अनूठे गृहमंत्री हैं पलानिअप्पम चिदम्बरम

0
136

भारत के गृह मंत्रियों में सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम बडे ही आदर के साथ लिया जाता है। उसके बाद के गृहमंत्रियों ने कोई खास करिश्मा नहीं किया है। शिवराज पाटिल जैसे गृहमंत्रियों ने देशवासियों का भरोसा तोडने में कोई कोर कसर नही रख छोडी। वर्तमान गृहमंत्री पलानिअप्पम चिदम्बरम ने कुछ नया करने की ठानी है, जिससे भारतवासी उन्हें अनूठे गृहमंत्री के तौर पर सालों तक याद रख सकेंगे।

अमूमन किसी भी सूबे या केंद्र के मंत्री का सपना होता है कि वह अपने मंत्रालय में ज्यादा से ज्यादा अधिकार अपने पास रखे। इसके लिए वह देश की अस्मिता के साथ समझौता करने से भी नहीं चूकता। पी.चिमदम्बरम ने अपने ही गृह मंत्रालय को तोडकर दो भागों में विभाजित करने की वकालत की है। यह निश्चित तौर पर उनकी एक अनूठी पहल मानी जा सकती है।

देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई में पिछले साल हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले के बाद शिवराज पाटिल से गृहमंत्री का प्रभार लेने वाले पी.चिदम्बरम के सर पर वाकई कांटों भरा ताज रखा गया था। उस दौरान देश के गृह मंत्रालय के सामने चुनौतियों का अंबार लगा हुआ था। यह चिदम्बरम की सबसे बडी कामयाबी कही जाएगी कि उनके कार्यकाल में बीते एक साल में देश कम से कम आतंकी हमलों से तो महफूज रहा है। इतना ही नहीं उनके कार्यकाल में 12 बडे आतंकी हमलों की साजिश से पर्दा भी उठ सका है।

चिदम्बरम का एक साल का कार्यकाल तारीफेकाबिल इसलिए भी माना जा सकता है, क्योंकि उनके अंदर समन्वय बनाने की बेजोड क्षमता है। देश में गुप्तचर सूचनाएं देने के काम में लगी विभिन्न एजेंसिया प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाकार और स्वयं गृहमंत्री को सीधे रिपोर्ट करतीं हैं। विभिन्न महकमों के मंत्रियों और देश भर के सूबों की सरकारों के बीच तालमेल बनाना कोई आसान बात नहीं है। चिदम्बरम ने अब यह किया है, यही कारण है कि आतंकियों के हर मंसूबों पर पानी फिरा है।

चिदम्बरम की सोच सही है कि 11 सितम्बर 2001 के बाद दुनिया के चौधरी अमेरिका पर कोई आतंकी हमला नहीं हो सका है। अपने आप को चुस्त दुरूस्त बनाने में अमेरिका जैसे विकसित देश को 36 माह का समय लग गया था। इस हमले के तुरंत बाद अमेरिका ने होमलैंड सिक्यूरिटी महकमे का गठन कर लिया था, जिसकी प्रमुख जवाबदारी आतंकी हमलों से निपटना और आंतरिक सुरक्षा मजबूत करना था।

चिदम्बरम चाहते हैं कि 2010 में भारत राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीएस) का गठन कर ले। दरअसल गृहमंत्री चिदम्बरम चाहते हैं कि गृह मंत्रालय के दो फाड कर दिए जाएं। एक मंत्रालय आंतरिक सुरक्षा से इतर की जवाबदारी का निर्वाहन करे तो दूसरा आंतरिक सुरक्षा की कमान संभाले।

चिदम्बरम के बजान को राजनैतिक चश्मे से देखने की आवश्यक्ता नहीं है। आज से लगभग दस साल पहले कमोबेश यही समय था जबकि पाक प्रशिक्षित आतंकवादी इंडियन एयरलाईंस के विमान को हाईजेक कर बरास्ता अमृतसर उसे कंधार ले गए थे। यात्रियों की रिहाई के बदले भारत सरकार को लश्कर ए तैयबा के प्रमुख सरगना हाफिज मोहम्मद सईद को छोडना पडा था। यह वही सईद है जो पिछले साल मायानगरी मुंबई में हुए आतंकी हमलों का मास्टर माईंड माना जा रहा है।

वैसे पिछले साल गृह मंत्रालय का कामकाज संभालने वाले पी. चिदम्बरम का मानना था कि गुप्तचर सेवाओं को और अधिक चाक चौबंद किया जाए। इन एजेंसियों से प्राप्त सूचनाओं के लिए एक नेशनल ग्रिड की सिफारिश और 21 सूचना केंद्रों को इससे जोडने की बात भी कह चुके हैं गृहमंत्री। विडम्बना ही कही जाएगी कि अफसरशाही के बेलगाम घोडों ने चिदम्बरम की मंशाओं को अब तक परवान नहीं चढने दिया है।

देशवासियों के लिए सुखद आश्चर्य यह है कि इक्कीसवीं सदी में राजनीति की काली कोठरी में पलियानिअप्पम चिदम्बरम जेसा व्यक्तित्व भी है जो अपने काम काज और उपलब्धियों का ढिंढोरा नहीं पीटते हैं। चिदम्बरम की कार्यशैली से साफ हो जाता है कि गृहमंत्री के तौर पर वे आतंकी या दुश्मन की ताकत को कम करके नहीं आंकते। रही बात समाधान की तो वे अपने तरीके से हर समस्या के समाधान को सभी के सामने रखने का माद्दा भी रखते हैं।

आशा की जानी चाहिए कि गृहमंत्री पी.चिदम्बरम के गृह मंत्रालय को बांटने, एनसीटीएस के गठन और गुप्तचर एजेंसियों के लिए नेशनल ग्रिड के सुझावों का सरकार में बैठे समस्त सहयोगी और सभी दलों के संसद सदस्य स्वागत करें। इस पर समय सीमा तय कर जल्द ही राष्ट्रव्यापी बहस कराई जाकर चिदम्बरम की मंशा के अनुसार इसे अगले साल के अंत तक अस्तित्व में ले आया जाए, वरना कहीं देर न हो जाए और सांप निकलने के बाद हम लकीर न पीटते रह जाएं।

-लिमटी खरे

Previous article‘हिन्दस्वराज’ में गांधी जी की शिक्षा नीति
Next articleये है दिल्ली मेरी जान/घर में ही विद्रोह का समाना करना पडा युवराज को!
हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

12,746 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress