआ । त्रिशंकु संसद बनी । 232 सीट लेकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी , जबकि भाजपा ने 120 सीटें प्राप्त कीं और जनता दल को केवल 59 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा । राजीव गांधी के न रहने से कांग्रेस नेताविहीन हो गई थी , ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस के सुलझे हुए नेता पी वी नरसिम्हा राव को कॉंग्रेस ने प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत किया । जिन्हें 21 जून 1991 को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई।
देश की राजनीति रातों रात मंडल – कमंडल की विनाशकारी राजनीति में जाकर फँस गई ,और किसी ने इस ओर न तो उस समय संज्ञान लिया और न आज तक कोई ले पाया है । इसका कारण केवल एक ही था कि देश का निर्वाचन आयोग अपने आप में शक्तिहीन रहा । नेता अपने आप को बेलगाम रखने के लिए देश में कुख्यात हो चुके थे । इन लोगों का एक ‘ न्यूनतम सांझा कार्यक्रम ‘ है कि किसी भी राजनीतिक दल को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में ढालने के लिए कड़े नियमों का पालन करने से सदा मुक्त रखा जाएगा , कोई भी ऐसा कानून नहीं बनाया जाएगा जो इन्हें और इनके राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पाठ पढ़ा सके । यह जैसे चाहें जो चाहें वैसे करने के लिए स्वतंत्र रहने चाहिए। 

11वीं लोकसभा
11वीं लोकसभा के चुनाव 1996 में हुए । इसमें भी त्रिशंकु संसद बनकर ही हमारे सामने आई । 2 वर्ष तक हमने देखा कि देश फिर राजनीतिक अस्थिरता के युग में प्रवेश कर गया । संक्षिप्त से काल में देश ने तीन प्रधानमंत्रियों को शपथ ग्रहण करते देखा , परंतु किसी ने भी लोकसभा का पूरा कार्यकाल पूर्ण नहीं किया । देश की राजनीति बंदरबांट में लगी रही और एक दूसरे को नीचा दिखाने व अपने स्वार्थ पूर्ण करने के उपायों को खोजने में नेता किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार दिखाई दिए । फलस्वरूप कई कई प्रधानमंत्री देकर भी कोई भी दल स्थाई सरकार देश को नहीं दे पाया । मई 1995 में देश के भीतर एक विशेष घटना घटित हुई । कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से विद्रोह करके अर्जुन सिंह और एनडी तिवारी ने कांग्रेस छोड़ दी ।
पी वी नरसिम्हाराव ने आर्थिक सुधारों को बड़ी ईमानदारी से देश में लागू किया । उन्होंने मध्यावधि चुनावों की स्थिति से भी देश को बचाया , परंतु उन्हें अपनी ही कांग्रेस का समर्थन नहीं मिला । उनकी अपनी पार्टी के लोग भी उन्हें गिराने और नीचा दिखाने में लगे रहे । उनके काल में हर्षद मेहता घोटाला , राजनीति के अपराधीकरण पर वोहरा रिपोर्ट , जैन हवाला कांड, तंदूर हत्याकांड जैसे मामले सामने आए । जिनके कारण राव सरकार की विश्वसनीयता गिरी । भाजपा और उसके सहयोगी दल संयुक्त मोर्चा , वाममोर्चा, जनता दल का गठबंधन चुनाव में कांग्रेस के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में सामने खड़े थे । पी वी नरसिम्हाराव ने आर्थिक सुधारों को मुद्दा बनाया तो भाजपा ने हिंदुत्व कार्ड खेला , जबकि कांग्रेस से अलग अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों के पास कोई प्रभावी मुद्दा नहीं था ।कोई ऐसा घोषणा पत्र उनके पास नहीं था जिसके आधार पर जनता को अपनी ओर आकर्षित कर सकते । फलस्वरूप देश के मतदाता किसी भी पार्टी से प्रभावित नहीं हो पाए ।
चुनाव परिणामों से स्पष्ट हुआ कि भाजपा ने 161व कांग्रेस ने 140 सीटें प्राप्त की । भाजपा के बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के कारण देश के राष्ट्रपति ने अटल बिहारी वाजपेई को देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए आमंत्रित किया । अटल बिहारी वाजपेई को 16 मई 1996 को देश का अगला प्रधानमंत्री बनाया गया , परंतु उनके पास संख्या बल नहीं था । अतः उनकी सरकार मात्र 13 दिन पश्चात ही गिर गई । तब राजनीतिक घोटालेबाज नेताओं ने मिलकर देवेगौड़ा को देश का अगला प्रधानमंत्री बनवाया । श्री देवेगौड़ा ने 1 जून को संयुक्त मोर्चा गठबंधन की सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की । उनकी सरकार भी कुछ महीने ही चल पाई । देवेगौड़ा सरकार में विदेश मंत्री रहे इंद्रकुमार गुजराल को फिर देश का अगला प्रधानमंत्री बनाया गया । उन्होंने अप्रैल 1997 में पदभार ग्रहण किया । कांग्रेस ने इस सरकार को बाहर से समर्थन देने की बात कही , परंतु कांग्रेस ने अपने दिए हुए वचन को निभाया नहीं और 28 नवम्बर 1997 कोई यह सरकार भी गिर गई। इस प्रकार यह लोकसभा अपने तीन प्रधानमंत्रियों के साथ मात्र 18 महीना ही चल पाई।
वचन और वायदे भारत की राजनीति के लिए बहुत ही हल्की चीज हो कर रह गए । उनके प्रति निष्ठा और कर्तव्यपरायणता का भाव राजनीतिक लोगों में व राजनीतिक दलों में अपने सबसे निम्नतम बिंदु पर आ गया । केवल स्वार्थ ही स्वार्थ चारों ओर फैला हुआ दिखाई दे रहा था । राजनीति ने अपने आप को सचमुच धर्म निरपेक्ष मान लिया अर्थात धर्म से और नैतिकता से अपने आप को विलग कर लिया । सारे लोकतांत्रिक प्रतिष्ठान और देश की न्यायपालिका मुंह को बंद कर राजनीति की नौटंकी को देखते रहे । इन सबके हाथ बंधे हुए थे , कोई भी कुछ करने की स्थिति में नहीं था। 

12 वीं लोकसभा 
12 वीं लोकसभा भी अपने कार्यकाल को पूर्ण न करने वाली लोकसभा रही थी । परिस्थितियां ऐसी बनीं कि यह लोकसभा उस समय तक की लोक सभाओं के सबसे कम कार्यकाल को ही पूर्ण कर पाई थी । इसने मात्र 413 दिन काम किया और 13 महीने पश्चात ही इसे भंग करना पड़ गया था ।
28 नवंबर 1997 को गुजराल सरकार का पतन हुआ तो नए चुनाव कराए गए । जिन में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को मिलाकर कुल 265 सीटें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को प्राप्त हुईं ।यह संसद में कार्यकारी बहुमत ही था, परंतु इस बार इतना तो निश्चित हो गया था कि अटल जी यदि देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो उन्हें पहले की भांति 13 दिन पश्चात अपना त्यागपत्र नहीं देना पड़ेगा । संख्या बल लगभग उनके पास पर्याप्त था । यही कारण रहा कि उन्हें देश के तत्कालीन राष्ट्रपति ने सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया । तब अटल बिहारी वाजपेयी ने 19 मार्च 1998 को देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की । कांग्रेस ने गुजराल सरकार को अनर्गल आरोप लगाकर चलता कर दिया था। उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष सीताराम केसरी थे। जिन्हें ढलती हुई आयु में ऐसी भ्रांति हो रही थी कि वह यदि अभी चुनाव करा लेते हैं तो देश के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं । उनका सपना सपना ही रहा और सत्ता उनकी ओर न जाकर अटल जी की ओर आ गई। 
10 मार्च 1998 को 12 वीं लोकसभा का गठन हुआ। तब अटल जी के नेतृत्व में 19 मार्च को सरकार ने शपथ ग्रहण की । यह सरकार भी मात्र 13 महीने पश्चात गिर गई ।सरकार के संख्या बल की समस्या आड़े आई और मात्र एक मत के अंतर से सरकार को गिरना पड़ गया। देश फिर से एक नई लोकसभा के गठन के लिए चुनावों के द्वार पर जा खड़ा हुआ । ना चाहते हुए भी देश हजारों करोड़ के एक खर्चीले चुनाव में जाने की तैयारी कर रहा था । चुनाव आयोग के सामने केवल यही विकल्प था कि नये चुनाव कराए । हमारा मानना है कि ऐसी परिस्थिति में सरकार को न गिरा कर राष्ट्रीय सरकार का गठन करने का विकल्प चुनाव आयोग के पास होना चाहिए । उसे नए चुनाव ना कराने पड़ें, अपितु वह वर्तमान लोकसभा को ही जीवन दान देकर देश को खर्चीले चुनावों से बचाने के लिए अधिकृत हो , ऐसा कानून देश में बनना चाहिए। 

