‘हाथ’ में ‘झाड़ू’

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-जग मोहन ठाकन-   appeasement policy

सिर पर टोपी लाल, हाथ में रेशम का रूमाल, होये तेरा क्या कहना। आम नत्थू की खास चाय की दुकान पर यह गाना बज रहा था । मोहल्ले में घर की चाय से असंतुष्ट प्रबुद्धजनों का जमावड़ा रोज की तरह नत्थू की दुकान पर लगा हुआ था। चुनावों पर टिप्पणी पर टिप्पणी पान की बेगम पर हुकुम के बादशाह की तरह फटकारी जा रही थी। तभी मोहल्ला कवि रमलु प्रसाद भाष्कर ने कहा- रूको रूको, मेरे दिमाग में इस गीत में कुछ तबदीली की कुलबुलाहट हो रही है। जरा ध्यान से सुनो। सभी चुप हो गये। रमलु प्रसाद ने अपनी फटे बांस सी रानी मुखर्जी टाइप आवाज में पैरोडी प्रस्तुत की। सिर पर टोपी सफेद, हाथ में झाड़ू का कमाल, होये तेरा क्या कहना। नगरपालिका में मुनादी करने वाले मसुदी लाल ने तुरन्त मुगलिया दाद दी। बहुत खूब, बहुत खूब। क्या पैरोडी मारी है। कमाल कर दिया, धोती का रूमाल कर दिया। बधाई हो रमलु प्रसाद जी।
तभी हिन्दी के अध्यापक पण्डित गणेशी लालजी ने जोड़ा- भई, हाथ और झाड़ू की इस डेढ़ इश्किया जोड़ी पर तो पूरा शोध ग्रंथ लिखा जा सकता है। दोनों में चोली दामन का संबंध नजर आता है। बिना ‘हाथ’ के ‘झाडू’ कुछ नहीं कर सकती। परन्तु ‘हाथ’ की चतुराई देखिये कि जो ‘हाथ’ पहले ‘झाड़ू’ को हाथ नहीं लगाता था, वही ‘हाथ’ अब उसी तिरष्कृत ‘झाड़ू’ को हाथ में चैकस पकड़े बैठा है। और उसी ‘हाथ’ की सफाई देखिये कि उसी ‘झाड़ू’ को सहलाये भी जा रहा है और गंदगी की सफाई के बहाने ‘झाड़ू’ को घिसाये भी जा रहा है। परन्तु ‘झाड़ू’ की मजबूरी है, जब तक उसे पकड़ने वाले ‘हाथ’ का संग ना हो वह कोई सफाई नहीं कर सकती ।
‘हाथ’ का पुराना तजुर्बा है, उसने सदैव ‘यूज, फ्यूज एण्ड रिफ्यू्ज’ थ्योरी का प्रयोग किया है तथा वह इसमें कामयाब भी रहा है। यह इसी ‘हाथ’ की कलाकारी ही है कि वह कभी ‘लालटेन’ को पकड़कर प्रकाश की व्यवस्था करता है, कभी ‘साइकिल’ के हैण्डल को अपनी सुविधा अनुसार घुमाता है, तो कभी भारी भरकम मदमस्त ‘हाथी’ के मस्तक को सहलाकर तो कभी भाला मारकर काबू करता है। परन्तु समय गवाह है कि जिस किसी को भी ‘हाथ’ ने हाथ लगाया वो ‘पिंजरे का तोता’ बनकर रह गया।
हमारे देश के एक बहुत बड़े नेता ने बहुत पहले टोपी और फूल को संग रखकर भारतीय राजनीति में अपनी अहम पैठ जमाई थी। परन्तु उनकी आने वाली पीढ़ियों ने ‘टोपी’ औैर ‘फूल’ दोनों को भुला दिया। जिसका फायदा अन्य लागों ने उठाया और वही ‘टोपी’ औैर ‘फूल’ उसी बड़े नेता की वर्तमान पीढ़ियों के गले की फांस बनी हुई है। आज टोपी किसी के पास है तो ‘फूल’ किसी के पास। मास्टर गणेशी लाल के लम्बे भाषण से परिचर्चा में ठहराव सा आ गया। लोग उठकर चलने लगे। परन्तु नत्थू चाय वाला सोच रहा है कि कहीं यही ‘हाथ’ इस बंधी ‘झाड़ू’ को भी तिनका-तिनका न कर दे औैर ‘झाड़ू’ के मंसूबों पर झाड़ू न फेर दे।

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