लेखक परिचय

अविनाश वाचस्‍पति

अविनाश वाचस्‍पति

14 दिसंबर 1958 को जन्‍म। शिक्षा- दिल्ली विश्वविद्यालय से कला स्नातक। भारतीय जन संचार संस्थान से 'संचार परिचय', तथा हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम। सभी साहित्यिक विधाओं में लेखन, परंतु व्यंग्य, कविता एवं फ़िल्म पत्रकारिता प्रमुख उपलब्धियाँ सैंकड़ों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। जिनमें नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता अनेक चर्चित काव्य संकलनों में कविताएँ संकलित। हरियाणवी फ़ीचर फ़िल्मों 'गुलाबो', 'छोटी साली' और 'ज़र, जोरू और ज़मीन' में प्रचार और जन-संपर्क तथा नेत्रदान पर बनी हिंदी टेली फ़िल्म 'ज्योति संकल्प' में सहायक निर्देशक। राष्ट्रभाषा नव-साहित्यकार परिषद और हरियाणवी फ़िल्म विकास परिषद के संस्थापकों में से एक। सामयिक साहित्यकार संगठन, दिल्ली तथा साहित्य कला भारती, दिल्ली में उपाध्यक्ष। केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद के शाखा मंत्री रहे, वर्तमान में आजीवन सदस्य। 'साहित्यालंकार' , 'साहित्य दीप' उपाधियों और राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्त्राब्दी सम्मान' से सम्मानित। काव्य संकलन 'तेताला' तथा 'नवें दशक के प्रगतिशील कवि कविता संकलन का संपादन। 'हिंदी हीरक' व 'झकाझक देहलवी' उपनामों से भी लिखते-छपते रहे हैं। संप्रति- फ़िल्म समारोह निदेशालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली से संबद्ध।

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Hindi_Divasहिन्दी वाले जिस दिन का इंतजार साल भर करते हैं। लो वो भी आ गया। आज एक और हिन्दी दिवस है। गए गुजरों सालों पर नज़र डालते हैं तो बीत गए कल की तुलना में अपने आज को बेहत्तर पाते हैं और भविष्य को डायमंड जड़ित देखते हैं। बीते कल में हिन्दी की खूब दुर्गति हुई है। उसी कल में यह सरकारी कामकाज की राजभाषा भी बनी और राष्ट्रभाषा बनने की ओर तेज़ी से अग्रसर है। मुकाम बस हासिल होने ही वाला है। बीते कल में ही इसे हिंग्लिश बनने पर खूब आलोचना झेलनी पड़ी है। पर हिन्दी में अँग्रेज़ी के शब्द ले लेकर ही हिन्दी वालों ने अँग्रेज़ी की जड़ें काट डाली हैं। उसकी शब्दों की सेफ भी सुरक्षित नहीं रही है। उसमें भी हिन्दी ने सेंध लगा डाली है। अँग्रेज़ी के शब्द भंडार रीत रहे हैं। खुश हो लो अब अँग्रेज़ी के दिन बीत रहे हैं। जब अँग्रेज़ी माल हिन्दी में अवेलेबल है तो अँग्रेज़ी क्यों लाईक की जाएगी?

ई मेल पर अब तो खैर हिन्दी आ गई हैं जब नहीं आई थी तब भी हिन्दी के दीवाने हिन्दी में ई मेल भेजते रहे हैं। हिन्दी के शब्दों को रोमन में लिखकर जो जुगाड़ फिट किया वो हिट रहा है। मजबूर होकर हिन्दी के आगे अँग्रेज़ी ने घुटने टेक दिए हैं। ई मेल पर और नेट पर भी अब हिन्दी अपनी प्रखरता से शोभायमान हो रही है। सर्च इंजन भी हिंदी में, ब्लॉग हिन्दी में, विविध प्रकार के फोंट सब कुछ सर्वत्र हिन्दी में उपलब्ध है। हिन्दी अब सहज और सरल हो गई है। टीवी पर हिन्दी के चैनलों की धूम है। हिन्दी में वो सब माल ताज़ा मिल रहा है जिसके लिए अँग्रेज़ी पर निर्भर रहना पड़ रहा था, अब एकदम चकाचक ताज़ा रसभरा आपकी अपनी भाषा में मौजूद है।

मल्लिका और बिपाशा ने फिल्मों में हिन्दी के झण्डे फहरा दिए हैं। किसकी मजाल है उन्हें लहराने से रोक सके। उनकी लहर का जादू सिर चढ़कर अब हिन्दी में बोल रहा है। कुछ ही पल की देर है अब अँग्रेज़ी वाले घिघियाएंगे। कुछ ही बरस बाकी हैं जब अँग्रेज़ी प्रेमी मिलकर अँग्रेज़ी दिवस मनाया करेंगे। अँग्रेज़ी सप्ताह, पखवाड़े, माह मनाकर खुशी पाएंगे और अँग्रेज़ी साल मनाने के लिए तरस जाएंगे। अँग्रेज़ी के लिए पुरस्कार प्रतियोगिताएं रखी जाएंगी। अँग्रेज़ी के बुरे दिन बस आ गए समझिए।

अँग्रेज़ी के चैनल और अखबार इतिहास की बकवास बनकर विस्मृतियों में खो जाएंगे। रद्दी बेचने के लालच में भी खरीदने वालों का टोटा पड़ जाएगा। चाहे कितनी ही बार कंट्रोल के साथ एफ दबाकर ढूँढते रहो, कुछ हाथ नहीं लगेगा। हाथ तो कंप्यूटर कमांडो का विकल्प भी नहीं लगेगा। फिर कंप्यूटर पर काम करने के लिए हिन्दी का ज्ञान अपेक्षित होगा। बिना हिन्दी के कंप्यूटर का पत्ता (बटन) भी नहीं हिलेगा। हिंदी के ललाट पर सफलता की बिंदी चमक रही होगी और अँग्रेज़ी चिंदी चिंदी होकर अपनी फटेहाली पर बिसूर रही होगी।

हिन्दी धूम वन, टू और थ्री होगी। अँग्रेज़ी को कोई नहीं पूछेगा। इंग्लिश डे पर अँग्रेज़ी वाला कहता मिलेगा ईट एंड अर्न डे आ गया है। फिर हिंदी में बोलेगा खूब खा लो और कमा लो। फिर साल भर बाद ऐसा मौका आएगा। अँग्रेज़ीदां के अँग्रेज़ी बोलने पर खूब थुक्का फ़जीहत हुआ करेगी। उन्हें नसीहतें मिला करेंगी कि सावधानी रखो। सावधानी हटी दुर्घटना घटी। स्कूलों में अँग्रेज़ी बोलने पर चालान हुआ करेंगे। पर खुश न हों ट्रैफिक पुलिस वाले, उनको जुर्माना करने के अधिकार नहीं मिलेंगे। हिन्दी की अपनी पुलिस होगी जो स्थिति पर निगाह रखेगी और जुर्माना करेगी और अपनी दयालुता दिखाते हुए अपराधी को सबसिडी के तौर पर वापिस लौटा देगी। हिन्दी वाले अँग्रेज़ी वालों की तरह कठोर दिल नहीं हुआ करते हैं। रहमदिल हैं सिर्फ रहम किया करते हैं। पकड़ते हैं अँग्रेज़ी बोलते हुए, पर हिंदी सिखाकर छोड़ दिया करते है।

हिंदी यूनेस्को की भाषा बन चुकी है और जिस दिन संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनेगी। उसी दिन विश्व पर हिन्दी का परचम फहरा उठेगा जो किसी के रोके न रुकेगा। विश्वभर के हिंदीप्रेमी महसूस करने लगे हैं कि उनकी एक सशक्त विश्व हिंदी फेमिली है जो सभी भाषाओं से घुली-मिली है और अँग्रेज़ी लगती लिज़लिज़ी है।

-अविनाश वाचस्पति

56 Responses to “हिंदी दिवस पर विशेष: अँग्रेज़ों के खाने कमाने का दिन”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    टिप्पणी दो:
    जैसे हर राग में, एक संवादी स्वर होता है। उसी प्रकार किसी विशेष क्षेत्र में सुसंवादी पारिभाषिक शब्द रचना की जा सकती है। हमारे पास बेजोड़, शब्द रचना शास्त्र है।उदाहरण–> नीचे मुख पेशियों के नाम (अभिनवं शारीरम्‌- से ) प्रस्तुत है। इनपर विचार करें। संस्कृत पर्याय के साथ अंग्रेजी संज्ञा दी गई है। भ्रूसंकोचनी: Corrugator supercilli ( भ्रू को संकॊचनेवाली पेशी), नेत्र निमीलनी: –Orbicularis Oculi (नेत्र बंद करनेवाली), नासा संकोचनी: Compressor naris(नाक का संकोच करनेवाली पेशियां) नासा विस्फारणी: Dilator naris( नाक विस्फारित करने वाली), नेत्रोन्मीलनी(आंख खोलनेवाली)इत्यादि (१) संस्कृत/हिंदी की संज्ञा का स्पेलिंग याद करना नही पड़ेगा (२) उसकी व्याख्या, संज्ञाके साथ पता चलती है। स्पेलिंग और व्याख्या रटते जो समय बिताएंगे, उसके 25% समय में आप हिंदी/संस्कृत में अध्ययन कर सकते हैं। स्वेच्छा से रशियन, फ्रेंच, जपानी, अंग्रेजी पढ़ने में विरोध नहीं।
    चीनी में हर शब्द के लिए चित्र है। चीनी टाइप राइटर आधा मीटर लंबा होता है, जिसमें 7000 अक्षर (हमेशा काम आनेवाले) होते हैं। जीवनभर व्यक्ति नए नए शब्द/अक्षर सीखता है। वैसे तो चीनी में 40 ,50 हजार शब्द अनुमानित हैं।किंतु चीनी अपनी भाषाको त्यागने की बात सुनाइ नही देती। (४) अंग्रेजी में भी जीवन भर आप स्पेलिंग याद करेंगे।(5)हिंदी में 36 व्यंजन और 12 खड़ी सीखने के बाद आपको कभी कोई भी शब्द पढ़ने में कोई कठिनाई नहीं है।(६) एक प्रश्न करके छॊडता हूं। यदि आप पहले से केवल अंग्रेजी माध्यम में पढ़े (देव नागरी बिल्कुल नहीं) तो शब्द का उच्चारण कैसे सीखेंगे?। और विश्व के विद्वान, संस्कृत को अप्रतिम देन मानते हैं। ज्यादा जगह के लिए क्षमा चाहता हू। टिप्पणीकार स्ट्रक्चरल इंजिनयरिंग के प्राध्यापक है,और उच्च स्ट्रक्चर की संस्कृत संज्ञाओंपर काम कर रहे है।

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    टिप्पणी एक:
    मै हिंदी के पक्ष में हूं। 20 वर्ष पहले मैं, जो नहीं मानता था, वोह आज मानता हूं। क्यों? (१) पहले बालक एक अंग्रेजी की बैसाखी पर चढ़कर संतुलन सीखता है। (2)फिर चलना, दौडना, सीखते सीखते कमसे कम 10/15 वर्ष निकल जाते हैं। वो भी केवल एक अभिव्यक्ति का माध्यम सीखते सीखते (3) फिर उस माध्यम से आगे अपना शोध, खॊज और योगदान देने में सारा जीवन लग जाता है। (4) करोडॊ छात्रों के अरबों वर्षॊं को हम दुर्व्यय करते हैं। जिसका अनुमानित मूल्य अरबों रुपयों में होगा। साथ (क) अपने प्रति, अपनी भाषा और संस्कृति की ओर लघुता ग्रंथी प्राप्त होती है। जापान, रशिया, फ्रांस, चीन इत्यादि देश कोई पराए माध्यम में पढ़ता नहीं है। सचमुच मौलिक खोज, चिंतन, मनन, विचार,इत्यादि आप परायी भाषा में करना बहुत कम संभनीय है।सोचिए, यदि भारत अपनी ( हिंदी) भाषा में शोध, चिंतन, अनुसंधान करता तो हम कहां होते? भारतीय भाषाओं का विकास संस्कृत शब्द शास्त्रके आधार पर होता तो किसी भी शब्द का , अर्थवाही पर्याय प्राप्त होता।

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  3. दुर्गेश गुप्त "राज"

    प्रिय भाई विचार अच्छे हैं. लेकिन हमारा वास्तविक सपना तभी सच होगा जब देश के राज-काज की, उच्चतम-न्यायालय की, उच्च-न्यायालय की भाषा हिन्दी हो जाएगी.बच्चों को उनकी मां की भाषा में प्राथमिक शिक्षा दी जाने लगेगी, देश की सभी प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त हो जाएगी.

    Reply
  4. दुर्गेश गुप्त "राज"

    प्रिय भाई विचार अच्छे हैं. लेकिन हमारा वास्तविक सपना तभी सच होगा जब देश के राज-काज की, उच्चतम-न्यायालय की, उच्च-न्यायालय की भाषा हिन्दी हो जाएगी.बच्चों को उनकी मां की भाषा में प्राथमिक भाषा दी जाने लगेगी, देश की सभी प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त हो जाएगी.

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  5. Dr. K. V. Narasimha Rao

    स्वप्न देखना प्रगति के लिए आवश्यक है जिसे लगन और निरंतर प्रयासों से साकार किया जा सकता है । इसके लिए हिंदी के बारे में तमाम आशंकाओं को दूर करना और अपने देश की सभी भाषाओं में जो श्रेष्ठ है उसे हिंदी में प्रतिबिंबित करते हुए आगे बढ़ना अपरिहार्य है । साथ ही, सामाजिक प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, रोजगार, प्रौद्योगिकी और उन्नति के साथ हिंदी को संबद्ध करने से वे सभी संभावनाएँ सच हो सकती हैं जो श्री अविनाश जी के लेख में दर्शायी गयी हैं । हिंदी की प्रगति के साथ इस देश का बहुजनहित जुड़ा हुआ है । हम आशा करते हैं कि वह दिन जल्दी आए जब हम अपने देश की भाषा में हर काम कर सकेंगे। इतने अच्छे लेख के लिए बधाई । – डा. के. वी. नरसिंह राव

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  6. sunil patel

    अविनाश जी के इस लेख ने दिल को छू लिया. वाकई पिछ्ले दॊ तीन सालॊ मे हिन्दी ने अचंभा कर दिया. काश हमारे नेता और अफ़सर भी हिन्दी का संम्मान करना सीखे.