13 वीं लोकसभा

12 वीं लोकसभा में भाजपा को विश्वास मत प्राप्त करते समय जयललिता की अन्ना डीएमके पार्टी ने समर्थन देने से इनकार कर दिया था । जिस कारण 12 वीं लोकसभा समय से पहले भंग करनी पड़ी । क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में काम कर रही भारतीय जनता पार्टी की सरकार एक मत के अंतर से गिर गई थी । उस समय जयललिता अपनी शर्तों और अपनी मांगों पर सरकार को समर्थन दे रही थीं । कुमारी जयललिता की इच्छा थी कि वह तमिलनाडु की सरकार को राजग की केंद्र सरकार से गिरवा दें ,और अपने हाथ से निकले तमिलनाडु को फिर किसी न किसी प्रकार से प्राप्त करें । उधर भाजपा का कहना था कि जयललिता भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच से बचने का दबाव अटल बिहारी वाजपेयी की केन्द्र सरकार पर बना रही थीं। कुछ भी हो ,इतिहास अब इतिहास है, सरकार गिरी और नए चुनाव हुए । 
ऐसी परिस्थितियों में 26 अप्रैल को राष्ट्रपति के. आर . नारायणन ने लोकसभा भंग कर दी । अटल बिहारी वाजपेयी को अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में बने रहने को कहा गया । चुनाव आयोग ने चुनावों की तिथि घोषित कर दी । यह चुनाव 5 सप्ताह तक चले। इन चुनावों में देश की राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय स्तर की कुल 45 पार्टियों ने भाग लिया । 1998 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद को सोनिया गांधी ने प्राप्त किया । तब कांग्रेस के भीतर ही सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा बड़ी प्रमुखता से उछला । कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शरद पवार ने इस मुद्दे को बहुत हवा दी और वह प्रखर आलोचक के रूप में सोनिया गांधी के सामने आ खड़े हुए । अन्त में इसी मुद्दे को लेकर बढ़े विरोध के चलते उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी । तब सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा भाजपा ने हथिया लिया और उसे जनता के सामने उसने प्रमुखता से उठाना आरंभ कर दिया ।
दुख की बात यह है कि यदि सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा भाजपा ने उठाया था तो इसे कालांतर में धीरे से उसने कहीं यूं ही विलीन क्यो कर दिया ,जैसे कि वह था ही नहीं ? सम्भवत: यह मुद्दा सोनिया गांधी को केवल सत्ता से दूर रखने के लिए ही भाजपा ने प्रयोग किया था । यदि भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे के प्रति गंभीर थी तो इसे लेकर भारतीय जनता पार्टी की सरकार को कानून बनाना चाहिए था कि कोई भी विदेशी मूल का व्यक्ति किसी पार्टी का न तो अध्यक्ष बन सकता है और न देश का प्रधानमंत्री हो सकता है । 
भाजपा और उसके गठबंधन के दल उन दिनों देश के विभिन्न राज्य में निरंतर विस्तार पाते जा रहे थे । संपन्न हुए चुनावों में ओड़िसा, आंध्र प्रदेश और असम में भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बढ़त मिली थी । 6 अक्टूबर 1999 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ के आर नारायणन ने अटल बिहारी वाजपेयी को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलायी।
देश की आत्मा अभी भी चुनावी सुधारों के लिए छटपटा रही थी ।अटल जी को देश के लोग चाहते थे और वह एक अच्छे प्रधानमंत्री भी देश के मतदाताओं की दृष्टि में थे । इस सब के उपरांत भी देश की आत्मा अभी किसी ऐसे प्रभावशाली नेतृत्व को चाह रही थी जो देश की चुनाव व्यवस्था को सुधारने वाला हो , देश के चुनाव आयोग को शक्ति संपन्न करने वाला हो , देश की न्याय व्यवस्था को देश के नेताओं पर अपना अंकुश चलाने वाली बनाने वाला हो ,और जो पूर्ण पारदर्शी लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया में विश्वास रखने वाला हो । 

1 thought on “भारत में आम चुनाव और निर्वाचन आयोग ,भाग —- 3

  1. WE NEED WRITERS WHO SHOULD WRITE WHAT WE SHOULD DO TO BRING INDIA AND INDIANS BACK TO GLORY.
    THEY SHOULD FIND A WAY HOW TO BRING BACK MISGUIDED HINDU WHO HAVE CONVERTED TO ENEMY CULTURE BACK TO HINDU FOLD TO SAVE NATION.
    ITS SO CLEAR WE HAVE SEEN EACH NATION AFTER CONVERSION ARE SICK AND DEAD NOW ..
    CONVERTS EVERY WHERE CAUSE OF DESTRUCTION OF OWN NATIONS AND RACE .
    WE HAVE 58 NATIONS ON DEATH BED NOW .
    MORE THAN 1.3 BILLIONS CONVERTS LIVING LOW LIFE .
    WE NEED ARTICLES LIKE HOW YOUR LIFE WILL BE WHEN LOCALS ADOPT THE ENEMY CULTURE .

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