इंसान की असलियत

लगा रहे हैं छप्पन भोग भगवान को।
खिला न रहा है कोई भूखे इंसान को ।।

रेशमी वस्त्र पहनाए जाते है पाषाण को।
कौन पहनाता है वस्त्र नंगे इंसान को।।

बिलख रहे हैं भूखे बच्चे दूध की एक बूंद को।
दूध पिलाया जाता है पत्थर के पाषाण को।।

आज बोलबाला है,एक झूठे इंसान का।
कोई न पूछता है अब सच्चे इंसान को।।

आज खून पी रहा है इंसान,इंसान का।
ये कैसा नियम बना है अब इंसान का।।

फल भोगता है इंसान अपने कर्मो का।
फिर भी दोष देता है वह भगवान को।।

नेता कुछ भी कह दे एक अच्छे इंसान को।
पर अच्छा इंसान नहीं खोलता अपनी जबान को।।

जरूरत नही है अब आग की इंसान को।
जला रहा है खुद इंसान दूसरे इंसान को।।

इंसानियत अब कहा रह गई अब इंसान में।
देखकर जल रहा है अब इंसान इंसान को।।

इंसान याद करता है बुरे वक़्त में भगवान को।
पर अच्छे वक़्त में याद नहीं करता वह
भगवान को।।

कैसा कोरोना वायरस आया है संसार में।
बन्द किया गया है घर में अब इंसान को।

आर के रस्तोगी

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