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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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शिक्षा के उद्देश्य पर चलने वाली बहस पुरानी है। भारत की आधुनिक शिक्षा पध्दति अंग्रेजी राज की देन है। अंग्रेजी राज की शिक्षा का उद्देश्य भारत की सभ्यता को अंग्रेजी सभ्यता में ढालना था । भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के प्रति आत्महीन भाव पैदा करना था। अंग्रेजी राज को जायज ठहराने वाले विद्वान पुरूष पैदा करना था। लार्ड मैकाले ने इसी बड़े लक्ष्य को लेकर भारतीय शिक्षा प्रणाली का ताना-बाना बुना था। अंग्रेजी सत्ताधीशों की भाषा थी, अफसरों और न्यायालयों की भाषा थी। सो अंग्रेजी सम्मान और हनक-ठसक की भाषा भी थी। गांधी जी ने ‘हिन्द स्वराज’ (पृष्ठ 91) में लिखा, यह क्या कम जुल्म की बात है कि अपने देश में अगर मुझे इन्साफ पाना हो, तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना चाहिए। बैरिस्टर होने पर मैं स्वभाषा में बोल ही नहीं सकता। दूसरे आदमी को मेरे लिए तरजुमा कर देना चाहिए । यह कुछ कम दंभ है? यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है? इसमे मैं अंग्रेजों का दोष निकालूं या अपना? हिन्दुस्तान को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी जानने वाले लोग ही हैं।

राष्ट्र की हाय अंग्रेजों पर नहीं पड़ेगी, बल्कि हम पर पड़ेगी। गांधी जी की टिप्पणी में आक्रामकता के साथ वेदना भी है कि राष्ट्र की हाय अंग्रेजों पर नहीं बल्कि हम पर पड़ेगी। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती। प्रत्येक संस्कृति की अपनी भाषा होती है, प्रत्येक भाषा की अपनी संस्कृति भी होती है। भारतीय संस्कृति की भाषा संस्कृत थी और है। संस्कृत भाषा ने भारतीय संस्कृति को राष्ट्रव्यापी, वैज्ञानिक और दार्शनिक बनाया था। हिन्दी संस्कृत का नया रूप है। अंग्रेजी भाषा की भी अपनी संस्कृति है। अंग्रेजी भाषा और संस्कृति मेंं विज्ञान, इतिहास और सभी विषयों की अपनी दृष्टि है। यह दृष्टि दैहिक और भोगवादी है। यहां अंग्रेजी शिक्षा के साथ अंग्रेजी सभ्यता भी आई थी। गांधी जी ने लिखा, आपको समझना चाहिए कि अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म वगैरा बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा पाये हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे परेशान करने में कुछ भी उठा नहीं रखा है। (वही पृ0 91) गांधी जी ने लिखा, करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकॉले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। उसने इसी इरादे से अपनी योजना बनायी थी, ऐसा मैं नहीं सुझाना चाहता। लेकिन उसके काम का नतीजा यही निकला है। यह कितने दुख की बात है कि हम स्वराज्य की बात भी परायी भाषा में करते हैं? (वही पृ0 90)

भारत में शिक्षा की सुव्यवस्थित प्राचीन परम्परा थी। अंग्रेजी राज के पहले यहां लाखों स्कूल थे। इसके भी हजारों वर्ष पहले उत्तरवैदिक काल में सुव्यवस्थित शिक्षा व्यवस्था थी। शिक्षा का उद्देश्य अविद्या का नाश और विद्या की प्राप्ति था। विद्या का उद्देश्य मुक्ति था- ‘सा विद्या या विमुक्तये’। अविद्या दुख का कारण थी, विद्या आनंद का पर्याय थी। महात्मा बुध्द ने भी समस्त दुखों और पुनर्जन्म का कारण ‘अविद्या’ ही बताया है। इसके भी पहले उत्तरवैदिक काल में रचे गए उपनिषद् साहित्य में अनेक भौतिक अधिभौतिक विषयों की सूची मिलती है। नारद सभी विषयों के ज्ञाता थे। छान्दोग्य उपनिषद् (7.1.) में इन विषयों की सूची है। नारद ने सनत्कुमार को बताया, हे भगवान्! मैं ऋग्वेद पढ़ा हूँ तथा यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद, पांचवा इतिहास पुराण, वेदों का वेद पिन्न्य, राशि, दैव, निधि, वाक्योवाक्य, एकायन, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्प और देवजन की विद्या यह सब। हे भगवान! मैं पढ़ा हूँ। नारद सभी विषयों के विद्वान थे लेकिन अशान्त थे। उपनिषद् में सनतकुमार द्वारा उन्हें मूल ज्ञान दिया गया।

