लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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hindi in tn(भाग एक)
डॉ. मधुसूदन

सारांश:
**तमिलनाडु में हिन्दी प्रवेश हो जाए, तो शेष भारत में विशेष समस्या नहीं होगी।**
**हमें हिन्दी चाहिए”, ऐसी नई माँग, तमिलनाडु में उठने लगी है।**
** आज हिंदी परीक्षार्थियों की संख्या भी बढी है।**
** कुशलता से काम लेने का अवसर है।**
**कुशलता ऐसी,कि,हिन्दी की, बाँसुरी बजे, और चतुराई ऐसी, कि, सत्ता का बाँस न टूटे।**
**ऐसी कुशलता सांप्रत शासन का गुण है।**
पूरा आगे पढें।

(एक) विषय प्रवेश:
इस विषय पर २ या ३ आलेख बनाने का विचार है। और उन पर आधारित ज्ञापन प्र. मंत्री को, आपकी अमरिका यात्रा के अवसर पर देने का विचार है। आज पहला आलेख प्रस्तुत है।
किसी मित्र ने चुनौती भरे स्वरो में कहा, कि, यदि आप तमिलनाडु में हिन्दी को प्रवेश करवा दें, तो शेष भारत में विशेष समस्या नहीं होगी। मुझे भी, मित्र की बात सही लगती है। और, अब ऐसा अवसर भी, आ ही रहा है, ऐसा लगता है। इस प्रक्रिया के शुभ संकेत भी, मुझे क्षितिज पर दिखाई दे रहे हैं।

एक, सांप्रत समाचारों का विश्लेषण करनेपर आप सहमत ही होंगे, ऐसा मानता हूँ। दूसरा कारण है, भारत में पहली बार सशक्त बहुमति के साथ एक हिंदी हितैषी, हिंदी में आग्रह से, बोलने वाला, और हिन्दी के लिए अनुकूल, ऐसा समर्थ प्रधान मंत्री, जीत कर,आया है। आदरणीय अटलजी भी अवश्य हिन्दी समर्थक और हिन्दी हितैषी थे ही, पर उनके पास मोदी जी जैसी बहुमति नहीं थी।

(दो)हिंदी के अनुकूल खिडकी या गवाक्ष:

नीचे निर्देशित सांप्रत, समाचारों का, और, घटनाओं का अर्थ यदि लगाया जाए, तो आज, हिन्दी के पक्ष में, तमिलनाडु में, एक खिडकी अवश्य खुल रही है। इसे महाद्वार समझना गलत होगा; पर खिडकी अवश्य है, या छोटा गवाक्ष ही है। इस खिडकी या गवाक्ष से हिंदी को तमिलनाडु में प्रवेश करवाने के लिए, हिंदी हितैषियों को, और शासन को, बडे कौशल और चतुराई से काम लेना होगा।
कुशलता ऐसी, कि, हिन्दी की, बाँसुरी भी बजे, और चतुराई ऐसी, सत्ता का बाँस भी न टूटे, पर सुरक्षित बचा रहे, ऐसा कुशल समाधान चाहता हूँ। ऐसी कुशलता सांप्रत शासन का गुण है। इस लिए, इस समस्या के, समाधान की दिशा में आगे बढने की, संभावना मुझे निश्चित दिखाई देती है। कहते हैं, कि, कुशल विक्रेता, वस्तुके गुणों का ऐसा बखान करता है; कि, ग्राहक स्वयं ही उस वस्तु को, बिकत लेना चाहता है। ऐसी कुशलता से ही काम लिया जाए, और कुशलता पर भार देता अगला आलेख सोच रहा हूँ। आजका आलेख समाचारों पर केंद्रित है।

(तीन)समाचार:

समाचारों पर यदि लक्ष्य केंद्रित करें, तो, प्रतीत होगा, कि, तमिलनाडु में एक नई लहर चल निकली हैं। कुछ पाठकों ने भी यह अनुमान किया होगा ही। वहाँ, हिन्दी के हित में अनुकूल वातावरण बनता दिखाई दे रहा है। इन समाचारों के अनुसार; आज तमिलनाडु में हिन्दी पढने की ओर झुकाव दिखाई देता है। यह अनुमान निम्न चार समाचारों से, फलित होता है; आप ने भी पढा होगा ही।

(तीन-१) N D T V का, जून १६ २०१४ का समाचार:
===>”हमें हिन्दी चाहिए”, ऐसी नई माँग, तमिलनाडु ( दक्षिण) में, बदलाव की भाषा बोलती सुनाई दे रही है।—लेखक है, सॅम डॅनियल स्टालीन, जो N D T V का समाचार देते हैं। यह जून १६-२०१४ का समाचार है।
===>”आगे –चेन्नई के छात्र कहते हैं, हिन्दी और अन्य भाषाओं की शिक्षा का अभाव उनके व्यावसायिक नियुक्तियों में और उनकी उन्नति को क्षति पहुंचाता है।”
===>उदाहरणार्थ, ९वी कक्षा का छात्र अनिरुद्ध, समुद्री (Marine Engineering) अभियान्त्रिकी पढना चाहता है। वह कहता है, उसे तमिल सीखनेपर विवश किया जा रहा है। कहता है, “यदि मैं उत्तर भारत में नियुक्ति चाहूं, तो मुझे हिन्दी का ज्ञान होना चाहिए।” ऐसा उसने N D T V के पत्रकार को कहा।
===>तमिल-भाषी भाई जिष्णु और मनु संस्कृत और हिन्दी (दोनों) सीखना चाहते हैं। कहते हैं, वे, “कि, हम घर में, तमिल बोलते हैं। उसी भाषा को शाला में सीखना, ऊबाऊ हो जाता है।”
” His brother added, “Even in other countries they encourage students to learn as many languages as possible.”
उसके भाई ने कहा, कि, अन्य देशों में भी अधिकाधिक भाषाओं के सीखने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है।

(तीन-२) दूसरा संकेत:
दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के सांख्यिकी आँकडे इसी लहर की पुष्टि करते हैं।
फोर्ब्स सामयिक से –**दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा काफी व्यस्त है। उसके (२०१०) के समाचार के, अनुसार, प्रति वर्ष (६००,०००) अर्थात ६ लाख छात्र, राज्य में, परीक्षाएं देते हैं, और इस संख्या में भी प्रतिवर्ष , +२० % के अनुपात में वृद्धि हो रही है। १९६५ में जब हिन्दी विरोधी आंदोलन चरम पर था, २०,००० से भी संख्या में अल्प, परीक्षार्थी हुआ करते थे। **हिन्दी विरोधी आंदोलन ने ही हिंदी के प्रति लोगों की उत्सुकता बढायी। उन्हें जाग्रत किया, और हमारे पास लाया।** कहते हैं समिति के कार्यवाह, श्री. अन्नामलाई।**यह (२०१०) का समाचार है।
६००,०००/२०,००० =३० इसका अर्थ हुआ कि आज १९६५ की अपेक्षा ३० गुना युवा छात्र तमिलनाडु में हिन्दी सीख रहें हैं। यह समाचार काफी उत्साह जनक ही मानता हूँ।
ये आँकडे २०१० के हैं। आज यदि २०% प्रतिवर्ष की वृद्धि मान लें, तो चार वर्षों में आज १२४४१६० छात्र हिन्दी सीख रहे हैं।
**तो आज १९६५ के प्रमाण में ६२ गुना छात्र हिन्दी सीखी जा रही है।**

(तीन-३)हिन्दी विरोधी व्यंग्यचित्र:

