कृषि के लिए मानसूनी बारिश के शुभ संकेत

सुरेश हिन्दुस्थानी

यह बात शत प्रतिशत सही है कि भारत कृषि आधारित देश है, कृषि ही 130 करोड़ जनता का पेट भरती है। वास्तव में वर्तमान में कृषि का क्षेत्रफल संकुचित होता जा रहा है, लेकिन जनसंख्या अबाध गति से बढ़ती जा रही है। क्या किसी ने इस बात पर चिंतन किया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से आज भारत की जनसंख्या में लगभग चार गुणा वृद्धि हुई है, लेकिन फसल पैदा करने वाली भूमि कम होती गई, पहले जहां एक एकड़ भूमि से एक परिवार पोषित होता था, अब इतनी ही भूमि से चार परिवार पोषित होते हैं यानी स्वतंत्रता के बाद परिवार के सदस्यों की संख्या बढ़ी है। इसके हिसाब से कृषि भूमि बढ़ना चाहिए, लेकिन सरकारों ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। अगर ऐसे ही कृषि भूमि कम होती रही और जनसंख्या बढ़ती रही तो स्वाभाविक है कि एक दिन खाद्यान्न की बहुत भारी कमी होगी।
भारत में धरती के सूखते जल श्रोतों के कारण अधिकांश राज्यों में कृषि की पैदावार मानसूनी बारिश पर ही निर्भर है। मानसूनी वर्षा ठीक हो तो फसल भी ठीक हो जाती है, लेकिन जिस वर्ष भी मानसूनी बारिश ने धोखा दिया है, उस वर्ष कई राज्यों को सूखे का सामना तो करना ही पड़ता है, साथ पेयजल की समस्या भी विकराल बन जाती है। इस वर्ष मौसम विभाग द्वारा संकेत दिए हैं कि मानसूनी बारिश सामान्य से अच्छी हो सकती है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि मौसम के बारे में पूर्व में किए गए अनुमान हर बार सही साबित नहीं हुए। भारत का किसान कई बार यह सोचकर अपने खेत में हल चलाता है कि इस बार भगवान भरोसे उसकी फसल अच्छी हो सकती है, लेकिन मानसून के दगा देने के बाद उसके हाथ कुछ भी नहीं आता।
भारत की खेती कभी बहुत लाभ देने वाली होती थी, पूरा देश खेती से होने वाली फसल से प्रभावित होता था। इसका तात्पर्य यही था कि मानसूनी बारिश अच्छी होती थी। मानसून की बारिश के लिए पर्यावरण का अच्छा होना आवश्यक है। पहले हम संचार माध्यमों के द्वारा सुनते थे कि चार दिन की बारिश होगी और जितने दिन का बताया जाता था, वैसा होता भी था। लेकिन आज लगातार और मूसलाधार बारिश कहीं भी देखने को नहीं मिलती। इसके पीछे का एक मात्र कारण यही माना जा रहा है कि देश में वन आच्छादित क्षेत्रों की भारी कमी आई है। यह सब शहरीकरण के चलते ही हो रहा है। हम वास्तव में जिस विकास की कल्पना के सहारे आगे जा रहे हैं, वह भावी जीवन के साथ एक खिलवाड़ ही है। पेड़ पौधों के काटने से भले ही हमारे लिए स्थान मिल जाएं, लेकिन जीवन के लिए इसका नुकसान क्या है, इसके संकेत अभी से मिलने प्रारंभ हो गए हैं।
इस वर्ष की मानसूनी बारिश के बारे में मौसम विभाग ने अंतरिक्षीय अध्ययन के बाद कहा है कि इस बार दक्षिण पश्चिम मानसून सामान्य रह सकता है। वर्तमान वातावरण के हिसाब से सामान्य का आशय बहुत अच्छी बारिश होना ही है। क्योंकि पिछले कई वर्षों से सामान्य से कम ही बारिश हुई है। इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि खरीफ मौसम के दौरान देशभर में अच्छी बारिश होगी, जिससे कृषि क्षेत्र के साथ-साथ समूची अर्थव्यवस्था को संतोषजनक लाभ होगा। यह बात सही है कि कृषि क्षेत्र की हालत अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से प्रभावित करती है। पिछले कुछ सालों से देश के अधिकांश