लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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आतंकवाद, प्रदूषण, धार्मिक उन्माद, सामाजिक अंतद्र्वंद और महंगाई जैसी समस्याओं के मध्य कृषि प्रधान देश में कृषि की समस्याओं का मुद्दा हमेशा गौण रह जाता हैं। विगत वर्ष देश के अनेक हिस्से सूखाग्रस्त रहे। मौसम वैज्ञानिकों की माने तो आने वाले समय में भी स्थिति कुछ अच्छी नहीं दिख रही है। भारत में कृषि पूरी तरह मानसून पर निर्भर करती है। पिछले दिनों अप्रत्याशित मानसून के कारण कृषि के क्षेत्र में भी संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा हैं। यह संकट अपने साथ अनेक अन्य समस्याओं को भी उत्पन्न कर रहा है। जिसमें महंगाई एवं किसानों की बदहाली सबसे बड़ी समस्या हैं।
अप्रत्याशित मानसून के कारण विगत चार वर्षों से लगातार खरीफ की फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई है। कृषि के क्षेत्र में बदहाली के अनेक अन्य उदाहरण भी मौजूद हैं। पिछले दिनों तमिलनाडु में हुई भारी बारिश इसका ताजा उदाहरण है।
भारतीय अर्थव्यस्था (जी॰डी॰पी॰) में लगभग 14 प्रतिशत का महत्वपूर्ण योगदान देने वाला, गंगा-जमुनी तहज़ीब को अपनी गोद मे खिलाने वाला एवं भारतीय संस्कृति को सीचने वाला कृषि व्यवसाय आज खतरे में है। हर रोज सैकड़ों किसान कृषि छोड़ रहे हैं। विडंबना यह है कि इतना महत्वपूर्ण तथ्य कभी खबर नहीं बनता लेकिन जब यही किसान लाचार होकर आत्महत्या करने को मजबूर होते हैं तो यह खबर बन जाती है और कथित पत्रकार कैमरा लेकर पहुँच जाते हैं। सरकारी तंत्र डी॰डी॰ किसान जैसे चैनल किसानों के पुनरुत्थान के लिए शुरू तो कर देता है लेकिन फिर भी यह पहल जमीनी स्तर पर बहुत प्रभावी नहीं दिखती। इसके अनेक कारण हैं। किसानों से जुड़ी समस्यों पर चर्चा करने के लिए आप उन स्वयंभू किसानों को बुलाते हैं जिन्हें कई बार ये भी नहीं पता होता हैं कि खरीफ की फसल में कितने पानी की आवश्यकता होती है। ज़ाहिर सी बात है, इससे आप किसान की उस मूल वेदना तक नहीं पहुँच सकते हैं जो किसान खेतों को दिन भर अपने पसीने से सींचता है और उसी पसीने से इन ‘किसानों’ की बड़ी-बड़ी गाडि़यों का तेल भरा जाता है।
कृषि के क्षेत्र में सरकार को मुख्यतः दो स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है। पहला सामाजिक और दूसरा आर्थिक स्तर पर। इससे कृषक और कृषि दोनों की दशा एवं दिशा में निश्चित रूप से बेहतरी होगी। आज कृषि प्रधान देश में कृषकों को दोयम दर्जा दिया जाता हैं। कृषकों को आज भी उपेक्षित रखा जाता है। इनकी समस्याएँ किसी पार्टी का एजेंडा नहीं बनती है। उन्हें मुख्यधारा में जोड़ने के ठोस प्रयास किए जाने चाहिए। दूसरा आर्थिक स्तर पर, सभी प्रतिकूल परिस्थितियों की मार झेलते हुए किसान जब अपने पसीने से सिंचित अन्न को लेकर बाज़ार मे जाता है तो उसे एक बार फिर जबरदस्त निराशा का सामना करना पड़ता है। यह कृषि कैसा व्यवसाय है जिसमें किसानों की उपज किस मूल्य पर बेची जाएगी, यह किसान स्वयं तय नहीं करते अपितु सरकारें एवं दलाल तय करते हैं?
निश्चित रूप से सरकारों ने कृषि की बदहाली की समस्या से निपटने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। पिछले दिनों मौजूदा सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना को मंजूरी दी। इस योजना के तहत अगले पाँच वर्षों के दौरान 50 हज़ार करोड़ रुपए खर्च करने का प्रावधान है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य कृषि योग्य जमीन का विस्तार, सिंचाई का पानी बचाने वाली तकनीकी का विकास एवं सिंचाई मे निवेश को आकर्षित करना है। लेकिन इस योजना को क्रियान्वित करने के दौरान हमें कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। सबसे पहली बात की वर्षा के असमान वितरण को ध्यान मे रखना होगा। दूसरी बात यह कि हमें वैश्विक तापवृद्धि जैसी समस्या को भी ध्यान मे रखने की आवश्यकता है। हम खेतों में कितना भी खाद दें लेकिन तथ्य यह है कि पौधे पोषक तत्वो के अपनी कुल जरूरत का 30 प्रतिशत ही खाद से बाकी वह प्रकृति से ही प्राप्त करते हैं, इसलिए पर्यावरण एवं मिट्टी कि उर्वरता को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त कृषि में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों इत्यादि के पानी में घुलने से पानी की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हो रही है तथा भूमिगत जल के अनियंत्रित दोहन से जलस्तर भी निरंतर गिरता जा रहा है। इन सभी समस्याओं से निपटने के बाद हमें खाद्य संरक्षण की भी उच्च तकनीकि व्यवस्था करनी होगी।
वैश्विक तापवृद्धि, जलस्तर के लगातार गिरने एवं वर्षा के आसमान वितरण इत्यादि को ध्यान मे रखते हुए ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए हम एक निश्चित फसल प्रणाली तय कर सकते हैं। किसानो को जल संरक्षण के लिए प्रेरित कर सकते हैं। छोटी सिंचाई परियोजनओं को बढ़ावा दे सकते हैं। सिंचाई की आधुनिक विधियों को प्रयोग मे लाया जा सकता है जिससे जल का दोहन कम हो। इन सभी छोटे-छोट प्रयासों से निश्चित रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था को पंख लगेगी और भारत  अनाज शक्ति के रूप मे एक विकासित राष्ट्र बन सकेगा।
राजीव प्रताप सिंह

