लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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असहमति को स्वीकारने का साहस हमारे सत्ताधारियों में कहां है

संजय द्विवेदी

अन्ना हजारे के साथ लेखक संजय द्विवेदी

असहमति को स्वीकारने की विधि हमारे सत्ताधारियों को छः दशकों के हमारे लोकतंत्र ने सिखाई कहां है? इसलिए अन्ना हजारे के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ जो अनपेक्षित हो। यह न होता जो आश्चर्य जरूर होता। लोकतंत्र इस देश में सबसे बड़ा झूठ है,जिसकी आड़ में हमारे सारे गलत काम चल रहे हैं। संसद और विधानसभाएं अगर बेमानी दिखने लगी हैं तो इसमें बैठने वाले इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। साढ़े छः दशक का लोकतंत्र भोग लेने के बाद लालकिले से प्रधानमंत्री उसी गरीबी और बेकारी को कोस रहे हैं। यह गरीबी, बेकारी, भुखमरी और तंगहाली अगर साढ़े छः दशक की यात्रा में खत्म नहीं हुयी तो क्या गारंटी है कि आने वाले छः दशकों में भी यह खत्म हो जाएगी। अमीर और गरीब की खाई इन बीस सालों में जितनी बढ़ी है उतनी पहले कभी नहीं थी। अन्ना एक शांतिपूर्ण अहसमहमति का नाम हैं, इसलिए वे जेल में हैं। नक्सलियों, आतंकवादियों और अपराधी जमातों के प्रति कार्रवाई करते हमारे हाथ क्यों कांप रहे हैं?अफजल और गुरू और कसाब से न निपट पाने वाली सरकारें अपने लोगों के प्रति कितनी निर्मम व असहिष्णु हो जाती हैं यह हम सबने देखा है। रामदेव और अन्ना के बहाने दिल्ली अपनी बेदिली की कहानी ही कहती है।

बदजबानी और दंभ के ऐसे किस्से अन्ना के बहाने हमारे सामने खुलकर आए हैं जो लोकतंत्र को अधिनायकतंत्र में बदलने का प्रमाण देते हैं। कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी जैसै दरबारियों की दहाड़ और हिम्मत देखिए कि वे अन्ना और ए. राजा का अंतर भूल जाते हैं। ऐसे कठिन समय में अन्ना हजारे हमें हमारे समय के सच का भान भी कराते हैं। वे न होते तो लोकतंत्र की सच्चाईयां इस तरह सामने न आतीं। एक सत्ता किस तरह मनमोहन सिंह जैसे व्यक्ति को एक रोबोट में रूपांतरित कर देती है, यह इसका भी उदाहरण है। वे लालकिले से क्या बोले, क्यों बोले ऐसे तमाम सवाल हमारे सामने हैं। आखिर क्या खाकर आप अन्ना की नीयत पर शक कर रहे हैं। आरएसएस और न जाने किससे-किससे उनकी नातेदारियां जोड़ी जा रही हैं। पर सच यह है कि पूरे राजनीतिक तंत्र में इतनी घबराहट पहले कभी नहीं देखी गयी। विपक्षी दल भी यहां कौरव दल ही साबित हो रहे हैं। वे मौके पर चौका लगाना चाहते हैं किंतु अन्ना के उठाए जा रहे सवालों पर उनकी भी नीयत साफ नहीं है। वरना क्या कारण था कि सर्वदलीय बैठक में अन्ना की टीम से संवाद करने पर ही सवाल उठाए गए। यह सही मायने में दुखी करने वाले प्रसंग हैं। राजनीति का इतना असहाय और बेचारा हो जाना बताता है कि हमारा लोकतंत्र कितना बेमानी हो चुका है। किस तरह उसकी चूलें हिल रही हैं। किस तरह वह हमारे लिए बोझ बन रहा है। भारत के शहीदों की शहादत को इस तरह व्यर्थ होता देखना क्या हमारी नीयत बन गयी है। सवाल लोकपाल का नहीं उससे भी बड़ा है। सवाल प्रजातांत्रिक मूल्यों का है। सवाल इसका भी है कि असहमति के लिए हमारे लोकतंत्रांत्रिक ढांचें में स्पेस कम क्यों हो रहा है।

