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    Homeसाहित्‍यलेखपवित्र धर्मस्थल व आस्था-विश्वास का केंद्र मोक्षदायक मथुरा नगरी

    पवित्र धर्मस्थल व आस्था-विश्वास का केंद्र मोक्षदायक मथुरा नगरी

    -अशोक “प्रवृद्ध”

    सदियों से ही भारत के बहुसंख्यकों का पवित्र धर्मस्थल व आस्था-विश्वास का केंद्र भारतवर्ष के उत्तरप्रदेश का मथुरा नगर श्रीकृष्ण जन्म स्थल पर स्थित संरचना से वर्तमान में लगी हुई जामा मस्जिद को हटाने की मांग को लेकर स्वयं श्रीकृष्ण विराजमान और स्थान श्रीकृष्ण जन्मभूमि के द्वारा न्याय की गुहार लगाने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए पहुंच जाने के कारण चर्चा के केंद्र में है। विष्णु अवतार षोडश कलायुक्त श्रीकृष्ण की जन्मस्थली होने के कारण उत्तरप्रदेश का मथुरा जनपद सम्पूर्ण विश्व में अतिप्राचीन काल से ही एक धार्मिक स्थल के रूप में लोकख्यात, और भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का प्रमुख केंद्र रहा है। प्राचीन काल से ही भारतीय धर्म, दर्शन,सभ्यता- संस्कृति, कला एवं साहित्य के निर्माण व विकास में मथुरा का महत्त्वपूर्ण योगदान सदा से रहा है। महाकवि सूरदास, संगीत के आचार्य स्वामी हरिदास, स्वामी दयानंद सरस्वती के गुरु स्वामी विरजानंद, कवि रसखान आदि का नाम मथुरा नगरी से जुड़ा हुआ है।
    भारतवर्ष के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गौरव की आधारशिला समझी जाने वाली मोक्षदायक सप्त पुरियों में मथुरा का स्थान विभिन्न पुराणों में अयोध्या के पश्चात अन्य पुरियों के पहले रखा गया है। पदम पुराण में मथुरा का महत्व सर्वोपरि मानते हुए कहा गया है कि यद्यपि काशी आदि सभी पुरियाँ मोक्ष दायिनी है तथापि मथुरापुरी धन्य है। यह पुरी देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। इसी का समर्थन गर्गसंहिता में करते हुए कहा गया है कि पुरियों की रानी कृष्णापुरी मथुरा बृजेश्वरी है, तीर्थेश्वरी है, यज्ञ तपोनिधियों की ईश्वरी है, यह मोक्ष प्रदायिनी धर्मपुरी मथुरा नमस्कार योग्य है। श्रीकृष्ण जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध मथुरा के सम्बन्ध में पौराणिक मान्यता है कि मथुरा में निवास करने मात्र से मनुष्य पाप रहित हो जाता है और उसे अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। पौराणिक ग्रन्थों में मथुरा नगरी की गौरवमयी इतिहास के विस्तृत अंकन प्राप्य हैं । विभिन्न धर्मों से सम्बन्धित होने के कारण यहाँ वैदिक सहित विभिन्न धर्मावलम्बियों के अनुयायियों के बसने और निवास करने का महत्व क्रमशः बढ़ता ही रहा है। पुराणों में मथुरा पुरी की महिमा गायन के अनेकशः विवरणियाँ अंकित हैं। वराह पुराण के अनुसार मथुरा नगरी में शुद्ध विचार से निवास करने वाले लोग मानव के रूप में साक्षात देवता हैं। श्राद्ध कर्म का विशेष फल प्राप्त होने वाले मथुरा में श्राद्ध करने वालों के पूर्वजों को आध्यात्मिक मुक्ति मिलती है। उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने मथुरा में तपस्या कर के नक्षत्रों में स्थान प्राप्त किया था। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार पृथ्वी के द्वारा मथुरा तीर्थस्थल के महिमा के बारे पूछे जाने पर महावराह ने कहा कि मुझे इस वसुंधरा में पाताल अथवा अंतरिक्ष से भी मथुरा अधिक प्रिय है। वराह पुराण में मथुरा के भौगोलिक स्थिति का वर्णन करते हुए कहा गया है कि मथुरा की माप बीस योजन है। इस मंडल में मथुरा, गोकुल, वृन्दावन, गोवर्धन आदि नगर, ग्राम एवं मन्दिर, तड़ाग, कुण्ड, वन एवं अनगणित तीर्थों के होने का विवरण पौराणिक ग्रन्थों में अंकित है। इनका विशद वर्णन विभिन्न पुराणों में अंकित प्राप्य है। पुराणों में गंगा के समान ही यमुना के गौरवमय महत्त्व का भी विशद विवरण किया गया है। पुराणों में मथुरा के राजाओं के शासन एवं उनके वंशों का भी वर्णन प्राप्त होता है।

