लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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डॉ0 आशीष वशिष्ठ 

मल्टी ब्रांड खुदरा निवेश में 51 फीसदी और एकल ब्रांड में 100 फीसदी प्रत्यक्ष की अनुमति देकर अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार की नीति और नीयत का देशवासियों के सामने खुलासा कर दिया है कि वो किस हद तक विदेशी ताकतों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के समक्ष नतमस्तक है.

खुदरा बाजार में एफडीआई के अध्ययन के लिए बनी दो स्थायी संसदीय समितियों ने एफडीआई विरोध में विचार व्यक्त किये थे, लेकिन सब सुझावों ओर विरोधों को दरकिनार रखकर सरकार ने अमेरिका की चमचागिरी और बहुराष्ट्रीय कंपनियोंं की स्वामीभक्ति की अनूठी मिसाल पेश करने में कोई कोताई नहीं बरती.

खुदरा बाजार में एफडीआई की मंजूदी देकर सरकार ने छोटे-मझोले व्यापारियों, किसानों, दुकानदारों, फेरीवालों और खुदरा व्यापार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े और रोजी-रोटी कमाने वाले करोड़ों लोगों के पेट पर सीधे लात मारने का घिनौना काम किया है. गौरतलब है कि देश का रिटेल सेक्टर 23,562 करोड़ रूपये का है. इसमें 90 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी छोटे दुकानदारों की है.

देश में वर्तमान में थोक व्यापार में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत है वहीं सिंगल ब्रांड रिटेलिंग में 51 फीसदी एफडीआई की अनुमति मिली हुई है इसे यूपीए सरकार ने बढ़ाकर 100 फीसदी कर दिया है. फिलहाल मल्टी ब्रांड रिटेलिंग में एफडीआई की इजाजत नहीं है, प्रस्तावित बिल में मल्टी ब्रांड रिटेलिंग को 51 फीसदी की इजाजत का प्रावधान किया गया है, जिस पर सारा हंगामा और बहस हो रही है.

भारतीय बाजारों में दिख रहे भारी मुनाफे को कमाने के लिए विदेशी कंपनियां किस कदर बेचैन है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि खुदरा बाजार में वि’व की बड़ी कंपनी वालमार्ट ने मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्र में एफडीआई का मार्ग प्रशस्त करने के लिए अमेरिकी रिटेल चेन वाल मार्ट द्वारा भारतीय मसलों की लाॅबिंग पर लगभग 70 करोड़ रूपए खर्च किए हैं. सरकार ने खुदरा बाजार में एफडीआई को मंजूदी दे दी है आने वाले दिनों में वालमार्ट, टेस्को, केयर फोर, मेट्रो एजी और शक्चार्ज अंतर्नेमेंस जैसी तमाम बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपने मेगा स्टोर खोल सकेंगी.

एनएसएसओं के ताजा सर्वेक्षण के अनुसार खुदरा व्यापार में कुल श्रमशक्ति के आठ फीसदी अर्थात 3.31 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है. इसका अर्थ यह हुआ कि यदि एक व्यक्ति के परिवार में औसतन पांच सदस्य मानें तो कोई सोलह करोड़ से अधिक लोगों की रोजी-रोटी खुदरा व्यापार पर टिकी हुई है. देश में लगभग 1.25 करोड़ से अधिक खुदरा कारोबार करने वाली दुकानें हें और इसमें सिर्फ चार फीसदी दुकानें ऐसी हैं जो पांच सौ वर्ग मीटर से ज्यादा बड़ी हैं. इसके विपरित अमेरिका में सिर्फ नौ लाख खुदरा दुकानें हैं जो भारत की तुलना में तेरह गुना बड़े खुदरा बाजार की जरूरतों को पूरी करती हैं.

खुदरा दुकानों की उपलब्धता के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है. एसी नेल्सन और केएसए टैक्नोपैक के अनुसार भारत में प्रति एक हजार व्यक्तियों पर ग्यारह खुदरा दुकानें हें. इससे स्पष्ट है कि भारत में खुदरा व्यापार सिर्फ एक आर्थिक गतिविधि या कारोबार भर नहीं है बल्कि यह करोड़ों लोगों को लिए जीवन-मरण का प्रश्न है. 1997 में थोक व्यापार (कैश ऐंड कैरी) में 100 फीसदी और 2006 में एकल ब्रांड खुदरा व्यापार में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति पहले ही दी जा चुकी है.

खुद सरकारी आंकड़ों के मुताबिक थोक व्यापार में अब तक लगभग 777.9 करोड़ रूपए और एकल ब्रांड खुदरा व्यापार में 900 करोड़ रूपए का एफडीआई आ चुका है जो कि सरकार के अनुमान से बेहद कम है. फिर रिटेल क्षेत्र कृषि के बाद अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्र है. जीडीपी में भले ही खुदरा व्यापार का योगदान लगभग आठ फीसदी के आसपास है लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि इसमें कृषि क्षेत्र के बाद सबसे अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है.

रिटेल में एफडीआई समर्थक आपूर्ति श्रृंखला से जिन बिचैलियों को हटाने की बात कर रहे हैं वे कोट-पैंट-टाई पहनने वाले नहीं हैं. भारत में बिचैलिए बैलगाड़ी-ट्रैक्टर-टेम्पू चलाने वाले, ट्रांसपोर्टर, एजेंट और छोटे कारोबारी हैं. दूसरी ओर वैश्विक दिग्गज कंपनियों के लिए ब्रांड एंबेसडर बिचैलियों का काम करते हैं जो कंपनियों से करोड़ों रूपए लेते हैं. इसके अलावा बिजली खपत, गोदाम और ट्रांसपोर्टर के उनके खर्चे भी बहुत ज्यादा होते हैं.

हमारे बिचैलिए न केवल अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं बल्कि देश के सामाजिक ढांचे को भी ठीक रखने में सहायता करते हैं. देखा जाए तो भारत में मंहगाई बेलगाम बनी है जब से बड़े कारोबारी घरानों का खुदरा कारोबार में प्रवेश (2005 से) हुआ है. इन कंपनियों के पास बड़े-बड़े गोदाम होते हैं जिनमें बड़े पैमाने पर जमाखोरी की जाती है इसीलिए मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली 42 सदस्यीय संसदीय समिति ने स्पष्ट कहा था कि खुदरा बाजार में संगठित वर्ग और विदेशी कंपनियों के निवेश की अनुमति से छोटे स्तर के व्यवसायी बुरी तरह प्रभावित होंगे और उनके लिए बाजार में अपना अस्तित्व कायम रख पाना कठिन होगा.

संसदीय समिति ने यह भी सुझाव दिया कि सरकार एक राष्ट्रीय खुदरा माल नियामक कानून लाए जिससे बाजार में प्रतिस्पर्धा के मार्ग विधिवत रूप से खुले रहें और कोई भी कंपनी बाजार पर अपना एकाधिकार जमा कर मनमानी न कर सके. बिक्री की एकाधिकारी प्रवृत्तियों से उत्पादकों की आय घटती है क्योंकि उन्हें अपना उत्पाद बेचने के लिए सीमित विकल्प रहते हैं. 1997 से 2002 के बीच कॉफ़ी बीन की फुटकर कीमतें 27 फीसदी घटी जबकि किसानों को चुकाई जाने वाली कीमतें 80 फीसदी तक गिर गईं. दुनिया में 50 करोड़ कॉफ़ी उपभोक्ता हैं लेकिन कॉफ़ी के व्यापार का 45 फीसदी चार बड़ी एग्रीबिजनेस कंपनियों के हाथ में है.

वाणिज्य मंत्रालय के स्थायी समिति की रिपोर्ट मंे एफडीआई के विरोध में कड़ी टिप्पणी की गई है. इस समिति ने विस्तृत अध्ययन के बाद कहा है कि बहुराष्ट्रीय और घरेलु कंपनियां सिंगल ब्रांड रिटेल में एफडीआई के नियमों का सही तरीके से पालन नहीं कर रही हैं. एक ही शोरूम में कई ब्रांड बेचे जा रहे हैं. इसके लिए ब्रांडों की बंडलिंग की रणनीति अपनाई जा रही है. यह भी एक तथ्य है कि सिंगल ब्रांड रिटेल में एफडीआई की अनुमति देने के बाद अप्रैल 2006 से मार्च 2010 तक चार साल में मात्र 901 करोड़ रूपए की एफडीआई आयी है.

