लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

Posted On by &filed under कविता.


एक बूढी औरत….

राजघाट पर बैठे-बैठे रो रही थीHindi_Divas1

न जाने किसका पाप था जो

अपने आंसुओं से धो रही थी।

मैंने पूछा- माँ , तुम कौन?

मेरी बात सुन कर

वह बहुत देर तक रही मौन

लेकिन जैसे ही उसने अपना मुह खोला

लगा दिल्ली का सिंहासन डोला

वह बोली-अरे, तुम जैसी नालायको के कारण शर्मिंदा हूँ,

न जाने अब तक क्यो जिंदा हूँ।

अपने लोगो की उपेक्षा के कारण

तार-तार हूँ, चिंदी हूँ,

मुझे गौर से देख…

मै राष्ट्रभाषा हिन्दी हूँ ।

जिसे होना था महारानी

आज नौकरानी है

हिन्दी के आँचल में है सद्भाव

मगर आँखों में पानी है।

गोरी मेंम को दिल्ली की गद्दी और मुझे बनवास।

कदम-कदम पर होता रहता है मेरा उपहास

सारी दुनिया भारत को देख कारण चमत्कृत है

एक भाषा-माँ अपने ही घर में बहिष्कृत है

बेटा, मै तुम लोगों के पापो को ही

बासठ वर्षो से बोझ की तरह ढो रही हूँ

कुछ और नही क्रर सकती इसलिए रो रही हूँ।

अगर तुम्हे मेरे आंसू पोंछने है तो आगे आओ

सोते हुए देश को जगाओ

और इस गोरी मेम को हटा कर

मुझे गद्दी पर बिठाओ

अरे, मै हिन्दी हूँ

मुझसे मत डरो

हर भाषा को लेकर चलती हूँ

और सबके साथ

दीपावली के दीपक-सा जलती

-गिरीश पंकज

8 Responses to “हिंदी दिवस पर विशेष : वह एक बूढी औरत”

  1. Dr. Dhanakar Thakur

    हिन्दी भारत की राजभाषा है राष्ट्रभाषा नहीं , यह संपर्क भाषा है और रहेगी
    संस्कृत या संकृतनिष्ठ हिन्दी ही राष्ट्रभाषा हो सकती है पर मुसलमान और हिन्दू का बड़ा हिस्सा इसे नहीं मानेगा
    इजरायल का उदाहरण नहीं चलेगा क्योंकि वहां के वल यहुर्दी राष्ट्र था भारत में हिन्दू छोड़ सभी राष्ट्र के अपने अपने रास्ते हैं –
    वैसे हिन्दी भाषी इस भ्रम को हटा लें की वे ही राष्ट्रिय हैं और नही -हिन्दी को सर्वग्रासी होने के बजाय सर्वस्पर्शी होना चाहिए –

    Reply
  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    गिरीश पंकज जी—-
    (१)जापान जापानी भाषा की नैया पर तर गया, आगे निकल गया।
    (२)इज़राएल ३६ भाषी देशों से नागरिक बसाकर, हिब्रु जो एक भी इज़राएली बोल न सकता था; उस स्थिति से हिब्रु को राष्ट्र भाषा बनाकर आगे बढ गया।
    (२क) बेन येहुदा ने अपने घरसे प्रारंभ कर के हिब्रु को राष्ट्र भाषा का पद दिलवाया। कब? जब एक भी इज़राएली हिब्रु बोल न पाता था।

    ———–
    (३)और हमारे सपनों का भारत, अंग्रेज़ी नहीं तो हिंग्रेजी, और हिंग्लिश में; सारे देश को लेकर, सबसे आगे खाई में गिरने के लिए लालायित है। जागो ! भारत जागो ! कुछ बुद्धि है या नहीं?
    ==>अल्पसंख्य लोगों का भला हो भी गया, तो भी समग्र देश का भला अंग्रेज़ी कर नहीं सकती।<===
    राष्ट्र भाषा का "गोवर्धन परबत" उठाने में सहायता चाहिए।
    अपनी भाषा को लेकर उसी गोवर्धन पर चढकर भार बढानेवाले –सावधान–नहीं चाहिए।
    राष्ट्रीय वृत्ति वाले ही आगे बढें।
    लेखक को, विलम्ब से ही सही, पर, बहुत बहुत धन्यवाद।
    आज पहली बार, हृदय विदारक कवित्त पढा।

    Reply
    • RTyagi

      माननीय डा० मधुसुदन जी,

      कुछ २-३ माह पहले सब आपने हिंदी के प्रचार प्रसार पर लेख लिखा तो अपने बच्चों को कैसे उचित और उपयोगी हिंदी शिक्षा माध्यम से व्यावहारिक रूप से शिक्षित किया जाये पर सुझाव माँगा था … और आपके अनुसार क्योंकि समस्या सर्व साधारण की थी, आपने १५ दिन बाद उस पर कुछ उपाय बताने का वादा किया था|

      कृपया बताएं की किस तरह आज के माहौल में अपने बच्चों को इंग्लिश स्कूलों के चंगुल से बचा कर हिंदी माध्यम से शिक्षा दी जाये जो उनके बोद्धिक विकास मैं सहायक होने के साथ साथ रोजगार परक भी हो..और अन्य अंग्रेजी माध्यम के बच्चों से प्रतिस्पर्धा भी कर सकें| आज हम पडोसी और समाज से प्रतिस्पर्धा (या कहें दिखावा) के कारन अपने बच्चों को इंग्लिश (और बड़े से बड़े, महंगे से महंगे) स्कूल में बच्चों को भेजने को मजबूर हैं… जो की हमारी जेब के आकार से भी बड़ी फीस ले कर लूट मचा रहे हैं…. सरकार मौन हो.. इस परिपाटी को फलीभूत कर रही है

      ऐसा इसलिए की हिंदी के प्रचार प्रसार के बारे में हम सिर्फ बातें कर या पढ़ पा रहे हैं.. उसको व्यावहारिक नहीं बना पा रहे| जब इसका हल मिल जायेगा… और जन साधारण जान जायेगा… हो सकता है… हिंदी और ज्यादा फल-फूल सके…

      आपके उत्तर का जवाब रहेगा…

      Reply
      • डॉ. मधुसूदन

        Dr.Madhusudan

        श्रीमान–त्यागीजी।
        भूल ही गया था । क्षमा कीजिए।
        अगला आलेख—इसी पर। स्मरण कराने के लिए धन्यवाद।

        Reply
  3. M.M.NAGAR

    हिंदी दिवस १४ सितम्बर के सन्दर्भ में:–>

    हिंदी को अभी बहुत काम करना बाकी है , उच्च न्यायालयों में आज भी हिंदी नहीं है, उच्च शिक्षा विशेषकर तकनीकी शिक्षा जैसे मेडिकल या इंजिनियर में हिंदी का प्रयोग नहीं होता ,शर्म की बात है

    अपने देश के नेता जो विदेश में हिंदी की जगह अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं जबकि दुसरे देश वाले अपने देश की भाषा को स्थान देते हैं ,हिंदी बोलने वालों को आज भी नीचा मन जाता है अंग्रेजी के मुकाबले

    ये अपेक्षित है की सरकार इसमें कोई सहयोग नहीं करेगी किसी भी राजनेतिक दल को हिंदी के लिए वोट नहीं मिलते सो वो कोशिश भी नहीं करती .

    हिंदीभाषियों को खुद जागना होगा ये काम करने होंगे व् सरकारों को भी हिंदी की शुचिता स्वीकार करने को विवश करना होगा और ये सब असंभव नहीं बस प्रेरक की आवश्यकता भर है.

    केवल लकीर पीटने के लिए हिंदी दिवस मनाने से कोई लाभ होने वाला नहीं

    Reply
    • Dr. Dhanakar Thakur

      तकनीकी विषयों की पढाई भारतीय भाषाओँ में हिने एही चाहिए – वे एक मानक तकनीकी शब्द सभी भरिय भाषाओँ में प्रयोग करें जैसे कभी लैटिन में पूरा यूरोप करता हटा- भारत के लिए यह संस्कृत से शब्द बनेंगे
      बिना संकृत के हिन्दी से ऐअसा लीछ नहीं हो सकेगा असिवय फ़िल्मी गानों- व्यापार और भाषण के

      Reply
  4. VIPUL

    In present scenario craze of hindi songs/ movies / TV serial & hindi culture is being followed & trained to many youngesters, when we go for bussiness meet even other nationals surprisingly greets us by saying “NAMSTE” but In india, so called hindi govt & young GEnX are not doing well for promotion of Hindi. Govt & we individual really need to SAVE HINDI LANGUAGE & HINDI CULTURE to keep India alive.

    Reply
    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      श्री विपुल,इस टिपण्णी को आपने हिंदी में क्यों नहीं लिखा?

      Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *