वह जरूर गिरता है! जो आगे चलता और पीछे देखता है!!


                केवल कृष्ण पनगोत्रा

बात से बात चलती है। बात न चले तो चिंतन-मंथन की गति रुक जाती है। चिंतन-मंथन और वैचारिक आदान-प्रदान की गति रुकने से समाज का हर प्रकार से विकास बाधित होता है। बौद्धिकता का ह्रास होता है।
10 मई, 2020 को मदर्स डे था। कई लोगों ने इस दिन के उपलक्ष्य में सोशल मीडिया साइट फेसबुक पर अपने मनोभाव और उद्गार प्रकट किये। यह स्वाभाविक ही था कि पुरुषों ने अपनी माँ के प्रति निष्ठा और प्रेम को उजागर किया। कइयों ने मां के संघर्ष का स्मरण किया। वहीं महिलाओं ने भी उनकी माताओं के प्रति प्रेम को छाया चित्रों और शब्दों के माध्यम से भावना और वाणी दी। महिलाओं के संदर्भ में यह भी स्पष्ट रहा कि किसी अपवाद मात्र को छोड़कर ज्यादातर महिलाओं ने अपनी जननी माँ के अलावा सास के प्रति प्रेम को फोटो सहित उजागर किया हो।
महिलाओं की इस मनोवृत्ति को मेरे एक सहपाठी मनजीत सिंह जम्बाल ने महसूस किया और अपनी फेसबुक वाल पर पोस्ट किया। जम्बाल साहिब ने सवाल उठाया कि मदर्स डे पर कितनी महिलाओं ने अपनी सास के साथ फोटो शेयर किया। सवाल एक ऐसे गंभीर परिवारिक माहौल की ओर इशारा कर रहा था जिस पर शायद ही मंथन हुआ है। संवभत: जम्बाल जी का मंतव्य यह भी रहा होगा कि विवाहित महिलाओं को मायके की अपेक्षा ससुराल को प्राथमिकता देनी चाहिए।

* सास कांट्रोवर्शिल है क्या ?:
संसार में माँ की महत्ता का जितना गुणगान किया जाए उतना ही थोड़ा है। फिर चाहे माँ पुरुष पति की हो या महिला पत्नी की लेकिन सास विवादास्पद यानि कांट्रोवर्शिल विषय है। किसी पति पुरुष की सास (पत्नी की माँ) इतनी controversial नहीं है जितनी कि महिला पत्नी की (पति की माँ) है। तकरार के जितने किस्से सास और बहु के देखे-सुने जाते हैं, उतने शायद ही सास और दामाद के होते हैं। यह बात दीगर है कि सास अगर नौकरीपेशा है तो बहु को सिक्कों की खनक तो सुहानी ही लगेगी। ऐसे में कई बार ससुर महाराज भी बलि का बकरा बन जाते हैं। खैर, मित्र मनजीत सिंह के मुद्दे की फेसबुक पर सबने सराहना की और प्रसन्नता की बात यह रही कि कुछ बहनों ने भी उनकी बात का समर्थन किया।सिर्फ मेरे एक मित्र मोहिन्दर कुमार जी ने यह लिख कर मनजीत जी का मित्रवत विरोध किया कि कितने पति पुरुषों ने अपनी सास यानि पत्नी की माँ के साथ मदर्स डे पर फोटो पोस्ट किए।