13 Responses to “कृषि के क्षेत्र में गहराता संकट”

  1. डॉ. मधुसूदन

    madhusudan

    Our Problems. (1) Drinking Water. (2) Irrigation water (3)Infrastructure.(4) Access to Market without middlemen (5) Famines (6) Suicides (7) Unemployment ———SOLUTION NEEDED.
    Keep Egos Out——SOLVE THE PROBLEM.
    Thinkers’ needed.

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  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    मैं बार बार कहता हूँ कि प्राथमिकता बदलनी होगी.पहली प्राथमिकता है,हमारी वर्तमान आबादी और बढ़ती हुई जनसँख्या के लिए भोजन मुहैया कराना है.उसके लिए प्रयाप्त अनाज आपको देश में ही पैदा करना होगा.इसके बाद स्थान आता है निर्यात का.हमारे पास कृषि योग्य इतनी उपजाऊ जमीन है कि हम उसका उचित उपयोग करके निर्यात की स्थिति में भी पहुँच सकते है.अगर हम गुणवत्ता युक्त अनाज पैदा करें,जिसकी टेक्निक हमारे यहाँ मौजूद है,तो कोई कारण नहीं कि इसमें हम विश्व में स्थान न बना सकें. वहां कच्छ का उदाहरण भी सामने आता है,पर फिर बात आकर रूकती है,प्राथमिकता किसको? अनाप सनाप भूमि अधिग्रहण को या उस भूमि के समोचित उपयोग की.मेरा अपना विचार है कि यहां हम अगर अन्य देशों की नक़ल से बच कर अपने अक्ल .को काम में लाएं,तो शायद देश की ज्यादा तरक्की हो.मेरा मत इस बारे में दूसरों से भिन्न है .मैं आज भी इस देश के लिए महात्मा गांधी और पंडित दीन दयाल उपाध्याय के समाधान को उपयुक्त मानता हूँ,क्योंकिमेरे विचार से उन सिद्धांतों को अपनाये बिना भारत का सर्वांगीण विकास सम्भव ही नहीं है.मैं केवल जी.डी.पी में बढ़ोतरी को विकास का पैमाना नहीं मानता.

