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    Homeविश्ववार्ताओली की विषैली बोली से दरकते रिश्ते

    ओली की विषैली बोली से दरकते रिश्ते

    • श्याम सुंदर भाटिया

    भारत और नेपाल कोई नए नवेले दोस्त नहीं हैं। सदियों से दोनों देशों के बीच बेटी-रोटी का रिश्ता है। नेपाल हमेशा भारत को बिग ब्रदर मानता रहा है, लेकिन नेपाल के प्रधानमंत्री श्री ओपी शर्मा ओली की कोविड के दौरान बोली जहरीली हो गई है तो रीति और नीति भी एकदम जुदा है। ओली अपने आका ड्रैगन के इशारे पर साम, दाम, दंड और भेद की नीति का अंधभक्त की मानिंद अनुसरण कर रहे हैं। ऐसा करके ओली नेपाल की अवाम और विरोधी नेताओं के बार-बार निशाने पर हैं। ओली की सरकार भारत के तीन हिस्सों -कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का बता रही है। यह ही नहीं, भारत के प्रबल विरोध के बावजूद नेपाल की संसद में इस विवादित नक़्शे में संशोधन का प्रस्ताव भी पारित हो गया। भारत की नहीं बल्कि पूरी दुनिया नेपाल के इस बगावती रुख के पीछे चीन की हिमाकत को देखते हैं। ओली कभी दावा करते हैं, भगवान राम नेपाल में जन्मे थे, इसीलिए भगवान राम भारतीय नहीं बल्कि नेपाली हैं। वह यह कहना भी नहीं चूकते, असली अयोध्या भारत में नहीं नेपाल में है। ओली ने सारी सीमाएं लांघते हुए कहा, इंडियन वायरस चाइनीज और इटली से ज्यादा जानलेवा है। भारत को उकसाने, सांस्कृतिक हमले और सम्प्रभुता से छेड़छाड़ में नेपाल कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा है। इन सब की आड़ में नेपाल के मंसूबे बेहद खतरनाक हैं। नेपाल अपने आका के इशारे पर बहादुर गोरखों को भारत से बहुत दूर करने की फिराक में है। बावजूद इसके भारत अपने फर्ज से नहीं डिगा है। परिपक्वता का परिचय देते हुए बड़े भाई की भूमिका निभा रहा है। नेपाल को पूर्ववत की भांति इमदाद जारी है। कोविड- 19 में नेपाल को वेंटीलेटर देकर भारत बड़े दिल वाले का शिद्दत से अहसास करा चुका है।

    भारत और नेपाल में घनिष्ठ दोस्ती में गहरी दरार आने लगी है। दरअसल नेपाली संसद में विवादित नक्शा पास हो जाने के बाद दोनों देशों में रिश्ते मधुर नहीं हैं। भारत के तीनों हिस्सों -कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा पर जबरिया नेपाल अपना हक जता रहा है। नेपाल की संसद में अंततः विवादित नक्शे में संशोधन का प्रस्ताव पास भी हो गया है। 275 सदस्यों वाली नेपाली संसद में इस विवादित बिल के पक्ष में 258 वोट पड़े।  नेपाल के इस फैसले के बाद भारत का रुख नाराजगी वाला है।  नेपाल के इस बगावती रुख के पीछे चीन का हाथ माना जा रहा है। गौरतलब है कि 8 मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेख से धाराचूला तक बनाई गई सड़क का उद्घाटन किया था।  इसके बाद नेपाल ने लिपुलेख को अपना हिस्सा बताते हुए विरोध किया था। कोरोना संकट के बीच 18 मई को नेपाल ने अपने देश का नया नक्शा जारी किया, जिसमें भारत के लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी सहित तीन इलाके को अपना हिस्सा बताया। इस कदम से भारत और नेपाल की दोस्ती में दरार आनी शुरु हो गई है। भारत ने लगातार इसका कड़ा विरोध किया लेकिन नेपाल अब इस नक्शे पर अड़ा हुआ है। चीन के इशारों पर काम करने वाले नेपाल ने एक और विवादित अभियान चला रखा है।  इस अभियान के तहत नेपाल उत्तराखंड के देहरादून, नैनीताल समेत हिमाचल, यूपी, बिहार और सिक्किम के कई शहरों को अपना बता रहा है। नेपाल ने भारतीय शहरों को अपना बताने के लिए 1816 में हुई सुगौली संधि से पहले के नेपाल की तस्वीर दिखा रहा है। 8 अप्रैल 2019 में नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र संघ में इस मुद्दे को उठाया भी था, लेकिन फिर इस मुद्दे पर शांत हो गया था।