गांधी जी ने भी उसी तर्ज पर लिखा, अब ऊंची शिक्षा को लें। मैं भूगोल-विद्या सीखा, खगोल-विद्या (आकाश के तारों की विद्या) सीखा, बीजगणित (एलजेब्रा) भी मुझे आ गया, रेखागणित (ज्यॉमेट्री) का ज्ञान भी मैंने हासिल किया, भूगर्भ-विद्या को भी मैं पी गया। लेकिन उससे क्या? उससे मैंने अपना कौन सा भला किया? अपने आसपास के लोगों का क्या भला किया? किस मकसद से मैंने वह ज्ञान हासिल किया? उससे क्या फायदा हुआ? ……….. अगर यही सच्ची शिक्षा हो तो मैं कसम खाकर कहूंगा कि ऊपर जो शास्त्र मैंने गिनाये हैं उनका उपयोग मेरे शरीर या मेरी इन्द्रियों को बस में करने के लिए मुझे नहीं करना पड़ा। इसलिए प्राइमरी-प्राथमिक शिक्षा को लीजिये या ऊँची शिक्षा को लीजिये, उसका उपयोग मुख्य बात में नहीं होता। उससे हम मनुष्य नहीं बनते- उससे हम अपना कर्तव्य नहीं जान सकते। (वही पृष्ठ 88-89) सच्चा मनुष्य बनने और समाज का भला करने वाली शिक्षा ही गांधी जी को प्रिय थी। तैत्तिरीय उपनिषद् की शुरूआत ‘शिक्षावल्ली’ से ही होती है। ऋषि कहते हैं शीक्षां व्याख्या स्यामः – अब हम शिक्षा की व्याख्या करते हैं। (अनुवाक् 2) यहां पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश आदि विषय हैं। फिर ‘अध्यात्म’ समझाते हैं। गैरजानकार लोग अध्यात्म को आस्था विषयक ज्ञान मानते हैं लेकिन मन्त्र संहिता में अध्यात्म शरीर संरचना है। चौथे अनुवाक् में प्रार्थना है मैं मेधा सम्पन्न बनूं। शरीर सक्रिय और रोगरहित रहे – शरीरम् मे विचर्षणम्। फिर छठे अनुवाक में विद्या प्राप्त ज्ञानी की प्रशंसा है आप्ति स्वराज्यम् – वे स्वराज्य पाते हैं, वाणी के स्वामी हो जाते हैं, विज्ञानपति हो जाते हैं आदि। 11 वें अनुवाक् में शिक्षण समाप्ति के बाद का उपदेश है सत्य बोलना। धर्म में रहना । अध्ययन में आलस्य न करना । सन्तान प्रवाह का उच्छेद नहीं करना- ‘मा व्यवच्छेत्सी’। पढ़ने और पढ़ाने में आलस्य न करना। मां, पिता, आचार्य देवता है। अतिथि देवता है। निन्दित कर्म वर्जित हैं। निर्दोष कर्म करणीय हैं। सच और गलत के बारे में शंका हो तो सत्कर्म पालन में संलग्न विद्वानों से परामर्श करना। महात्मा गांधी ‘असली मनुष्य’ के निर्माण वाली ऐसी ही शिक्षा के पक्षधर थे।

गांधी जी ने लिखा है शिक्षा-तालीम का अर्थ क्या है? अगर उसका अर्थ सिर्फ अक्षर-ज्ञान ही हो, तो वह तो एक साधन जैसी ही हुई। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा उपयोग भी हो सकता है। एक शस्त्र से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के लिए भी काम में लाया जा सकता है। अक्षर-ज्ञान का भी ऐसा ही है। बहुत से लोग उसका बुरा उपयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा उपयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं । (वही पृष्ठ 87) भारत पश्चिमी सभ्यता के मोहपाश में है। उन्होंने लिखा, हम सभ्यता के रोग में ऐसे फंस गये हैं कि अंग्रेजी शिक्षा लिये बिना अपना काम चला सकें ऐसा समय अब नहीं रहा। जिसने वह शिक्षा पायी है, वह उसका अच्छा उपयोग करे। अंग्रेजों के साथ के व्यवहार में, ऐसे हिन्दुस्तानियों के साथ के व्यवहार में निज की भाषा हम समझ न सकते हों और अंग्रेज खुद अपनी सभ्यता से कैसे परेशान हो गये हैं यह समझने के लिए अंग्रेजी का उपयोग किया जाये। जो लोग अंग्रेजी पढ़े हुए हैं उनकी संतानों को पहले तो नीति सिखानी चाहिए, उनकी मातृभाषा सिखानी चाहिए और हिन्दुस्तान की एक दूसरी भाषा सिखानी चाहिए। बालक जब पुख्ता (पक्की) उम्र के हो जायें तब भले ही वे अंग्रेजी शिक्षा पायें, और वह भी उसे मिटाने के इरादे से, न कि उसके जरिये पैसे कमाने के इरादे से। (वही पृष्ठ 91)