सवाल यह भी है कि कश्मीर के गिलानी से लेकर माओवादियों का खुला समर्थन करने वाली अरूंधती राय तक दिल्ली में भारत की सरकार को गालियां देकर, भारत को भूखे-नंगों का देश कह कर चले जाएं किंतु दिल्ली की बहादुर पुलिस खामोश रहती है। उसी दिल्ली की सरकार में अफजल गुरू के मृत्युदंड से संबंधित फाइल 19 रिमांडर के बाद भी धूमती रहती है। किंतु बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के लिए कितनी त्वरा और कितनी गति है। यह गति काश आतंकियों, उनके पोषकों, माओवादियों के लिए होती तो देश रोजाना खून से न नहाता। किंतु हमारा गृहमंत्रालय भगवा आतंकवाद, बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की कुंडलियां तलाशने में लगा है। मंदिर में सोने वाले एक गांधीवादी के पीछे लगे हाथ खोजे जा रहे हैं। आंदोलन को बदनाम करने के लिए अन्ना हजारे को भी अपनी भ्रष्ट मंडली का सदस्य बताने की कोशिश हो रही है। आखिर इससे हासिल क्या है। क्या अन्ना का आभा इससे कम हुयी है या कांग्रेस के दंभ से भरे नेता बेनकाब हो रहे हैं। सत्ता कुछ भी कर सकती है, इसमें दो राय नहीं किंतु वह कब तक कर सकती है-एक लोकतंत्र में इसकी भी सीमाएं हैं। चाहे अनचाहे कांग्रेस ने खुद को भ्रष्टाचार समर्थक के रूप में स्थापित कर लिया है। अन्य दल दूध के धुले हैं ऐसा नहीं हैं किंतु केंद्र की सत्ता में होने के कारण और इस दौर में अर्जित अपने दंभ के कारण कांग्रेस ने अपनी छवि मलिन ही की है। कांग्रेस का यह दंभ आखिर उसे किस मार्ग पर लेकर जाएगा कहना कठिन हैं किंतु देश के भीतर कांग्रेस के इस व्यवहार से एक तरह का अवसाद और निराशा घर कर गयी है। इसके चलते कांग्रेस के युवराज की एक आम आदमी के पक्ष के कांग्रेस का साफ-सुथरा चेहरा बनाने की कोशिशें भी प्रभावित हुयी हैं। आप लोंगों पर गोलियां चलाते हुए (पूणे), लाठियां भांजते हुए (रामदेव की सभा) और लोगों को जेलों में ठूंसते हुए (अन्ना प्रसंग) कितने भी लोकतंत्रवादी और आम आदमी के समर्थक होने का दम भरें, भरोसा तो टूटता ही है। अफसोस यह है कि आम आदमी की बात करने वाले विपक्षी दलों के नेताओं की भूमिका भी इस मामले में पूरी तरह संदिग्ध है। अवसर का लाभ लेने में लगे विपक्षी दल अगर सही मायने में बदलाव चाहते हैं तो उन्हें अन्ना के साथ लामबंद होना ही होगा। पूरी दुनिया में पारदर्शिता के लिए संघर्ष चल रहे हैं, भारत के लोगों को भी अब एक सार्थक बदलाव के लिए, लंबी लड़ाई के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

10 Responses to “हजारे के साथ कुछ गलत नहीं हुआ !”

  1. pROF. AVINASH LALL

    ANNA HAJARE TATHA UNKE HAJARO HAAJAR SAMRTHAKO SE……..