    नेपाल के प्रधानमंत्री अपनी धुन में मस्त हैं। लगता है,ओली का केवल तो केवल वन टारगेट है, भारत विरोधी अभियान चलाना। ड्रैगन चाहता है, किसी तरह गोरखाओं को भारतीय सेना में शामिल होने से रोका जाए। भारतीय सेना के गोरखा सैनिकों के पराक्रम से चीन वाकिफ है, इसीलिए वह नेपाल पर दबाव डाल रहा है, वह 200 साल पुरानी परंपरा को खत्म करके भारतीय सेना और गोरखाओं के बीच एक चौड़ी खाई खींच दे। सियाचिन ग्लेशियर की खतरनाक चोटियों पर गोरखा सैनिक अपनी बहादुरी का कई बार परिचय दे चुके हैं। यही बात चीन को खटक रही है। इस बीच, यह खबर भी सामने आई है कि चीनी दूतावास ने काठमांडू के एक गैर सरकारी संगठन को खास काम के लिए नियुक्त किया है। यह पता लगाने को कहा गया है, आखिर गोरखा समुदाय के लोग भारतीय सेना में क्यों शामिल होना चाहते हैं। इरादा साफ है – गोरखा समुदाय का ब्रेनवॉश करके उसे भारतीय सेना का हिस्सा बनने से रोका जाए। नेपाल सरकार खुद भी इस विषय पर कई बार बयानबाजी कर चुकी है। कुछ वक्त पहले नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ज्ञावली ने कहा था, 1947 में हुए समझौते के कई प्रावधान संदिग्ध हैं, इसीलिए अब भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती की समीक्षा होगी।

    मानो, ओली का विवादों से चोली-दामन सरीखा रिश्ता है। ओली ने पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को लेकर बेतुके कमेंट्स कर दिए, जिससे भारतवंशियों की धार्मिक भावनाएं आहत हो गई। भारत सरकार तो खासी नाराज है ही। ओली ने नेपाल के आदि कवि भानुभक्त की जन्म जयंती समारोह में कहा, भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में नहीं बल्कि बाल्मीकि आश्रम के पास है। श्रीराम भारतीय नहीं बल्कि नेपाली हैं। उन्होंने बीरगंज के पास ठोरी गांव में जन्म लिया था। श्रीराम वहीं के राजकुमार हैं। इन अतार्किक कमेंट्स को लेकर ओली को प्रतिपक्ष के तीखे हमलों का सामना करना पड़ रखा है। विपक्षी नेपाली कांग्रेस के प्रवक्ता श्री बिश्व प्रकाश शर्मा ने कहा, हमारी पार्टी प्रधानमंत्री के बयान और बर्ताव से इत्तेफाक नहीं रखती है। उन्होंने ओली पर तीखा प्रहार करते हुए कहा, उन्होंने देश पर शासन करने के लिए नैतिक और राजनीतिक आधार खो दिया है। ओली का बयान क्या सरकार का आधिकारिक बयान है, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए। ऐसे कठिन वक्त में यह दुर्भाग्य की बात है, प्रधानमंत्री की जवाबदेही और कामकाज में भरी अंतर है। यह रुलिंग पार्टी पर निर्भर करता है, वह प्रधानमंत्री की सोच, काम करने के तरीके आदि में कोई बदलाव लाती है या प्रधानमंत्री को बदला जाता है। प्रधानमंत्री यह भी भूल गए, संविधान और संवेदनशीलता के साथ सरकार चलाई जाती है।    

    ओली सरकार भारत से अपने संबंधों को लगातार बिगाड़ने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। जहां ओली सरकार ने भारत के चैनलों पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, वहीं अब अपने एफएम स्टेशन के माध्यम से हिन्दुस्तान के खिलाफ प्रोपेगेंडा की साजिशों में जुटी है। नेपाल के एफएम स्टेशनों पर दिन-रात कालापानी और लिपुलेख पर अपना दावा जताने वाले संगीत और गीत गाए जा रहे हैं। कड़वा सच यह है, भारत विरोधी बयान देकर सुर्खियों में बने रहने वाले नेपाल के प्रधानमंत्री ओली पर चीन से रिश्वत लेकर अपने स्विस बैंक एकाउंट में 41 करोड़ रुपये जमा करने का आरोप है। ग्लोबल वॉच एनालिसिस की एक रिपोर्ट में इस बात का दावा किया गया है। ड्रैगन का एजेंडा अब दुनिया से छिपा नहीं है,वह ओली के जरिए नेपाल में अपने हित साध रहा है। ड्रैगन नेपाल के हुक्मरानों को प्रलोभन देकर भारत विरोधी माहौल बनाने की चाहें जितनी कुचालें चल ले,लेकिन के बाशिंदे अपनी सरकार के इंडिया विरोधी स्टैंड से कतई ख़ुश नहीं हैं। हकीक़त यह है,वे भारत जैसे बड़े भाई के संग दोस्ती के प्रबल हिमायती हैं।

    श्याम सुंदर भाटिया
    श्याम सुंदर भाटिया
    लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं। रिसर्च स्कॉलर हैं। दो बार यूपी सरकार से मान्यता प्राप्त हैं। हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में उल्लेखनीय योगदान और पत्रकारिता में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए बापू की 150वीं जयंती वर्ष पर मॉरिशस में पत्रकार भूषण सम्मान से अलंकृत किए जा चुके हैं।

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