“अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कमीशन का गुरुकुल कांगड़ी का भ्रमण एवं प्रशंसा”

गुरुकुल कांगड़ी का अतीत अत्यन्त स्वर्णिम एवं अनेक उपलब्धियों से भरपूर है जो शायद अब नहीं रहीं है। वर्तमान का गुरुकुल देश के अन्य विश्वविद्यालयों की तरह का एक विश्वविद्यालय है। मात्र स्वामी श्रद्धानन्द जी और आचार्य रामदेव जी आदि का नाम इस गुरुकुल से जुड़ा है। अब यह एक सरकारी स्कूल, कालेज या विश्वविद्यालय के समान है। गुरुकुल की अतीत की विशेषतायें स्वामी श्रद्धानन्द जी के पं. सत्यदेव विद्यालंकार रचित जीवन चरित में विद्यमान हैं। वहीं से आज हम इस लेख की सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। हम आशा करते हैं पाठकों को यह ऐतिहासिक जानकारी पसन्द आयेगी।

एक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का कमीशन गुरुकुल आया और उस पर मुग्ध हो गया। डॉक्टर अन्सारी और बैरिस्टर आसफ अली सरीखे निष्पक्ष मुसलमान गुरुकुल गये और उस पर लट्टू हो गये। जो मुसलमान गुरुकुल को साम्प्रदायिक संस्था समझते हुए यह सोचते थे कि उनको वहां अपने बर्तन में कोई पानी नहीं पिलायेगा, जब ब्रह्मचारियों और अध्यापकों ने उनके साथ बैठ कर भाई-भाई की तरह भोजन किया तब उनकी आंखे खुलीं और गुरुकुल ने उनके हृदयों में घर कर लिया।

कलकत्ता यूनिवर्सिटी कमीशन के प्रधान मि. सैडलर और श्री आशुतोष मुकर्जी गुरुकुल आये, उन पर गुरुकुल का जो असर हुआ, वह सैडलर कमीशन और रिपोर्ट में दर्ज है। मि. सैडलर ने गुरुकुल का खूब गहरा अवलोकन करने के बाद कहा था-‘‘मातृभाषा के माध्यम से उच्च शिक्षा देने के परीक्षण में गुरुकुल को अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई है।

माननीय श्रीनिवास शास्त्री सरीखे नरम से नरम, लाला लाजपतराय जी सरीखे गरम से गरम, पंडित मोतीलाल जी नेहरू सरीखे उग्रतम राजनीतिज्ञ, पंडित मदनमोहन जी मालवीय सरीखे फूंक-फूंक आगे कदम बढ़ाने वाले और गुरुकुल में भी बड़ी संख्या के संथापक सेठ जमनालाल बजाज सरीखे श्रद्धा सम्पन्न साधु-स्वभाव महानुभाव, भारत कोकिला श्रीमती सरोजिनी नायडू सरीखी महिला, शान्ति निकेतन-बोलपुर के संस्थापक विश्वविख्यात श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर सरीखे महापुरुष और जगद्वन्द्य महात्मा गांधी सरीखे सन्त आदि सबको ही, भिन्न-भिन्न रुचि और भिन्न-भिन्न स्वभाव रखते हुए भी गुरुकुल ने अपनी ओर आकर्षित किया और सबके हृदयों में अपने लिए एक-सा स्थान बनाया।

जिले के मजिस्ट्रेट, प्रान्त के गवर्नर और भारत के वायसराय के लिए भी गुरुकुल में कुछ आकर्षण था। रुड़की के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट मि. आर.सी. हावर्ट ने ठीक ही लिखा था-‘‘गुरुकुल एक अद्भुत संस्था है, जिसका प्रबन्ध अत्युत्तम है। इसको देख कर मुझको चैस्टहाउस का अपना विद्यार्थीजीवन सहसा याद गया। गुरुकुल में अपनी मौलिक पद्धति के साथ विलायत के सार्वजनिक स्कूलों की अच्छाई का मिश्रण किया गया है। शिक्षा का माध्यम हिन्दी है और जनता की आम भाषा ही शिक्षा का वास्तविक माध्यम है। मैंने भारत में कहीं और ऐसे स्वस्थ और प्रसन्न बालक नहीं देखे। अध्यापक निःस्वार्थी हैं और अपने शिष्यों के चरित्रगठन का पूरा ध्यान रखते हैं। सरकारी अधिकारियों की ऐसी सम्मतियों से गुरुकुल की सम्मति-पुस्तक भरी पड़ी है। स्वामी श्रद्धानन्द जी के पावन जीवन की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। इसके पाठक को प्रत्येक घटना से प्रेरणा मिलती है। काश स्वामी श्रद्धानन्द जी आज भी जीवित होते और हम उनके दर्शन कर पाते। स्वामी श्रद्धानन्द जी ऋषि दयानन्द जी की देश व समाज को अनेक देनों में से एक प्रमुख देन थे। प्रत्येक आर्यसमाज के सदस्य को स्वामी श्रद्धानन्द जी के पं. सत्यदेव विद्यालंकार रचित जीवन-चरित को पढ़ना चाहिये। इससे वह गुरुकुल के प्राचीन गौरव और स्वामी श्रद्धानन्द जी के जीवन, व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित हो सकेंगे।

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