लेखक परिचय

अभिषेक रंजन

अभिषेक रंजन

लेखक कैम्पस लॉ सेन्‍टर, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में एल.एलबी. (द्वितीय वर्ष) के छात्र हैं।

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-अभिषेक रंजन-  narendra-modi

‘टाइम’ पत्रिका की मानें तो नरेन्द्र मोदी अमेरिका के लिए मुसीबत बन सकते हैं। हाल में ही भारतीय राजनयिक देवियानी खोबड़ागड़े के साथ हुई बदसलूकी की वजह भारत-अमेरिका संबंधों में काफी खटास पैदा हो गया है। पत्रिका के मुताबिक, अब अगले चुनाव में काफी संभावना है कि मोदी देश के प्रधानमंत्री बन जाएंगे, ऐसे में वीजा न देने के फैसले को लेकर अड़े रहने वाले अमेरिका काफी पशोपेश में होगा। ओबामा कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी नीतियों को लेकर उन्हें आलोचना सहनी पड़े। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका मोदी को वाकई पसंद नहीं करता? यदि हां तो क्या अमेरिका मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकेगी?
इससे पहले कि हम उन तथ्यों पर जाएं, यह जानना जरुरी है कि अमेरिका मोदी को क्यों नापसंद करता है ?
पहली बात तो यह है कि मोदी आरएसएस और भाजपा सहित उस संघ परिवार से जुड़े हैं जिसे इसाई मिशनरी और इसाइयों के प्रभुत्वशाली देश नापसंद करते हैं। भारत में अगर आरएसएस और भाजपा नहीं होती तो इसाइयों द्वारा धर्म परिवर्तन के काम को काफी आगे बढ़ाया जा सकता था, लेकिन इनके हिन्दू धर्म विरोधी सभी प्रयासों का पुरजोर विरोध करने की वजह से संघ के कार्यकर्त्ता हमेशा चर्च और इसाइयों के निशाने पर रहते हैं। केरल में संघ परिवार से जुड़े लोगों की लगातार हो रही बर्बर हत्या इसका प्रमाण है। मोदी इस संघ परिवार के मजबूत चेहरा है। जाहिर है, ईसाई धर्म बहुल अमेरिका मोदी को प्रधानमंत्री बनता नहीं देखना चाहता।
दूसरी वजह यह है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार अमेरिकी नीतियों से काफी ज्यादा प्रभावित रहती है। उसके आर्थिक नीतियों में अमेरिका के हितों की ज्यादा चिंता दिखाई देती है। भारत अमेरिका असैन्य परमाणु करार और खुदरा क्षेत्र (रिटेल) में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को तमाम विरोधों के बाद भी मंजूरी दिलाने की कोशिश इसका बड़ा उदाहरण है। नरेन्द्र मोदी और भाजपा इन दोनों फैसलों के खिलाफ़ है। समझना कठिन नहीं है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही दोनों फैसले पलट दिए जाएंगे।
तीसरी वजह यह है कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार न केवल आर्थिक मसले पर, बल्कि विदेश नीति के मामले में भी अमेरिका का पिछलग्गू देश बन गया है। भारत की विदेश नीति इतनी ढीली-ढाली कमजोर हो गई है। न केवल पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश, नेपाल जैसे पड़ोसी देश चढ़ बैठे हैं, बल्कि दुनिया के बाकी हिस्सों में भी भारत की प्रतिष्ठा कम हुई है। समुद्री मछुआरे की हत्या के मामले में इटली ने तो आंख दिखाया ही, कैप्टन सुनील जेम्स के मामले में टोगो जैसा देश भी भारत की नहीं सुन रहा था। नरेन्द्र मोदी की छवि और भाजपा के नेतृत्व में बनी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार की मजबूत विदेश नीति के रिकॉर्ड को देखते हुए अमेरिका को लगता है कि भारत की स्थिति विश्व में मजबूत हो जाएगी।
चौथा कारण है कि मोदी और भाजपा स्वदेशी विचारों को आगे बढ़ाने के समर्थक हैं। हाल में हुई कई घपले-घोटाले विदेशों से ख़रीदे गए सौदों में देखने को मिली है। साफ़ है कि मोदी के नेतृत्व में अमूमन भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टोलेरेंस की नीति पर चलने वाली भाजपा सरकार की नीतियां अमेरिका के हितों के विरुद्ध होगी। भारत अपनी स्वदेशी तकनिकी और आर्थिक नीतियों से ही ताकतवर बन जाएगा, ऐसे में अमेरिका का एक बड़ा बाज़ार समाप्त हो जाएगा। मतलब साफ़ है कि मोदी का प्रधानमंत्री बनना अमेरिका के हित में कतई नहीं है। जाहिर है, वह कुछ ऐसे षड्यंत्रों का सहारा ले रहा है ताकि मोदी की छवि ख़राब की जाए। अमेरिका चाहता है कि किसी भी तरीके से मोदी को कमजोर किया जाए ताकि भाजपा सरकार न बना पाए और उसके हितों की सुरक्षा हो सकें।
मोदी का विरोध करने के लिए अमेरिका कर क्या रहा है
कल ही दिल्ली हाईकोर्ट ने जाने माने अधिवक्ता एम.एल.शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को एक नोटिस जारी करके कुछ बिन्दुओं पर जबाब मांगा है। चौंकाने वाली बात इसमें यह है कि यह नोटिस अमेरिका से आम आदमी पार्टी के समर्थन में आए लाखों फ़ोन कॉल से संबंधित है। इस याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि पिछले साल 2013 में नवंबर और दिसंबर महीने में 6 लाख से भी ज्यादा फ़ोन कॉल अमेरिका से आम आदमी पार्टी के समर्थन में आए है। तक़रीबन 10 करोड़ से भी ज्यादा खर्च वाले इन फ़ोन कॉल का मकसद आम आदमी पार्टी के समर्थन में प्रचार और लोगों से वोट मांगना था। अपनी याचिका में शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि यह सारा काम बिना गृह मंत्रालय की जानकारी के बगैर हुआ है जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की अखंडता और भारतीय लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है।
समझने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए कि अमेरिका ने मोदी विरोध के नाम पर अपना एक मुखौटा खड़ा कर दिया है ताकि किसी भी तरह मोदी को रोका जा सकें। अमेरिका स्थित फोर्ड फाउंडेशन से अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसौदिया के बड़े गहरे संबंध रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन ने ही केजरीवाल को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार देकर नाम चमकाने का मौका दिया। अब वही सत्ता हथियाने में मदद कर रही है।
मोदी को वीजा न देने की बात बार-बार अमेरिका दुहराता रहता है। सोचने वाली बात है कि जब मोदी ने कभी वीजा मांगा ही नहीं तो देने और न देने की बात कहां से आ जाती है। पिछले ही दिनों अमेरिकी कांग्रेस में एक प्रस्ताव मोदी को वीजा न देने के लिए लाया गया जिसमें 2 मुस्लिम सहित 43 सदस्य शामिल थे। जाहिर बात है, वीजा का मुद्दा बार-बार उछालकर अमेरिका मोदी को नीचा दिखाना चाहता है, ताकि यह बात पुरे दुनिया सहित आम भारतियों के पास जाए कि मोदी को अमेरिका वीजा नहीं दे रहा। ऐसे आदमी को प्रधानमंत्री बनाना सही रहेगा!
अमेरिका में कुछ ऐसे बुद्धिजीवियों का समूह भी सक्रीय है जो विश्व पटल पर गुजरात के दंगे के नाम पर भारत को बदनाम करने और मोदी की छवि बिगाड़ने में जुटा रहता है। व्हार्टन विवाद उसी का एक छोटा सा नमूना है। इसके साथ ही भारत के वामपंथी बुद्धिजीवियों का भी अमेरिका कनेक्शन है, जो वहां के धार्मिक और राजनीतिक मामलों के समूह को मोदी विरोध के लिए उकसाते रहते हैं। अब जबकि कोर्ट से मोदी को क्लीन चीट मिल गई है, फिर भी डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट दिन-रात इसी जुगत में जुटा रहता है कि कहां से कुछ ऐसा ढूंढ़ निकाले जिससे मोदी घिरते दिखाई दें। साफ़ है, अमेरिका मोदी को प्रधानमन्त्री बनते नहीं देखना चाहता। अब देश की जनता को यह तय करना है कि वह अमेरिकी इच्छा का सम्मान करेगी या अपने स्वाभिमान की रक्षा करके अपने और देश के हित में मोदी को प्रधानमंत्री बनाने या न बनाने का फैसला लेगी।