समिति ने कहा था कि बिना किसी रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के निजी क्षेत्र की बड़ी घरेलु रिटेल चेन के विस्तार पर भी अंकुश लगाया जाना चाहिए. लेकिन सरकार ने अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. पिछले चार साल में रिटेल स्टोर की ओर से कृषि उपज के भंडारण व उससे जुड़ी बुनियादी सुविधाओं के लिए कोई खास पहल नहीं की गई है.

केश एंड कैरी बैक एंड आपरेशन में सौ फीसदी एफडीआई के बावजूद कंपनियों ने बुनियादी सुविधाओं के विकास में बड़ा निवेश नहीं किया. यही नहीं इन कंपनियों ने अनुबंध खेती के नाम पर किसानों के साथ संबंध स्थापित करने की कोशिश तो की, लेकिन करार की अनुचित शर्तों के कारण यह कोशिश भी विफल हो गई. इस अनुभव को झेल चुके किसानों का अनुबंध खेती से मोहभंग हो चुका है.

12 Responses to “हाट नहीं अब वालमार्ट”

  1. Bipin Kumar Sinha

    इस लेख पर जो प्रतिक्रियाएं आयी है उनसे मैं सहमत हूँ दरअसल भारतीय व्यापारिओं में प्रतिस्पर्धा में उतरने की ताकत ही नही है लोगों को बेवकूफ बना कर व्यापार करते हैं बिचौलिए एक जोंक की तरह है जो हमारा खून चूस रहे है यद्यपि भारत जैसे देश में इनका खातमा आसानी से नहीं हो सकता क्यों कि यहाँ कि जनता जागरूक नहीं है इसी लिए तो टी वी में एड आता है जागो ग्राहक जागो महगाई ख़त्म हो सकती है पर जमा खोरी कि वजह से इस पर लगाम नहीं लग पाता कृत्रिम अनुप्लाभ्ध्ता पैदा कर अपना साम्राज्य कायम रखते है वैसे यह भी नहीं सोचना चाहिए कि इस तरह के उपाय स्वर्ग ले आएंगे पर फ़िलहाल इन जोंकों से तो मुक्ति पानी है
    बिपिन कुमार सिन्हा

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  2. ratnesh pareek

    वालमार्ट जेसी कंपनिया केवल अपने फायदे के लिए काम करती है ये भारत जेसे बड़े देसों से सिर्फ और सिर्फ पेसे चाहती है जेसा की मुझे लगता है इसके आने से कई देशो को बहुत नुकसान हुआ है और भारत को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है तथा आम आदमी को भी जो व्यापारी है उनकी दुकाने जिनसे वो अपना घर चलाते है वो भी उठ जाएगी क्या सरकार उन्हें घर चलाने के लिए मदद करेगी

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  3. आर. सिंह

    R.Singh

    ऐसे मैं यहाँ यह भी जोड़ना चाहता हूँ कि यह कांग्रेसी सरकार की बहुत सोची समझी चाल है कि वालमार्ट का मुद्दा ऐसे समय में उठाया गया है जब संसद के शीत कालीन अधिवेशन में लोक पाल बिल पास होना था.अब कांग्रेस सरकार को यह कहने का बहाना मिल गया कि संसदचली ही नहीं तो लोक पाल बिल कैसे पास होता. अब तो यह साफ़ जाहिर हो चुका है कि कांग्रेस सरकारनहीं चाहतीकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे या भारत के बाहर जमा काले धन पर कोई कार्रवाई हो.इसीलिये ये सब हथकंडे अपनाए जा रहे हैं.अगर कांग्रेस का रवैया सचमुच जनता या उपभोक्ता की भलाई करना होता तो भी यह मुद्दा लोक पाल बिल के पास होने के बाद उठाया जा सकता था.

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  4. आर. सिंह

    R.Singh

    अजय जी ,आपने सही पूछा है कि हमारे यहाँ क्या नहीं है कि वाल मार्ट को बुलाये?हमारा यहाँ थोडा ज्यादा हीं है ,जिसके लिए वाल मार्ट जैसी कंपनियों को यहाँ आना आवश्यक है.हमारे यहाँ नकली औषधियां हैं.हमारे यहाँ रासायनिक दूध है.हमारे यहाँ नकली खोये हैं. हमारे यहाँ मिलावट का बाजार बड़े जोरों से फ़ैल रहा है.आम उपभोक्ता को पता हीं नहीं चलता कि असली क्या है और नकली क्या है? वालमार्ट से खरीददारी में कम से कम उपभोक्ताओं को यह तो संतोष रहेगा कि उसे असली वस्तु उचित मूल्यपर उपलब्ध होगी.

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  5. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन उवाच

    पहले दशक में जब वालमार्ट आयोवा (IOWA) राज्यमें आया था, राज्यसे
    ५५५ किराना दुकाने। 555 grocery stores,
    २९८ अवजारों की दुकाने 298 hardware stores
    २९३ मकान गढने की सामग्री की दुकाने 293 building supply stores
    १६१ विविध वस्तुओं की दुकाने161 variety stores
    १५८ महिला वस्त्र दुकाने158 women’s apparel stores,
    ११६ दवाइ की दुकाने116 drugstores
    १११ पुरूष वस्त्र दुकाने 111 men’s and boys’ apparel stores
    बंद पडी थी।(Source: Iowa State University Study

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  6. AJAY

    hamare yaha kya kami hai jo walmart ko bulai, hamare banks mai 17623 crores rs unclaimed padai hai , TATA JAISI COMPANY HAI, JO “FOREIGN COMPANIES” KO KHARID RAHI HAI, HUMKO INHAI AGAI LANA CHAYIYAI………..! BAKI CONGRESS ? LAYEGI, WALMART ETC SAI PAHLAI HI KAI MINISTERS NAI “SERVICE TAX” LAI LIYA HOGA ??????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????

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  7. आर. सिंह

    R.Singh

    ईस्ट इंडिया कंपनी से जमाने से आज के युग की तुलना करके हम क्या दर्शाना चाहते हैं,यह मेरे जैसोंकी समझ में तो नहीं आ रहा है?भारतीय इतिहास का कोई भी छात्र यह जानता है कि भारत उस समय अनगिनत टूकड़ों में बंटा हुआ था या यों कहिये कि भारत नाम का कोई देश था ही नहीं ,जब कि आज परस्थितियाँ अलग है.हमारे देश वाशी भी विदेशों में अपना व्यापार फैलाए हुयें है.अफ्रीका और मुस्लिम देशों की कौन कहें,अमेरिका ,कनाडा और इंग्लैण्ड में भी ये व्यापारी अपनी धाक जमाये हुए हैं.यह दूसरी बात है कि वहां वे ऐसे मिलावटी कारोबार नहीं करते जैसा उनके भाई बंद भारत में कर रहे हैं.आज हमारी एक पहचान अवश्य है,जिस पर भ्रष्टाचारी और मिलावट करने वाले धब्बा लगा रहे हैं.हमारे लोग अनेक मुल्कों से अपनी कमाई का पैसा भारत भेजते हैं ,जिसमे नौकरियों के अतिरिक्त व्यापार से उत्पन्न लाभ का पैसा भी शामिल है.उन देशों ने तो शायद ही यहब प्रश्न उठाया हो कि भारतीय उनके देश को लूट रहे हैं,तो हामारी ओर से इतना चिल्ल पों क्यों?क्या यह हल्ला गुल्ला हमारी हीन भावना का द्योतक नहीं है?वालमार्ट जैसी कंपनियों के आने से हमारे उन व्यापारियों या उद्योगपतियों को छोड़कर किसी अन्य को घाटा नहीं होने जा रहा जो नकली या खराब सामान बनाकर या मिलावट के बल पर अपना धंधा चला रहें हैं और अगर इस तरह के धांधली वाले उद्योग या व्यापार पर अंकुश लगेगा तब शायद स्वीश बैंकों में भी पैसा जाना कम हो जाएगा ई,क्योंकि यदि नकली वस्तुओं के उत्पादन पर रोक लगेगा और मिलावटी कारोबार कम होंगे तो स्वत हथली गर्म करना भी कम हो जाएगा.

