लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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   मृत्युंजय दीक्षित

हिंदी भारत की सबसे अधिक प्राचीन,सरल, लचीली ,लोकप्रिय व सीखने में आसान भाषा है। हिंदी का इतिहास भी बहुत ही प्राचीन है। हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इसलिये यह भाषा देवनागरी लिपि भी कही जाती है। देवनागरी में 11 स्वर और 33 व्यंजन भी होते हंै।  हिंदी भाषा का अब पूरे भारत मंे ही नहीं अपितु विदेशों में भी पर्याप्त प्रचार – प्रसार हो गया है। विदेशी मीडिया संस्थानों में हिंदी भाषा में कार्यक्रमों व समाचारों आदि का विधिवत प्रसारण हो रहा है।चीन, पाकिस्तान आदि देशों में भी हिंदी फिल्मंे व गाने लोगों को द्वारा खूब पसंद किये जा रहे हैं। आज लगभग पूरे विश्व में निश्चय ही हिंदी की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही  है। हिंदी भाषा को सीखना भी बहुत आान हो गया हैं । हिंदी विश्व की एकमात्र ऐसी भाषा है जिसके नियम अपवादविहीन हैं।

हिंदी का शब्दकोष विशाल है। माना जाता है कि हिंदी के मूल शब्दों की संख्या ढाई लाख से अधिक है तथा हिंदी बोलने ,लिखने एव समझने वालों की संख्या काफी तेजी से बढ़ रही है। एक प्रकार से हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली है। हिंदी विश्व की एकमात्र व्यवस्थित और उन्नत भाषा है।हिंदी भाषा का साहित्य सबसे समृद्ध व मनोरंजक तथा ज्ञानवर्धक साहित्य पाया जाता है। हिंदी भारत की सबसे आसान सम्पर्क भाषा है।आज हिंदी को जानने समझने एवं बोलने वाले तमिलनाडु से लेकर असम तथा मणिपुर अरूणंाचल और केरल में तो मिल ही जायेंगे साथ ही  विदेशों में चीन, रूस, अमेरिका से लेकर संयुक्त अरब अमीरात सहित खाड़ी के तमाम देशों व फिर जापान , यूरोपियन देशों में भी हिंदी को जानने वाल व उससे एक भाषा व संस्कृति के रूप मंे प्यार करने वाले मिल जायेंगे। आज हिंदी की लोकप्रियता इतनी बढ़ रही है कि यदि आपको केवल हिंदी ही आती है और अन्य किसी भाषा को बोलने व समझने में समस्या आती है तो भी आप असोम जैसे प्रांत मंे आसानी से घूम सकते हैं तथा आसानी से अपने सभी कार्योे को अंजाम दे सकते हैं।

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का बनाने का आंदोलन महात्मा गांधी और दयानंद सरस्वती ने तो प्रारम्भ किया ही वाराणसी में बीएचयू के संस्थापक मदन मोहन मालवीय भी हिंदी के प्रबल समर्थक थे। इसके साथ ही दक्षिण के अनेक संतों व सूफी आदि फकीरांे ने भी अपने मत का प्रचार- प्रसार हिंदी में ही किया है।हिंदी कई बोलियों में उपलब्ध है जिसमें अवधी,ब्रजभाषा,कन्नैाजी,भोजपुरी,हरियाणवी,राजस्थानी,छत्तीसगढ़ी, मालवी, झारखंडी, कुमांऊनी ,मगरी आदि प्रमुख हैै। स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में हिंदी भाषा का अप्रतिम योगदान रहा है। हिंदी भाषा के विषय में जितना भी लिखा जाये वह बेहद कम है।इतना सब कुछ होते हुए भी हिंदी आजादी के 70 साल बाद बहुत से क्षेत्रोें में उपेक्षित है ओैर कई कारणों से अपमानित भी होती रहती है तथा लगातार हो रही है। आजादी के 70 साल बाद भी आज देश की न्यायपालिका की भाषा हिंदी नही बन पायी है। सर्वोच्च न्यायालय मंे हिंदी का निर्णय सुनाया जाना आज भी सपना है। संसद में कई ऐसे सांसद हैं जो हिंदी के अच्छे जानकार होते हुए भी हिंदी मंे भाषण देने की जरूरत नहीं समझते और न हीं हिंदी में अच्छी बहस करने की क्षमता का प्रदर्शन करते हंै। आजादी के 70 साल बाद भी आम बजट और रेल बजट हिंदी मे नहीं पेश किया जा सकता है। केवल पूर्व रेल मंत्री रामविलास पासवान,पूर्व रेल मंत्री नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने ही कुछ हद तक हिंदी में रेल बजट का भाषण पढ़कर हिंदंी को समय -समय पर गौरवान्वित किया है। संसद में अधिकतर विधेयकों का प्रस्तुतीकरण अग्रेंजी में ही होता है तथा सांसदों की मांग पर ही हिंदंी व अन्य क्ष्ेात्रीय  भाषा में विधेयकों की कापी प्रदान की जाती है।