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  3. डॉ. राजेश कपूर

    राजेश कपूर

    आपका उत्साह अभिन्नदनीय है पर इसमें खतरे भी नीहित हैं।
    आपको लगता है कि आप जो जानते और मानते हैं वह निश्चित रूप से सही है। हो भी सकता है पर न हुआ तो? पता नहीं तबतक हम अति उत्साह में कितना विनाश कर चुके हों? वहाँ से लौटना संभव भी होगा या नहीं?
    मुझे आशंका है की अति उत्साह में विषय को गहराई से समझे बिना गलत निश्कर्ष निकालने की भूल हुई हो सकती है।
    चलिए एक विनम्र निवेदन स्वीकार करें- – – –
    # आपलोग करना चाह रहे हैं या जो होना आपकी नजर में उचित है, उसका माडल/ प्रतिमान संसार में कहीं तो होगा, या उससे मिलताजुलता कुछ कहीं होगा। कृपा करके वह बतलाएं।
    # आपलोग जो करना चाहते हैं या जो आपके अनुसार होना चाहिये, उसकी थोड़ी परिकल्पना बतलाने की कृपा करें।
    मैं सीखने को सदा तत्पर हूँ। सही को स्वीकार करने की पूरी भूमिका भी है। आपसे भी यही आशा है।
    दीनदयाल जी जैसे काल द्रष्टा के दर्शन में संशोधन व कालानुसार परिवर्तन को जानना व समझना, ऐसा करने की सामर्थय रखने वालों से संवाद करना, सीखना तो सौभाज्ञ की बात होगी।
    उत्सुकता तथा संवाद जारी रहने की आशा सहित,
    सादर, सप्रेम,
    राजेश कपूर।

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    • राजीव प्रताप सिंह

      राजीव प्रताप सिंह

      श्री कपूर जी आप किस समस्या की बात कर रहे हैं, इससे बड़ी समस्या क्या होगी की एक आंकड़े के मुताबिक हर रोज़ 27 किसान आत्महत्या कर रहे हैं ? और हमें किसी देश के मॉडल को अपनाने की ज़रूरत नही हैं क्योंकि मॉडल का स्वरूप राज्य की विभिन्न परिस्थियों के अनुसार बदल जाता हैं !

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      • आर. सिंह

        आर.सिंह

        राजीव प्रताप जी,आपने ठीक लिखा है कि हमें किसी भी अन्य देश के माडल को अपनाने की आवश्यकता नहीं है.मैं आपसे एक कदम आगे बढ़ कर यह कहना चाहता हूँ कि मेरे विचार से कृषि का सर्वोत्तम मॉडल हमारे देश में ही मौजूद है.आवश्यकता है केवल उसे बड़े पैमाने पर अपनाने की.

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  4. आर. सिंह

    आर.सिंह

    डाक्टर राजेश कपूर की टिप्पणी भी मैंने देखी है और उन्होंने हमारी नीति सम्बन्धी जो कमियां गिनाई है,उसमे भी मेरी सहमति है.फिर भी मैंने अपना स्वतन्त्र मत व्यक्त करना जरूरी समझा.मैं आगे यही कहना चाहूँगा कि केवल ईमानदार होना ही सब कुछ नहीं है..कार्य कलापों में वह ईमानदारी झलकनी भी चाहिए.
    डाक्टर मधुसूदन केआलेख के समय मैंने मत व्यक्त किया था कि इसपर वृहद चर्चा की आवश्यकता है.लगता है कि वह चर्चा प्रारम्भ की गयी है.

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  5. आर. सिंह

    आर.सिंह

    आपने लिखा है कि भारत की अर्थ व्यवस्था यानि जी.डी.पी. में कृषि का १४% योगदान है,पर क्या आपको पता है कि हमारी आबादी का करीब ६४% कृषि कार्यों में लगा है,अतः उत्पादकता की दृष्टि से यह हमारा सबसे कमजोर पहलू है.जब तक सरकार या सरकारें इस बात को नहीं समझेगी तब तक न कृषि की दशा सुधरेगी और न कृषकों के हालात में परिवर्तन होगा. ,इस समस्या से सम्बंधित डाक्टर मधुसूदन का एक आलेख “कृषकों की आत्महत्त्याएं कैसे रुकेगी”?प्रवक्ता.कॉम पर आ चूका है.वहां इस पर बहुत सी टिप्पणियां भी आई हैं.आपसे अनुरोध है कि आप उनको भी एक बार अवलोकन कर लें.इस समय तो मैं इतना हैं कहूँगा कि कृषि की ओर सरकार और अन्य सम्बन्धित लोगों की विचार धारा में जब तक आमूल परिवर्तन नहीं आएगा और जब तक भारतीय कृषि को उद्योग का दर्जा नहीं मिलेगा,तब तक यह समस्या जहाँ की तहाँ रहेगी अभी सरकार या सरकारों का जिस प्रकार का रवैया कृषि के प्रति है,उससे तो यही लगता है कि वह दिन दूर नहीं,जब हम अन्न की भीख के लिए विश्व के सामने झोली फैलाने को वाध्य होंगे,जैसा कि साठ के दशक में हुआ था.

