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    हरित घर वर्तमान की आवश्यकता

                 – दयानन्द अवस्थी

    “*भूर्जज्ञ ऊत्तानपदों”- ऋगवेद की एक ऋचा जो कि तैत्तरीय संहिता में वर्णित है के अनुसार हमारी पृथ्वी वृक्ष से उत्पन्न हुई है। यही आधार हमें अपनी जननी के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करता है।
    आज सम्पूर्ण विश्व पर्यावरण प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, लुप्त होती प्रजातियों व प्राकृतिक असंतुलन जैसी गम्भीर समस्याओं से जूझ रहा है। ये सारी समस्याएं आपस में जुड़ी हुई हैं और पर्यावरण से अनावश्यक छेड़छाड़ के कारण उपजी हैं।बेतरतीब औद्योगिकरण व शहरीकरण तथा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन तथा जीवाश्म ईंधन की बढ़ती हुई खपत के कारण पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हुई है।

             मानव व जीव-जन्तुओं के अस्तित्व हेतु वृक्षों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है इसी बात से प्रेरित होकर हमारे ऋषि मुनियों व पूर्वजों ने वनों के संरक्षण व संवर्द्धन को धार्मिक सस्थाओं व व्यवहारों से आबद्ध किया है।

           आज भी हमारे समाज में कई वृक्षों जैसे कि बरगद,पीपल,तुलसी ,आँवला,आम आदि की पूजा की जाती है तथा कई औषधीय पौधों को पूजा पद्धति में शामिल किया जाता है।वन ग्लोबल वार्मिग व जलवायु परिवर्तन की समस्या को कम करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वन वन्य प्राणियों के प्राकृतिक घर हैं।किंतु उनके रहवास को मानव ने एंकरोचमेंट कर लिया है।

        जेओफ्री डोनोवन नामक वैज्ञानिक ने एक शोध में यह बताया कि किसी विशेष क्षेत्र में वृक्षों के काटने से होने वाली मृत्यु एवं लोगों के मृत्यु के बीच तुलनात्मक रूप से किये गये अध्ययन का परिणाम चैकाने वाला था । जिस क्षेत्र में पेढ़ों की अंधाधुँध कटाई हो रही थी, उस क्षेत्र में हृदयद्यात एवं श्वांस रोग सम्बन्धी समस्याओं से होने वाली मृत्युदर अधिक पाई गई  । यह भी ज्ञात हुआ कि जिन क्षेत्रों में घने वन थे, उन क्षेत्रों में क्राइम रेट कम था।