29 Responses to “मोदी विरोधी अमेरिका और ‘आप’”

  1. कालचक्र

    आज हमें अरविंद केजरीवाल जैसे सी आई ऐ ऐजेंट की नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी जैसे राष्ट्रवादी नेता की जरूरत है जो व्लादीमिर पुतिन की तरह देश को स्वावलम्बी और अग्रणी बना सके । sad, media lobby is backing them , nilekani’ s wife sells 5.77 lakh sharesshares of infosys and shifts to delhi for philanthropy, odyar (who bought snowdensnowden’s papers to save nsa’s ass) spending 125 crores for philanthropy, kejriwal is a big scam in himself, whatever he says don’ t fall prey in his trap , dont get involved in fake sting operations, he says give bribe to anyone who asks for it dont deny,deny give him just make a  video or audio, think what he will do, he will not take any action against anyone but just make him as well as you a hostage by blackmailing, also please change your phone numbers as you are already half way trapped by passing them to these dramebaazs

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      ठीक है.अपनी अपनी पसंद है,पर अरविन्द केजरीवाल सी.आई.ए के एजेंट हैं ,यह तो कोरी कल्पना है,पर यह सत्य है कि नमो पूंजीपतियों के दलाल और दागियों के समर्थक होने के अतिरिक्त भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले अवश्य हैं. गुजरात ही ऐसा राज्य है,जहां लोकायुक्त को पंगु बना दिया गया है.अब आआप का लोकायुक्त बिल भी आया है,जिसको रोकने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों एक हो गयी है. एक अन्य बिल भी सामने है,स्वराज बिल,जिसके द्वारा दिल्ली की जनता के हाथों शासन का अधिकार दिया जाना है.कांग्रेस और भाजपा इसको भी नहीं पारित होने देगी,क्योंकि अगर जनता के हाथों में शक्ति आ गयी ,तो खाने कमाने का धंधा ठप हो जाएगा.

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      चौथी दुनिया का लिंक में प्रदर्शित आलेख देख कर कोई आश्चर्य नहीं हुआ.बाद में एक और सत्य सामने आया है. तीन अफ़्रीकी औरतों ने पुलिस में मामला दर्ज कराया है कि उनको बरगला कर युगांडा से अच्छे जॉब देने के बहाने यहाँ लाया गया था और अब उनसे जबर्दस्ती वेश्या वृति कराई जा रही है. अब तो शायद वह अफ़्रीकी औरत गिरफ्तार भी हो चुकी है,जिसने यह सब किया था. ऐसे भी चौथी दुनिया ने आआप के पक्ष में कभी कुछ लिखा है ,ऐसा मुझे नहीं लगता.

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      • शिवेंद्र मोहन सिंह

        बरगलाना तो कोई “आप” से सीखे. बात कि धारा को सफाई से मोड़ कर दूसरी तरफ कर दो. मुद्दे से ध्यान हटा दो. ॐ पवित्राये नमः….ॐ पवित्राये नमः…ॐ पवित्राये नमः… कानून मंत्री जी दोष मुक्त. सारा दोष यूगांडा से आई महिलाओं कि तरफ. जो दुनिया का छंटा हुआ स्पैमर, — साइटें चलाता हो वो तो पवित्र बाकी सब भ्रष्ट, क्योंकि माननीय हरिश्चंद्र जी की पार्टी का है. सच्चाई का ठेका “आप” के पास है, जो हम बोलें वही सत्य है शेष असत्य. जो पोल खोले वो भ्रष्ट. क्योंकि भ्रष्टाचारी होने सर्टिफिकेट देने का ठेका मेरे पास. बोले सो निहाल…. केजरीवाल केजरीवाल

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  2. narendrasinh

    मुजर तो लगता है ये आर आर सिंह साहेब कि मत मरी गयी है है उनके लिखावट कि जो दें भगवन ने उन्हें दी है उसका ये भरपूर प्रयोग देश विरोधी कम के किये कर रहे है ! मई तो एक ही बात कहूंगा कि हवा के साथ चलना ही एक सुबुध्धा नागरिक कि पहचान है और मरी समाज में ये नहीं आता कि आप लोग ये क्यों नहीं सोचते कि कोंग्रेस के सहारे जीने वाली पार्टी मोदी का विरोध क्यों करती है ? आज परिस्तिति ऐसी है कि राजकाज से अनजान इंसान भी समाज सकता है कि मोदी देश कि जरुरत है तो फिर आप पढ़े लिखे लोको के दिमाग में ये बात क्यों नहीं जाती !!

    बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि गुलामी मानसिकता में से जो लो ग आज भी बहार नहीं आये वो ही ऐसी बात कर सकते है जैसी आर आर सिंह करते है !

    आर आर सिंह जरा अपने आप में से बहार आके देश और देशवासियो के बारे में तनिक सोचिये अगर आपको मोदी सही न लगे तो आप लिखते जाना सिर्फ एक बार मातृभूमि के लिए सोचिये !!!!!