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  8. sunil patel

    वालमार्ट के बारे में डॉ. वशिष्ट जी ने बहुत अच्छी जानकारी दी है. अभी भी हमारे देश में स्नातक, स्नातकोत्तर लोगो को भी वाल मार्ट के बारे में नहीं पता है. लोग अगर विरोध कर रहे है तो कुछ जानकार लोगो के कहने पर. अच्छे पढ़े लिखे लोग भी वाल मार्ट को एन मार्ट और अन्य रेटल सेक्टर कंपनी की तरह ही देख रहे है.

    जिस प्रकार इस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में व्यापर के जरिये प्रवेश किया था और पुरे देश पर कब्ज़ा कर लिया था. वाल मार्ट के जरिये प्रत्यक्ष शुरुआत हो चुकी है.

    हमें नहीं भूलना चाहिए की वाल मार्ट हर चीज नहीं बेचेगा. जो ज्यादा बिकेगा वाही बेचेगा. बहुत चीजे जो जरुरी है किन्तु कम बिकती हैं वे नहीं बेचेगा. किन्तु पारंपरिक रूप से जो आज सामान मिल रहा है वोह कल नहीं मिलेगा क्योंकि घरेलु उद्योग, लघु उद्योग, तो ख़त्म हो जायेंगे. क्योंकि उनके प्रयोग में आने वाली वस्तुए जब नहीं मिलेंगे तो एक जंजीर की तरह पूरा वर्तमान पारंपरिक हाट ख़त्म हो जायेगा. करोडो लोग भूखे मरेंगे.

    आज डाक व्यवसाय में बहुत सी कंपनिया है किन्तु बड़े सहर में सभी कंपनी सेवा देती है. छोटे शहर में भी कुछ कंपनी सेवा देती है. किन्तु अभी भी सकडो शहर, कसबे व लाखो गाँव है जहाँ भारतीय डाक विभाग ही डाकियो के जरिये रोजाना अपनी सेवा दे रह है.

    जितना पैसा सरकार एक बाँध, एक बिजली संयंत्र में खर्च करती है उतने ही पैसे लघु उद्योगों पर प्रोतसाहन पर खर्च करे तो एक दो टाटा अम्बानी परिवार और बढ़ने की जगह लाखो लोग प्रत्यक्ष रोगजार से जुड़ेंगे. अभी जो पेंसिल सेल ६ रूपए में मिल रहा है वोही २ रुपए में मिलेगा. (हाँ अनावयासक अंग्रेजो के ज़माने के कर को समाप्त कर दिया जाय. सरकारी भ्रष्टाचार ख़त्म कर दिया जाय) विश्वाश मानिए वाल मार्ट भारत में नहीं आएगा – भारत का हाट बाजार दुनिया में जायेगा.

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  9. आर. सिंह

    R.Singh

    वालमार्ट के आने से मेरे जैसे आम आदमी को यह तो साफ़ दिख रहा है कि आजाद पुर सब्जी मार्केट से दिल्ली के किसी कोने में आते आते सब्जियों का जो दाम तिगुना से चौगुना हो जाता है,वैसा होना बंद हो जायेगा.मिलावट से भी उपभोक्ताओं की जान बचेगी.अगर वालमार्ट ने दूध इत्यादि भी बेचना आरम्भ कर दिया तो रासायनिक दूध से भी त्राण होने की संभावना है.हाँ यह अवश्य है कि बिचौलिएऔर मिलावट का कारोबार करने वालों का व्यापार ठप हो जाएगा.रही बात सविश बैंकों में पैसा जाने की तो मेरे ख्याल से उसमे भी थोड़ी कमी आयेगी,क्योंकि अधिक पैसा तो उनके पास से आता है जो अवैध धंधा करते हैं.उपभोक्ताओं के लिए रोजमर्रा में काम आने वाली चीजों को हम क्यों नहीं सस्ता बना सकते ?अगर हम ऐसा कर सकें तो न केवल अपने देश के उपभोक्ताओं को सस्ता सामान उपलब्ध करा सकेंगे,बल्कि दूसरे देशों का बाजार भी अपने कब्जे में कर सकेंगे.मैं तो अभी थोड़े समय के लिए अमेरिका में हूँ.लोग सब चीजें यहाँ वालमार्ट से ही नहीं खरीदते,बल्कि विभिन्न सामान भिन्न भिन्न स्थानों से खरीदते हैं.बहुत से सामानों के लिए तो देशी यानि भारत और पाकिस्तान के स्टोरों का भी सहारा लेते हैं,जिनकी संख्या यहाँ डल्लास में बहुत अधिक है.घाटा क्या होगा इसे समझने में मेरे जैसे लोगों को देर लग सकती है ,पर लाभ तो साफ़ दिखाई पड़ रहा है.घटिया सामग्रियों की महंगे दामों में उपलब्धि के बदले अच्छी सामग्रियों का सस्ते दामों में उपलब्ध होना,खासकर खाद्य पदार्थों का,जो कि इस देश से ही खरीद कर यहीं के उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराए जायेंगे.