    भारत के उत्तरप्रदेश प्रान्त के मथुरा जिले का कुल क्षेत्रफल 3709 वर्गकिलोमीटर अर्थात1,432 वर्गमील है। वर्तमान ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार राष्ट्रीय महत्व का मथुरा नगर कनिष्क वंश के द्वारा स्थापित नगर है। यद्यपि भारत की प्राचीन नगरी मथुरा को वर्तमान में उत्खनन द्वारा प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार कुषाण कालीन माना जाता है, तथापि इसके विपरीत पौराणिक आख्यानों में उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार मथुरा द्वापर युग में शूरसेन देश की राजधानी थी, और मथुरा को शूरसेन नगरी, मधुपुरी, मधुनगरी, मधुरा आदि आदि अनेक नामों से पुरातन ग्रन्थों में संबोधित किया गया है।
    हिमालय और विंध्याचल के मध्य में पड़ने वाले आर्यावर्त्त अर्थात भारतवर्ष में यमुना नदी के किनारे बसे मथुरा को वाल्मीकि रामायण में मधुपुर अथवा मधुदानव का नगर बताते हुए कहा गया है कि यहाँ लवणासुर की राजधानी थी। इस नगरी को मधुदैत्य द्वारा बसाया गया है। लवणासुर त्रेतायुगीन श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न के द्वारा युद्ध में पराजित होकर मृत्यु को प्राप्त मधुदानव का पुत्र था। वाल्मीकि रामायण में उल्लिखित इस प्रसंग से मधुपुरी या मथुरा का त्रेता युग अर्थात रामायण-काल में बसाया जाना सिद्ध होता है। वाल्मीकि रामायण में इस नगरी की समृद्धि का वर्णन करते हुए कहा गया है कि इस नगरी को लवणासुर ने भी सजाया संवारा था। इससे यह स्पष्ट है कि प्राचीनकाल से अब तक इस नगर का अस्तित्व अखण्डित रूप से चला आ रहा है। उल्लेखनीय है कि मथुरा पुरी के चारों ओर चार शिव ,मन्दिर पूर्व में पिपलेश्वर, दक्षिण में रंगेश्वर, उत्तर में गोकर्णेश्वर और पश्चिम में भूतेश्वर महादेव का मन्दिर अवस्थित है। चारों दिशाओं में शिव के विराजित होने के कारण भगवान शिव को मथुरा का कोतवाल कहा जाता है। मथुरा नगर को आदि वाराह भूतेश्वर क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, और मथुरा वाराह जी की गली में नीलवारह और श्वेतवाराह के सुंदर विशाल मन्दिर अवस्थित हैं। श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने श्री केशवदेवजी की मूर्ति स्थापित की थी। परन्तु औरंगजेब के काल में वह मूर्ति नष्ट -भ्रष्ट कर दी गई औरंगजेब ने मन्दिर को तोड़ डाला और उसके स्थान पर मस्जिद खड़ी कर दी। बाद में उस मस्जिद के पीछे नया केशवदेवजी मन्दिर का निर्माण किया गया है।

    पौराणिक तथ्यों के अनुसार योगीश्वर श्रीकृष्ण के द्वारा महाभारत युद्ध के पश्चात अपनी इहलौकिक लीला संवरण कर लेने और युद्धिष्ठिर के द्वारा हस्तिनापुर का राज्य परीक्षित व मथुरा मंडल का राज्य श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ को सौंप कर चारों भाईयों सहित परलोक के लिए महाप्रस्थान कर जाने के बाद महाराज वज्रनाभ ने महाराज परीक्षित और महर्षि शांडिल्य के सहयोग से मथुरा मंडल की पुन: स्थापना करके उसकी सांस्कृतिक छवि का पुनरूद्वार किया। वज्रनाभ द्वारा मथुरा में अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया गया, और श्रीकृष्ण की जन्मस्थली का महत्व भी स्थापित किया गया। इसमें भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की अर्द्धरात्रि को श्रीकृष्ण द्वारा अवतार ग्रहण किये जाने वाला वह जन्म स्थल- कंस का कारागार भी शामिल था, जो आज कटरा केशवदेव नाम से प्रसिद्ध है। कालान्तर में यह कारागार केशवदेव के मन्दिर के रूप में परिणत हुआ, और मथुरा नगरी इसी केशवदेव मन्दिर के आस-पास ही फली -फूली और मथुरा पुरी के रूप में सुशोभित हुई। कालक्रम में यहाँ अनेक गगनचुम्बी भव्य मन्दिरों का निर्माण हुआ। इनमें से कुछ तो समय के साथ नष्ट व काल कलवित हो गये और कुछ को विधर्मियों- जिहादियों ने नष्ट कर दिया। खुदाई होने से यहाँ बहुत सी ऐतिहासिक वस्तुएँ प्राप्त हुई थीं।
    वर्तमान साक्ष्यों के अनुसार ईस्वी सन से पूर्व 80-57 के महाक्षत्रप सौदास के समय के ब्राह्मी लिपि में प्राप्त एक शिलालेख के अनुसार अर्जुनायन शासक अरलिक वसु ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर एक मन्दिर तोरण द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था। कालक्रम में हूण, कुषाण आदि हमलों में इस मंदिर के ध्वस्त होने के बाद गुप्तकाल के सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने सन 400 ईस्वी में दूसरे वृहद मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर को महमूद गजनवी के द्वारा ध्वस्त कर दिए जाने के पश्चात महाराज विजयपाल देव तोमर के शासन काल में नील के व्यापार के लिए प्रसिद्ध मथुरा क्षेत्र के ही मगोर्रा के सामंत हिन्दू जाट शासक जाजन सिंह ने तीसरी बार मन्दिर का निर्माण करवाया। खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से भी जाजन सिंह (जज्ज) के मंदिर बनाने की पुष्टि होती है। स्तम्भ में उल्लेख किया गया है कि शासक जाजन सिंह तोमर (कुंतल) ने 1150 ईस्वी में करवाया। इस जाजन सिंह को जण्ण और जज्ज नाम से भी सम्बोधित किया गया है। इस मन्दिर को सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में सिकन्दर लोदी के शासन काल में नष्ट कर डाला गया था। मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शासन काल में 1618 ईस्वी में ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जूदेव बुन्देला द्वारा श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर पुनः 250 फीट ऊँची एक नया विशाल मन्दिर निर्माण कराया गया, जो आगरा से भी दिखाई देता था, और उस समय इस निर्माण की लागत लगभग तैंतीस लाख रुपये आई थी। इस मन्दिर के चारों ओर एक ऊँची दीवार का परकोटा बनवाया गया था, जिसके अवशेष अब तक विद्यमान हैं। दक्षिण पश्चिम के एक कोने में कुआँ भी बनवाया गया था जिस का पानी 60 फीट ऊँचा उठाकर मन्दिर के प्रागण में फब्बारे चलाने के कार्य में लाया जाता था। यह कुआँ और उसका बुर्ज आज तक विद्यमान है। सन 1669 ईस्वी में मुगल शासक औरंगजेब द्वारा पुन: यह मन्दिर नष्ट कर दिया गया और इसकी भवन सामग्री से ईदगाह बनवा दी गई, जो आज विद्यमान है। उल्लेखनीय है कि मन्दिर पर किए गए मुगलों के हमले का वीर गोकुला जाट ने जमकर विरोध किया और इस मन्दिर को मुगल हमले में भी पूर्ण रूप से सुरक्षित रखा। वीर गोकुला जाट के बलिदान के पश्चात ही मुगलों द्वारा इसे गिराया जा सका था। इससे गुस्साए जाटों ने मुगलों की राजधानी आगरा पर आक्रमण कर दिया था। बाद में मुगलों द्वारा नष्ट -भ्रष्ट कर दिए गए इस स्थान पर स्थित मन्दिर का पुनर्निर्माण यहां के जाट शासक महाराजा सूरजमल ने करवाया, जिसका विस्तार महाराजा जवाहर सिंह ने किया। 21 फरवरी 1951 को कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना करने के साथ ही यह मंदिर ट्रस्ट के अधीन चला गया जबकि इससे पहले इसकी जिम्मेदारी भरतपुर नरेशों के पास थी।

    अशोक “प्रवृद्ध”
    अशोक “प्रवृद्ध”
    बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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