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      नरेंद्र सिंह जी मुझे तो नहीं लगता कि मुझे कोई लिखावट की देन मिली है,पर आप कहते हैं तो इसे भी मान लेता हूँ.आप मेरे विचारों को देश विरोधी क्यों कह रहे हैं?क्या नमो के या आपलोगों के विचार धारा से अलग होना देशविरोध है? आप मुझे नहीं जानते औरमैं समझता हूँ कि जानने की कोई आवश्कता भी नहीं है.मैं केवल टिपण्णी नहीं करता ,कुछ अलग से भी लिखता हूँ.फुर्सत मिले तो आप उसे भी पढ़ लीजियेगा. एक बात अन्य बात भी आपको बतादूँ.मेरे विचार गलत हो सकते हैं,पर आपको उसे गलत सिद्ध करना होगा. हिटलर ने कहा था और शायद स्टालिन ने भी उसे दोहराया था कि झूठ को भी सौ बार जोर देकर कहो ,तो वह सत्य दिखने लगता है.यही आज हो रहा है.मगर मेरी निगाह में झूठ झूठ ही रहेगा ,चाहे उसे लाखों बार सत्य सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाए. मैंने जब जब नमो के विरुद्ध कुछ कहा है तब तब उसके लिए प्रमाण दियें हैं.पेशे से अभियंता हूँ,अतः दो और दो मिलाकर चार ही बना सकता हूँ,पांच या तीन नहीं.साम्प्रदायिकता और जाति प्रथा का हृदय से विरोधी हूँ.मेरी टिप्पणियों या रचनाओं में भी वही दृष्टिगोचर होता है . मुझमें एक अन्य बुराई भी है.किसी का बड़ा नाम मुझे प्रभावित नहीं करता,क्योंकि बड़ों बड़ों को मैंने कालांतर में बौने में परिवर्तित होते देखा है.

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  3. राकेश कुमार आर्य

    Rakesh Kumar Arya

    अभिषेक जी,सुंदर आलेख के लिए हार्दिक धन्यवाद ।
    अमेरिका भारतीयता को प्रबल होते देखना कभी नही चाहेगा और न ही वह एक शक्षम ,समर्थ और सुद्रद्द देखना चाहेगा। निसंदेह मोदी उभरते हुए भारत की चमकती हुई तस्वीर हैं। उन्होने भारत के क्रांतिकारियों को और भारत के महान स्वतन्त्रता सेनानियो को बार-बार अपने भाषणों मे स्थान देकर सिद्ध किया है कि भारत की आजादी के लिए कितने लोगो ने सपने बुने और कितने लोगो ने अपना बलिदान दिया। ‘आप’ ने दिल्ली की जनता को एक भ्रांति मे डाला कि हम ईमानदार बाकी सब बेईमान हैं।पर अब पोल खुल रही हैं कि इन तथा कथित ईमानदारों के सरताज केजरीवाल जी ने चुनाव के समय अपना झूठा सपथपत्र दिया जिसमे अपनी संपत्ति का विवरण भी गलत दिया और अपना पता भी गलत दिया।जिसने राजनीति की सीढी चढ़ने के पहले दिन ऐसी बेईमानी की वह कितना ईमानदार होगा इससे इसका पता चलता हैं।व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन उसके सार्वजनिक जीवन की नीव होता हैं।यह पश्चिम की धारणा है कि व्यक्तिगत जीवन अलग और सार्वजनिक जीवन अलग होता हैं।भारत मे इस धारणा को नेहरू जी लाये। आपके अच्छे लेख के लिए एक बार फिर धन्यवाद।
    सादर।

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  4. आर. सिंह

    आर.सिंह

    बात पुस्तक पढ़ने की नहीं,विचारों पर अमल करने की है. मैंने पहले भी लिखा है कि अगर कांग्रेस ने महात्मा गांधी के विचारों के अनुसार कार्य किया होता या भाजपा ने पंडित दीन दयाल उपाध्याय के विचारों का अनुसरण किया होता,तो न भारत में इतनी विषमता होती और न इतना भ्रष्टाचार फैलता.बात उस समय की है,जब गुरु गोलवरकर सर संघ संचालक थे. किसी ने उनसे पूछा था कि आप तो भारतीय संस्कृति की बात करते है.संघ की आर्थिक विचार धारा क्या है ,इसपर आप कभी नहीं बोलते.इस पर गुरूजी का उत्तर था.यह कार्य पंडित दीन दयाल उपाध्याय के जिम्मे है.तो ऐसे थे पंडित जी मैं यहाँ पुस्तक पढ़ने की बात नहींकर रहा हूँ.बात विचार धारा की हो रही है.
    रही बात दागियों के सरकार को समर्थन देने की,या उनसे समर्थन माँगने की,तो आआप गल्ला फाड़ फाड़ कर चिल्ला रही है कि मैंने कभी समर्थन नहीं माँगा और आज भी अगर सरकार गिर जाती है तो हम जनता के पास जाने को तैयार है,फिर भी अगर कोई सरकार को गिरने न देना चाहे तो क्या किया जा सकता है?इसमे भाजपा का भी कम दोष नहीं है.एक तो उसने सरकार नहीं बनाया,जबकि भाजपा की सरकार भी नहीं गिरती,क्योंकि कांग्रेस और आआप एक साथ वोट नहीं करते और अगर कर देते तो दोनों की मिलभगत उजागर हो जाती.दूसरे केजरीवाल ने जब तक सरकार नहीं बनाने की सोची,तब तक डाक्टर हर्षवर्द्धन गल्ला फाड़ कर चिलाते रहे कि आआप को बिना शर्त समर्थन मिल रहा है,फिर भी वह जिम्मेवारी से भाग रही है.यह तो वही बात हुई न चित भी मेरी पट्ट भी मेरी.

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    • शिवेंद्र मोहन सिंह

      वाह सिंह साहब बड़ी दूर कि कौड़ी लाए हैं. दूसरों को भ्रम में डालना, मीडिया मैनेज करना सही को गलत और गलत को सही करना,कोई “आप” से सीखे. चुनाव परिणाम के तुरंत बाद शाम को माननीय हरिश्चंद्र जी का क्या स्टेटमेंट था? शायद आप भूल गए हैं या यहाँ भी मैनीपुलेशन? ये आप ही बेहतर जानते हैं. चलिए मैं आपको याद दिला देता हूँ, “ना हम समर्थन देंगे ना हम समर्थन लेंगे”, फिर भाजपा कि सरकार कैसे बन जाती? क्या अटल जी जैसे १३ दिन कि सरकार बनती? “आप” ने भाजपा को क्यों नहीं बोल दिया कि आप सरकार बनाइये, हम सदन से अनुपस्थित हो जाएंगे या आपके पक्ष में वोट देंगे?