    विकराल होती हुई जनसंख्या के कारण संसाधन के दोहन का अनुपात बेहद कम हो गया है वनों की वृद्धि ज़मीन की उपलब्धता पर आधारित है जो कि विभिन्न औद्योगिक परियोजनाओं एवं अंधाधुंध विकास के कारण कम हुई है । ऐसे में मनुष्य को स्वयं अपने पास अधिक से अधिक पौधारोपण कर प्राणवायु आक्सीजन की वृद्धि के प्रयास करने होंगे।
    इसके लिए वर्तमान में हरित घर की संकल्पना का प्रादुर्भाव हुआ है। हम जहां रहते हैं यदि उस प्रांगण को हरा भरा कर दें ,वातावरण को स्वच्छ व निरोगी रखें ,जल संचय करें, रसोई व कपड़े धोने के जल से फ़्लश के पानी अथवा किचन गार्डन में पानी की का पुनरुपयोग करें, ऊर्जा बचाएँ, वस्तुओं का तथा जल का पुनर्चक्रण करें,घरेलू अपशिष्ट से कम्पोस्ट का निर्माण करें, सौर ऊर्जा का बेहतर प्रयोग करें तथा प्लास्टिक को त्याग कर बांस, काग़ज़,मिट्टी ,सन ,पटसन सूत आदि का प्रयोग बहुतायत में अपने घर में करें तो वह हरित घर बन जाएगा।
    प्रत्येक हरित घर में पर्यावरण संरक्षण के चार आर (R ) रिड्यूस,रियूज, रिसाइक्लिंग व रीथिंकिंग को शब्दशः लागू करना होगा।किचन गार्डन (रसोई बगिया) का निर्माण फल व सब्ज़ियों की ज़रूरतों के क्षेत्र में आत्म निर्भरता प्रदान करेगा।यदि हमारे पास रिक्त स्थान है तो उसे पौधे से ही भरना एक उत्तम सोंच है।घर के प्रत्येक सदस्य के अनुपात में पाँच पेड़ यदि व्यक्ति लगाता है इन्हें अपने जीवन काल में बड़ा करता है तो वह दिन दूर नहीं जब हम अपनी जनसंख्या का पाँच गुना पेढ़ तो कम से कम इस धरा को दे जाएँगे।और यही क्रम आगामी आने वाली पीढ़ी भी करे तो हमारे हरित घर की संकल्पना साकार होगी।
    इंडिया वाटर पोर्टल के अनुसार मेरियम वेबेस्टर की इकोफ़्रेंडली हाउस  की संकल्पना भी हरित घर संकल्पना को प्रोत्साहित करता है इसके अनुसार पर्यावरणअनुकूल घरों का निर्माण करना जिसमें न्यूनकार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा मिलता हो |इसका प्रथम ज्ञात उपयोग सन 1989 में हुआ।ऐसे घरों में पवन ऊर्जा का प्रयोग ईंधन हेतु बायोगैस का प्रयोग, उच्च दक्षता की प्रकाश ब्य्व्स्था, ऐसी छतों का निर्माण जहां से दिन मे प्रकाश अधिक आए।ऐसे घरों का निर्माण कर्नाटक व केरल में शुरू किया जा चुका है। एक और नवीन कॉन्सेप्ट हरित छत संकल्पना भी हरित घर  में शामिल की जा सकती है – 1960 के दशक में जर्मनी से प्रारम्भ हुआ यह आंदोलन आज यूरोप व अमेरिका में अपनी सक्रिय भूमिका में है और विभिन्न इमारतों की छतों में इसका प्रयोग कर 6,50,000 वर्गमीटर क्षेत्र को कव्हर करके तापमान नियंत्रण पर सफलता पाई गयी है। भारत में प्रथम हरित छत सम्मेलन का आयोजन 2011 में इंदौर मप्र में वर्ल्डग्रीन इन्फ़्रास्ट्रक्चर नेटवर्क व ग्रीन टेक्नोलोजी नामक संस्था के तत्वावधान में आयोजित हुआ जिसमें टेरेस गार्डन व छतों में हरियाली के माध्यम से ताप नियंत्रण व वातावरण को शुद्ध रखने के उपाय पर चर्चा की गयी तथा एतदर्थ उपाय सुझाए गए।
     इसी प्रकार इस क्षेत्र में होने वाले प्रयासों को आपस में साझा करने से प्रेरणा व युक्ति की प्राप्ति होगी, उदाहरण स्वरूप वृक्षों के संरक्षण को लेकर भारत  में सुन्दरलाल बहुगुणा जी का  बहु चर्चित चिपको आंदोलन हुआ था। बिहार के भागलपुर जिले के ग्राम धरहरा के ग्रामीणो में बेटियों के जन्म के साथ ही दस पौधे लगाने व पौधों के जन्मदिन मनाने की सुंदर परंपरायें है।

    Indian state of forest report 2018 के अनुसार भारत में 24.4 क्षेत्रफल पर वन हैं।राष्ट्रीय वननीति के अनुसार देश के 33.3% भू-भाग पर वन होने चाहिए।यह वैषम्य हर हालत में पूरा और सही होना चाहिए।
    भारत में मानसून एक वरदान है यह ऐसा समय है जब पौध रोपण बेहतर तरीक़े से होता है इस समय रोपे गये पौधों की जीते रहने की दर अधिक होती है । हमें हरित घर की संकल्पना को साकार करने के लिये आगे आकर घरों में न केवल पौधरोपण करना चाहिये वरन इसे बढ़ावा देने के लिए आस पड़ोस में प्रेरित भी करना चाहिए यदि हम “हरियाली से ख़ुशहाली” पाना चाहते हैं तो प्रकृति ने जितना हमें हमारे हिस्से का दिया है उसे अपने जीते जी वापस कर जाएँ तभी हम आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ छोड़ जाएँगे अन्यथा आने वाली पीढ़ी हमें सिर्फ़ उपभोगकर्ता के रूप में याद करेगी प्रदाता के रूप नहीं।

    दयानन्द अवस्थी

    दयानन्द अवस्थी
    दयानन्द अवस्थी
    प्रान्त प्रमुख पर्यावरण संरक्षण सोशल मीडिया गतिविधि(आरएसएस) रायगढ़, छत्तीसगढ़ 9425572053

    2 COMMENTS

    1. यह हरित घर प्राय:शहरों में bolcony में हाई रैज़ार्स में बनने हैं..जहाँ प्रदूषण अत्यधिक है वहां सांप बिछु जैसी समस्या नहीं होती है . गाँवों में प्रत्येक खेत में सांप बिच्छु पाए जाते हैं कृषक उन्हीं के बीच कार्य करते हैं ..

    2. और तो सब बातें ठीक हैं पर हरित घरों में साँप, बिच्छू जैसे जहरीले जीवों का प्रकोप भी अधिक ही होता है|

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