    “PAHALE YAH TO TAY KAR KI WAFAADAAR KOUN HAI…
    FIR WAKT TAY KAREGA KI GADDAAR KOUN HAI”.
    PROF. AVINASH LALL

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  2. श्रीराम तिवारी

    shriramt tiwari

    अन्ना एंड कम्पनी अपनी सदिक्षाओं का कितना ही बखान करती फिरे ,जब तक वे भृष्टाचार की लड़ाई में ‘एकला चलो रे’करते रहेंगे तब तक जन-लोकपाल या किसी भी कारगर आन्दोलन का सफल होना संभव नहीं.ताज्ज्ब तो इस बात का है कि अच्छे और नामी वकीलों के सानिध्य में भी अन्ना हजारे सरकार से वो सब कुछ मांगते रहते हैं जो सरकार के बूते कि बात नहीं.संसदीय जनादेश या refrendam के कुछ कायदे क़ानून होते हैं,यदि दुनिया के विशालतम प्रजातांत्रिक राष्ट्र कि निर्वाचित सरकार को जनादेश मिलता कि संविधान में अमुक को लोकपाल के दायरे में लाना है,अमुक को बाहर रखना है और फिर भी वो ऐंसा नहीं करती तो यह जनादेश कि अवहेलना हो सकती थी.किन्तु विगत २० सालों में किसी भी राजनैतिक दल को सरकार बनाने लायक न्यूनतम जनादेश भी देश कि जनता ने नहीं दिया.अब इसी जनता का एक क्षुद्र समूह जिसने शायद अपने वोट का भी इस्तेमाल नहीं किया होगा ,केवल ‘कोरी हीरो गिरी’ से प्रभावित होकर सड़कों पर भृष्टाचार को समाप्त करने के लिए देवी अवतारों के पद प्रक्षालन को आतुर है.उस केंद्र सरकार को जो कई दलों के टूटे-फूटे अंग -प्र्ताय्न्गों और उनकी हिमालयी शर्तों से क्षत विक्षत होने के वावजूद ‘यु पी ऐ ‘द्वतीय ने मौजूदा दौर के जनान्दलों को जिस ठोस तरीके से निबटाया वो दुनिया में कम से कम ये तो सावित करने के लिए पर्याप्त ही है कि भारत में भरी भृष्टाचार,महंगाई,गरीबी और असमानता के वावजूद पूंजीवाद की पकड़ मजबूत है.अमिरिका को और कर्पोरत जगत को इसी से मतलब है.अन्नाजी,रामदेव जी और जितने भी क्रांतिकारी व्यक्ति और समूह हैं वे समझ लें कि व्यवस्था परिवरतन और जन-लोकपाल जैसे शब्दों को हवा में उछालने से केवल हेरोगिरी में इजाफा होता रहेगा.क्रांतियों के मार्ग कि सबसे बड़ी बाधा पूंजीवादी शाशन तंत्र है ,उसे बदलने के लिए अन्ना को तीन-चौथाई बहुमत लेकर sansad में प्रवेश करना होगा.

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  3. इंसान

    कुछ दिन हुए मेरा सात वर्ष का नवासा पीठ के बल लेटा बिस्तर के किनारे सिर लटकाए सामने और ऊपर छत की ओर देख रहा था| मेरे पूछने पर बोला, “नाना, सब कुछ उल्टा नज़र आ रहा है|” स्वभाविक है उस स्थिति में बच्चे की अनुभूति अवश्य प्रभावित हुई है| अचानक मीणा जी की टिप्पणी में मनुवाद की रट को देख यह आभास हो चला है कि कहीं…! उठ कर सीधे बैठने से संभवत: विचारों में कुछ संतुलन होने का लाभ हो सकता है| यह भी कैसा संतुलन? मीणा जी के धर्म के ठेकेदारों को समझ तो अवश्य आएगी लेकिन तब तक देश का और हिंदुओं का सर्वनाश कर चुके होंगे| धर्म के ठेकेदारों का क्या हुआ? वो तो सर्वनाश गति को प्राप्त न हुए? नाम से तो हिंदू दीखते है मीणा जी| धर्म के ठेकेदार है या हिंदू हैं जिनका सर्वनाश निश्चित है? यदि दोनों में नहीं तो क्या अभी भी उल्टा लेते हुए हैं?

    जो भी हों डा: पुरुषोतम मीणा ‘निरंकुश’ मैं उनके विचारों को अवश्य पढ़ यह जानने का प्रयत्न करता रहूँगा कि मनुवादी, माओवादी, राष्ट्रवादी, इतियादी, उनकी ओर ईंट पत्थर क्यों फैकते हैं?