      “ना हम समर्थन देंगे ना हम समर्थन लेंगे” , ” मैं अपने बच्चों कि कसम खा के कहता हूँ कि….”, इन बातों के बाद अपनी ही बातों से मुकरना, इसी को कमजोर चरित्र या मौकापरस्ती कहते हैं.

      आपके सामने के घर का दरवाजा खुला है और आपका पडोसी आपको भड़का रहा है कि कोई नही है घुस जाओ घर में घुस जाओ, तो क्या आप उस घर में घुस जाएंगे ? अगर नैतिक बल मजबूत होगा तो नहीं जाएंगे उस घर में, और अगर चरित्र कमजोर होगा तो अंदर दाखिल हो जाएंगे. इसी को मौका परस्ती, दुर्भावना कहते हैं.

      डाक्टर हर्षवर्द्धन चिल्ला रहे थे तो सरकार बना ली और डाक्टर हर्षवर्धन चिल्ला रहे हैं कि क़ानून मंत्री को बर्खास्त करो बर्खास्त करो तो अब क्यों नहीं उनकी बात मानी जा रही है?

      कुछ समय इन्तजार करते और दोबारा चुनाव का सामना करते तो आज जो सब तरफ से उलाहने और कटाक्ष आ रहे हैं ये नहीं आते और “आप” दिल्ली में पूर्ण बहुमत से आती और लोगों का ज्यादा भला होता. ईमानदारी और शुचिता कि नई परंपरा का शुभागमन होता. लेकिन आप लोग रस्सी को सांप और सांप को रस्सी बनाने पर आमादा हैं.

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      • आर. सिंह

        आर.सिंह

        अब वह समय भी आ रहा है,जब या तो स्वराज और जन लोकायुक्त बिल पारित होगा या सरकार गिर जायेगी.तब सरकर का असली उद्देश्य सामने आ जाएगा और तब यह कहने का शायद ही किसी को साहस हो कि अरविन्द केजरीवाल और उनकी सरकार जिम्मेवारियों से भाग गयी.भाजपा और कांग्रेस दोनों की कथनी और करनी का अंतर भी समझ में आ जाएगा.
        बार बार यह दोहराया जा रहाहै कि बच्चों की कसम तोड़ दी. जब अरविन्द केजरीवाल ने न समर्थन माँगा और न समर्थन लिया,तब कसम कहाँ टूटी? रही बात सरकार बनाने के समय डाक्टर हर्षवर्द्धन की बात मानने और सोमनाथ भारती के समय न मानने कि तो इसमे बीच में आम आदमी भी है,जिसके विचार सर्वोपरी हैं.पहले हालत में आम आदमी के विचार भी डाक्टर हर्षवर्द्धन के विचारों से मेल खाते थे,पर दूसरे हालत में आम आदमी के विचार डाक्टर साहिब के विचारों से भिन्न हैं,ख़ास कर उस चुनाव क्षेत्र के जनता के विचार जिसका प्रतिनिधत्व सोम नाथ भारती करते हैं. अब तो परिस्थितिया कुछ ऐसी बदली हैं कि यह सिद्ध हो चूका है कि वे तीनों औरतें वास्तव में बेश्या वृति में निमग्न होने के लिए बाध्य की गयी थी.और उस समय वहाँ वही हो रहा था ,जिसके लिए सोमनाथ भारती ने पुलिस को छापा मारने के लिए कहा था.

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        • शिवेंद्र मोहन सिंह

          वाह सिंह साहब,

          मीठा मीठा वाह वाह …. कड़वा कड़वा थू थू थू …

          १- हल्ला जनलोकपाल बिल का हो रहा है और आप बोल रहे हैं “जन लोकायुक्त”?
          = झूठ आप बोल रहे हैं या “आप” की सरकार, इसी को खुली आँखों में धूल झोंकना कहते हैं.

          २- जन लोकपाल बिल नियम विरुद्ध कैसे पास करवा सकते हैं ?
          = मतलब साफ़ है बिल पास करवाने की मंशा ही नहीं है. “आप” को पता है की बिल किस तरह लाया जाता है और बिल पास किस तरह होता लेकिन नीयत नहीं है,इसलिए नियम विरुद्ध जा के खुद अपनी सरकार गिरवाई जाए और मीडिया में प्रोपोगेंडा करके शहीद का दर्जा पाया जाए. संसद के नियम विरुद्ध सिर्फ नक्सलवादी और देश ध्वंशक ही जाते हैं. तो “आप” को क्या कहा जाए? जिनकी लोकतंत्र में आस्था नहीं होती है वही इस तरह के कार्य करते हैं.

          जिसकी लोक तंत्र में आस्था होती है और काम करने का मन होता है वो भांडगिरी नहीं करता है. और “आप” सिर्फ यही कर रही है. बाकी तीन सरकारें अपना अपना काम कर रही हैं और “आप”, धरना प्रदर्शन और नाटक के सिवा कुछ नहीं कर रही है. ये सिर्फ कुछ एक नक्सलियों का समूह है जिसकी देश के लोकतंत्र और विधि में कोई आस्था नहीं है, इनका कार्य है सिर्फ और सिर्फ अराजकता फैलाना.

          सनद रहे “आप” को दिल्ली विधान सभा में २८ सीटें मिली हैं ना की लोकसभा की और रही बात भाजपा के समर्थन की और भाजपा और कांग्रेस को बेनकाब करने की तो कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही कह रही है कि हम लोकपाल के नहीं लोकपाल लाने के तरीके के खिलाफ हैं।

          दिनकर के शब्दों में कहें तो
          समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध्र,
          जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध.

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          • आर. सिंह

            आर.सिंह

            दिनकर के ये शब्द न तो आआप पर लागू होते हैं और न मुझ पर.अब आती है बात बिल पर और बिल के तरीकों पर. एक प्रशासनिक आदेश के अंतर्गत,जिसका संविधान से कुछ लेना देना नहीं है, एक आपत्ति लगा दी गयी और बहाना मिल गया दोनों पार्टियों को उसका विरोध करने के लिए.अगर यह आपत्ति नहीं भी लगती ,तो एक दूसरा बिंदु होता विरोध के लिए.वह यह होता कि यह संसद द्वारा पारित लोकपाल बिल के विरुद्ध जाता है.अतः पारित तब भी नहीं होता,पर अभी बहाना ज़रा बेहतर है. जिस तरह दोनों पार्टियों ने मिलकर स्पीकर को शक्ति हीन बना दिया था,वह कहाँ तक जायज था?
            असल लड़ाई तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध है.वह चाहे जहां से लड़ी जाए.आज भाजपा चाहे भ्रष्टाचार के विरुद्ध कुछ भी कहे ,पर इतने वर्षों से उसने भी इसे बढ़ावा ही दिया है. इस पर मुकेश अम्बानी के विरुद्ध ऍफ़.आई.आर . रही सही कसर इसने पूरी कर दी.अरविन्द केजरीवाल ने ठीक ही कहा कि मुकेश अम्बानी के विरुद्ध ऍफ़.आई.आर ने दोनों पार्टियों को एक साथ खड़ा कर दिया आआप के विरोध में.

  5. आर. सिंह

    आर.सिंह

    अमेरिका से आये फोन काल के लिए भी बहुत हो हल्ला हो रहा है,तो मेरे समझ में यह नहीं आ रहा है कि अमेरिका से आये व्यक्तिगत फोन कालों में यह वर्गीकरण कैसे हो रहा है कि वे काल आम आदमी पार्टी के लिए थे.अगर इस बात का पता है कि वे काल आआप के लिए थे तो यह भी पता होना चाहिए कि काल करने वाले कौन थे?क्या वे प्रवासी भारतीय नहीं हो सकते थे?क्या किसीप्रवासी भारतीय का अपने मित्र या सम्बन्धी को फोन करना राष्ट्र के लिए खतरनाक है?इन सब पर भी बहस होनी चाहिए.ऐसे तो बहुत प्रवासी भारतीय अपना कार्य छोड़ कर या छुट्टी लेकर आये थे और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के प्रचार कार्य में लगे हुए थे.क्या वे सब विदेशी सरकारों के एजेंट थे? वास्तविकता यह है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय अपने देश में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार से बहुत शर्मिंदगी महसूस करते हैं.जब उन्हें एहसास हुआ कि नई पार्टीं भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रही है तो उन्होंने इसमें योगदान देना अपना कर्त्तव्य समझा.

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  6. Himwant

    किसी भी देश की विदेश निति का आधार राष्ट्र-हित होता है. वैदेशिक सम्बन्ध किसी धार्मिक आस्था या राजनितिक वाद से निर्देशित नहीं होती है. और देश के ब्यूरोक्रेट्स के पास एक संस्थागत स्मरण ( इन्स्त्युचेश्नल मेमोरी) भी होती है, देश की सत्ता पर कोई भी आए परम्परागत सम्बन्ध के अपने मायने होते है. जहां तक खोबरगड़े प्रकरण का सवाल है, वह मुझे स्वभाविक एवं स्वस्फूर्त नहीं दिख पड़ती. मोदी को सत्ता सौपने के पहले सभी देशो से सम्बन्ध खराब करने की कांग्रेस की सोची समझी रणनीति के तहत वह सब कुछ हुआ है.

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  7. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    मुख्य मंत्री अमृतम योजना-गुजरात राज्य।
    मोदी जी की यह योजना गुजरात में चल रही है। मात्र जानकारी हेतु प्रस्तुत।
    ==========================================================
    =====>आपको किसी भी प्रकार के इलाज की जरूरत है तो आप माननीय नरेन्द्र मोदीजीकी ड्रीम योजना, मुख्यमंत्री अमृतम योजनाका लाभ जरुर लें ..इसमें आपको २ लाख रूपये तक का इलाज मुख्यमंत्री राहत फंड से होगा तथा आजीवन आपकी दवाओं का खर्च भी सरकार वहन करेगी ..गुजरात के कई बड़े अस्पतालों में इसके लिए विशेष काउन्टर बनाये गये हैं..और यदि आपके किसी १२ साल से कम उम्र के बच्चे को कोई तकलीफ जैसे है दिल में छेद, कटे होंठ, भेंगापन आदि है तो उसका ओपरेशन भी पूरी तरह से निशुल्क होगा ..यदि आपको इस योजना के बारे में कोई सहायता या अन्य किसी भी प्रकार की जानकरी चाहिए तो आप नीचे दिए सम्पर्क सूत्रों पर बात कर सकते हैं।
    .Email : mayojanagujarat@ gmail.comOffice : +91-79-23265301Fax : +91-79-23253311Toll Free : 1800-233-1022ज्यादा से ज्यादा शेयर करें विशेष तौर पर अपने मित्रों के साथ या कापी पेस्ट करें, शायद आपके प्रयास से किसी गरीब का जीवन बच जाए जो धन के आभाव के कारण अपना या अपने किसी परिवार जन का इलाज नहीं करवा पा रहा है|

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  8. आर. सिंह

    आर.सिंह

    ऐसे इस तरह के एक तरफ़ा और अपनी डफली अपना राग वाले आलेखों पर टिपण्णी करना समय की बर्बादी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है,पर कभी कभी लगता है कि मौन स्वीकृति लक्षणम समझते हुए लोग यही समझेंगे कि सब इस मूर्खता पूर्ण आलाप के समर्थक हैं.पहले तो कांग्रेस और आआप में सम्बन्ध की बात..आआप ने कांग्रेस को दिल्ली में समाप्त कर दिया,तब भी यदि कुछ लोगों को लगता है कि आआप कांग्रेस से मिली हुई है तो मैंने पहले भी लिखा है कि यह मर्ज लाइलाज है. यह भी सत्य है कि आआप को मुस्लिमों के वोट नहीं मिले और कुछ लोग बीजेपी के इस प्रचार में धोखा खा गए कि आआप को वोट देने से आप का वोट बर्बाद होगा और परोक्ष रूप से कांग्रेस को लाभ होगा,नहीं तो नजारा कुछ और होता..
    रही बात विदेशों से चंदा लेने कि तो जिन पार्टियों के ८६%(कांग्रेस) और ७४%(भाजपा) अनुदान बेनामी हैं,जो क्रमशः १४०० करोड़ रूपये और ९०० करोड़ रूपये होते हैं,उन पार्टियों के समर्थक अगर ५ करोड़ विदेशी अनुदान को ,जिसका रसीद मौजूद है,अमरीकी कंपनियों द्वारा दिया मानते हैं तो ऐसी वेशर्मी के लिए कौन सा शब्द इस्तेमाल किया जाए?
    आआप ने दिल्ली में ऍफ़.डी.आई. पर रोक लगा कर दिखा दिया है कि वह किसी अमेरिकी कंपनी या अमेरिकी शासन द्वारा नहीं संचालित होता है.आआप की आर्थिक या प्रशासनिक विचार धारा भी किसी से प्रभावित है तो वे हैं पंडित दीन दयाल उपाध्याय और महात्मा गांधी. दिल्ली में जब प्रत्येक वार्ड में चार चार मुहलाक सभा काम करने लगेगी और सरकारी अनुदान विधायकों के बदले इन मुहल्ला सभाओं द्वारा खर्च होने लगेगा,तब लोगों को पता चलेगा कि यह किस देश के इशारे पर हो रहा है.
    नमो भक्तों को मैं केवल यही कहना चाहूंगा कि वे अंध भक्त न बने और वास्तविकता को समझे. मैं नहीं जानता कि कितने लोग समूल व्यवस्था परिवर्तन और नई बोतल में पुरानी शराब में अंतर समझते हैं,पर मैं यह अवश्य कहूंगा कि जहां आआप का उद्भव एक क्रांति है,वहीँ कांग्रेस से भाजपा और भाजपा से कांग्रेस केवल आँख मिचौली है.

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    • शिवेंद्र मोहन सिंह

      मुंगेरी लाल के हसीन सपने ……

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  9. आर. सिंह

    आर.सिंह

    ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी की वकालत करने वाले अपने को सबसे अधिक बुद्धिमानमानते हैं,पर वे भूल जाते हैं कि बुद्धि किसी की बपौती नहीं है.ऐसा नहीं है कि भारत में मोदी के समर्थकों को छोड़कर अन्य सब मूर्ख हैं. मैं अनेकों बार लिख चुका हूँ कि आआप उसी सपने को साकार करने में लगी है,जो पहले महात्मा गांघी ने और बाद में पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने देखा था. लोग एकात्म मानववाद की चर्चा तो करते हैं,पर उसमे वर्णित सिद्धांतों का नमो अनुसरण करते हैं या नहीं इसपर किसी ने ध्यान दिया है?मैंने पहले भी लिखा है कि आप को समझने के लिए चार पुस्तकें पढ़नी पड़ेगी.महात्मा गांधी का हिन्द स्वराज ,पंडित दीन दयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद और भारतीय अर्थ नीति:एक दिशा निर्देश और अरविन्द केजरीवाल का स्वराज. आआप के बारे में झूठे बकवास करने और फोर्ड के इशारे पर उसके चलने के बारे में गलतफहमी फैलाने वाले पहले इनका अध्ययन करें,तब वे कुछ कहें. आआप या अरविन्द नमो की तरह पूंजीपतियों के दलाल नहीं है,न भ्रष्टों के हिमायती. नमो या बीजेपी भ्रष्टाचार में कांग्रेस से पीछे हो सकते हैं,पर कमोवेश ये दोनों पार्टियां एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं.नमो मनमोहन सिंह की तरह व्यक्तिगत रूप में ईमानदार हो सकते हैं,पर जिस तरह उन्होंने दागियों को अपने मंत्रिमंडल में प्रश्रय दिया हुआ है,उससे तो नहीं लगता कि वे भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैं. अनेक ऐसी बाते हैं,जिसपर मैं पहले भी प्रकाश डाल चुका हूँ,पर नमो भक्त तो अपने प्रभुनाम की माला जपने में लगे हुए हैं,उनको सत्य कैसे दृष्टिगोचर हो?

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    • RTyagi

      बहुत अच्छा लेख अभिषेख जी.. पर कुछ लोग इसको बस विरोध ही समझेंगे…

      इसका मतलब यह हुआ… कि आप पार्टी भी अन्य पार्टियों कि तरह भविष्य में .. अपने संस्थापक केजरीवाल के मूल्यों को भूल कर खांग्रेस के मार्ग पर चलने वाली है …(क्योंकि केजरीवाल के अतिरिक्त सभी इसी पृथ्वी गृह पर जन्मे हुए हैं, और अपना मानव चरित्र नहीं छोड़ सकते…और यह आने वाला समय सिद्ध भी करेगा… मेरी यह टिपण्णी सहेज कर रख लेना)…. तब क्यों अपना समय और ऊर्जा बर्बाद करनी… क्यों न एक हिंदुस्तव और रास्ट्रधर्म पर चलने वाली पार्टी बीजेपी को अपना समय और समर्थन दिया जाये…

      हाँ तो जय बीजेपी, नमो नमो… एक बार मोदी जी को मौका दो

      भारत माता कि जय

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  10. शिवेंद्र मोहन सिंह

    पुनः धारदार लेखन अभिषेक जी …. बहुत सुन्दर विश्लेषण और निष्कर्ष. साधुवाद

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  11. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    देवयानी के साथ अनुचित व्यवहार का कारण क्या था?
    एक प्रबुद्ध प्राध्यापक जो कूटनीति समझते हैं, उन के वार्तालाप से जाना।
    क्याः===>अमरिका के, देवयानी खोबरागडे के साथ, अनुचित व्यवहार के पीछे कौनसी कूट नीति है?
    उत्तरः==>यह, मनमोहन सिंह और यु पी ए की दुर्बल छवि के कारण मोदी के पक्ष में जाते मतों को रोकने का उद्देश्य है। अमरिका अपेक्षा करता है, कि, यु पी ए शासन, देवयानी प्रकरण में, अमरिका का कडा विरोध करेगा। इससे मनमोहन की दुर्बल छवि कुछ शक्तिशाली होगी। और मोदी के पक्षमें जाते मत कम होंगे।
    —————————–
    अंतर राष्ट्रीय कूट नीति, सारे छोटे छोटे कारणों पर उकसाना-बढाना-घटाना-प्रोत्साहन करना इत्यादि से ही संचलित होती है।
    आगे और भी चालें चली जाएंगी।चुनाव के पहले, उचित समय पर देवयानी प्रकरण सुलझाया जाएगा। अमरिका मान जाएगा, और मनमोहन की विजय भी होगी,और यु पी ए को लाभ कराया जाएगा। भारत का मतदाता भोला माना जाता है।
    ——————–
    मूरख “आ आ पा” भी मोदी विरोध में, अमरिका का मोहरा है।कुछ बुद्धुओं को समझना चाहिए।
    ——————————
    भारत यदि विश्वशक्ति बन जाएगा, तो, अमरिका का प्रतिस्पर्धी ही होगा।
    आज भारत ३ रे क्रम पर है। (१) अमरिका (२) चीन (३) भारत, जापान, और रूस —
    ऐसे क्रमों पर माने जाते हैं। रूस अमरिका के बराबर था, पर जब उसके १३ टुकडे हुए, वैसे ही, पहले क्रम से खिसक कर ३रे पर आ गया। भारत के भी टुकटे करकर अंग्रेज़ दुर्बल बना कर गया है।
    —————————-
    मोदी को अमरिका इसी लिए विसा नहीं दे रहा। मोदी “सरदार पटेल” है। मोदी को २७२+ बैठकें मिल जाए, तो भारत विश्वमें आगे ही आगे बढ कर, ऐसा चमकेगा आज आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
    भारत स्विस बॅन्क से काला धन जोड ले तो धनी ही है।
    —-यह जानकार व्यक्ति से, वार्तालाप में जाना। लेखक को धन्यवाद। इस विषय पर कोई विस्तृत लेख लिखें –आवश्यक है।

    ॥जय भारत॥

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    • शिवेंद्र मोहन सिंह

      बिलकुल दुरुस्त फरमा रहे हैं डाक्टर साहब (अब तो -आप- कहते भी डर लगता है), अचानक से रीढ़ विहीन व्यक्ति (सरकार) कठोर फैसले कैसे लिया, मूल शंका का यही कारण है. जिस व्यक्ति ने भी ये निष्कर्ष निकला है जैसा कि आपने लिखा है, एक गहरे षड़यंत्र का पता चलता है. बहुत फूंक फूंक कर कदम रखना होगा, शत्रु और मित्र को खुली आँखों से पहचानना होगा. भेड़ों कि खाल में छिपे हुए भेड़ियों पर पैनी नजर रखनी होगी.