“तमिल पुस्तकों से हिन्दी विरोधी व्यंग्यचित्र हटाने की माँग” जो २०१२ में की गयी, वह भी इसी संकेत की पुष्टि करती है।
तमिल पुस्तकों से हिन्दी विरोधी व्यंग्यचित्र हटाने की माँग। Remove anti-Hindi agitation cartoon: Says Karunanidhi. आपने, करुणानिधि द्वारा, तमिलनाडु में, पाठ्य पुस्तकों से हिंदी-विरोधी (Cartoon) व्यंग्यचित्र हटवाने की माँग का, समाचार २०१२ में पढा होगा ही। राजनीतिज्ञ जब ऐसी माँग करते हैं, तो उसके पीछे कुछ कूटनैतिक कारण ही होने चाहिए। कहा जा सकता है, कि, इसका कारण है, तमिलनाडु के युवा छात्र, जो भारी संख्या में आज कल हिन्दी सीख रहें हैं। अर्थात प्रदेशका हिन्दी विरोधी दृष्टिकोण बदल रहा है; और हिन्दी विरोध शिथिल पड रहा है।

(तीन-४) हिंदी की शालाएँ:

पर तमिलनाडु की शासकीय शालाएं अब भी हिंदी नहीं पढाती। कारण लगता है, जिन शासको ने १९६५ में हिन्दी का विरोध कर प्रादेशिक तमिल भाषा का अभिमान जगाया था; वे अपना हिंदी विरोधी दृष्टिकोण सरलता से, छोडने के लिए तैयार नहीं दिखते ।
पर शालाओं के होनहार छात्र शासकीय शालाएँ छोड केंद्र संचालित शालाओं में जहाँ हिन्दी पढायी जाती है; जा रहे हैं। उसी प्रकार निजी विद्यालयों में भी जिन छात्रों के, अभिभावक निजी (प्रायवेट) पाठशाला शुल्क देने की सामर्थ्य रखते हैं, ऐसे छात्र प्रवेश ले रहे हैं। और निजी विद्यालयो में हिन्दी पढाई जाती है।
इन समाचारों से पता चलता है; कि हिन्दी पढने की प्रवृत्ति तमिलनाडु में बढ रही है।

(चार)हिंदी का विरोध कौन कर रहा है:

आजका होनहार छात्र हिन्दी का विरोध नहीं कर रहा।पर, पुराण पंथी पीढी जो, अंग्रेज़ी लिखने में क्षमता रखती है, उस की ओर से विरोध हो रहा है। लिखना जानने के कारण उनका विरोध अधिक मुखर भी हो रहा है। अब इस पुरातन निवृत्त पीढी को कहीं शेष भारत में नियुक्ति के लिए प्रयास भी तो करना नहीं है। यह पीढी निवृत्त हो कर, अपने सुरक्षित आसन के पैंतरे से विरोध कर रही है। { अंशतः मेरे छात्रों, और पूर्व छात्रों का, वार्तालाप, और समाचारों का सार, यही है।}
हिंदी विरोध अब भी सुनाई देता है, पर अब विशेषतः, मात्र निवृत्त वृद्ध विरोध करते दिखते हैं। उनकी संख्या घटने की भी अपेक्षा है।
दूसरा हिन्दी विरोध करनेवाले राजनीतिज्ञ है, जिनका आसन हिंदी विरोध पर टिका हुआ था। पर जब वे देखेंगे, कि, प्रजा का हिन्दी विरोध ढीला हो रहा है, तो वें अवश्य अपना पैंतरा बदलने की क्षमता और चतुराई रखते हैं। जिस प्रकार से हिंदी विरोधी कार्टून हटाने की माँग करूणानिधि ने की थी, उसी प्रकार राजनीतिज्ञ कुछ शब्दों का जुगाड कर ही लेंगे।
संक्षेप में युवा पीढी बदल रही है, निश्चित, उसे समझ आ रही है, और भी अनुभव होता है, कि शेष भारत में, अंग्रेज़ी की अपेक्षा हिन्दी में ही बहु-संख्य प्रजा वैचारिक लेन देन करती है।बाजार में भी शेष भारत में हिंदी ही, चलती है। यात्रा स्थलों पर भी हिंदी ही काम आती है।

(पाँच) आगामी आलेख के बिंदू:

परन्तु हिन्दी को तमिलनाडु में फैलानेवालों को निम्न वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर रण-नीति गढनी होगी। इन बिंदुओं पर आगे के आलेख में विस्तार सहित लिखा जाएगा।
(१) जान लें, कि, तमिल प्रजा के लिए हिन्दी सीखना, अन्य सभी प्रदेशों की अपेक्षा सर्वाधिक कठिन है।
—इस लिए संवेदनशीलता से काम लिया जाए। साथ साथ तमिल प्रजा को, हिंदी सीखने के लिए, कुछ सीमित वर्षों तक, सर्वाधिक प्रोत्साहन भी दिया जाए। आर्थिक प्रोत्साहन भी सोचा जाए।
(२) तमिल लिपि की उच्चारण मर्यादा भी इस कठिनता का कारण है।
(३) पर हिंदी की उपयुक्तता जो तमिलों की, समझ में भी आ रही है; हमारा प्रभावी शस्त्र है;
इसी उपयुक्ततता के आधार पर प्रवेश करना होगा, धीरे धीरे विस्तार कर फैलना होगा।
(४) तमिलनाडु में हिंदी का प्रवेश अनेक स्तरों पर किया जाए, न केवल लिखित स्तर पर।
(५) देवनागरी लिपि को ही बिना हिंदी भाषा पहले सर्वत्र पढाया जाए।
(६) अल्प-शिक्षित छोटे व्यावसायिकों को केवल हिंदी बोलना ही, संस्कृत भारती की सफल पद्धति के ढाँचे से, सिखाया जाए।
(७) अनेक राष्ट्रवादी तमिल भाषी भी, हिंदी के विद्वान हैं। साथ, जिन्हें वहाँ के राजनीति का भी ज्ञान है, और कुशलता पूर्वक जो हिंदी को प्रचलित करने का प्रयास करेंगे; ऐसे विद्वानों की सहायता ली जाए। अंदर का जानकार जो सहायता कर सकेगा, वो दिल्ली में बैठा हिंदी का कोरा विद्वान नहीं कर सकता।
पाठकों की ओर से, टिप्पणी अपेक्षित है; विशेषतः हिंदी हितैषी पाठकों से,
अपना अलग मत भी अवश्य टिप्पणी में दर्शाएँ जिससे अगले आलेख की रचना में सहायता हो।
वंदे मातरम्‌।

14 Responses to “तमिलनाडु में हिंदी प्रवेश कैसे करें ?”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    श्री. रमेश जोशी
    लेखक, कवि, पूर्व हिंदी अध्यापक, प्रधान सम्पादक, ‘विश्वा’, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की त्रैमासिक पत्रिका–की ओरसे निम्न संदेश, इ मैल द्वारा आया था।
    लेखक आपका आभारी हैं।
    मधुसूदन
    ========================================

    प्रिय बन्धु

    आपका लक्ष्य पावन और अनुकरणीय है |भाषा की समस्या व्यक्ति द्वारा नहीं बल्कि राजनीति द्वारा उलझाई जाती है | संस्कृत सदैव से ही भारत की संपर्क भाषा रही है और उसका सहारा लिया जाना भारत में भाषा समस्याओं को सुलझाने के लिए सरल रास्ता है |

    धन्यवाद,
    रमेश जोशी
    लेखक, कवि, पूर्व हिंदी अध्यापक, प्रधान सम्पादक, ‘विश्वा’, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की त्रैमासिक पत्रिका

    Reply
  2. योगी दीक्षित

    मैं कई वर्षों से संयुक्त अरब अमीरात के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में हिंदी पढ़ा रहा हूँ| इसके पूर्व सिंगापुर, क़तर में भी पढ़ा चुका हूँ| मेरे अधिकाँश छात्र दक्षिण भारतीय रहे हैं| दक्षिण भारत के अभिभावकों में अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाने की कितनी ललक है, इसका अनुमान भारत में बैठे मेरे भाइयों को नहीं हो सकता| परन्तु अच्छे हिंदी अध्यापकों का अकाल-सा है| हिंदीभाषी लोग जब अपने दक्षिण भारतीय भाइयों का मजाक बनायेंगे, तो भला हिंदी का कल्याण कैसे हो सकता है? हिंदी के अध्यापकों को हिंदी पढ़ाते समय उनकी भाषागत कठिनाइयों का ध्यान रखना चाहिए|

    अ. दक्षिण भारत के छात्रों को सबसे अधिक कठिनाई हिंदी-शब्दों के लिंग जानने में होती है| हिंदी में गाय जाती है, कुत्ता जाता है| लड़का गोरा अथवा काला है, लड़की गोरी अथवा काली है| अंग्रेजी के समान दक्षिण की भाषाओं में इस प्रकार लिंग नहीं होते| अंग्रेजी में Cow is going, dog is going. Man is black or white, woman is black or white. छात्रों को यह जानने में सचमुच बहुत कठिनाई होती है कि कोई संज्ञा शब्द स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग| उसी लिंग के अनुसार विशेषण और क्रिया का प्रयोग करना है| लिंग निर्धारण का कोई फार्मूला नहीं है| हिंदी में रजाई स्त्रीलिंग है जबकि लिहाफ पुल्लिंग| हैं दोनों एक ही वस्तु परन्तु अलग अलग शब्दों के लिंग अलग हैं| पाठशाला स्त्रीलिंग शब्द है, विद्यालय पुल्लिंग शब्द है| हैं दोनों एक ही चीज़| अब बताइये जिसकी मातृभाषा हिंदी नहीं है, वह कैसे निर्धारण करेगा लिंग का?

    ब. दक्षिण की भाषाओं में क,ख,ग.घ इन सबके लिए एक ही अक्षर है| इसलिए प्राय: दक्षिण के छात्रों का उच्चारण सही कराना बहुत श्रमसाध्य है| हिंदी वर्ण माला के किसी भी वर्ग के दूसरे और चौथे वर्ण का उच्चारण क्रमश: पहला और तीसरा करते है| जैसे भारत को बारत, घर को गर, झाड़ू को जाडू|

    सबसे बड़ी बात उनका दिल जीतना है| वे हिंदी सीखना चाहते हैं| अध्यापक जितना अधिक स्नेही होगा, तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ विद्यार्थी उतनी जल्दी हिंदी सीखते हैं| जब हम खुद उनका मद्रासी, कल्लू जैसे शब्दों से मजाक बनाते हैं, तो फिर हिंदी के उन्नयन की अपेक्षा कैसे कर सकते है?

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  3. शिवेंद्र मोहन सिंह

    बहुत सुन्दर यथार्थ परक लेख, लम्बे समय से जिस घड़ी की प्रतीक्षा थी वो आ पहुंची है। दबे पाँव प्रवेश करना होगा। बिना किसी अवरोध प्रतिरोध के अनुरोध पर कार्य करना होगा। उत्तर भारत की कम्पनियाँ भी वहां जा रही हैं। जिसके कारण भी हिंदी का प्रचलन बढ़ रहा है, प्रतिरोध सिर्फ राजनीतिक है। आम जन दिल से हिंदी को गले लगाना चाहते हैं, कोई विरोध नहीं है। मैं कार्य के सिलसिले में दूरस्थ गावों में भी गया था कहीं को भी ऐसा नहीं मिला जिसे कोई दिक्कत हो हिंदी को लेकर। तीर्थ स्थानों पर तो लगभग सभी दूकानदार और निकटवर्ती लोग भी अच्छी हिंदी जानते हैं। कदम सावधानी से रखने होंगे किसी को भी ये ना लगे की भाषा थोपी जा रही है।