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  7. albela khatri

    ओ भाईजी !
    जब आप जैसे मतवाले लोग
    इतने सरल
    सहज
    सुगम्य
    और
    सर्वमान्य
    तरीके से
    हिन्दी की ध्वजा को
    फहराएंगे
    तो भला परिणाम
    शत प्रतिशत क्यों नहीं आयेंगे ?
    ज़रूर आयेंगे
    अवश्य आयेंगे ।
    _______आपको बहुत बहुत शुभ कामनाएं
    और इस रोचक व सटीक ही नहीं बल्कि उर्जापूर्ण आलेख के लिए

    हार्दिक अभिनन्दन ।

    जय हिन्दी
    जय हिन्द !

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  8. अरूण कुमार झा

    ]हिंदी दिवस पर विशेष: अँग्रेज़ों के खाने कमाने का दिन, अविनाशन भाई आपने अपने वैचारिक लेख में जो शीर्षक दिया है, वह अक्षरश सही लिखा है, आज जो दुर्गती हिन्‍दी की हो रही है, वह हम हिन्‍दी वालो के कारण ही, हमें शर्म आनी चाहिए कि हम तो खाते हैं हिन्‍दी का, लेकिन काम करते है, अंग्रेजी का, कैसी विडंबना है भाई, सुबह से शाम तक हम कई अंग्रेजी में स्‍वांग करते हैं, आज सरकारी और राजनीति में अंग्रेजी का जो बोलवाला है, वह हमारी ही कमजोरी और हीन मानसिकता के चलते ही, तो है, कल की मैं एक बात आपको उदाहरण देता हूं, हमारे एक स्‍नेहिल मिञ ने मुझे नेट पर चैट में हाय कहा, मैंने उन्‍हें कहा कि भाई अभी हिन्‍दी का सप्‍ताह चल रहा है, ऐसे में हाय कहिएगा,तो कोई भी मर जायेगा, तब जानते हैं, मिञ ने मुझसे बात करनी छोड दी, उस मिञ का भी उपर में अविनाश भाई के लेख पर प्रतिक्रिया है, मुझे समझ में नहीं आता है कि हम दो दिल कैसे एक ही सिने में छूपाये हुए है, यह उदाहरण गंभीर है, क्‍योंकि हम मंच पर, मजलशि में और ऐसे मौके पर ही सिर्फ प्रतिक्रिया देने के लिए हिन्‍दी की बात न करें, हम अपने रोजमर्रे की जिन्‍दीगी में भी आदत डाले, तभी हम हिन्‍दी का सम्‍मान कर कर सकते हैं, नहीं तो सब स्‍वांग ही होगा,
    मै अविनाश भाई को इस मामले में आदर्श मानता हूं, कि वो हर वक्‍त हिन्‍दी के लिए जीते हैं, हर वक्‍त कुछ न कुछ हिन्‍दी के लिए करते हैं, हमें जो भी हिन्‍दी के लिए कुछ करने का विचार आया है, वह उन्‍हीं की देन है, ऐसे साधु परूष के जैसे हमारे देश को जरूरत है, जय हिन्‍दी, जय अविनाश वाचस्‍पति,
    एक बात विनम्रता के साथ कि मुझे वहां माफ करेंग, जहां लिखने में ञुटि हुई हो, नेट का मै कच्‍चा खिलाडी हूं और अभी अभी ही हिन्‍दी लिखना सीखी है, और नेट पर सही वर्तनी नहीं लिखा पाता
    आपका मिञ अरूण कुमार झा

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  9. rajesh utsahi

    अविनाश जी आपका लेख पढ़ा। उस पर औरों की प्रतिक्रिया भी। हमारी दिक्‍क्‍त यही है कि हम किसी और भाषा के अवसान में अपनी हिन्‍दी की प्रगति देख रहे हैं। आखिर क्‍यों। इंटरनेट में हिन्‍दी का आज जो जलवा है क्‍या वह बिना अंग्रेजी के संभव था। आज हम उसी को गरिया रहे हैं। क्‍यों। हम अपनी लकीर को बड़ा करने के लिए दूसरे की लकीर को मिटाकर छोटा कर रहे हैं। क्‍यों। क्‍यों नहीं अपनी लकीर बड़ी करते।

    सच यह है कि मैं आज जिस मुकाम पर हूं,वह हिन्‍दी में अपनी प्रवीणता के कारण ही हूं। मुझे अंग्रेजी नहीं आती है। केवल पढ़ लेता हूं और समझ लेता हूं। हम हिन्‍दी दिवस क्‍यों मनाते हैं। सबसे पहले हमें इसे मनाना बंद करना चाहिए। यह हमारी प्रतिदिन की भाषा है। मेरे हिसाब से दिवस उनके मनाए जाते हैं,जिन्‍हें रोज याद करना संभव न हो। मुझे पता है कि यह आपका व्‍यंग्‍य लेख था।

