लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार

राकेश कुमार आर्य

एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री ने अपने जन्मदिवस पर लेखपाल स्तर तक के कर्मचारी से पार्टी फंड के नाम पर वसूली कराई। प्रदेश की राजधानी में भव्य समारोह के अंतर्गत अपने जन्मदिवस का केक काटा। कई क्विंटल लड्डू बांटे गये। निर्धन प्रदेश की दलित समाज की इस मुख्यमंत्री ने अपने जन्मदिवस को इस प्रकार मनाकर मुगल बादशाहों को भी पीछे छोड़ दिया। यह लोकतंत्र का नया चेहरा है जिसमें आज के ‘सम्राट और साम्राज्ञी’ जनता के रक्त को पीकर चौराहों पर उसका उपहास करते हैं, जिसे देखकर हमारे सब जन प्रतिनिधि चुप हैं आखिर क्यों? क्योंकि –

– इन सबकी अस्मिता बिक गयी है।
– सबके ईमान गिरवी रखे जा चुके हैं।
– सब ‘नक्कूपंथ’ में सम्मिलित हो चुके हैं।
– हमाम में सब नंगे हैं।
– सबके हाथ खून से सने हुए हैं।
– सबके दागदार चेहरों पर राज बड़े गहरे हैं।

अत: बोलने के लिए हमारे जनप्रतिनिधियों में साहस नही रहा। आत्मबल नही रहा। नैतिकता नही रही। आत्मा की आवाज नही रही। इसलिए सब चुप होकर ‘द्रोपदी के चीरहरण’ को देख रहे हैं। इन सभी की आत्मा मृतप्राय: हो चुकी है।

इन्हें नही पता कि जब चीरहरण कर मर्यादा का हनन होता है तो महाभारत का साज सज जाता है और जब-जब धर्म की हानि होती है तो कुरूक्षेत्र की रणभेरी बज उठती है। आज लोकतंत्र का चीरहरण हो रहा है, तो कल को महाभारत का साज भी सजेगा। अपने इन राजनीतिक महान कर्णधारों से एक प्रश्न है, जिसका उत्तर उन्हें देना ही पड़ेगा। वह बतायें कि यह होने वाला महाभारत क्या पुन: एक ही परिवार के बीच होगा या इसका मैदान और निशान कोई अन्य देश होगा? अर्थात खूनी नीतियों से गृहयुद्घ की विभीषिका बनेगी या किसी शत्रु राष्ट्र से महायुद्घ होगा?

ग्राम प्रधान से चुनाव में मिठाई खाने और शराब पीने वाले लोग विकास कार्यों पर काम कराने की बात नही कर सकते। हां, उसे तंग करने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने की योजना अवश्य तैयार कर सकते हैं। राजनीति का यह खोखलापन ऊपर से नीचे आया है। अत: कहना नही होगा कि देश की राजधानी से प्रदेशों की राजधानी में और महानगरों से नगरों तक की नगर पालिकाओं और उनसे भी नीचे ग्राम पंचायतों में बैठे हमारे सभी जनप्रतिनिधि राजनीति के इसी घिनौने खेल में लगे हुए हैं। संध्या गहराती जा रही है, अत: रात्रि का अंधकार बढ़ रहा है। इसलिए प्रभात की किरण दिखाई नही दे रही।

इस देश में कभी भी किसी राजनीतिक दल ने 35 प्रतिशत से अधिक मत लेकर देश पर शासन नही किया। कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दल उपरोक्त वर्णित प्रतिशत मतों से कम मत लेकर ही भारत पर शासन करते रहे हैं।

भारत का लोकतंत्र भी सिरों की गिनती से चलता है। देश की संसद और विधानसभाओं में सिरों की गिनती जिसके साथ अधिक होती है, उसी की सरकार चलती है या नही बनती है। जब 35 प्रतिशत मतों से अधिक मत लेकर किसी भी सरकार ने आज तक भारत में राज किया ही नही है तो बस! बात स्पष्ट है कि देश की जनता का बहुमत हमेशा उसके विरूद्घ रहा है। लेकिन वोटों का खेल है सौ में से 25 से 30 मत एक दल को तो शेष अन्य दलों को मिलते रहे हैं जिससे सत्ता के रास्ते सुगम हो गये। इसलिए संसद या विधानसभाओं में किसी दल को अपने सदस्य बढ़ाने में सहायता अवश्य मिल गयी। इसमें सिरों की गिनती का खेल पूरा हो गया। बहुमत की उपेक्षा कर अल्पमत ने बहुमत का रूप ले लिया और हाथ में डंका लेकर राज करने लगा।

फिर कुछ अवसर भारत में ऐसे भी आये कि जब जनादेश का गला घोंटा गया। देखिये, सन 1991 ई. के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की संसद में सबसे अधिक सीटें थीं। बात स्पष्ट थी कि देश की जनता ने सबसे अधिक भरोसा पुन: कांग्रेस पार्टी पर ही देश का राज चलाने के लिए किया था। लेकिन सिरों की गिनती में वह पीछे थी, अर्थात साधारण बहुमत के 272 के अंक को नही छू पा रही थी।

अत: रातों रात गैर कांग्रेसी दल एक साथ इकट्ठे हो गये और कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिए अपनी-अपनी जुगत में सब लग गये। सबने रेत का भवन बनाना प्रारंभ किया। जनता को यह कहकर समझा-बुझाकर मूर्ख बनाया गया कि जनादेश गैर कांग्रेसी दलों के पक्ष में है।

अब इनको कौन समझाये कि जनादेश तो सन 1952 ई. से ही गैर कांग्रेसी दलों के पक्ष में ही होता आया है, तब से सरकारें बनाने का प्रयास क्यों नही किया गया था? सन 1991 ई. के जैसे उदाहरण को ही अटल जी की सरकार को गिराने और एचडी देवेगौड़ा की सरकार के निर्माण के समय सन 1996 ई. में दोहराया गया। उस समय नारा गढ़ा गया कि जनादेश साम्प्रदायिक दलों के विरूद्घ है अत: सरकार ‘धर्मनिरपेक्ष दलों’ की बनेगी। इस प्रकार लोकतंत्र के कफन में कील ठोंकने का काम करने में हमारे कर्णधारों ने कभी कमी नही छोड़ी। सच है-

रंज लीडर को बहुत हैं मगर आराम के साथ।
डिनर कौम के खाते हैं मगर हुक्काम के साथ।।

ऐसे लीडर हमारे पास हैं तभी तो यह देश ‘सारे जहां से अच्छा’ है। इसीलिए यह घोटालेबाजों का देश है, दागियों का देश है, जमाखोरों और नकली स्टांप बेचने वालों का देश है। क्योंकि सभी हर जगह बैठकर व्यापार कर रहे हैं। भले ही राष्ट्र को बाजी पर ही क्यों न लगाना पड़ जाए? इसलिए –

– कैसे होगा उद्घार इस देश का?
– कैसे होंगे हम क्रांतिकारी देशभक्तों के ऋण से उऋण?
– कैसे चलेगा लोकतंत्र और कैसे बचेगा लोकतंत्र का भाव?
– यहां सब कुछ राम भरोसे है।
– यहां सब कुछ संदिग्ध है।
– यहां सब कुछ चोरों के हाथों में है।

अब तो आशा की किरण दूर क्षितिज पर उभरती क्रांति की लालिमा के दूसरी ओर ही दिखाई देती है। जिसे क्रियान्वित होने में अब ज्यादा समय नही है।

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