      लेखक के साथ साथ आपका भी बहुत बहुत धन्यवाद, सार्थक टिप्पणी के लिए.

      सादर

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      • डॉ. मधुसूदन

        डॉ.मधुसूदन

        “नो मोदी ऍट ऍनी कॉस्ट”—
        शिवेन्द्र जी नमस्कार। बहुत समय हुआ, आप से वार्तालाप कर के।
        इस कूटनीति को, अंग्रेज़ी में “माइक्रो पॉलिटिक्स” अर्थात “सूक्ष्म कूटनीति” कहा जाता है।
        शायद चुनाव के पहले हिंसात्मक दंगा भी हो सकता है। और मामूली निरपराध हिंदु-मुस्लिम भी मारे जाएंगे।
        ====>इन्हें डर है, कि, मोदी के नेतृत्व में भारत का क्रम महासत्ताओं में ऊपर उठ जाएगा। अभी ३ रे क्रमपर रूस और जापान के साथ साथ है।
        मॉर्गन थाउ के इस विद्वान मित्र के भाष्य के अनुसार==> विश्लेषण के स्तरपर सबसे पहले, अमरिका, (१) उन सारे घटकों की पहचान करता है; जिसके कारण भारत शक्तिशाली बनेगा।ऐसे घटकों को चोट पहुंचाना, उद्देश्य होता है। जिससे मोदी की हानि हो, ऐसों को सहायता दी जाएगी।बन पाए तब तक मोदी का विसा रोका जाएगा। प्रत्येक छोटे बिंदू पर विचार होता है। आ आ पा को तो सस्ती संस्था माना जा रहा है।
        (क) इसमें मोदी जी का चुनाव जीतना सबसे ऊपर निकलता है।
        (ख) उनका ऐतिहासिक अनुभव है, कि, एन डी ए के (भा ज पा) के अटलजी ने पोखरण अणु विस्फोट कर, भारत को अणुशक्तियों के समूह में प्रवेश पाया था। भा ज पा को रोकना परम उद्देश्य है।
        (ग) भारत को दुर्बल रखने के लिए, अमरिका कांग्रेस को जिताना चाहता है।जो, अब उसे असंभव लग रहा है।
        (घ) इस लिए आ. आ. पा. को (फ़ोर्ड फाउण्डेशन द्वारा) सहायता करवा कर तैराया है।
        (च) आ आ पा, कुछ ही समय में गुजरात में नरेंद्र मोदी के सामने चुनाव के लिए उनके तगडे से तगडे(शायद भारती या केजरीवाल को) प्रत्याशी घोषित कर, उतारेगा।
        (छ) कुमार विश्वास इसी लिए मोदी को अमेठी से चुनौती दे रहा है।
        (ज)इन समाचारों को दिखाकर ही आ. आ. पा. अमरिकाको प्रमाणित करता है, कि,”देखो आप की आज्ञा अनुसार हमारा काम हो रहा है।”
        (झ)माना जाता है, कि, अमरिका से गुप्त कॉन्ट्रॅक्ट हो चुका है।==>”नो मोदी ऍट एनी कॉस्ट।”<=== मोदी यदि जितते हैं, तो अमरिका का सपना चकनाचूर हो जाएगा।भारत चुटकी में आगे बढ पाएगा।
        "माइक्रो इन्टरनेशनल पॉलिटिक्स" में हर छोटे घटक पर ध्यान दिया जाता है। कूट नीतिज्ञ मानते हैं, कि, आ. आ. पा. को सस्ते में खरिदा जा चुका है।
        और कहीं और लडे या ना लडे आ आ पा गुजरात में मोदी के सामने तगडा प्रत्याशी उतारेगा। लिख के रखिए।
        शिवेंद्र जी लगे रहिए|
        ||वंदे मातरम||

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        • डॉ. मधुसूदन

          भारत भक्त

          भारत को शक्तिशाली देखना परदेशी सत्ता बिलकुल नहीं चाहती।और, मोदी भारत को शक्तिशाली बना देगा तो?
          इस लिए (लिख के रखिए) मोदी विरोध में हर हथकंडा अपनाया जाएगा।
          भारत शक्तिशाली हो, यह परदेशी सत्ता को स्वीकार नहीं है।
          निम्न तरीकों को अपनाया जाएगा।
          (१)”चुनाव के उचित समय पहले, दंगा होगा(?)”। गुजरात में दंगा सबसे अधिक क्रूर और कारगर हो सकता है।
          (१क) और भी प्रदेशों में दंगे होंगे। और भाजपा विरोधी, शासक उन्हें होने देंगे। ऐसे दंगे बाहरी शक्तियाँ(?) करवाना..चाहेगी…….। इसके लिए तैयार रहें।
          (२) दंगा अल्पसंख्यकों को, और कांग्रेस भक्तों को, मोदी से, अलग करने के हेतु से होगा।
          (३)एक मेरे बुद्धु जैसे प्रश्न का उत्तर कोई देगा?
          (४) भ्रष्टाचार विरोधी आ आ पा, जिसने शासकीय भ्रष्टाचार को,प्रायः निर्मूल किया है, उस मोदी का ही विरोध क्यों कर रही है?
          (५) गुजरात में मोदी के सामने केजरीवाल खडा होगा, यह परदेशी कॉन्ट्रक्ट की कूटनीति प्रतीत हो रही है।
          मोदी के भ्रष्टाचार(?) का विरोध, भ्रष्टाचार विरोधी, केजरीवाल (?) करेगा?
          कोई संतोषजनक उत्तर है?