आज आजादी के 70 साल भी देश में इतनी सरकार आयीं और चलीं गयीं लेकिन किसी भी सरकार ने यह कोशिश नहीं की कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में स्थान मिल सके। दक्षिण भारत व देश के कुछ हिस्सों में आज भी कुछ राजनेैतिक दल अपने निहित क्षेत्रीय स्वार्थ के कारण हिंदंी के विरोध में आंदोलन खड़ा करते  रहते हैं।हिंदी कभी अपने सम्मान के लिए भूखी नहीं रही लेकिन कुछ निहित राजनैतिक स्वार्थी तत्वों ने हिंदी के समकक्ष उर्दू को खड़ा करने के लिए तथा इसकी आढ़ में मुस्लिम  वोट बैंक के तुष्टीकरण का खेल भी खेला गया।यह राजनीति उप्र में सर्वाधिक खेली गयी तथा अभी भी ख्ेाली जा रही है। हिंदी को अपमानित करने व  उसे कमजोर करने का हरसंभव प्रयास राजनैतिक दलों और निहित स्वार्थी तत्वों की ओर सेे हमेशा किया जाता रहा है। लेकिन हिंदी प्रगति के पथ पर लगातार बढ़ती जा रही है। हिंदंी का विकास लगातार होता जा रहा है। हिंदी को सबसे अधिक दबाने का प्रयास अंग्रेजी माध्यम के शिक्षण संस्थानों  की ओर से किया जा रहा है जिसका असर यह दिखलायी पड़ रहा है कि उप्र में माध्यमिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों मेें पढ़ने वाले हाईस्कूल और इंटर के छात्रों मे ं40 प्रतिशत छात्र या तो फेल हो गये । जबकि वास्तवकिता यह है कि हिंदी भाषा से कैरियर बनाना बेहद आसान हो गया है। हिंदी आम जनमानस व किसानों की भाषा है। जब कप्यंूटर और इंटरनेट की दुनिया का आगमन हो रहा था तब यह कहा जा रहा था कि कम्प्यूटर के आ जाने के बाद हिंदी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के अस्तित्व को गहरा खतरा उत्पन्न हो जायेगा। लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं हो सका और आज इंटरनेट के कारण हिंदी तो जन- जन की भाषा बनती जा रही है।

आज गूगल में हिंदी में कुछ भी खोजा जा सकता है। गूगल के कारण हिंदी सीखना भी आसान हो गया है। गूगल के कारण समाज से संबंधित हर विषय की समाग्री हिंदी में उपलब्ध हो चुकी है तथा हो रही है। वर्तमान समय में हिंदी पत्रकािरता ने भी हिंदी के विकास में अहम भूमिका अदा की है। आज अधिकांश गैर हिंदीभाषी  राज्यों व क्षेत्रों में भी हिंदी के समाचार पत्र व पत्रिकाएं मिल रही है। हिंदी हमारी मातृभाषा है, राष्ट्रभाषा है और रहेगी। पीएम नरेंद्र मोदी ने अपनी विदेश यात्राओं के दौरान कई अवसरों पर हिंदी में भाषण देकर हिंदी का गौरव बढ़ाया है। जिस प्रकार से पीएम मोदी ने योग के लिए  अंतराष्ट्रीय दिवस घोषित करवने में सफलता प्रप्त की है उसी प्रकार से हर हिंदी भाषी व प्रेमी को उम्मीद है कि एक  न एक दिन हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनेगी।लेकिन अब पीएम मोदी की सरकार अपना कायकाल तेजी से आगे की ओर बढ़ रही है लेकिन इस सरकार में भी हिंदी को संयुक्तराष्ट्र महासभा में स्थान नहीं मिल पाया है लेकिन एक बात और हुई है कि पीएम मोदी ने अपने विदेशी दौरांे मंे हिंदी काही उपयोग किया है जिस पर हम सभी को गर्व करना ही होगा। आज विश्व के 25 से अधिक देशों में अपनी हिंदी की धमक सुनायी पड़ रही है।  वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश की 1.2 अरब आबादी में से 41.03 फीसदी की मातृभाषा हिंदी है।   4.22 करोड़ लोगों ने अपनी मूल भाषा हिंदी बतायी है। दुनिया भर में 80 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलने वाले हो गये हंै। भारत में कम से कम 75 प्रशित लोग हिंदी बोलने व समझने मंे सक्षम हो गये हैं।