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  4. इंसान

    अन्ना हजारे और किरण बेदी को दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लेने के समाचार ने क्षण भर के लिये मुझे निस्तब्ध कर दिया है| अन्ना हजारे गांधीवादी हैं और सुना है कि वे सन्यासी की भांति महाराष्ट्र में किसी मंदिर में वास करते हैं| व्यक्तिगत रूप में घर गृहस्थी में उलझे लाखों करोड़ों भारतीयों की तरह सत्ताधारी कांग्रेस से दूसरी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े इस सेनानी को कुछ खो जाने का कोई भय नहीं है| दूसरी ओर घर गृहस्थी से सम्बंधित और अपने दीर्घ एवं ख्यातिपूर्ण कार्यकाल में समाज में योगदान देती किरण बेदी हमारे आपके व देश के भविष्य के लिए इस नासूर रूपी भ्रष्टाचार और अनैतिकता के विरोध में बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के संग जा खडी हुई हैं| भारतीय पुलिस सेवा की पूर्व अधिकारी इस वीरांगना ने न केवल साधारण भारतीयों बल्कि भारतीय पुलिस कर्मीयों के सामने देश के हित अपने व्यक्तिगत सुख चैन को तिलांजलि दे एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है| आज भारतीय पुलिस कल की गुलामी में लाचार नहीं है| अपने कर्तव्य को पूरा करते हुए उन्हें पहले देश के भविष्य का सोचना चाहिए| आज अपने व्यक्तिगत सुख के कारण देशद्रोहियों और आंतकवादियों का साथ देते हुए अराजकता फैला रहे है, उनकी संताने कल ऐसे दूषित वातावरण में खुल कर सांस भी न ले सकेंगी| कैसी विडम्बना है कि जब विदेशों में सभ्य लोग आने वाले कल को सोच अपने व्यवहार में निखार लाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, अपने यहां आज के सुख में मदमस्त कल की सुबह के मुख पर कालिख पोतने में कोई संकोच नहीं करते! मैं चाहूंगा कि भारतीय पुलिस कर्मी, युवा कार्यकर्ता, और कांग्रेस से जुड़े दूसरे अवसरवादी समर्थक अपने घरों से बाहर आ सच्चाई से अपने इर्द गिर्द देखें और सोचें कि क्या वे सचमुच भारतीय समुदाय को तीव्र अभाव, गरीबी, और गन्दगी में पड़े नहीं देखते? वे सोचें कि क्या ऐसी दयनीय स्थिति का आज के सर्वव्यापक भ्रष्टाचार, अनैतिकता, और दूसरी तमाम कुरीतियों से सीधा संबंध नहीं है? समय आ गया है कि वे एक दूसरे को रौंदते कॉकरोच की जिंदगी बसर न करते हुए चींटी की भांति एक कतार में राष्ट्र हित कार्यों में जुट जाएं और भारत को पुन: स्वतन्त्र कर भारतीय जन समूह को स्वाबलंबी और समृद्ध बनाने में एक दूसरे का साथ दें|

    आज की युवा पीढ़ी को व्यक्तिगत आस्तित्व और देश को संपन्न बनाए रखने के लिए कौन अच्छा कौन बुरा के प्रति सतर्क रहना होगा| आज ऑनलाइन मीडिया पर बेतुके प्रश्नों से टिप्पणीकारों को अनन्त वाद विवाद में फंसा कांग्रेस व उनके समर्थक भारतीय युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं| उन्हें भारत पुनर्निर्माण के सभी कार्यक्रमों व चेष्टाओं पर अपना ध्यान केंद्रित कर निरर्थक वाद विवाद से बचना होगा| इन्टरनेट पर टिप्पणियां पढ़ते मैं ऐसा अनुभव करता हूं कि आज के अभागे भारत में प्राय: दो पक्ष हैं| एक जो भ्रष्टाचार और अनैतिकता की स्थिति को ज्यों का त्यों बनाए रखना चाहता है| दूसरा पक्ष है जो देश और देश की प्रजा के हित परिवर्तन लाना चाहता है| यदि आज अन्ना हजारे और किरण बेदी जैसे राष्ट्रवादी लोगों को रोका जा रहा है तो यह समझना आसान हो जाता है कि देशद्रोही कौन हैं| इन्टरनेट के माध्यम से एक ही समय में एक ही साथ इस सोच पर प्रश्न और उत्तर प्रस्तुत किये जा सकते हैं| सोचिये, अपने विचारों को समझिये और जानिये कि क्या आप राष्ट्रवादी हैं या राष्ट्रद्रोही?

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  5. Dharmveer Vashistha

    Respecteds Anna Hazareji, Kiran Bediji, Swami Ramdevji & all supporters of India
    with Amitabh Bachchanji, Prakash jhaji & EFs,

    Vande Mataram.

    —– आ रक्षक
    करने आ रक्षण
    —– आ रण में

    Freedom in our Mind,
    Faith in our Words,
    Pride in our Souls,
    So We must salute our Nation.

