More
    Homeसाहित्‍यलेखस्वामी विद्यानन्द विदेह वर्णित वैदिक नारी के छः भूषण

    स्वामी विद्यानन्द विदेह वर्णित वैदिक नारी के छः भूषण

    -मनमोहन कुमार आर्य
    ऋग्वेद एवं अथर्ववेद में एक मन्त्र आता है जिसमें वैदिक नारी के छः भूषणों का उल्लेख वा वर्णन है। हम इस मन्त्र व इस पर आर्यजगत के कीर्तिशेष संन्यासी स्वामी विद्याननन्द विेदेह जी के पदार्थ व व्याख्या को प्रस्तुत कर रहे हैं। मन्त्र निम्न हैः

    इमा नारीरविधवाः सुपत्नीरांजनेन सर्पिषा सं विशन्तु।
    अनश्रवोऽनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे।।
    ऋग्वेद 10.18.7, अथर्ववेद 12.2.31, 18.3.57
    पदार्थः- (1) (इमाः नारी) ये नारियां, (अविधवाः) अ-विधवा, (सुपत्नीः) सुपत्नियां, (अनश्रवः) अनश्रु, (अनमीवाः) नीरोग, (सुरत्नाः) सुरत्ना और (जनयः) जननियां हों। (2) ये (आ-अंजनेन सर्पिषा) अंजन और स्नेहन के साथ (अग्रे) पहिले (सं-विशन्तु) प्रवेश करें और (योनिं आ-रोहन्तु) सवारी पर आरोहण करें।

    मन्त्र का भावार्थ एवं व्याख्या करते हुए स्वामी विद्यानन्द विदेह जी ने लिखा है कि इस मन्त्र में जहां नारी के लिये षड्-भूषणों का विधान है, वहां मानव-समाज के लिये नारी के विषय में दो आदेश हैं। 
    
    नारियों का प्रथम भूषण अविधवा होना है। धव नाम पति का है। धवा का अर्थ है पतियुक्ता, पति के साथ रहनेवाली, विधवा का अर्थ है पतिवियुक्ता, पति से पृथक् रहने वाली। अविधवा का अर्थ है पति से पृथक न रहनेवाली, सदा पति के साथ रहनेवली। सच्ची नारियां स्वप्न में भी कभी पति से वियुक्त होना नहीं चाहती। रण में, वन में, नगर में, नारियां सदा पति के साथ रहें, सुख में, दुख में सदा अपने पति का साथ दें। 
    
    नारियों का दूसरा भूषण है सुपत्नी होना। पत्नी का अर्थ है स्वामिनी और सुपत्नी का अर्थ है सुस्वामिनी। नारियों को उच्च कोटि की सुस्वामिनी तथा उच्च कोटि की सुगृहप्रबन्धिका होना चाहिये। जहां नारियां सुगृहस्वामिनी और सुगृहिणी होती हैं, वहां श्री तथा लक्ष्मी का निवास होता है और उन घरों में देवता रमण करते हैं। सुपत्नीत्व नारी की परम प्रतिष्ठा है। 
    
    नारियों का तीसरा भूषण है अनश्रु होना, अश्रुविहीना होना, कभी अश्रु न बहाना, सदा सुप्रसन्न रहना। वियोग वा करुणा के अवसरों पर मनुष्य ही क्या, पशु पक्षी तक की आंखों में आंसू आ जाते हैं। किन्तु बात बात पर आंसू बहाने का स्वभाव अच्छा नहीं, बहुत बुरा है। साथ ही पुरुषों का भी यह कर्तव्य है कि वे ठेस या पीड़ा पहुंचाकर स्त्रियों को रुलाया न करें। जहां नारियां दुःखी होकर आंसू बहाती हैं, वहां सब प्रकार की आपत्तियां आकर निवास करती हैं। देवियां सदा सुप्रसन्न रहें। सुप्रसन्नता सर्वश्रेष्ठ सुलक्षण हैं। 
    
    नारियों का चौथा भूषण हैं नीरोगिता। स्त्रियों को आयुर्वेद का अध्ययन कराके स्वास्थ्यविज्ञान की जानकारी अवश्य करायी जानी चाहिये, जिससे वे अपना और अपने परिवार का स्वास्थ्य सम्पादन कर सकें। जो देवियां रुग्ण रहती हैं, वे न तो पारिवारिक कर्तव्यों को सुष्ठुतया निर्वाह कर सकती हैं, न अपने परिवार को स्वस्थ व नीरोग रख सकती हैं और न देश और संसार की ही कुछ सेवा कर सकती हैं। अस्वस्थता से जहां आयु और धन की हानि होती है, वहां सुख और सौन्दर्य का भी ह्रास होता है। स्वस्थ शरीर से ही सब धर्मों (कर्तव्यों) की साधना होती है। 
    
    नारियों का पांचवा भूषण है सुरत्ना होना। उत्तम गुण का नाम सुरत्न है। नारियों में उत्तमोत्तम गुण होने चाहियें। विद्या सुरत्न है। सुशिक्षा सुरत्न है। मधुरता सुरत्न है। सुशीलता सुरत्न है। सदाचार सुरत्न है। पवित्रता सुरत्न है। सौन्दर्य सुरत्न है। जितनी रमणीयतायें हैं, सब सुरत्न हैं। देवियों को चाहिये उत्तमोत्तम गुणों से सुरत्ना बनें। 
    
    नारियों का छठा गुण है जननी अथवा माता बनना। यह ठीक है कि अधिक सन्तान का होना आपत्तिपूर्ण होता है, किन्तु सर्वथा निस्सन्तान होना भी पाप है। पति स्त्री की शीतल छाया है और सुसन्तान नारी की माया है। धन होने पर भी सन्तान के बिना नारी निर्धना है। मातृत्व नारी का परम पद है। स्मरण रहे कि कुसन्तान की माता बनना दारुण दुर्भाग्य है और सुसन्तान की माता होना महान् गौरव है। 
    
    सामाजिक व्यवहार में वेदमाता नारियों के लिये अतिशय उच्च समादर का विधान करती है। प्रत्येक परिवार की देवियां अंजन और स्नेहन से सुशाभनीय रहे। देवियां सुन्दर वस्त्र, शोभनीय आभूषण, अंजन (सुरमा, काजल, मेंहदी, सिन्दूर आदि) और स्नेहन (तैल आदि स्निग्ध पदार्थ) का उपयोग करें। विशेषतया जब वे सार्वजनिक आयोजनों मे जायें तो उनकी वेश भूषा तथा रूपनीयता सुदर्शनीय हो। 
    
    गृहों, सभाओं अथवा उत्सवों में प्रथम देवियां प्रवेश करें और पुरुष उनके पीछे। इसी प्रकार सवारियों पर प्रथम नारियां आरोहरण करें और पुरुष पीछे। 
    
    ये नारियां हो अविधवासुपत्नी, अनश्रु नीरोग सुरत्ना जननी। 
    अंजन स्नेहन से हों सुश्रृंगारित, करें प्रथम प्रवेश यानों पर चढ़े।।
    
    हमने उपर्युक्त वेदमन्त्र, उसका पदार्थ व टीका स्वामी विद्यानन्द विदेह जी की लघु पुस्तक ‘वैदिक स्त्री-शिक्षा’ से दी है। पुस्तक लगभग 50 वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई थी। पुस्तक का मूल्य चालीस पैसे मात्र था। पुस्तक में 32 पृष्ठ हैं। पुस्तक के अन्दर के कवर पृष्ठ पर स्वामी जी के वेदसंस्थान की मासिक पत्रिका का विज्ञान भी दिया गया है। यह संस्थान दिल्ली में अब भी कार्यरत है और वहां से स्वामी जी समस्त साहित्य उपलब्ध होता है। हम भी वर्षों तक इस पत्रिका के ग्राहक व पाठक थे। उसके सम्भवतः 1976 व 1978 वर्ष के अंक भी हमारे संग्रह में हैं। यह पत्रिका अजमेर से प्रकाशित होती थी जिसे स्वामी जी के ज्येष्ठ पुत्र श्री विश्वदेव शर्मा प्रकाशित करते थे। स्वामी जी के दूसरे पुत्र दिल्ली के राजौरी गार्डन स्थित वेदसंस्थान का संचालन करते थे। 
    
    वैदिक स्त्री-शिक्षा पुस्तक में कुल 11 वेदमन्त्रों की व्याख्यान की गई है। इन मन्त्रों के शीर्षक निम्न दिये गये हैं: 

    1- षड्-भूषण
    2- स्त्री का मन व क्रतु
    3- पाणि-ग्रहण
    4- सहचारिणी जाया
    5- सम्राज्ञी
    6- पत्नी के वस्त्रों का अप्रयोग
    7- धर्मशिला नारियां
    8- सुमंगली वधू
    9- सदाचारिणी भार्या
    10- देवपत्नियां
    11- सुकुशला राका

    हमें लगता है कि यह पुस्तक सभी नारियों वा स्त्रियों को पढ़नी चाहिये। इस विषय को विस्तार से पढ़ना हो तो एक सर्वोत्तम पुस्तक ‘‘वैदिक नारी” है जिसके लेखक वेदों के महान विद्वान आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी हैं। यह पुस्तक वेदों का मंथन कर उसमें विद्यमान नारी जाति की सर्वांगीण उन्नति के नियम, सिद्धान्त व विचार दिये गये हैं। हमने स्वामी विद्यानन्द विदेह जी के सन् 1970-1980 के दशक में वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून में दर्शन करने के साथ उनके अनेक प्रवचनों को सुना था। वह वेद मन्त्रों की व्याख्या करते थे। उनकी व्याख्या मधुर, सरस, ज्ञान एवं भक्तिरस से युक्त होती थी। उनका व्यक्तित्व श्रोताओं को आकर्षित करता था। हम वर्ष 1970 में 18 वर्ष के थे तथा हमें उनके उपदेशों में सम्मोहन सा गुण अनुभव होता था। उनके व्यक्तित्व से प्रेरित होकर ही हम उनकी मासिक पत्रिका के वार्षिक सदस्य बने थे और दशकों तक बने रहे थे। अपनी क्रय शक्ति के अनुसार हमने उनका साहित्य भी खरीदा व पढ़ा था। स्वामी विद्यानन्द विदेह जी की मृत्यु सहारनपुर आर्यसमाज में उपदेश करते हुए मंच पर ही हुई थी। इस घटना से कुछ समय पूर्व उनको हृदयाघात हुआ जिसमें वह बच गये थे। सहारनपुर में उन्हें दूसरा हृदयाघात हुआ जिसे वह सहन नहीं कर सके और दिवंगत हो गये। आर्यसमाज क ेमच पर प्रवचन करते हुए मृत्यु होना उनकी वेदभक्ति और ऋषिभक्ति का प्रमाण है। आर्यसमाज में अब स्वामी विद्यानन्द विदेह ही के समान सुन्दर, आकर्षक व्यक्तित्व वाले, वेद प्रचार के लिए सर्वात्मा समर्पित तथा वेद को अपने जीवन में जीने वाले विद्वान बहुत ही कम हैं। हमने स्वामी जी को स्मरण करते हुए उनकी उपर्युक्त वेदमन्त्र की व्याख्या देने के लिए यह आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं। हम आशा करते हैं कि पाठक इस आलेख को पसन्द करेंगे। 
    मनमोहन आर्य
    मनमोहन आर्यhttps://www.pravakta.com/author/manmohanarya
    स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    12,313 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read