गांधी जी ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मौलिक प्रश्न उठाये हैं। बच्चों की शिक्षा की शुरूआत की भाषा आखिरकार क्या हो? 21 वीं सदी के भारत में ढाई तीन बरस के शिशु की शिक्षा शुरूआत भी अंग्रेजी से ही होती है। गांधीजी ने दो टूक लिखा बालक जब पुख्ता (पक्की) उम्र के हो जायें तब भले ही वे अंग्रेजी शिक्षा पायें और वह भी उसे मिटाने के इरादे से, न कि उसके जरिए पैसे कमाने के इरादे से। (वही) गांधीजी अंग्रेजी सत्ता की तुलना में अंग्रेजी सभ्यता और अंग्रेजी सभ्यता वाली शिक्षा को ज्यादा खतरनाक मानते थे। ‘हिन्द स्वराज’ का मतलब अंग्रेजीराज की जगह भारतीय राज ही नहीं है। हिन्द स्वराज का मतलब स्वसंस्कृति, स्वसभ्यता और स्वराष्ट्र के अंतरंग, स्वरस और स्वछंद में ही भारत के भविष्य का निर्माण करना है। लेकिन वही हुआ, जिसका भय था। अंग्रेजीराज गया, अंग्रेजी सभ्यता के जीवाणु पहले से भी ज्यादा भयावह रूप में हिन्दुस्तान को कैंसरग्रस्त बना रहे हैं।

– हृदयनारायण दीक्षित

2 Responses to “‘हिन्दस्वराज’ में गांधी जी की शिक्षा नीति”

  1. sunil patel

    बहुत ही अच्छा लेख. दो दिन में २० से २5 बार पढ़ा गया. श्री दीक्षित जी ने मीडिया या अन्य पर लिखा होता तो सेकड़ा पर कर जाता. यही हमारी वर्तमान सिक्षा निति है. भारत से कई गुना छोटे बहुत से देश है जो आपनी मात्र राष्ट्र भाषा में अपना सारा कम काज करते हैं. इंग्लिश वहां सिर्फ अन्य देशो से संपर्क करने के लिया उपयोग के जाती है. हम तो अंग्रेजी के गुलाम है. हिंदी भाषा यहाँ दाई के तरह है. बहुत शर्म की बात है.

    इन विषय पर सरकार कोई बात करना भी नहीं चाहती है. जनता को इससे कोई मतलब ही नहीं है. हर कोई गाँधी जी के सिर्फ आहिन्षा के पहलू को ही याद करंता है. उनके अन्य पाठ सिद्धान्त को लोग जानना ही नहीं चाहते हैं.

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  2. RAJ SINH

    बहुत ही सार्थक आलेख .लेकिन साथ ही सत्य यह है की गांधीजी ने कांग्रेस को जन आन्दोलन बनाया और जन से जुड़े थे.वे सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से ही भारत को स्वतंत्र नहीं करना चाहते थे बल्कि ‘ जन ‘ को सही आजादी दिलाना चाहते थे .लेकिन कांग्रेस से जुड़े अधिकांस नेता ,जो की जन की आजादी नहीं बल्कि अंग्रेजों को हटा खुद ही उनकी जगह लेना चाहते थे . वे वही लोग थे जो मैकाले की सिक्छा की उपज थे और मार्क्स की परिभाषा में पेटी बुर्जुआ .उन्हें ‘ जन ‘ से सरोकार नहीं सत्ता से सरोकार था. और नेहरू के नेत्रित्व में ब्राउन साहबों ने बस गोरों की जगह ले ली और देश पहले से ज्यादा गुलाम भी हुआ और उनके नेत्रित्व में सत्ता और भी भ्रष्टाचारी और निरंकुश ही नहीं जनद्रोही भी हुयी .

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