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    हिंद स्वराज : इटली और हिन्दुस्तान

    नवभवन द्वारा प्रकाशित महात्‍मा गांधी की महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक ‘हिंद स्‍वराज’ का ग्‍यारहवां पाठ

    hind swarajjपाठक: इटली ने किया वैसे। मैजिनी और गैरीबाल्डी ने जो किया, वह तो हम भी कर सकते हैं। वे महावीर थे, इस बात से क्या आप इनकार कर सकेंगे?

    संपादक: आपने इटली का उदाहरण ठीक दिया। मैजिनी महात्मा था। गैरीबाल्डी बड़ा योद्धा था। दोनों पूजनीय थे। उनसे हम बहुत सीख सकते हैं। फिर भी इटली की दशा और हिन्दुस्तान की दशा में फरक है। पहले तो मैजिनी और गैरीबाल्डी के बीच का भेद जानने लायक हैं।

    मैजिनी के अरमान अलग थे। मैजिनी जैसा सोचता था वैसा इटली में नहीं हुआ। मैजिनी ने मनुष्य जाति के कर्तव्य के बारे में लिखते हुए यह बताया है कि हर एक को स्वराज्य भोगना सीख लेना चाहिये। यह बात उसके लिए सपने जैसी रही। गैरीबाल्डी और मैजिनी के बीच मतभेद हो गया था। यह हमें याद रखना चाहिये। इसके सिवा गैरीबाल्डी ने हर इटालियन के हाथ में हथियार दिये और हर इटालियन ने हथियार लिये।

    इटली और आस्ट्रिया के बीच सभ्यता का भेद नहीं था। वे तो चचेरे भाई माने जायेंगे। जैसे को तैसा वाली बात इटली की थी। इटली को परदेशी आस्ट्रिया के जूए से छुड़ाने का मोह गैरीबाल्डी को था। इसके लिए उसने काबूर के मारफत जो साजिशें कीं, वे उसकी शूरता को बट्टा लगानेवाली हैं।

    और अन्त में नतीजा क्या निकला? इटली में इटालियन राज करते हैं इसलिए इटली की प्रजा सुखी है, ऐसा आप मानते हों तो मैं आप से कहूंगा कि आप अंधेरे में भटकते हैं। मैजिनी ने साफ बताया है कि इटली आजाद नहीं हुआ है। विक्टर इमेन्युअल ने इटली का एक अर्थ किया, मैजिनी दूसरा। इमेन्युअल, काबूर और गैरीबाल्डी के विचार से इटली का अर्थ था इमेन्युअल या इटली का राजा और उसके हूजूरी। मैजिनी के विचार से इटली का अर्थ था इटली के लोग-उसके किसान। इमेन्युअल वगैरा तो उनके (प्रजा के) नौकर थे।

    मैजिनी का इटली अब भी गुलाम है। दो राजाओं के बीच शतरंज की बाजी लगी थी, इटली की प्रजा तो सिर्फ प्यादा थी और है। इटली के मजदूर अब भी दुखी हैं। इटली के मजदूरों की दाद-फरियाद नहीं सुनी जाती, इसलिए वे लोग खून करते हैं, विरोध करते हैं, फिर फोड़ते हैं और वहां बलवा होने का डर आज भी बना हुआ है। आस्ट्रिया के जाने से इटली को क्या लाभ हुआ? नाम का ही लाभ हुआ। जिन सुधारों के लिए जंग मचा वे सुधार हुए नहीं, प्रजा की हालत सुधरी नहीं।

    हिन्दुस्तान की ऐसी दशा करने का तो आपका इरादा नहीं ही होगा। मैं मानता हूं कि आपका विचार हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों को सुखी करने का होगा, यह नहीं कि आप या मैं राजसता ले लूं। अगर ऐसा है तो हमें एक ही विचार करना चाहिये। वह यह कि प्रजा स्वतन्त्र कैसे हो?

    आप कबूल करेंगे कि कुछ देशी रियासतों में प्रजा कुचली जाती है। वहां के शासक नीचता से लोगों को कुचलते हैं। उनका जुल्म अंग्रेजों के जुल्म से भी ज्यादा है। ऐसा जुल्म अगर आप हिन्दुस्तान में चाहते हों, तो हमारी पटरी कभी नहीं बैठेगी। मेरा स्वदेशाभिमान मुझे यह नहीं सिखाता कि देशी राजाओं के मातहत जिस तरह प्रजा कुचली जाती है उसी तरह कुचलने दिया जाय। मुझमें बल होगा तो मैं देशी राजाओं के जुल्म के खिलाफ और अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ जूझूंगा।