    Be Proud We are Indian.

    We all always gives high regards to Indian Democracy for Transparency but steel oneself,
    for ……. being Brave Indians
    Few words for Indian ………

    ……………….. कौन बनेगा करोड़पति ?
    ……. Beware from Corruption

    ……. होगा एक पुनरुत्थान ……..
    …….The Renaissance will be ……

    BE INDIAN MAKE INDIAN
    भारतीय बनो भारतीय बनाओ

    & ….THE REVOLUTION BEGAINS …….
    अपने लिए जीये तो क्या जीये , जी सके तो जी जमाने के लिए

    जन लोकपाल

    हमारे देश में हमने नेता , अधिकारी , डॉक्टर , वकील , इंजिनियर , अभिनेता , खिलाड़ी , शिक्षक बनते देखा पर असली आवश्यकता भारतीय बनाने की है .
    खुद के लिए जीने वाले मरते है, दूसरों के लिए मरने वाले जीते है .

    —– अन्ना हजारे ,

    I’m presenting my artical for The Nation.

    —————– वेदों में राष्ट्रीयता एवं वैश्विक द्रष्टि ——————-
    – डॉ. धर्मवीर वशिष्ठ

    प्राचीन भारतीय संस्कृति की अविरल शाश्वत धारा भारत के सांस्कृतिक इतिहास को सदैव गोरवान्वित करती रही है . वैदिक काल से भारत में सांस्कृतिक परंपरा का जो दिव्य स्वरुप वैदिक सनातन धर्मं से प्रस्फुटित हुआ उसी की प्रेरणा से विविध सम्प्रदायों का प्रादुर्भाव इतिहास में स्पष्ट दिखलाई देता है .
    प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के भारतीय इतिहास का शाश्वत सत्य यही हे की इसके सांस्कृतिक वैभव ने सम्पूर्ण विश्व को आत्मसात किया है . वेद एवं उपनिषद् सम्पूर्ण विश्व की विरासत है, जो ब्रह्म एवं प्रकृति की व्याख्या करते है . २१वीं सदी में पाश्चात्य जगत वैश्वीकरण की कल्पना कर रहा रहा हैं, जबकि वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति के प्रणेताओं ने सम्पूर्ण विश्व के कल्याण हेतु यज्ञ द्वारा आहुतियाँ देते हुए प्रत्येक प्राणी जगत एवं सृष्टी के कल्याण की कल्पना व साधना की है .
    माता भूमिः पुत्रोः अहं पृथिव्याः I पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु I ( अथर्ववेद १२/१ )
    भूमिः ! तुम हमारी माता हो हम उस (पृथिव्याः पुत्रः ) पृथ्वी के पुत्र है . (पर्जन्यः पिता) जल की वृष्टि से पोषण करने वाले आकाश व मेघ हमारे परम पिता अर्थात सम्पूर्ण सृष्टी का पालन करने वाले है (स उ नः) वह हमें निश्चय (पिपर्तु ) पालन करे .
    सम्पूर्ण पृथ्वी को माता एवं पर्जन्य को परम पिता के रूप में स्तुति करते हुए वैदिक संस्कृति हजारों वर्षों से ज्ञान का संचरण कराती रही है . वैदिक ऋचाओं एवं सूक्तों में विश्व बंधुत्व की कामना करते हुए राष्ट्र का धारण पोषण करने हेतु परमेश्वर से प्रार्थना की है . वेदों में अनेक सूक्तों में मातृभूमि की स्तुति, राष्ट्रदेवी की स्तुति व मातृभूमि के वैदिक राष्ट्रगीत द्वारा राष्ट्रीयता मानवीयता एवं वैश्विक दृष्टी की प्रेरणा देते है .
    सम्पूर्ण राष्ट्र के कल्याण हेतु मातृभूमि माँ भारती , मातृभाषा माँ इडा और मातृसभ्यता माँ सरस्वती को मानते हुए यज्ञ के द्वारा कल्याण हेतु बल चेतना एवं उत्तम कर्म से आसन पर बैठने का आव्हान किया है . ( अथर्ववेद ५/१२ )
    भारती नः यज्ञं तुयं आ एतु I
    सबका भरण करने वाली मातृभूमि हमारे यज्ञ में बल के साथ आवे .
    इडा मनुष्वत यज्ञं चेतन्ती इह I
    मातृभाषा मनुष्यों से युक्त यज्ञ को चेतना देती हुई यहाँ आवे .
    सरस्वती सु अपसः आ सदन्ताम
    मातृसभ्यता उत्तम कर्म करनेवालों के पास बैठे और
    तिस्त्रः देविः इदम स्योनं बर्हिः I
    तीनों देवियाँ यहाँ उत्तम आसन पर आकर विराजें .
    राष्ट्रदेवी के स्वरुप को प्रकाशक शक्ति के रूप में वस्तुओं को प्राप्त कराने वाली ज्ञान देने वाली ” यज्ञियानां प्रथमां ” अर्थात सब पूजनियों में प्रथम पूजनीय बतलाया है.
    मातृभूमि का वैदिक राष्ट्रगीत राष्ट्र पुष्टि की दृष्टी से महत्वपूर्ण है जिसमे राष्ट्रीयता के गुण स्पष्ट किये गए है –
    सत्यं बृहदृतमुग्रम दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति I
    सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुम लोकं पृथिवी नः कृणोतु I I ( अथर्ववेद १२/१ )
    सत्यव्रत ,यथार्थ ज्ञान , क्षात्र तेज , तप अर्थात धर्मानुष्ठान ज्ञान , दीक्षा अर्थात दक्षता , ब्रह्म एवं यज्ञ अर्थात त्याग व समर्पण ये गुण पृथ्वी या राष्ट्र का भरण पोषण करते है . ( सा पृथिवी ) वह मातृभूमि भूत , भविष्य तथा वर्तमान तीनों कालों के सम्पूर्ण पदार्थों का उत्तम प्रकार से पोषण करने में समर्थ है, ऐसी वह मातृभूमि हमको विस्तृत स्थान प्रदान करे .

    INDIANS’ BELIEF CAN CHANGE OUR WORLD.
    —— Save our Tigers ——-
    —— Save our Tigers ——-
    INDIAN TIGERS’ FORCE

    Jai Hind.

    truly yours
    Dharmveer, Basant Vaishnav, R.Usmani, B.S.Rathor, Manish Jain, VinodSingh Bhati, S.L.Purbia,Arun, Vishnu,SuryaPrakash, Pushkar Soni & many Indians

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    • sanjay

      इतना पढ़ के मीणा जी को कुछ अक्ल आई हो तो …शायद

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  6. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    सन 1800 के आसपास के उदाहरणों से पता चलता है कि महात्मा गाँधी से बहुत पहले भी भारत में सत्याग्रह, असहयोग व किसान आन्दोलन, त्रागा का प्रचलन था. अंग्रेजों द्वारा लिखे संस्मरणों के अनुसार सत्याग्रह का प्रमाण नमक कर के विरुद्ध सूरत में हुए 1840 के आन्दोलन का मिलता है. इसी प्रकार वाराणसी और आसपास के क्षेत्र में एक आन्दोलन ‘आवास कर” के विरुद्ध हुआ था. सरकारी दस्तावेजों के अनुसार नगर का काम कई दिन तक ठप्प रहा था. आन्दोलन इतना व्यापक था कि लोग अपने मृतकों को मुखाग्नि देकर गंगा में प्रवाहित कर देते थे, संस्कार के लिए लकड़ी तक नगर में नहीं आती थी. 20 ,000 लोग निरंतर धरने पर बैठे रहे. नगर और सिकरोल नामक स्थान के बीच अनुमानित दो लाख लोग एकत्रित हो गए थे. एक विवरण के अनुसार तमिलनाडु के लोगों को एक बार लगा कि भूमि सम्बन्धी फैसलों में उनके साथ अन्याय हुआ है. तो वे लोग मंदिर के स्तूप पर चढ़ गए और वहाँ से कूद कर आत्महत्या की धमकी देने लगे. तब उन्हें न्याय मिलने का आश्वासन देकर नीचे उतारा गया. # इस प्रकार के अनेक विवरणों से पता चलता है कि सरकारी निर्णयों के विरुद्ध विरोध प्रकट करने के लिए कई तरीकों से सत्याग्रह करने और विरोध्ज प्रकट करने को लोग अपना अधिकार समझते थे. # उस काल के अनेक विद्वानों का कहना है कि प्रशासन (राजा) और जनता के बीच गरिमापूर्ण संवाद की एक लम्बी परंपरा थी. ग्राम प्रमुख से साधारण किसान के आने पर उसे राज्याधिकारी के कार्यालय में कोई वस्त्र या शाल आदि देकर सम्मानित करने की परम्परा मिलती है. अंग्रेजों के लिए ये सब विस्मयकारी था. अंग्रेजी शासन में प्रारम्भ के कुछ वर्षों तक सदियों से प्रचलित ये भारी परम्पराए जीवित रहीं. उन्ही का वर्णन अँगरेज़ अदिकारियों के दस्तावेजों में मिलता है. भारत में प्रशासन और समाज के बीच एक विश्वास व संवेदनशील संवाद के सम्बन्ध होने के असंख्य उदाहरण मिलते हैं. # यूरोप की तरह असहमति होने पर मृत्युदंड