लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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jnuवर्तमान समय में बब्बी कुमारी दिल्ली स्थित जवाहरलालनेहरू विश्वविद्यालय से सोशियोलोजी की छात्रा हैं और इस समय ग्रीष्मावकास और वृद्ध पिता जी की तबियत ठीक न होने के कारण इन दिनों देवरिया जिले के साहबाज़पुर गाँव में अपने घर आयीं हुई हैं. इन्होने सपने मे भी नही सोचा था कि परिवार और समाज के चलते इतनी मुसीबतों का सामना करना पडेगा. दरअसल परिवार और समाज़ के दबाव के चलते इनका विवाह उस समय हुआ था जब यें बारहवीं कक्षा की छात्रा थी. परंतु पढने की ललक के चलते उस समय इन्होनें विवाहोपरांत ससुराल जाने से मना कर दिया परिणामत: ‘गवना’ की रश्म को कुछ दिनों के लिये टाल दिया गया. इन्होने अपने पति जो कि एक अनपढ हैं और कमाने के लिये शुरू से ही शहर मे रहते थे, से अपनी पढने की इच्छा जतायी तो उन्होने किसी भी प्रकार की सहायता देने के लिये मना कर दिया. परंतु इस बहादुर बेटी ने हार न मानने की ठान ली. माता-पिता की अस्वस्थता और उनकी निर्धनता के चलते इन्होने अपने स्नातक की पढाई का सारा खर्च दूसरे के खेतों मे मजदूरी कर उठाया. बहन की पढने की इस लगन को देखकर इनके बडे भाई जो कि उस समय खुद पढाई करते थे, ने अपनी बहन को दूसरे के खेत में मजदूरी के लिये जाने हेतु मना कर खुद मजदूरी करने लग गये. बहन-भाई की इस मेहनत का परिणाम सकारात्मक आया. कालंतर में बब्बी कुमारी का स्नातकोत्तर हेतु जवाहरलालनेहरू विश्वविद्यालय के सोशियोलोजी कोर्स मे चयन हो गया और बब्बी कुमारी जे.एन.यू. चली गयी. जब इनकी ससुराल वालों को बब्बी कुमारी की इस सफलता के बारे में पता चला तो उन्होने ‘गवना’ के लिये समाज की सहायता से इनके परिवार वालों के ऊपर दबाव बनाना शुरू किया परंतु बब्बी कुमारी और इनके भाई मुन्ना किसी भी प्रकार के दबाव के आगे नही झुके. बब्बी कुमारी बताती है कि जे.एन.यू. जाने के बाद जबतक छात्रावास नही मिला तबतक यह वहाँ के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक छात्रा के साथ कुछ दिनों तक रही. नम आँखों से बब्बी कुमारी ने बताया कि उनके साथ ऐसा समय कई बार आया जब इनके पास न्यूनतम कपडे तक नही होते थे और आर्थिक तंगी से परेशान होकर एक बार तो इन्होने आत्महत्या तक विचार बना लिया था परंतु इन्होने अपनी गरीबी को ही अपनी असली ताकत बनाने की सोचा. कुछ महीने बाद इन्हे छात्रावास मिला तथा छात्रावृत्ति भी मिलने लगी और आगे की पढाई का मार्ग प्रशस्त हुआ. इन्होने अपने पति से कई बार आर्थिक मदद के लिये कहा परंतु हर बार वो मना कर देता था. हारकर इन्होने भविष्य में अपने पति से कोई रिश्ता न रखने के लिये कहा तो उसने कुछ पैसे भेजें. इनकी आर्थिक – स्थिति को इनके साथ रहने वाली मित्र से जब नही देखा गया तो वह आगे आयी और इनकी हर प्रकार की सहायता की.

 

जे.एन.यू के एम.फिल की प्रवेश परीक्षा देकर ये अपने गाँव चली आयी. इनके गाँव आते ही इन्हे जबरदस्ती ससुराल ले जाने के लिये इनके ससुराल वालें कई लोगों के साथ इनके घर आ धमके. परंतु जब इनके भाई और इन्होने अपने ससुराल वालों के इस कृत्य का विरोध किया तो सैकडों गाँव वालों और खाप पंचायत के सामने अनुसूचितजाति-समाज की इस बेटी को खीँचकर ले जाने की कोशिश की गई परंतु इनके भाई के अलावा किसी ने भी इस कृत्य को रोकने की हिम्मत नही दिखायी. चिंतन-मनन के पश्चात किसी प्रकार वहाँ उपस्थित लोगों से इन्होने अगले दिन तक का समय मांगा और दिल्ली स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार राजीव गुप्ता को फोनकर अपनी सारी स्थिति बताते हुए मदद मांगी. बस यही से इस पूरे घटनाक्रम मे तेज़ी से बदलाव आया. अगली सुबह ही जिला उप-जिलाधिकारी श्री दिनेश गुप्ता के संज्ञान मे सारा विषय आ गया और प्रशासन के सकारात्मक सहयोग और दूरदर्शिता के चलते दोनों परिवारवालों के बीच विवाह-खत्म करने की सहमति बनी. समाज-उपेक्षा से बब्बी को तो अब मुक्ति मिल जायेगी परंतु अभी भी बब्बी कुमारी की आर्थिक समस्या मुँह बाये खडी है फिर भी बब्बी कुमारी ने नेट, जे.आर.एफ जैसी छात्रवृत्ति पाने की आशा रखते हुए प्रशासनिक सेवा में जाने का अब मन बना लिया हैं.

3 Responses to “इस बेटी के ज़ज्बे को सलाम-राजीव गुप्ता”

  1. Rekhasingh

    राजीव जी बेटी बब्बी पहली नहीं है । मुझे JNU के छात्रावास मे रहते हुए और भी अनुभव हुआ था । भगवान् का करोडो धन्यबाद जो उसने और उसके भाई ने गलत परिस्थतियो से समझौता न करके आपको सब कुछ बताया । अब उसका पति और उसके ससुराल वाले भी दुरुस्त हो जायेगे । कितनी होनहार संस्कारी बेटिया इस समाज के कुछ खराब लोगो के द्वारा प्रतिभावान होते हुए भी आगे नहीं बढ पाती है ।

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  2. Anil Gupta

    बात लगभग पेंतालिस वर्ष पुरानी है.अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के संगठन मंत्री का दायित्व उस समय आचार्य श्री गिरिराज किशोरे जी के पास था.(जो आजकल विश्व हिन्दू परिषद् के वरिष्ठ नेता हैं).पूर्वोत्तर में उस समय इनर लाईन परमिट व्यवस्था लागू थी आसाम के ऊपरी स्थानों पर और नेफा (वर्तमान अरुणांचल) में जाना काफी मुश्किल था. ये व्यवस्था अंग्रेजों ने लागू की थी ताकि शेष भारत के लोग वहां न जा सकें और ईसाई मिशनरियों को और चर्च को वहां अपनी धर्मान्तरण की गतिविधियाँ बेरोकटोक चलाने का अवसर मिलता रहे.
    ऐसे में विद्यार्थ परिषद् द्वारा एक कार्यक्रम अपने हाथ में लिया गया.नाम रखा गया “स्टूडेंट्स एक्सपीरियंस इन इंटरस्टेट लिविंग”(SEIL ).इसके अंतर्गत आचार्य गिरिराज जी, जो उस समय ग्वालियर के पास लश्कर में एक स्नातकोत्तर कालेज के प्रधानाचार्य थे तथा संघ के एक जीवनव्रती प्रचारक थे,के नेतृत्व में कालेज के विद्यार्थियों का एक दल पूर्वोत्तर का सामाजिक अध्ययन करने गया.वहां सभी परिवारों में संपर्क करने गए.एक परिवार में संपर्क करने पर एक बूढी अम्मा बहुत अनुनय विनय के बाद मिलने को तैयार हुई. जब वो उन लोगों के सामने आयीं तो सब की नजरें शर्म से झुक गयी.कारण?उस बूढी अम्मा ने जो जीर्ण शीर्ण वस्त्र पहन रखे थे उनमे उस अम्मा का शरीर भी पूरी तरह से ढक नहीं पा रहा था.आचार्यजी ने उनसे पूछा की आपके परिवार में और कौन है?इस पर उस बूढी अम्मा ने बताया की घर में उसके अतिरिक्त एक बेटी भी रहती है.सब लोगों ने उससे भी मिलने की इक्षा रखी.तो पहले तो अम्मा ने न नुकर की लेकिन आग्रह करने पर वो अन्दर चली गयी और थोड़ी देर बाद बेटी बाहर आ गयी.सब लोग देखकर आश्चर्य और क्षोभ से भर गए क्योंकि उस बेटी ने वही वस्त्र पहन रखे थे जो अम्मा ने पहन रखे थे.
    एक विद्यार्थी जो संपन्न परिवार का था और बहुत फिजूल खर्ची करता था.लेकिन वहां से लौट कर वहां के हालत का इतना असर उस पर पड़ा की उसने आचार्यजी से अपने खर्चे में से कुछ पैसे बचाकर वहां भेजने का अनुरोध किया.
    वापिस आने पर वहां की सामाजिक आर्थिक स्थिति पर मंथन के बाद ये तय किया गया की पूर्वोत्तर के कुछ विद्यार्थियों को बाहर लाकर पढाया जाये.और वहां के बहुत से छात्रों को संघ की योजना के तहत आगरा,कानपूर,मुम्बई, बड़ोदा आदि नगरों में संघ के स्वयंसेवकों के परिवारों में रखकर परिवार के सदस्य के रूप में ही पढाया गया.और पढाई पूरी होने के बाद वो वापिस अपने राज्यों में वापिस चले गए.और अपनी रूचि के अनुसार काम करने लगे.आज संघ की योजना से १९० ऐसे विद्यालय चल रहे हैं जिनमे पूर्वोत्तर के विद्यार्थियों के लिए छात्रावास की व्यवस्था है जो समाज के सहयोग से चलते हैं.ऐसे ९३ विद्यालय पूर्वोत्तर के सैट राज्यों में तथा ९७ विद्यालय अन्य प्रान्तों में हैं.मेरठ में भी ऐसा एक विद्यालय चल रहा है.
    आज भी हम पूर्वोत्तर के बारे में बहुत ही अनभिज्ञ हैं.लेकिन ऐसी गरीबी और विपन्नता केवल पूर्वोत्तर में ही नहीं है.देश के बहुत से हिस्सों में बहुत बड़ा वर्ग आज भी विपन्नता की स्थिति में जी रहा है.देश के सत्ताधीशों को केवल नारे उछालने की आदत है.गरीबी,शोषण, अत्याचार विषमता भुखमरी,आदि के प्रति संवेदनशून्यता है.लेकिन समाज को आगे आकर बाबी जैसी बहादुर बेटियों को आगे बढ़ने में पूरा सहयोग देना चाहिए.

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