लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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flowers

पल्लव भी बिखर गये,

सुन्दर सुमन झुलस गये,

पंखुड़ियाँ बिखर गईं,

धूल मे समा गईं।

 

बाग़ मे बहार थी,

बसंत-ऋुतु रंग थे,

धूल भरी आँधियों मे,

रंग सब सिमट गये।

 

मौसम अब बदल गये,

धूप तेज़ हो चली,

ठंड़ी बयार अब कुछ,

गर्म सी है हो चली।

 

होली का त्योहार भी ,

अब आस पास है,

बंसत फिर हेंमत ,

ग्रीष्म आगाज़ है।

 

हेमंत-ऋतु का अब,

एक और भी नाम है,

मौसम परीक्षाओं का है,

परीक्षा-ऋतु नाम है।

 

2 Responses to “हेमंत-ऋतु”

  1. विजय निकोर

    बहुत ही अच्छी अभ्व्यक्ति है।
    विजय निकोर

    Reply

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