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  10. Prem Janmejai

    प्रिय अविनाश जी
    आपने सवाल अच्छे उठाए हैं और हिंदी की ताकत को सही तरीके से प्रस्तुत किया है। पर अविनाश जी विश्व की भाषा तो हिंदी है और इसका अपना राष्ट्र भी है पर दिक्कत है कि हमारे देश की भाषा नहीं बन पाई है और न ही हमारे नेता इसे अपनी राजनीति के चलते बनने देना चाहते हैं।

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  11. हिमांशु

    आशावादी संदेश है यह !मैं सोचता ही हूँ – हिन्दी का स्वीकार हमारे ’स्व’ का स्वीकार है । हम अपने स्व से विरम गये हैं । हिन्दी हमारी अस्मिता का बोध कराती है । हिन्दी दिवस की इस प्रस्थान भूमि से हिन्दी का शंखनाद हो, हिन्दी की पताका विश्वभर में फैले – यही मंगल कामना है ।
    आपका अवदान हिन्दी के विस्तार और उसकी समृद्धि के लिये अत्युत्तम है । आभार इस आलेख के लिये ।

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  12. सुभाष नीरव

    भाई हिंदी सप्ताहों,पखवाड़ों के दिन हैं। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी यह दिखावा कर इतिश्री कर ली जाएगी। हिंदी के नाम पर जो दिखावा कर रहे हैं वे सुर्खियों में हैं। जो सही मायने में चुपचाप निस्वार्थ हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, वे अनजाने और उपेक्षित ही रहेंगे। मैं भाई सुशील जी की बात से सहमत हूँ कि हिन्दी जिसके दम पर चल रही है वह न नेता है, न युनेस्को , न कोई संगठन। हिन्दी अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से आगे बढ़ रही है अपने हिन्दी‍प्रेमियों की जुबान से।

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  13. विनोद कुमार बस्‍सी

    अंग्रेजों की खाट खड़ी करने वाले इस व्‍यंग्‍य लेख के लिए बधाई स्‍वीकारें। यह आज का व्‍यंग्‍य तो हो सकता है पर कल की हकीकत यही होगी।

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  14. amitabh

    हिंदी यूनेस्को की भाषा बन चुकी है और जिस दिन संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनेगी। उसी दिन विश्व पर हिन्दी का परचम फहरा उठेगा जो किसी के रोके न रुकेगा।
    ऎसा हॊ| आत्मेय शुभकामनायॆ|

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  15. रज़िया मिर्ज़ा

    हिंदी यूनेस्को की भाषा बन चुकी है और जिस दिन संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनेगी। उसी दिन विश्व पर हिन्दी का परचम फहरा उठेगा जो किसी के रोके न रुकेगा। आपके इस आशावाद को प्रणाम करती हुं।

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  16. महेंद्रभटनागर

    हिन्दी के भविष्य के प्रति आपका आशावाद युक्‍तियुक्‍त है। हास्य‍‍‍व्यंग्य मिश्रित आपकी शैली रोचक और प्रभावी है।
    *महेंद्रभटनागर, ग्वालियर

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  17. Sulabh Satrangi

    हिंदी तो चारो और विधमान है. बस जरुरत है उच्च शिक्षा और ज्यादा से ज्यादा रोज़गार के अवसरों से जोड़ने की.

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  18. sharad kokas

    अविनाश भाइ हिन्दी के प्रति इतना आशावाद तो मैं सचमुच पहली बार देख रहा हूँ । और यह आशावाद व्यर्थ नहीं है न ही भावुकता से भरा है । आपने हिन्दी के पक्ष में उचित तर्क दिये हैं । यह हम हिन्दी प्रेमियों के लिये सकारात्मक दिशा में बढ़ने के लिये एक आवश्यक दस्तावेज़ है । इसे हम सब मिलकर प्रचारित करें । अभी भोपाल मे मेरी भेंट बहुत से वरिष्ठ साहित्यकारों से हुई उन्हे भी मैने तकनीकी दिशा में हुई इस क्रंति से अवगत कराया । – आपका शरद कोकास

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  19. रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

    कितना अच्छा होता हमारे शिक्षा-संस्थान भी जाग गए होते! ज़्यादातर अधिकारी हीनभाव से ग्रस्त है॥ हिन्दी में काम करने वालों को बहुत सारे अड़ंगो से निपटना पड़ता है। अधिकतम हिन्दी शिक्षक अपने पैसे से साल में अगर एक दो पत्रिका/पुस्तक भी खरीदकर पढ़ ले तो हिन्दी दौड़ने लगेगी।

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  20. सूरज प्रकाश

    सरकार तो हार गयी हिन्‍दी ला ला के। अब बाजार ले के आ गया है। चाहे उत्‍पाद किसी भी देश से बन कर आ रहा हो, हिन्‍दी में काम करने की सुविधा के साथ आता है। यही बाजार है। हिन्‍दी का सबसे ज्‍यादा नुक्‍क्‍क्‍सान सरकार के राजभाषा विभाग ने किया है। अगर उनके हिन्‍दी संबंधी आदेशों की ढेरी लगायें तो उस कागज से 10000 स्‍कूलों के 25000000 लाख बच्‍चों के लिए स्‍कूली किताबें छापी जा सकती थीं। सरकार हिन्‍दी न लाने के लिए जितना धन खर्च करती है उससे सौ पचास बांध बनाये जा सकते हैं। लेकिन वे हैं कि हिन्‍दी में काम करने के लिए पैसे दिला कर कर्मचारियों को लालची और स्‍वार्थी बना रहे हैं। वरना वे दत्‍तक पुत्र हिन्‍दी में ज्‍यादा प्‍यार और काम करते हैं जिन्‍हें भाषा से सच्‍चे मन से प्‍यार है। वे सरकारी कर्मचारियों की तरह शब्‍द गिन कर हिन्‍दी का प्रयोग नहीं करते कि साल के आखिर मं हिन्‍दी अधिकारी बेचारा सम्‍मानित करेगा।
    उन सबकेा मेरा प्रणाम जो ब्‍लाग के जरिये ही सही इंटरनेट पर अपनी मौज्‍ूदगी दर्ज करा के बेहतर काम कर रहे हैं

    सूरज प्रकाश

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  21. डॉ. रत्ना वर्मा

    उस दिन का इंतजार है। आप जैसे हिन्दी की सेवा में लगे रहने वाले हैं तो देर से ही सही हिन्दी विश्व स्तर पर अपना परचम लहराएगी।
    अब तक हिन्दी दिवस मनाकर हम खानापूर्ति ही करते रहे हैं लेकिन अब वह समय आ गया है कि हम सब को मिलकर हिन्दी का लोहा मनवाना होगा।

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  22. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

    “हिंदी यूनेस्को की भाषा बन चुकी है और जिस दिन संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनेगी। उसी दिन विश्व पर हिन्दी का परचम फहरा उठेगा जो किसी के रोके न रुकेगा।”

    आशा ही नही अपितु विश्वास भी है कि यह स्वप्न भी पूरा होगा।
    हार्दि्क शुभकामनाएँ!

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  23. अनिल जनविजय

    अविनाश जी! शैली ज़रूर व्यंग्यात्मक है, लेकिन बातें तो सब सच्ची ही हैं। हिन्दी का विकास तो हो ही रहा है। हिन्दी जल्दी ही दुनिया पर छा जाएगी, यह बात ज़रूर मुश्किल लगती है, लेकिन ऐसा हो सकता है और हो रहा है। सिर्फ़ इसी साल रूस में हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ कर डेढ़ गुनी हो गई है। दुनिया के अन्य देशों में भी कमोबेश यही हालत है।

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  24. हरिराम

    अविनाश जी आपकी व्यंग्यात्मक शैली तो अनुपम है ही, भाव भी पाठक के दिल को कुरेद देते हैं। हिन्दी की बाढ़ विश्व में बढ़ रही है। इसे कोई नहीं रोक सकता।

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  25. M.L. sharma

    हिन्दी दिवस् पर् सभी हिन्दी प्रॆमियॊ कॊ बधाई.आपका लॆख् बहुत् अचछा है.हिन्दी विश्व् की भाषा बनॆगी, यह् सपना जलदी पूरा हॊगा.

    Reply
  26. विनीत कुमार

    आज की हिन्दी कई रुपों में,कई खेमों में,कई धंधों और तिकड़मों में बंटी हुई हिन्दी है। इसलिए आज प्रायोजित तरीके से हिन्दी का रोना रोने के पहले ये समझ लेना जरुरी है हम किस हिन्दी के नाम पर विलाप कर रहे हैं। एफ.एम.चैनलों की हिन्दी पर शोध करने के दौरान मैंने इसे समझने की कोशिश भर की और बाद में अलग-अलग संदर्भों में इसके विस्तार में गया। इस बंटी हुई,बिखरी हुई,अपने-अपने मतलब के लिए मशगूल हिन्दी को बिना-जाने समझे अगर आप हिन्दी की दुर्दशा पर सरेआम कलेजा पीटना शुरु कर दें तो जो लोग बाजार के बीच रहकर हिन्दी के बूते फल-फूल रहे हैं, सिनेमा,मीडिया,इंटरनेट और दूसरे माध्यमों के बीच हिन्दी का इस्तेमाल करते हुए कमा-खा रहे हैं,वो आपको पागल करार देने में जरा भी वक्त नहीं लगाएंगे। दूसरी तरफ अगर कोई मनोरंजन और महज मसखरई की दुनिया में तेजी से पैर पसारती हिन्दी को ही हिन्दी का विस्तार मान रहा है तो उन्हें सोचालय की हिन्दी(साहित्य और अकादमिक संस्थानों से जुड़े लोग)के लोगों से आज क्या सनातनी तौर पर हमेशा ही लताड़ खाने के लिए तैयार रहना होगा। उनके लिहाज से ये लोग हिन्दी के विस्तार के नाम पर टेंटें कर रहे हैं और ज्यादा कुछ नहीं। जबकि आज मोहल्लाlive पर विभा रानी ने हिन्दी को लेकर जो कुछ लिखा है उसके हिसाब से सोचालय के लोग हिन्दी के नाम पर जबरदस्ती टेंटे कर रहे हैं। हिन्दी की पूरी बहस इसकी ऑथिरिटी को लेकर है। सब अपने-अपने तरीके से इसकी हालत और शर्तों को तय करना चाहते हैं यही कारण है कि कभी हिन्दी के नाम पर मर्सिया पढ़ना जरुरी लगता है तो कभी हिन्दी को लेकर आंकडें देखते ही,हिन्दी चैनलों से दस हजार करोड़ सलाना कमाई की बात सुनकर हिडिप्पा और हिप्प हिप्प हुर्रे करने का मन करने लग जाता है। किसी के लिए हिन्दी में होना ईंद है तो किसी के लिए मुहर्रम।

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  27. Thats Fine

    बरसों पहिले बनारस मे सुधेन्दु पटेल और स्व.श्रीप्रकाश शर्मा ने प्रवक्ता का प्रकाशन शुरु किया था. आज प्रवक्ता ओनलाइन देखकर मजा आ गया.

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  28. kulwant happy

    एक शानदार…लेख..इंग्लिश हर साल हजारों हिन्दी शब्दों को खाकर मोटी हो जा रही है, तो हिन्दी को भी अब शब्दों को खाकर मोटा होने दिया जाए, तभी तो कटेगी..इंग्लिश की जड़े..

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  29. Manudeep

    जी बात ठीक है पर ऎक बात कहना चाहूगा कि अस्सी फीसदी हिन्दी चैनलो पर बडी बॆहुदा किस्म की हिन्दी बॊली जाती है. जिसमॆ सुधार हॊना ही चाहियॆ. शॆष सब शुभ ही शुभ है.

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  30. HARI SHARMA

    ऐसा दिन भी आयेगा और जरूर आयेगा
    लोग जब गर्व से कहे़गे कि लडका / लडकी हिन्दी लिख / बोल / समझ समझ सकता है. लडका / लडकी हिन्दी सिर्फ़ हिन्दी ब्लोग लिखते और पढते है़.

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  31. alka sarwat mishra

    बहुत् पुराना सपना है मॆरा कि हिन्दी विश्व की सिरमौर बनॆ ,अविनाश भैया आपनॆ तॊ जैसॆ मॆरॆ सपनॆ कॊ शब्द् दॆ दियॆ ,मैनॆ आज सॆ 15 साल पहलॆ कॆ.आर.मलकानी कॊ नॆपाल मॆ हिन्दी बॊलनॆ पर मजबूर कर दिया था.वैसॆ कॊई भाषा इतनी मधुर नही है जितनी हमारी हिन्दी .मजा आ गया आपका लॆख पड कॆ
    .

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  32. aparajita jain

    bahut achha lekh …ye sapna jarur pura hoga avinsh ji…jo bat ..mithas hindi mai hai wo kisi or bhasha main nahi….mai khud bhi hindi mai hi likhna chahti thee par mujhse ban nahi raha ..agle bar jarur koshish karungi ..shubhkamnaye .

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  33. राज भाटिया

    अजी हमारे लिये तो हिन्दी हमेशा ही अब्बल रही है,अग्रेजी सिर्फ़ मजबुरी मै वो भी तब जब सामने वाला कोई अग्रेज हो तब बोलते है, वरना कभी नही हिन्दी ओर जर्मन घर मै पंजाबी… इस लिये हमारे लिये तो हिन्दी का झंडा हमेशा उंचा रहा है. अग्रेजी हमारी नही, फ़िर क्यो बोले…

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  34. नवीन तिवारी

    अविनाश जी काफी देर से इस को पढ़ रहा हूँ और चिंतन कर रहा हूँ. पर ना जाने, दिल मनाता ही नहीं की ऐसा दिन आएगा, पर मन कहता है की जरा कोशिश से पत्थर तो उछाल प्यारे, आसमान मैं भी सुराग होता है.

    आप और हमारे सभी साथी मिल कर हर सपने को साकार करेंगे, हो सकता है की कुछ समय लगे पर हिंदी की स्थिती इतनी भी खराब नहीं की हम को विशेष पैकेज लेना पडे.
    बस मन मैं थोडी सी जगह हो और जज्बा हो तो हमारी हिंदी सब को प्यारी होगी.
    निज भाषा जिसको ज्ञान नहीं वो ……

    वन्दे मातरम् !

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  35. समीर लाल

    हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.

    कृप्या अपने किसी मित्र या परिवार के सदस्य का एक नया हिन्दी चिट्ठा शुरू करवा कर इस दिवस विशेष पर हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का संकल्प लिजिये.

    जय हिन्दी!

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  36. रजनीश के झा

    शानदार आलेख,
    नि;संदेह हिन्दी का परचम पुरी दुनिया पर लहराएगा.
    अविनाश भाई आपको बधाई
    और सभी साथियों को शुभकामना

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  37. सुशील कुमार

    आपका लॆख पठनीय है भाई अविनाश जी। पर हिन्दी जिसके दम पर चल रही है वह न नेता है, न युनेस्को , न कोई संगठन। हिन्दी अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से आगे बढ़ रही है अपने हिन्दी‍प्रेमियों की जुबान से।

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  38. अजय कुमार झा

    हा…..हा…हा….अविनाश भाई…मुझे एक किस्सा याद आ गया ये पढ कर….श्रीमती जी कुछ दिनों पहले ..हिंदी के अखबारों के साथ साथ एक अंग्रेजी का अखबार भी मंगवाना भी शुरू कर दिया….मैं हैरान था…कारण पूछा तो जानते हैं क्या पता चला….उन्होंने कहा…मम्मी कह रही थी…अंग्रेजी अखबार से रद्दी ज्यादा बन जाती है..बस इसीलिये..हिंदी के अखबार तो आधे से ज्यादा आप काट कर रख लेते हो…मैंने सोचा…बेटा अंग्रेजों….अब यही होना रह गया था तुम्हारे साथ….यही होगा…मज़ा आ गया..

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  39. अशोक

    अपने देश में सारी भाषायें पनपें और एक बहुभाषीय देश में भाषाई आतंकों से मुक्ति मिले।
    ऐसा वक़्त आये कि हर भाषा का सर्वश्रेष्ठ सभी अपनी भाषा में सहज बिना किसी ग्लानिबोध के पढ पायें।

    हिन्दी दिवस पर यही आकांक्षा है हमारी

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  40. Dr.Arvind Mishra

    यह निरी खुशफहमी नहीं है ,आपने आने वाले दिनों का पूर्वाभास कर लिया हैं ! मैं पूरी तरह आपसे इत्तेफाक रखता हूँ !

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  41. ulook

    हिन्दी का रास्ता हिन्दी
    और किसी सॆ कॊइ मतलब नही
    जय जय हिन्दी
    जय अविनाश जी

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  42. राजीव रंजन प्रसाद

    माँ, मातृभूमि, मातृभाषा इससे प्यार न हो संभव नहीं और आपके लेख में यही प्यार बोल रहा है अविनाश जी। यह भी सत्य है कि हिन्दी के लिये हमें बहुत बडी लडायी लडनी है।

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  43. Ankit

    अंग्रेजी?
    हमें तो भैया हिंदी ही आती है. इसीलिए हिंदी दिवस पर हिंदी में प्रतिकिर्या और हिंदी में मेल करने का संकल्प.
    धन्यवाद

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  44. Iहे प्रभु यह तेरापन्थ

    @@@अँग्रेज़ी बोलने पर चालान हुआ करेंगे। पर खुश न हों ट्रैफिक पुलिस वाले, उनको जुर्माना करने के अधिकार नहीं मिलेंगे। हिन्दी की अपनी पुलिस होगी जो स्थिति पर निगाह रखेगी और जुर्माना करेगी और अपनी दयालुता दिखाते हुए अपराधी को सबसिडी के तौर पर वापिस लौटा देगी। हिन्दी वाले अँग्रेज़ी वालों की तरह कठोर दिल नहीं हुआ करते हैं। रहमदिल हैं सिर्फ रहम किया करते हैं। पकड़ते हैं अँग्रेज़ी बोलते हुए, पर हिंदी सिखाकर छोड़ दिया करते है।”

    बहुत ही सुन्दर भावो से ओतप्रोत पोस्ट।
    काश…. आपने जो लिखा वो हो जाऍ….. तो आपकी कलम मे घी शक्कर……….. (आपके मुह मे घी शक्कर)………..
    आप को हिदी दिवस पर हार्दीक शुभकामनाऍ।

    पहेली – 7 का हल, श्री रतन सिंहजी शेखावतजी का परिचय
    हॉ मै हिदी हू भारत माता की बिन्दी हू
    हिंदी दिवस है मै दकियानूसी वाली बात नहीं करुगा

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