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    Homeसाहित्‍यकविताघर-घर दुःशासन खड़े

    घर-घर दुःशासन खड़े

    चीरहरण को देख कर,
    दरबारी सब मौन !
    प्रश्न करे अँधराज पर,
    विदुर बने वो कौन !!
    ★★★
    राम राज के नाम पर,
    कैसे हुए सुधार !
    घर-घर दुःशासन खड़े,
    रावण है हर द्वार !!
    ★★★
    कदम-कदम पर हैं खड़े,
    लपलप करे सियार !
    जाये तो जाये कहाँ,
    हर बेटी लाचार !!
    ★★★
    बची कहाँ है आजकल,
    लाज-धर्म की डोर !
    पल-पल लुटती बेटियां,
    कैसा कलयुग घोर !!
    ★★★
    वक्त बदलता दे रहा,
    कैसे- कैसे घाव !
    माली बाग़ उजाड़ते,
    मांझी खोये नाव !!
    ★★★
    घर-घर में रावण हुए,
    चौराहे पर कंस !
    बहू-बेटियां झेलती,
    नित शैतानी दंश !!
    ★★★
    वही खड़ी है द्रौपदी,
    और बढ़ी है पीर !
    दरबारी सब मूक है,
    कौन बचाये चीर !!
    ★★★
    छुपकर बैठे भेड़िये,
    लगा रहे हैं दाँव !
    बच पाए कैसे सखी,
    अब भेड़ों का गाँव !!

    डॉ. सत्यवान सौरभ
    डॉ. सत्यवान सौरभ
    रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

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