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    हरियाणा – राज्यसभा चुनाव में पैराशूट पर भारी ‘म्हारा छोरा’

    दीपक कुमार त्यागी

    देश के 15 राज्यों की 57 सीटों पर हाल ही में राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया पूर्ण हुई है। इन 57 में से 41 सीटों पर तो प्रत्याशियों का निर्विरोध निर्वाचन हो गया था। वहीं चार राज्यों की 16 सीटों के लिए 10 जून को मतदान संपन्न होकर बाद में परिणाम घोषित होने का कार्य हुआ। हरियाणा में इन चुनावों में भारतीय मीडिया जगत की चर्चित शख्सियत कार्तिकेय शर्मा ने भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी रणभूमि में आकर सभी को आश्चर्यचकित करने का कार्य कर दिया। चुनावों में कार्तिकेय शर्मा ने अपने बेहतरीन चुनाव प्रबंधन के दम पर जहां एक तरफ तो भाजपा-जजपा का समर्थन हासिल करने का कार्य किया, वहीं दूसरी तरफ अन्य वोट का इंतजाम करने का कार्य करके चुनावी रणभूमि में कांग्रेस के दिग्गज राजनेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन को जबरदस्त सियासी पटखनी देने का कार्य कर दिया‌। राजनेताओं के साथ साथ हरियाणा के आम जनमानस को भी उम्मीद है कि कार्तिकेय शर्मा राज्‍यसभा में हरियाणा के आम जन की आवाज को दमदार ढंग से बुलंद करने के दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वहन करेंगे। वैसे राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो कार्तिकेय शर्मा ने देश के राजनेताओं को यह दिखा दिया कि उन्होंने भी देश के दिग्गज राजनीतिज्ञ व अपने पिता विनोद शर्मा से बचपन से ही राजनीति के हर तरह के दांवपेंच कुशलतापूर्वक सीखने का कार्य किया है।

    चुनाव प्रचार के दौरान जिस वक्त राज्यसभा के चुनाव में अपनी जीत को कार्तिकेय शर्मा ने हरियाणा की जीत बताने का दांव चला था, उस समय ही देश के राजनीतिक विश्लेषकों ने इसको हरियाणा राज्यसभा चुनाव के परिणाम को कार्तिकेय शर्मा के पक्ष में करने वाला बड़ा दांव मान लिया था। यह उस दांव का ही कमाल था कि कांग्रेस पार्टी की तरफ से देश के दिग्गज राजनेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन का नाम आने के बाद भी हरियाणा ने इसे सिरे से खारिज करने का काम कर दिया, क्योंकि चुनाव में प्रचार के प्रथम दिन से ही हरियाणा बड़ा मुद्दा बन चुका था, पूरा चुनाव ‘म्‍हारा छोरा’ वर्सेज ‘पैराशूट कैंडिडेट’ के इर्दगिर्द लड़ा गया था। सोशल मीडिया पर भी ‘म्‍हारा छोरा’ जबरदस्त ढंग से वायरल होता रहा और जैसा कि रामकुमार गौतम ने अपील में कहा कि जो काम हरियाणा में कार्तिकेय शर्मा के पिता विनोद शर्मा ने अपने कार्यकाल में करवाए, आज राज्य में उसी से अनेक वर्गों का उत्‍थान हुआ है। इसी अहम कारण व विनोद शर्मा की स्‍वच्‍छ मिलनसार छवि और लोक कल्‍याण के कार्यों के कारण हरियाणा में कार्तिकेय शर्मा के पक्ष में सभी विधायक अंत तक भी एकजुट रहे। क्योंकि इनको विनोद शर्मा का यह अक्‍स उनके पुत्र कार्तिकेय शर्मा में भी दिखाई देता है, इस स्थिति ने कार्तिकेय की जीत को सरल बनाने का कार्य किया।

    इस बार के चुनाव पर अगर नजर दौड़ाएं तो राज्‍यसभा की सीटों के लिए हुए नामांकन के वक्‍त से ही हरियाणा का सियासी पारा जबरदस्त उफान पर था। राज्य की चुनावी रणभूमि में राजनीतिक घमासान अपने पूर्ण चरम पर था। हालांकि इसका सबसे अहम कारण भी बिल्कुल स्पष्ट था कि एक युवा समाजसेवी कार्तिकेय शर्मा की राज्यसभा सीट के लिए हरियाणा से प्रबल दावेदारी करना। वहीं इस बार हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और जेजेपी की जुगलबंदी ने पहले ही दिन से धरातल पर यह साफ कर दिया था कि कांग्रेस के हरियाणा में भी अब बुरे दिन शुरू हो चुके हैं। वहीं अभय चौटाला ने जिस तरह से साथ देते हुए यह साबित किया कि वह कार्तिकेय शर्मा को उच्‍च सदन में देखना चाहते हैं, वह काबिलेतारिफ है। वैसे देखा जाये तो पिता विनोद शर्मा की राह पर चल रहे कार्तिकेय ने भी राज्यसभा चुनाव में विजय के साथ यह साबित कर दिया है कि वह भी अपने पिता की तरह ही हरियाणा व देश की सियासत में जबरदस्त ढंग से परचम अवश्य लहराएंगे। यहां आपको बता दें कि करीब 30 वर्ष पहले वर्ष 1992 में कार्तिकेय शर्मा के पिता विनोद शर्मा भी राज्‍यसभा के सदस्‍य बने थे और अब उसी राह पर कार्तिकेय भी आगे बढ़ रहे हैं, उस वक्‍त पंजाब में तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री बेअंत सिंह की सरकार थी, इसी दौरान विनोद शर्मा कांग्रेस पार्टी से राज्‍यसभा सदस्‍य निर्वाचित हुए थे, उस वक्त विनोद शर्मा वर्ष 1998 तक राज्‍यसभा के सदस्‍य रहे थे। केंद्र में उस वक्‍त पीवी नरसिंहा राव की सरकार थी और कांग्रेस पार्टी में विनोद शर्मा की जबरदस्त पकड़ और अनुभव के कारण ही उन्‍हें केन्द्र में डिप्‍टी मिनिस्‍टर बनाया गया था। हालांकि इससे पहले विनोद शर्मा वर्ष 1980 में बनूड़ विधानसभा से विधायक चुने गए थे और वह अब तक तीन बार विधायक रह चुके हैं।

    वैसे देखा जाए तो कार्तिकेय शर्मा की राज्यसभा चुनाव में जीत के मायने बेहद अहम है, क्योंकि उनकी जीत हरियाणा के लिहाज से जहां बेहद महत्‍वपूर्ण है, वहीं केन्द्रीय राजनीति में अजय माकन के हार जाने से कांग्रेस पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा राजनीतिक झटका है। कार्तिकेय ने अपनी पहली चुनावी पारी में ही जिस सूझबूझ से रणनीति तैयार करने का कार्य किया है, उससे कार्तिकेय का हरियाणा व देश की केन्द्रीय राजनीति में एकाएक कद बढ़ गया है, वहीं कार्तिकेय शर्मा की कार्यशैली से यह भी स्पष्ट नजर आता है कि भविष्य में वह देश में ब्राह्मण राजनीति का भी एक केंद्र बिंदु बनकर उभरेंगे, वैसे हरियाणा के दृष्टिकोण से देखें तो फि‍लहाल कोई भी ऐसा जनप्रिय युवा ब्राह्मण नेता नहीं है जिसकी राष्ट्रीय फलक पर कोई पहचान हो। इस राजनीतिक दृष्टिकोण के लिहाज से जल्‍द ही कार्तिकेय शर्मा को राष्ट्रीय स्तर पर और भी कोई बेहद अहम व महत्वपूर्ण बड़ी जिम्‍मेदारी से भी नवाजा जा सकता है। कार्तिकेय शर्मा की शख्सियत की एक खासियत यह भी है कि वह जो भी कार्य अपने हाथ में लेते हैं, उसे जब तक पूरा न कर लें चैन से नहीं बैठते हैं, वह हमेशा अपनी जिम्मेदारी का पूरी मेहनत, निष्ठा व ईमानदारी के साथ निर्वहन करने का कार्य करते हैं। वैसे इस पूरे चुनावी घटनाक्रम में सबसे महत्‍वपूर्ण भूमिका मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की रही है, उन्‍होंने कंधे से कंधा मिलाते हुए हर एक कड़ी को बारीकी से देखा और उसे एक सूत्र में पिरो करके कार्तिकेय की चुनावी राह को आसान करते चले गये। राज्यसभा चुनाव में मनोहर लाल खट्टर की इस पहल का लाभ पहले ही दिन दिखने लगा था उसके पश्चात ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कार्तिकेय को समर्थन देने की बात कही थी।