देने जैसी परम्परा तो भारत में नज़र नहीं आती. कई मुस्लिम शासकों का शासन भी यूरोप के बर्बर शासन से काफी अछा नज़र आता है. सन 1818 तक ब्रिटेन में लगभग दो सौ अपराधों के लिए मृत्यु दंड दिया जाता था. इन अपराधों में पांच शिलिंग से अदिक की चोरी के लिए भी सीधे मृत्युदंड देने का कानून था. इसी तरह सन 1830 तक सैनिकों को 400 – 500 तक कोड़े लगाने की अँगरेज़ परम्परा थी. भारत में भी उसी बर्बर मानसिकता के कारण अँगरेज़ और उनकी पत्नियां अपने घरेलू नौकर, नौकरानियों को बेंतों से पीटते थे. कई बार इस क्रूर पिटाई से उनकी मृत्यु भी हो जाती थी. भारतीयों के लिए ये सब नया और बड़ा आतंकारी था. ऐसे कठोर दंड भारत में नहीं दिए जाते थे. भारत और यूरोप की परिस्थितियों में आकाश पाताल का अंतर ऐतिहासिक प्रमाणों से मिलता है. # ये तो नहीं कहा जा सकता कि भारत में बुरा या गलत कुछ नहीं था. पर इतना तो साफ़ नज़र आता है कि भारत अधिकाँश मामलों में यूरोप से अधिक सुसंस्कृत, समृद्ध, विकसित था. सामाजिक – प्रशासनिक परम्पराएं अधिक मानवीय थीं. समाज और शासन में दूरियां, कठोर दंड, असहमति प्रकट करने देने के अवसर निरंतर घटाते जाना आदि अंग्रेजों के आने के बाद होते नज़र आते हैं. अतः डा. मीना जी की बात कुछ अतिश्योक्ति पूर्ण लगती है तथा प्रमाणों से पुष्ट नज़र नहीं आती है. केवल अवाधार्नाओं पर आधारित लगते है जो कि भारत के शत्रु अंग्रेजों द्वारा लिखे झूठे इतिहास से बनी हो सकती है. # यहाँ हमें याद रखना होगा कि अंग्रेजों द्वारा लिखा व प्रचलित (झूठा) इतिहास अलग है और उनके दस्तावेजों व सर्वेक्षणों में उपलब्ध इतिहास उससे एकदम विपरीत है. # अन्ना जी के साथ आज भारत सरकार जो व्यवहार कर रही है वह पूरी तरह उसी यूरोपीय औपनिवेशिकता से प्रभावित नज़र आती है. सत्याग्रह और अनशन जैसे जिन अधिकारों को अंग्रेजों जैसे क्रूर और असभ्य शासकों ने भी नहीं छीना ; आज के ये भारत – भारतीयता के शत्रु शासक कुटिल चालें चल कर उस अधिकार को भी छीन रहे हैं. कुछ मामलों में ये अंग्रेजों से भी बुरे साबित हो रहे है. वे तो विदेशी थे, उन्हें तो अपने हित में भारत को बर्बाद करना व लूटना था. पर ये वर्तमान शासक भारत के होने पर भी आधुनिक रॉबर्ट क्लाईव सिद्ध हो रहे है. इन नेताओं व इनके सहयोगियों द्वारा अस्सीमित लूट और भारत के धन को विदेशों में जमा करने के कारन देश भुखमरी का शिकार हो रहा है. इनके स्वयं सबसे बड़े लुटेरे होने के कारन ही तो ये अन्ना के सबसे बड़े विरोधी यानी भारत के निर्धनों के सबसे बड़े अपराधी है. अतः चतुर्वेदी जी का कथन किसी प्रकार से गलत नहीं लगता.

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    • sanjay

      मीणा जी को अंग्रेजो द्वारा लिखित इतिहास पसंद है इसीलिए उसी पर यकीं करके हिन्दू विरोध करते है..
      इस्वर उन्हें सदबुध्धि दे…

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  7. -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    “आप लोंगों पर गोलियां चलाते हुए (पूणे), लाठियां भांजते हुए (रामदेव की सभा) और लोगों को जेलों में ठूंसते हुए (अन्ना प्रसंग) कितने भी लोकतंत्रवादी और आम आदमी के समर्थक होने का दम भरें, भरोसा तो टूटता ही है। अफसोस यह है कि आम आदमी की बात करने वाले विपक्षी दलों के नेताओं की भूमिका भी इस मामले में पूरी तरह संदिग्ध है।”

    आपके लेख की उक्त पंक्ति से असहमत होने का कोई कारण नहीं है, लेकिन “समस्या का कारण” आपके “लेख की प्रथम पंक्ति” में ही समाहित है, बशर्ते की इसे “ईमानदारी से लिखा जावे!” आप लिखते हैं कि-

    “असहमति को स्वीकारने की विधि हमारे सत्ताधारियों को छः दशकों के हमारे लोकतंत्र ने सिखाई कहां है?”

    श्री संजय जी हमारा तो पूरा इतिहास ही इस प्रकार के उदाहरणों से भरा पड़ा है जो असहमति को अपराध मानता है, नरक का रास्ता मनाता है! जिस देश में असहमति पर मौत की सजाएं देने के काले अध्याय लिखे हुए हैं, उस देश में असहमति के लिए जगह हो ये कैसे संभव है? यहाँ तो असहमति प्रकट करने वालों को देश-द्रोही तक का फ़तवा जारी करने का चलन रहा है, जो आज तक जारी है!

    क्या हम आपकी उक्त पंक्ति को निम्न प्रकार नहीं पढ़ सकते?

    “असहमति को स्वीकारने की विधि हमारे पूर्वजों ने हजारों साल के हमारे धर्म के इतिहास में सिखाई कहां है?”

    सच्चाई वाकई कड़वी होती है, जिसे कांग्रेस या भाजपा या संघ या हिंदुत्व के ठेकेदार सुनना ही नहीं चाहते! इस सबका परिणाम है : अन्ना हजारे, एक नहीं हजारों, लाखों अन्ना हजारे! आज नहीं तो कल इस देश की सरकार के और धर्म के ठेकेदारों को ये बात समझ में जरूर आयेगी, लेकिन तब तक ये इस देश का और हिन्दुओं का सर्वनाश कर चुके होंगे!

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    • sanjay

      मीणा जी क्या आपको पता है , हमारे प्राचीन ऋषि अगस्त्य ने विद्युत् उत्पादन के लिए श्लोक लिखे है ,
      कणाद ने कण सिध्हंत, भरद्वाज ने विमान शास्त्र ,
      और न जाने कितनी ही उपलब्धिया की है, कुछ धूर्तो की की करतूतों के लिए आप हमेशा सनातन धर्मं की बुराई करते रहते है, क्या आपको मालूम है विज्ञानं का मूल गणित इन्ही सनातन धर्मी लोगो की दें है…क्या इन्होने ही अत्याचार किया है, जो धर्मं सर्व धर्म सद्भाव की प्रेरणा देता है , वसुधैव कुटुम्बकम कहता है, जहा नारी प्राचीन काल से देवी है, जहा भूमि ,नदी, गाय ,पहाड़ आदि माता कहे जाते है, ऐसा कोई और है तो बताएं , मै आपके लेखो को जब भी पढता हूँ तो हिन्दू विरोध की बू आती है आप क्यों इतना नफरत क्यों है ,. जब आप सही मायने मै इसे समझेंगे और विदेशी नीतियों को समझेंगे तो समझ मै आएगा. मुझे आप देश भक्त नहीं लगते , क्योकि जो देश की मूल संस्कृति से नफरत करता है वह देश भक्त हो ही नहीं सकता…

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