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      सिंह साहब—(१)साथ साथ हमारी पेय जल समस्या भी गहरी है। पेय जल बोतलों में बिकना, क्या समाधान है?(२) आज समस्याओं की तेजी से बढती गति से अधिक शीघ्र हल निकलना चाहिए।
      (३) नदियों को जोडने का प्रकल्प कम से कम सोचकर (Think and Discard) तो देखें। (लाभ न हो तो कूडे में डाल दे।)बाँध मुझे रामबाण उपाय लगता है।
      (४) अधिग्रहण बिना कोई प्रगति मुझे नहीं दिखती।
      धन्यवाद

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      • आर. सिंह

        आर.सिंह

        डाक्टर साहब ,पहले आपके चौथे प्रश्न का उत्तर.:आपको जो चीज अमेरिका से नहीं दिखती,वह मुझे भारत में रह कर दिखती है और इसको बार बार मैं बता भी रहा हूँ, तो इसके बारे में मैं क्या कह या कर सकता हूँ?.
        अब आते हैं तीसरे प्रश्न पर.नदियों को जोड़ने का प्रकल्प सचमुच कूड़े में डालने की वस्तु है.पहले नदियों में साफ़ पानी तो उपलब्ध कराइये ,फिर उसको जोड़ने को सोचिये.अन्य कारण भी है. नदियों के जोड़ने का जो लोग विरोध कर रहे हैं, मैं उनके साथ मैं जुड़ा हुआ हूँ,अतः इस सिलसिले मैं शायद आपके सब प्रश्नों का जबाब देने में समर्थ हूँ.
        अब मैं आपके पहले प्रश्न पर आता हूँ.बोतल का पानी पीने की नौबत आना सचमुच एक ऐसी भीषण समस्या है,जिसपर सारे देश को शर्मिंदा होना चाहिए.मुझे अपना बचपन याद आता है,जब नदियों और नहरों के पानी को हमलोग स्वच्छ जल में गिनती करते थे.गंगाजल के बारे में तो यह कहा जाता था कि वर्षों रख दीजिये वह सड़ेगा नहीं,पर आज ऐसा क्यों है.केवल नदियों ही नहीं धरती के अंदर का भी जल प्रदूषित क्यों हो चूका है?इसके लिए कृषि और उद्योग दोनों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है.
        दूसरे प्रश्न के उत्तर में मेराही कहना है कि मैं आपसे पूर्ण सहमत हूँ.