हिस्सों में सूखे के हालात बने हुए हैं। विभाग का कहना है कि बारिश की संभावना 97 प्रतिशत तक है। वैसे पिछले साल भी विभाग ने सामान्य मानसून की संभावना जताई थी, लेकिन 15 प्रतिशत जिलों में बाढ़ आई तो 38 प्रतिशत जिले सूखे रहे थे। वहीं 640 जिलों में से सिर्फ 40 प्रतिशत सामान्य बारिश हुई थी। वैसे इस साल के मानसून को लेकर यह पहला अनुमान है। मौसम विभाग, उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़ों से ही मानसून के रूख का आंकलन करता है इसलिए अनुमान कुछ आगे-पीछे रहने की संभावना हमेशा बनी रहती है। यह लगातार तीसरा साल है जब मौसम विभाग ने सामान्य मानसून का पूवार्नुमान घोषित किया है। प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान दो से तीन डिग्री सेल्सियस कम रहेगा, जिसकी वजह से अल-नीनो का खतरा नहीं रहेगा और यह उदासीन रहेगा, इसकी वजह से बारिश अच्छी होगी। देश में इस समय डेढ़ सौ से अधिक जिले भीषण सूखे की चपेट में हैं। इनमें उत्तर प्रदेश और बिहार के जिले सबसे ज्यादा मार झेल रहे हैं। बुंदेलखण्ड सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित है। सूखे जैसे हालात से महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक भी जूझ रहे हैं। भारत की 70 प्रतिशत खेती मानसूनी बारिश पर ही निर्भर होती है। अब बारिश अच्छी होगी तो फसल भी अच्छी होगी। जहां सिंचाई के साधन हैं, वहां पर अच्छी बारिश होने से किसानों को नलकूप नहीं चलाने पड़ेंगे। इससे डीजल-बिजली की बचत होगी। कुल मिलाकर अच्छा उत्पादन होगा तो किसानों का लाभ बढ़ेगा तो सरकार भी राहत की सांस लेगी। बारिश अच्छी होगी तो सिंचाई के साथ-साथ पेयजल संकट भी समाप्त होगा। यहां बात यह भी है कि कई बार मौसम विभाग की भविष्यवाणी सटीक साबित नहीं रही है। 2005 से 2017 के दौरान सात बार ऐसा देखने को मिला है। अनुमानित और हकीकत में होने वाली बारिश में काफी अंतर रहता है। इससे ज्यादा निराशा किसानों को होती है तो अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। पैदावार अच्छी न हो तो फिर महंगाई बढ़ने का डर सताता है। रिजर्व बैंक तभी अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान मानसून के आंकलन पर गौर करता है। 2009 में मानसून धोखा दे गया था तो देश को चीनी का आयात करना पड़ा। 2016 में मानसून सामान्य रहा तो 2014-2015 में लगातार दो खराब मानसून का सामना देश को करना पड़ा। बहरहाल, मानसून खराब हो या अच्छा, जितनी जैसी भी बारिश होती है देश के हर हिस्से में मानसून प्रबंधन की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि खराब मानसून के होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
मानसूनी बारिया से प्राप्त हो सकने वाले लाभों के लिए हमारे देश के किसानों और नागरिकों को अभी से यह चिंतन करना चाहिए कि इस पानी को अधिक समय तक भूमि पर संग्रहित कैसे किया जाए। बारिश के पानी को उपयोग में लाने के लिए उचित भण्डारण की व्यवस्था होती रहे। यह हर देश के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत जैसे देश के लिए तो पानी का भण्डारण एक महत्वपूर्ण पहलू है। इसलिए हमें फिलहाल तो अच्छी बारिश की भविष्यवाणी का स्वागत करना चाहिए और अच्छी बारिश का लाभ लेने के लिए जल भण्डारण के उचित प्रबंध भी करने चाहिए।

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