इंटरनेट के युग में हिंदी साहित्य को एक नया मंच हासिल हुआ है। इंटरनेट के कारण ही आज हिंदी साहित्य की नयी प्रतिभाएं सामने आ रही हंै तथा तमाम साहित्य आम जनमानस तक पहुंच  पा रहा है। आज इंटरनेट पर बहुत से एप और  यूटयूब चैनल हिंदी सिखा रहे हैं। आज कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जिसमें हिंदंी का उपयोग न किया जा रहा हो। लेकिन हिंदी कासर्वाधिक तिरस्कार और राजनैतिक कारणों से सर्वाधिक विरोध कहीं हो रहा है तो वह है कर्नाटक, तमिलनाडु  और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में। कर्नाटक में तो सबसे उग्र विरोध देखने को मिल रहा है जहां दुकानदारांे को अपने श्राइन बोर्ड में हिंदी लिखने की मनाही है। आखिर हिंदी से इतनी नफरत क्यांे रखी जा रही है? हिंदी विरोध केवल एक मानसिक राग हो गया है।

 

One Response to “हिंदी का राजनैतिक व मानसिक विरोध ?”

  1. इंसान

    मृत्युंजय दीक्षित जी द्वारा लिखा निबंध, “हिंदी का राजनैतिक व मानसिक विरोध?” भाषा-संबंधी विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत करता है जिन्हें हिंदी दिवस पर भय-प्रसारक रूप में सदैव दोहराया जाता रहा है| यदि हम राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा का विकास, विस्तार व व्यवहार चाहते हैं तो हमें वर्तमान स्थिति को सुधारने के लिए क्रियात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा| हिंदी भाषा के लिए नेतृत्व व नीति दो ऐसे महत्वपूर्ण व आवश्यक चरण है जो कभी संगठित रूप से किये जाते नहीं देखे गए हैं| हमारी खोज आजीविका पा लेने अथवा कोई धंधा अथवा व्यापार चला लेने तक ही सीमित है| सामाजिक संस्थाएं जिन्हें हम शंका की दृष्टि से अशासकीय संस्था (एन जी ओ) से पहचानते हैं अपने में केवल धंधा ही हैं| इसके अतिरिक्त किसी प्रकार के संगठन के नाम पर अब तक राजनैतिक कारणों वश मनोरंजन अथवा कुम्भ को छोड़ भीड़ केवल राजनैतिक आंदोलनों और बाबाओं के ढेरों अथवा पूजा-स्थलों पर देखी गई है|

    आज के राजनैतिक वातावरण में विद्यालयों व विश्वविद्यालयों और शासकीय व सामाजिक संस्थाओं में हिंदी व अन्य प्रांतीय भाषाओं पर निरंतर शोध कार्य द्वारा भाषाओं के प्रयोजन, उनके विकास, विस्तार, व व्यवहारिक प्रयोग पर विचार-विमर्श पश्चात आयोजित नीतियों को कार्यान्वित किया जाना चाहिए| मेरा अभिप्राय यह है कि जो काम तुरंत उत्तर उपनिवेश काल में कर दिए जाने चाहियें थे उन्हें आज के सामाजिक व राजनैतिक वातावरण अनुकूल सोच समझ कर शीघ्र किया जाना चाहिए|

    जहां तक गूगल व अन्य विदेशी वेब-स्थलों की बात है वहां हिंदी और पंजाबी (मेरी मातृभाषा) भाषाओं की धज्जियां उड़ते देखा है| भारत में अपने वेब-सर्वर होने चाहियें ताकि वहां अंतरजाल पर हिंदी वेब-पेज की गुणवत्ता पर नियंत्रण रखा जा सके|

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