समलैंगिता शारीरिक नहीं, मानसिक बीमारी है..

गिरीश पंकज 


                स्वास्थ्यमंत्री गुलामनबी आज़ाद के बयान के बाद समलैंगिक संबंधों के पक्षधर लोगों ने बड़ा बवाल मचा कर रखा है. जबकि आज़ाद ने ऐसा कुछ नहीं कहा है, जिससे इतनी हाय-तौबा मचे. उन्होंने यही तो कहा है कि समलैंगिक सम्बन्ध बनाना एक तरह की बीमारी है.और अप्राकृतिक भी है.  इसमे गलत बात कुछ भी नहीं. बेशक यह एक मानसिक बीमारी है, और अब तो यह भविष्य की भयंकर सामाजिक  बीमारी भी बनने जा रही है. समलैंगिकता दो हताश, असफल, नाउम्मीद लोगों द्वारा आपसी सहमति से किया गया व्यभिचार है, इससे बचाने की जरूरत है. इसे हम अपने मौलिक अधिकार की तरह न ले. कुछ चीज़े प्रतिबंधित ही रहें तो बेहतर हो. बलात्कार के लिये सजा है. कल को ऐसे मानवाधिकारी भी सामने आ सकते हैं जो कहेंगे कि यह व्यक्ति का अपना अधिकार है. उसके मन में उत्तेजना उठी, उसने बलात्कार कर लिया. हर मन में काम-वासना होती है, इसमे गलत क्याहाई. कल यह भी माँग उठ सकती है कि चोरी, डकैती को भी अधिकार बनाया जाये. जो ताकतवर है, वो किसी को लूट सकता है. रिश्वत को भी कानूनी बना दिया जाये. अगर इसी तरह समाज की सोच  गतिमान रही, तो वह समय भी आयेगा, जिसे हम जंगल-राज का नाम दे सकते है.
              मैंने अनेक देशों की यात्राएं की हैं. वहाँ कभी-कभार खुले -आम वासना का खेल खेलते लोग भी देखे है. लेकिन बहुत कम. पश्चिममें भी व्यभिचारियों से निपटने के कानून बने हैं.भारत में भी अपनी वासना की तृप्ति के लिये लोग  बाग़-बगीचे, होटलों आदि का सहारा लेते हैं. यह मानवीय कमजोरी है. लेकिन कोई इसकी खुलेआम पैरवी नहीं कर सकता. जिस दिन ऐसा हो जायेगा, समाज को हम पत्थर-उग में देखेंगे. अभी सडकों पर केवल कुत्तों को ही खुलेआम  सहवास में रात देखा जा सकता है, अगर हम इसी  तरह मनुष्यों कम-वासना के सवाल पर उदारता दिखायेंगे तो कलको मनुष्य भी सडकों पर श्वानवत हरकतें करते  नज़र आने लगेंगे. इसलिये वर्जनाएं ज़रूरी होती है. अगर नैतिकताके दायरे में या वर्जना में नहीं रहना चाहते, तो घरों के शौचालयों या बाथरूमों में दरवाजे क्यों लगाते हैं? पूरी दुनिया में यह व्यवस्था. ऐसे इसलिये है कि कहीं  न कहीं हम अपने  आप को सभ्य, शालीन बनाये रखते है. जिस चीज को परदे में रहनाचाहिये, उसे परदे में ही रखना ही  बेहतर होता है. इसलिये समलैंगिकता के सवाल को भी वर्जनात्मक नज़रिए से देखने-समझने की ज़रुरत है.
             प्रकृति ने ही स्त्री-पुरुष की व्यवस्था पहले से रच दी है. उसी के सहारे संसार चल रहा है. लेकिन धीरे-धीरे मनुष्यों के बीच ऐसे लोग भी विकसित होने लगे जिनका विपरीत लिंग के प्रति कोई आकर्षण नहीं रहा. उन्हें समलिंगी ही भाने लगे. अपने इस सोच को उन्होंने ऐसा प्रचारित किया गोया वे कोई क्रांति कर रहे हैं. स्त्री और पुरुष दोनों में ही ऐसे लोगों कि संख्या बढ़ी और अब तो पूरी दुनिया में समलैंगिकों की बाढ़ -सी आ गई है. समलैंगिकों को सामाजिक मान्यता देने की बात हो रही है. वे आपस में शादी भी कर सकतें है. यह एक तरह की अराजक मानासिकता है और सच कहाजाये तो मानसिक बीमारीऔर अप्राकृतिक कामही. इसे रोकना चाहिए, हतोत्साहित किया जानाचाहिए.  कुछ लोग ऐसा करनाचाहते हैं तो वे करें, लेकिन पूरे समाज को क्यों लपेटने की कोशिश कर रहे हैं? ऐसे अभियानों से बाल मन पर बुरा असर पड़ता है.नए बच्चे जो अभी समझदार होने वाले हैं, उनके सामने जब समलैंगिकता जैसे मामले ”प्रगतिशील व्यवहार’  की तरह पेश किये जायेंगे  तो उन्हें लगेगा, यह भी एक रास्ता हो सकता है. समझदारऔर  बालिग लोग एक साथ रह सकते हैं. लेकिन वे ऐसा तो माहौल न बनायें, जिससे समाज में अशांति फ़ैल जाये. अगर सम्लान्गिता ही अन्तिम्पदाव बनजाये तो ये दुनिया कितनी बदसूरत हो जायेगी, इसकी सहज कल्पनाकी जा सकती  है. 
               मीडिया के कुछ उत्साही लोग सम्पादकीय लिख कर स्वास्थ्य मंत्री को कोस रहे हैं, गोया उन्होंने कितनी पिछड़ी हुई बात कर दी है, जबकि उन्होंने बिल्कुल ठीक मुद्दा उठाया है. इन्हीं सब कारणों से तो एड्स जैसी बीमारी बढ़ी है. मैं सोचता हूँ कि यौन कुंठा के शमन के लिये ये लोग सही जोड़ा बनाने की प्रतिभा क्यों नहीं विकसित कर पाते? नाग-नागिन के जोड़े बन जाते है, कुत्ता भी एक कुतिया तलाश कर लेता है. सारे जव्बर विपरीत्लिंगी सेक्स ही करते हैं. पशु ऐसा कर सकता है, क्या मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता? कर सकता है. करता रहा है,  मगर जब दिमाग में घृणित सोच पनपने लगे तो समलैंगिकता भी आन्दोलन बना दिया जाता है. वेश्यावृत्ति को मान्यता दी जानी चाहिए, यह माँग तो समझ में आती हैमगर समलैंगिकता को वैधानिक दर्जा देने की माँग चौकाती है कि हम प्रगति के ये कैसे मुकाम पर आ गए है, कि अप्राकृतिक काम को अधिकार बनाने पर तुले हैं? पतन को, हिन्साको सामाजिक स्वीकृति की माँग करने वाले तेज़ी के साथ बढ़े है. फिल्मों में खुले आम माँ-बहन की गलियाँ दी जा रही है, टीवी पर भी ये गलियाँ कभी-कभार सुनी जा सकती हैं. ये तो भलमनसाहत हैकि  कई बार गालियों की जगह ”बीप-बीप” सुनादिया जाता है. कुछ तथाकथित प्रगतिशील इसे भी गलत बताएंगे और कहेंगे कि यह अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को रोकने की साजिश है. समलैंगिकता के अभिशाप से समाज को मुक्त करने के लिये कड़े कानून बनाना चाहिए. इसे मौलिक अधिकार का दर्ज़ा देने की भूल भी नहीं करनी चाहिए. गुपचुप तो बहुत से खेल चलते रहे हैं, मगर इन्हें कानूनी दर्ज़ा नहीं दिया जा सकता, 

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