*कर्त्तव्य और निष्ठा में टकराव:
कोई दो राय नहीं कि जैसी पति की माँ, वैसी ही पत्नी की माँ। मगर यहां पर कर्त्तव्य और निष्ठा का टकराव है। चूंकि सनातन विवाह व्यवस्था और पद्धति में महिला को एक परिवार के साथ इसलिए जोड़ा जाता है ताकि एक सामाजिक-परिवारिक व्यवस्था बनी रहे। महिला को पुरुष के परिवार के साथ जोड़ा जाता है, न कि पुरुष को महिला के परिवार से जोड़ा जाता है। यहां सवाल पति-पत्नी यानि लड़के-लड़की की प्राथमिकता आधारित निष्ठा का है। पति की निष्ठा सर्वप्रथम उस परिवार से जुड़ी है जहां वह पैदा हुआ है। जहां का वह कानूनी वारिस है। पत्नी भी शादी के बाद उसी परिवार के वारिसों में शामिल हो जाती है जहाँ की वह बहु कहलाती है। क्या कोई पत्नी(लड़की) चाहेगी कि मायके में उसके भाई और भाभी उसके माँ-बाप को छोड़कर अपने सास-ससुर को प्राथमिकता पर रखे? लड़की के लिए प्राथमिकता सास-ससुर होने चाहिए और लड़के के लिए अपने माता-पिता। अगर लड़की सास-ससुर को छोड़कर अपनी माँ-बाप को प्राथमिकता देती है तो यह अतिशयोक्ति होगी। एक कहावत भी है कि जो मनुष्य आगे चलता है और पीछे देखता है, वह जरूर गिरता है। यही कहावत महिलाओं पर सटीक उतरती है। जो महिलाएं ससुराल में रहते हुए, मायके की अनावश्यक चिंता करती है, वे अपने घर यानि ससुराल में सफल ही नहीं हो सकतीं। घर जमाई एक अलग विषय है। अगर कोई महिला मायका स्थित अपने माता-पिता को ससुराल स्थित सास-ससुर से ज्यादा लगाव रखती है तो मायके में उसी के भाइयों और भाभियों की निष्ठा और कर्त्तव्य पर ऊंगली उठती है। घर जमाई के अपवाद को छोड़कर लड़की पति के परिवार में एक स्थापित हिस्से की वारिस होती है, जबकि लड़का अपने ससुराल का वारिस नहीं होता। कानूनी रूप से वर्तमान में कोई भी महिला माँ-बाप की संपत्ति में भागीदारी रखती है मगर कितनी महिलाएं मायके के हिस्से को अपने बेटे-बेटियों को बांटती हैं? यह पिता और दादा ही हैं जिनकी संपत्ति पुत्र-पौत्र बांटते हैं। यह मामा या नाना नहीं हैं जिनकी संपति भांजे और दौहित्र-दौहित्रियां बांटते हैं। चर्चा का उद्देश्य यह नहीं कि महिला मायका से प्रेम न करे मगर इतना भी नहीं कि एक तो भाई-भाभी की निष्ठा पर सवाल उठें और दूसरे अपने ससुराल में परिवार विद्रोह की भागी बने।

*शादी एक सनातन संस्था है:
समाज जब अर्थ प्रधान होता है तो इसका प्रभाव परिवार और संबंधों पर भी पड़ता है। पूंजीवादी अवधारण की पकड़ जैसे-जैसे मजबूत होती जा रही है, विवाह के परंपरागत स्वरूपों में कई कारणों से बड़े परिवर्तन आ रहे हैं। विवाह को धार्मिक बंधन के स्थान पर कानूनी बंधन तथा पति-पत्नी का निजी मामला मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और माता-पिता, भाई-बहन अादि रिश्तों की गरिमा घटती जा रही है।
विद्वतजनों का मानना है कि औद्योगिक क्रांति और शिक्षा के प्रसार से स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी बन रही हैं। पहले उनके सुखमय जीवनयापन का एकमात्र साधन विवाह था, अब ऐसी स्थिति नहीं रही। विवाह और तलाक के नवीन कानून दांपत्य अधिकारों में नरनारी के अधिकारों को समान बना रहे हैं। धर्म के प्रति आस्था में शिथिलता और गर्भनिरोध के साधनों के आविष्कार ने विवाह विषयक पुरानी मान्यताओं को, प्राग्वैवाहिक सतीत्व और पवित्रता को गहरा धक्का पहुंचाया है। किंतु ये सब परिवर्तन होते हुए भी भविष्य में विवाहप्रथा के बने रहने का प्रबल कारण यह है कि इससे कुछ ऐसे प्रयोजन पूरे होते हैं, जो किसी अन्य साधन या संस्था से नहीं हो सकते। पहला प्रयोजन वंशवृद्धि का है। यद्यपि विज्ञान ने कृत्रिम गर्भाधान का आविष्कार किया है किंतु कृत्रिम रूप से शिशुओं का प्रयोगशालाओं में उत्पादन और विकास संभव प्रतीत नहीं होता। दूसरा प्रयोजन संतान का पालन है, राज्य और समाज शिशुशालाओं और बालोद्यानों का कितना ही विकास कर ले, उनमें इनके सर्वांगीण समुचित विकास की वैसी व्यवस्था संभव नहीं, जैसी विवाह एवं परिवार की संस्था में होती है। तीसरा प्रयोजन सच्चे दांपत्य प्रेम और सुखप्राप्ति का है। यह भी विवाह के अतिरिक्त किसी अन्य साधन से संभव नहीं। इन प्रयोजनों की पूर्ति के लिए भविष्य में विवाह एक महत्वपूर्ण संस्था बनी रहेगी, भले ही उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन होते रहें।

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