    वहीं सूत्रों के अनुसार कांग्रेस पार्टी खुद के 31 वोट होने के बावजूद भी आपसी जबरदस्त अंतर्कलह को चुनावों में भी खत्म नहीं कर पाई। कांग्रेस के नेता अंदर ही अंदर चाहते थे कि इस बार के चुनाव में वह पूर्व मुख्यमंत्री भुपेंद्र सिंह हुड्डा का वर्चस्व खत्म कर दें, वह चाहते थे कि कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी अजय माकन चुनाव में हारें और हुड्डा की कांग्रेस पार्टी व हरियाणा की राजनीति में जबरदस्त किरकरी हो। हालांकि हुड्डा भी यह सब अच्छे से जानते थे और उन्होंने कांग्रेसियों की यह उम्मीद सच साबित न हो इसके लिए चुनावी रणभूमि में अंतिम समय तक खूब जतन किए थे, लेकिन वह एक युवा राजनीतिज्ञ कार्तिकेय शर्मा की रणनीति के आगे खुद की प्रतिष्‍ठा नहीं बचा सके। पूर्व मुख्‍यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए यह राज्‍यसभा चुनाव एक बहुत बड़ा राजनीतिक सबक है। उनके लिए सबक है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। राज्यसभा चुनाव में हार से भविष्य में हुड्डा के राजनीतिक कद पर भी असर पड़ सकता है और जो कांग्रेस हाई कमान अभी तक हुड्डा के हर सही या गलत फैसले पर ऑंख बंद करके अपनी मुहर लगाने का कार्य करते हुए आई है, अब भविष्य में हुड्डा की इस स्थिति पर विराम लग सकता है। देखा जाये तो कहीं ना कहीं राज्य की राजनीति में अनुभवी कुमारी शैलजा को किनारा करना भी कांग्रेस के लिए बेहद महंगा साबित हो रहा है।

    चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी अजय माकन की हार की बात करें तो कहीं न कहीं कांग्रेस हाई कमान के द्वारा समय रहते सही फैसले नहीं कर पाना भी एक बेहद अहम कारण है। यही कारण कि इस वजह से ही कांग्रेस पार्टी उठने की बजाए दिन प्रतिदिन राष्ट्रीय स्तर पर भी तेजी के साथ लगातार रसातल में जा रही है। आज देश के हर राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी जबरदस्त ढंग से चर्चा हो रही है कि कुलदीप बिश्‍नोई को आखिर राहुल गांधी ने मिलने का समय क्‍यों नहीं दिया, जबकि यह बात मतदान करने से पहले की है। अगर समय रहते राहुल गांधी हरियाणा के छत्रप कुलदीप बिश्‍नोई को समय दे देते तो अजय माकन को एक वोट का नुकसान नहीं होता और वह चुनाव नहीं हारते। हालांकि राजनीतिक लोगों के बीच यह भी चर्चा है कि कुलदीप को प्रदेश अध्‍यक्ष पद न मिलने के कारण वह पार्टी हाईकमान से नाराज थे और इस पर रही सही कसर हुड्डा ने कुलदीप बिश्‍नोई की मीटिंग राहुल गांधी से नहीं होने देने की वजह से पूरी करने का कार्य कर दिया था। ऐसा करके कहीं न कहीं हुड्डा ने अब अपने लिए ही एक बड़ा गड्ढा खोद लिया है, क्योंकि इस तरह के हालात के चलते हार के डर से ही रणदीप सुरजेवाला ने पहले ही राजस्‍थान का रुख कर लिया था, लेकिन अब वह राजस्थान से राज्यसभा चुनाव जीत गये हैं, ऐसे में पूर्व अध्‍यक्ष कुमारी शैलजा, रणदीप सुरजेवाला और कुलदीप बिश्‍नोई किसी भी सूरत में अब भविष्य में भुपेंद्र सिंह हुड्डा को चैन से बैठने नहीं देंगे। वैसे राजनीति में कब क्या हो जाये, इसके बारे में कोई कुछ भी नहीं कह सकता है, इस बात को एकबार फिर हरियाणा से कार्तिकेय शर्मा की राज्यसभा चुनाव में जीत ने साबित कर दिया है।

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