आज के दौर में ईमानदारी

—–विनय कुमार विनायक
आज के दौर में बड़ा कठिन है
ईमानदारी का व्रत पालना!
ईमानदार होकर घर चलाना!
चाकरी निभाना और मर जाना!
आसान नहीं है पहले जैसा!

सच पूछिए तो
ईमानदारी के साथ
बेईमानी का धर्म निभाना भी
आसान नहीं है आज!

रावण होने के लिए भी चाहिए
मंदोदरी सी एक भोली सती नारी!
पक्के धृतराष्ट्र भी तभी बन सकते
जब साथ में हो आंख में
पट्टी बांधने वाली गांधारी!

सच तो यह है
कि सफल दुर्योधन और दु:शासन
बनने के लिए भी चाहिए
द्रोण जैसा उद्भट गुरु!
कर्ण जैसा विश्वसनीय मित्र!
लक्ष्मण जैसा आज्ञापालक पुत्र!
जो भाड़े के टट्टू कदापि नहीं थे!

आज के दौर में
एक ईमानदार व्यक्ति का घर होता
कोहराम मचाता संसद
जिसमें धर्मपत्नी होती
चिखती-चिल्लाती विपक्ष का नेता!

बेरोजगार बेटे होते परम्परा विरोधी,
धर्मनिरपेक्ष युवातुर्क
बेटियां होती
विक्षुब्ध अल्पसंख्यक जन प्रतिनिधि!

सगे भाई पड़ोसी दुश्मन देश
अभिन्न मित्र-कुटुम्ब कश्मीर पर
बयानबाजी करते पश्चिमी राष्ट्र
और माता-पिता महामहिम राष्ट्रपति!

ऐसे में आर्थिक खस्तेहाली
असुरक्षित गृह-दीवार/बच्चों की लचर शिक्षा
ढुलमुल पड़ोस/विदेश नीति की जिम्मेदारी
किस पर डाली जाएगी?
आपके ईमानदार/कमजोर कंधे पर ही ना!

घर से दफ्तर और चौराहे से संसद तक
कहीं भी कभी भी
अवांछित कन्या भ्रूण की तरह
हत्या का शिकार हो जा सकती
आपकी ईमानदारी!

एक अदृश्य ईमानदारी की रक्षा में
लाखों भावी दृश्य खूबसूरत बंगले/सुन्दर कार
टीवी-भीसीआर/अवश्यंभावी भीआईपी परिवार की
कब तक करेंगे हत्या?

आपकी इन रोज-रोज की हत्याओं को
कबतक खामोश हो सहेंगे आपके घरवाले?

जो प्रत्यक्षदर्शी गवाह हैं
आपके कलिग का बाबू से सर हो जाने का!
उनकी झोपड़ी का शानदार घर हो जाने का!
स्टैंड के गुंडे का सफेदपोश मिनिस्टर हो जाने का!
आपके जीते जी आपके बच्चों का टुअर हो जाने का!
और आपके भोले चेहरे का फटीचर हो जाने का!

इन हकीकत को कबतक
नजरअंदाज करते रहेंगे आपके घर वाले
उस कृत्रिम ईमानदारी के लिए जिसके होने
नहीं होने का पुख्ता सबूत भी नहीं है आपके पास
इन नकारात्मक सबूत से कौन न्याय दिलाएगा
आपको अपनों से?

कि ईमानदार से नाराज होते
सारे सगे-सम्बन्धी/मित्र-रिश्तेदार
कि जो नहीं लेते घूस
उनसे बहुसंख्यक जनता रहती नाखुश!

कि एक ईमानदार मुलाजिम होता
मुजरिम सा निपट अकेला
नमस्कार तक से वंचित!
—–विनय कुमार विनायक

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