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          • आर. सिंह

            आर.सिंह

            दंगे कौन कराता है? स्वतन्त्र भारत में हिन्दू मुस्लिम दंगों का लाभ हमेशा भारतीय जनता पार्टी(पहले भारतीय जन संघ ) को मिला है,अतः इस तरह के दंगे अगर भविष्य में भी होंगे,तो शक की सूई भाजपा की ओर ही जायेगी,क्योंकि समझ बूझ कर वही दंगा कराएगा,जिसको उससे तत्काल लाभ की सम्भावना हो. इस तरह अगर देश व्यापी दंगें हो जाएँ या करवा दिए जाएँ तो भाजपा की जीत सुनिश्चित है.अतः मेरी नेक सलाह यही है कि आपलोग इस तरह की उटपटांग टिपण्णी न करें.
            रही बात भ्रष्टाचार रोकने की,तो जिसने गुजरात में लोकायुक्त को अपंग कर दिया ,वह अगर भ्रष्टाचार रोकने की बात करे तो यह उसके मुंह से शोभा नहीं देता.एक लोकायुक्त बिल केजरीवाल सरकार भी ला रही है.दोनों की तुलना करने से सत्य को समझने में ज्यादा आसानी होगी.

        • आर. सिंह

          आर.सिंह

          ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी की वकालत करने वाले अपने को सबसे अधिक बुद्धिमानमानते हैं,पर वे भूल जाते हैं कि बुद्धि किसी की बपौती नहीं है.ऐसा नहीं है कि भारत में मोदी के समर्थकों को छोड़कर अन्य सब मूर्ख हैं. मैं अनेकों बार लिख चुका हूँ कि आआप उसी सपने को साकार करने में लगी है,जो पहले महात्मा गांघी ने और बाद में पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने देखा था. लोग एकात्म मानववाद की चर्चा तो करते हैं,पर उसमे वर्णित सिद्धांतों का नमो अनुसरण करते हैं या नहीं इसपर किसी ने ध्यान दिया है?मैंने पहले भी लिखा है कि आप को समझने के लिए चार पुस्तकें पढ़नी पड़ेगी.महात्मा गांधी का हिन्द स्वराज ,पंडित दीन दयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद और भारतीय अर्थ नीति:एक दिशा निर्देश और अरविन्द केजरीवाल का स्वराज. आआप के बारे में झूठे बकवास करने और फोर्ड के इशारे पर उसके चलने के बारे में गलतफहमी फैलाने वाले पहले इनका अध्ययन करें,तब वे कुछ कहें. आआप या अरविन्द नमो की तरह पूंजीपतियों के दलाल नहीं है,न भ्रष्टों के हिमायती. नमो या बीजेपी भ्रष्टाचार में कांग्रेस से पीछे हो सकते हैं,पर कमोवेश ये दोनों पार्टियां एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं.नमो मनमोहन सिंह की तरह व्यक्तिगत रूप में ईमानदार हो सकते हैं,पर जिस तरह उन्होंने दागियों को अपने मंत्रिमंडल में प्रश्रय दिया हुआ है,उससे तो नहीं लगता कि वे भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैं. अनेक ऐसी बाते हैं,जिसपर मैं पहले भी प्रकाश डाल चुका हूँ,पर नमो भक्त तो अपने प्रभुनाम की माला जपने में लगे हुए हैं,उनको सत्य कैसे दृष्टिगोचर हो?

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          • शिवेंद्र मोहन सिंह

            “आप” किसके खिलाफ है

            आप पार्टी समाजवादी पार्टी के खिलाफ
            नहीं बोलती
            आप पार्टी मायावती के खिलाफ
            नहीं बोलती
            आप पार्टी लालू यादव के विरुद्ध
            नहीं बोलती
            आप पार्टी जे डी यू के विरुद्ध
            नहीं बोलती
            आप पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के विरुद्ध
            नहीं बोलती
            आप पार्टी कभी ममता बनर्जी के विरुद्ध
            नहीं बोलती
            आप पार्टी कभी कम्युनिस्ट के खिलाफ
            नहीं बोलती
            आप पार्टी कभी करुणा निधि और जय ललिता के खिलाफ
            नहीं बोलती
            आप पार्टी कभी मुस्लिम लीग के विरुद्ध
            नहीं बोलती
            आप पार्टी कभी बंगला देश घुसपैठ के विरुद्ध
            नहीं बोलती
            आप पार्टी कभी आतंकवादियों के खिलाफ
            नहीं बोलती
            आप पार्टी कभी नक्सलवाद और माओवाद के खिलाफ
            नहीं बोलती
            जब भी बोलती है कांग्रेस कि भाषा बोलती है,
            केवल बीजेपी के खिलाफ ही बोलती है।

            स्वघोषित हरिश्चंद जी, जरा नेट सर्च कर लें पता चल जाएगा की फोर्ड से चंदा आया की नहीं.
            स्वघोषित हरिश्चंद जी, जहां तक दागियों की बात है है तो हालिया उदाहरण स्वयं आपके क़ानून मंत्री जी का ही है. और शोएब इक़बाल जी शायद स्टील के गिलास से अभिमंत्रित जल छिड़कने के बाद शुद्ध हो गए हों. नहीं तो स्वघोषित ईमानदार साहब गला फाड फाड कर चिल्लाते थे की संसद और विधान सभा में बैठे लोग क्रिमिनल है. और इन्होने खुद दिल्ली विधान सभा में क्रिमिनल का एक लिस्ट जारी किया था जिसमे यह शोएब इक़बाल भी शामिल थे और अब उसी समर्थन लेकर ये कांग्रेस-केजरीवाल सरकार दिल्ली में चला रहे हैं.

            किताब चार क्या दस पढ़ लीजिये जब तक उसके अनुसार आचरण नहीं होगा तो सवाल उठेंगे ही. जहां तक बात है बुद्धिमानी की तो आ आ पा वाले कुछ ज्यादा ही बुद्धिमान हैं तभी तो बच्चों की कसम खा कर भी “उसी” के साथ सरकार. वाह जी वाह बलिहारी है बुद्धिमानी की. और माला भी १५ सालों का काम देख के की जा रही है ना की २ साल के धरना प्रदर्शन और अन्ना की पीठ में छुरा घोंपने और मौकापरस्ती को देख के की जा रही है.

  12. yamunapanday

    सबसे अहम् कारण मोदी की पैनी वह द्रष्टि है जिसमे देश का स्वालंबन छिपा है ।इस लक्ष को यदि भारत प्राप्त कर पाता है मोदी के सहयोग द्वारा तो बहुत हद तक अमरीका पर भारत की निर्भरता समाप्त हो जाएगी ।अमरीका का बर्जस्व प्रायः समाप्त न हो इसमें इसलिए उसकी यह चिन्ता उसे रात दिन सोने नही देती । इसाई धरम का भारत पर प्रशरण यह गौड़ है । अपना महत्व बनाए रखना सर्बप्रथम लक्ष्य है अमरीका का, मोदी के आने पर वह लक्षभ्रष्ट हो जाएगा । क्यों की मोदी एक अलग मिटटी में बने हैं ।
    रही बात अब वीजा की,मोदी ने जब माँगा ही नहीं तो उसका प्रश्न ही क्यों उठाया गया किसने उठाया जाँच का विषय है ?
    यमुना शंकर पाण्डेय,,

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