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  10. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    अजित जी
    अमरिका के विषय में आपकी बात लगभग सही है|
    चीन:==> मैं ३ एक वर्ष पहले चीन भी होकर आया हूँ| वहां कलाकार भी एक श्रम-जीवी की भाँती, घंटो के दर पे, काम करते पाया| इस लिए
    वस्तुएं बहुत सस्ती बेचीं जाती है| थोक में और भी सस्ती|
    पर चीनी बहुत कठोर श्रम करते पाया| उसके सिवा कोई चारा नहीं है, उसे|
    अब चीन नें अमरीका में भी निवेश शुरू किया है| यहाँ बहुत सस्ती चीनी बस कंपनी शुरू हुयी है|
    पता नहीं, भारत में भी यही करेंगा |
    वालमार्ट को यहाँ भी जनता ने विरोध ही किया था| फिर ठंडा पड़ गया|

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  11. ajit bhosle

    मधुसूदन जी आप अमेरिका में रहते हैं, साप बेहतर जानते होंगे की वालमार्ट भले ही चीन का माल अमेरिका में बेच रहा हो पर वहां की सरकार ने उसके मुनाफे पर अपना अधिकतम नियंत्रण कर रखा होगा और बहुत सीमित मात्रा में अमेरिका का धन चीनी लोगों के पास जा रहा होगा, क्योंकि यह ब्रह्मसत्य है की अमेरिका आँख मीचकर अपने देशवासियों का नुक्सान नहीं होने देता जैसा की भारत के शासक होने देते हैं अतः मैं पूरी तरह वालमार्ट का विरोध करता हूँ क्योंकि जानता हूँ की यह पैसा अमेरिका लगभग साठ प्रतिशत और चीन लगभग चालीस प्रतिशत हज़म कर जायेंगे,और कुछ बचा भी तो स्विस बेंकों में चला जाएगा यानी की आम हिन्दुस्तानी का बुरा हाल होना तय है भले ही देर से हो.

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  12. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    वालमार्ट सारी चीन में बनी वस्तुएं अमरीका में बेच रहा है| चीन अपनी मुद्रा स्थिति सुधार रहा है|
    यहाँ भी वालमार्ट का कारोबार व्यावसायिक- या नैतिक (Professional ) नहीं है| सुपर पावर बनना, आज कल (१) “धन बल” और (२) “कल्चरल आक्रमण” द्वारा ही संभव माना जाता
    है| दोनों से भारत ग्रस्त हो रहा है|
    सामरिक शक्ति सहायक मानी जाती हैं, भय दिखा ने के लिए, या अपनी बात मनवाने के लिए|
    वालमार्ट को कल्चरल आक्रमण और आर्थिक आक्रमण मानता हूँ| चीन से माल आएगा, चीन और वालमार्ट दोनों लाभ में होंगे|
    भारत का क्या भला होगा?
    इस वालमार्ट से?
    समझ नहीं पा रहा हूँ| विरोधी और भिन्न टिप्पणियों को पढ़ना चाहता हूँ|

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