    स्वदेशाभिमान का अर्थ मैं देश का हित समझता हूं। अगर देश का हित अंग्रेजों के हाथों होता हो, तो मैं आज अंग्रेजों को झुककर नमस्कार करूंगा। अगर कोई अंग्रेज कहे कि देश को आजाद करना चाहिये, जुल्म के खिलाफ खड़े होना चाहिये और लोगों की सेवा करनी चाहिये, उस अंग्रेज को मैं हिन्दुस्तानी मानकर उसका स्वागत करूंगा।

    फिर, इटली की तरह जब हिन्दुस्तान को हथियार मिलें, तभी वह लड़ सकता है पर इस भगीरथ (बहुत बड़े) काम का तो मालूम होता है आपने विचार ही नहीं किया है। अंग्रेज गोला बारूद से पूरी तरह लैस हैं इससे मुझे डर नहीं लगता। लेकिन ऐसा तो दीखता है कि उनके हथियारों से उन्हीं के खिलाफ लड़ना हो, तो हिन्दुस्तान को हथियारबन्द करना होगा। अगर ऐसा हो सकता हो, तो इसमें कितने साल लगेंगे? और तमाम हिन्दुस्तानियों को हथियारबन्द करना तो हिन्दुस्तान को यूरोप-सा बनाने जैसा होगा।

    अगर ऐसा हुआ तो आज यूरोप के जो बेहाल हैं वैसे ही हिन्दुस्तान के भी होंगे। थोड़े में, हिन्दुस्तान को यूरोप की सभ्यता अपनानी होगी। ऐसा ही होनेवाला हो तो अच्छी बात यह होगी कि जो अंग्रेज उस सभ्यता में कुशल हैं, उन्हीं को हम यहां रहने दें। उनसे थोड़ा बहुत झगड़ कर कुछ हक हम पायेंगे कुछ नहीं पायेंगे और अपने दिन गुजारेंगे।

    लेकिन बात तो यह है कि हिन्दुस्तान की प्रजा कभी हथियार नहीं उठयेगी। न उठाये यह ठीक ही है।

    पाठक: आप तो बहुत आगे बढ़ गये। सबके हथियारबंद होने की जरूरत नहीं। हम पहले तो कुछ अंग्रेजों का खून करके आतंक फैलायेंगे। फिर जो थोड़े लोग हथियारंबद होगें, वे खुल्लमखुल्ला लड़ेंगे। उसमें पहले तो बीस पचीस लाख हिन्दुस्तानी जरूर मरेंगे। लेकिन आखिर हम देश को अंग्रेजों से जीत लेंगे। हम गुरीला (डाकुओं जैसी) लड़ाई लड़कर अंग्रेजों को हरा देंगे।

    संपादक: आपका खयाल हिन्दुस्तान की पवित्र भूमि को राक्षसी बनाने का लगता है। अंग्रेजों का खून करके हिन्दुस्तान को छुड़ायेंगे, ऐसा विचार करते हुए आपको त्रास क्यों नहीं होता? खून तो हमें अपना करना चाहिये क्योंकि हम नामर्द बन गये हैं, इसीलिए हम खून का विचार करते हैं। ऐसा करके आप किसे आजाद करेंगे? हिन्दुस्तान की प्रजा ऐसा कभी नहीं चाहती। हम जैसे लोग ही जिन्होंने अधम सभ्यतारूपी भांग पी है, नशे में ऐसा विचार करते हैं। खून करके जो लोग राज करेंगे, वे प्रजा को सुखी नहीं बना सकेंगे।

    धींगरा ने जो खून किया है उससे या जो खून हिन्दुस्तान में हुए हैं उनसे देश को फायदा हुआ है, ऐसा अगर कोई मानता हो तो वह बड़ी भूल करता है। धींगरा को मैं देशाभिमानी मानता हूं, लेकिन उसका देश प्रेम पागलपन से भरा था। उसने अपने शरीर का बलिदान गलत तरीके से दिया। उससे अंत में तो देश को नुकसान ही होनेवाला है।

    पाठक: लेकिन आपको इतना तो कबूल करना होगा कि अंग्रेज इस खून से डर गये हैं, और लार्ड मॉले, ने जो कुछ हमें दिया है वह ऐसे डर से ही दिया है।

    संपादक: अंग्रेज जैसे डरपोक प्रजा है वैसे बहादुर भी है। गोला-बारूद का असर उन पर तुरन्त होता है, ऐसा मैं मानता हूं। संभव है, लार्ड मॉलें ने हमें जो कुछ दिया वह डर से दिया हो लेकिन डर से मिली हुई चीज जब तक डर बना रहता है तभी तक टिक सकती है।

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