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  6. डॉ. राजेश कपूर

    राजेश कपूर

    मोदी जी जैसे अद्भुत प्रधानमंत्री से भारत की जनता का पाला पहली बार पड़ा है। उन्हें समाज समझ नहीं पा रहा।
    उनमें अद्भुत क्या है?
    सबको समझ आता है कि वे इमानदार हैं।
    इमानदारी के साथ विडम्बना यह जुड़ी है कि उनकी अधिकाँश नीतियाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, कार्पोरेशनों के हित साधने वाली हैं। कार्पोरेशनों का हित किसान और कृषि की बरबादी में है। भुमि अधिग्रहण से कृषि बजट तक की नीतियाँ और प्रयासों के अवलोकन से स्पष्ट हो जाता है कि मोदी सरकार भी परोक्ष व प्रत्यक्ष रूप से किसानों को खेती से बेदखल करने के लिये प्रतिबद्ध है।
    सबको लगता है कि मोदी देशभक्त व इमानदार हैं, फ़िर भी वे किसानो की बरबादी में सहायक क्यों सिद्ध हो रहे हैं?
    एक ही जवाब सूझता है कि उनके पास भारत के विकास की कोई परिपक्व परिकल्पना ही नहीं है।
    वे विदेशी ताकतों द्वारा घड़ीगयी विकास की विनाशकारी अवधारणा को ही विकास का आदर्श मान कर कार्य कर रहे हैं। लोहिया, गाँधी, दीनदयाल उपाध्याय जी जैसी भारत की भूमि से जुड़ी स्वदेशी व परिपक्व विकास की परिकल्पना, अवधारणा उनके पास नहीं है।
    इसके इलावा उनके अंतर्विरोधी व्यवहार का कोई और तर्कसंगत उत्तर नहीं सूझता।
    यदि यही सच है तो संसार के दूसरे सभी भौतिकवादी देशों की तरह भारत का विनाश भी सुनिश्चित है।
    केवल और केवल भारत के पास ही वह परिपक्व, अनुभुत विचार व दर्शन उपलब्ध है जो सारे संसार को कल्याण के मार्ग पर ले जा सकता है। देश का दूर्पभाग्य यह रहा कि हमारे राजनैतिक आका उस श्रेष्ठ दर्शन व संस्कृति से अछुते ही नहीं, उसके घोर शत्रु भी थे व आज भी हैं। मोदी जी से आशा बंधी थी कि ये उस श्रेष्ठ संस्कृति के आधार पर देश का विकास करने के लिये प्रयास करेंगे। किन्तु खेद यह है कि शायद उस दर्शन की इन्हें स्वयं ही समझ नहीं है। अन्यथा देश की प्रगति की योजनाओं में कृषि और किसान केन्द्र में पहली प्राथमिकता पर होता और उद्योग आदि सब उसके बाद।

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      प्रिय मित्र डॉ. राजेश कपूर जी।
      (१) आज की समस्या कुछ अलग है।५५-६० कोटि की(४५% की) कृषक जनसंख्या मात्र १४-१५% का सकल घरेलु उत्पाद दे रही है।अपने अनुपात का योगदान भी नहीं दे रही।
      (२) इस लिए एकात्म मानव दर्शन में और स्वदेशी दर्शन में बदलाव आवश्यक है।
      मौलिक चिन्तन में अंतर करना होगा।
      (३)आज बिना आयात आप देश की सुरक्षा भी नहीं दे सकते।आयात के लिए हमें निर्यात भी करनी पडेगी। निर्यात के लिए उद्योग चाहिए। निवेश चाहिए। निवेश से रोजगार-मिलेगा।
      (४) हमारी जनसंख्या बढी है; भूमि नहीं। कृषि पर अब १००% निर्भर नहीं रह सकते।आत्महत्त्याएं इसी लिए हो रही है।
      (५) पू. गांधी और दीनदयाल जी का रास्ता अपनाते अपनाते बहुत वर्ष लग जाएंगे। तब तक समस्याएँ और बढ जाएँगी। आज दोनों दर्शन कालबाह्य हो गए हैं। हिन्द स्वराज और एकात्म दर्शन दोनों मैंने पढे हुए हैं।
      (६) देश का अर्थ शास्त्र आज नवीन परिवेश से घिरा हुआ है।
      मैं पूरा आलेख बनाऊंगा। सारे प्रश्नों के उत्तर देने का (मेरी समझके आयाम में) प्रयास करूंगा।
      (७) कच्छ की मरु भूमि मे जहाँ एक फसल भी कठिन थी। वहाँ प्रतिवर्ष ३-४ फसले ऊगने जा रही है। एक एकड अधिग्रहण से सौ सौ एकड हरे होंगे।
      (८) आज हम स्वदेशी मात्र से काम चला नहीं सकते। मात्र कृषि पर निर्भर नहीं रह सकते।
      (९)बात पर अडूंगा नहीं। भारत के हितमें कोई मुझे समझाए, तो, अपना मत बदल सकता हूँ।
      (१०) पर, मोदी को शीघ्र हल भी निकालना पड रहा है। जनता में आज धीरज नहीं है।
      धन्यवाद।

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  7. Himwant

    किसानो की आय कैसे बढे ? कृषि में उनकी रूचि कैसे बरकरार रहे, यह आज की सबसे बड़ी चुनौती है. कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था के लिए किसी भी अन्य क्षेत्र से अधिक महत्वपूर्ण है. इसे भी महत्व दिया जाना चाहिए. पिछले कई दशको से यह ठन्डे बसते में रहा है.

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