    इति शुभम।


    सादर,
    शिवेंद्र मोहन सिंह

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  4. Mohan Lal Gupta

    यदि तमिल लोगो को तमिलनाडु से बहार नौकरी चाहिए तो उन्हें हिंदी या अन्या प्रादेशिक भाषा तो सीखनी होगी। यदि हिंदी नहीं सीखी तो उन्हें जिंदगी भर तमिलनाडु में नौकरी करनी होगी क्योंकि हिंदी न जानने के कारन अन्य जगहों पर नौकरी मिलने की सम्भाबना कम हो जायेंगी। ऐसी अवस्था में उन्हें तमिलनाडु में ही सिमित होकर रहना पडेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार तमिलनाडु में हिंदी जानने वालो की संख्या अंग्रेजी जानने वालो से अधिक हैं। कांग्रेस सरकार के साशन के दौरान प्रशाशक और नौकरशाह लोग अंग्रेजी को ही महत्व देते थे क्योंकि उनमे उच्च श्रेणी का भाव था और जिनपर शाशन करना था उन्हें निम्न श्रेणी के लोग समझा जाता था। तमिलनाडु में हिंदी का विरोध उन निम्न जाती के लोगो द्वारा किया जाता हैं जो इस्लाम या इशाई धरम में परिवर्तित हो गए हैं। इन लोगो का और प्रशाशक और राजनैतिक लोगो द्वारा हिंदी का विरोध अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किया जाता हैं। एक उद्देश्य तमिलनाडु को शेष भारत से अलग करने का हो सकता हैं और दूसरा लोगो को अंग्रेजी बनाये रखने के नाम पर भड़का कर राजनैतिक लाभ उठाना हो सकता हैं। करुणाधीने की दमक पार्टी ने हिंदी विरोध के नाम पर बहुत राजनीति की और चुनाब भी जीते। कुछ पार्टी द्वारा अभी भी हिंदी के नाम पर राजनीती की जा रही हैं। इन समस्याओं को देखते हुए तमिलनाडु में हिंदी के प्रचार और प्रसार लिए ऐसी योजना होनी चाइये जो कारगार और व्यभारिक हो। मोदी जी हमेशा हिंदी में बोलते हैं। यदि अन्य मंत्री लोग भी हिंदी में बोले तो तमिलनाडु के लोगो को हिंदी सीखने के प्रेरणा मिलेगी। आजकल तमिलनाडु के स्कूलों में हिंदी नहीं पढाई जाती हैं। आजकल भारत में नुक्कड़ नुक्कड़ पर अंग्रेजी सिखाने बाले स्कूल खुले हैं। तमिलनाडु में हिंदी के प्रचार और प्रसार के लिए हिंदी समर्थक लोगो को भी तमिलनाडु के हर निक्कड़ पर हिंदी स्कूल खोलने चाहिए। डॉक्टर मदुसूदन जी ने तमिलनाडु में हिंदी के प्रचार के बारे में एक अच्छा लेख लिखा हैं और हिंदी के प्रसार के लिए भी कई सुझाब दिए हैं।

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  5. डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना

    प्रतिभा सक्सेना

    तमिलनाडु में हिन्दी के प्रति रुझान उन के ही हित में है -व्यवसाय आजीविका आदि की दृष्टि से ,राजनैतिक अड़ंगेबाज़ी की संकीर्णता लोगों की समझ में आने लगी है .उन्हें अपने साथ रखने एवं पारस्परिक सौहार्द के लिए एक भाषायी स्तर पर होना राष्ट्रीयता सद्भाव और परस्पर जुड़ाव को दृढ़ करेगा .इसमें किसी प्रकार की हेकड़ी या अड़ने की भावना न आये उनकी पुरातन को भाषा सम्मान देते हुए अपना व्यवहार संयत और मृदु रख कर ,सेवा भाव से भाषा का शिक्षण, गति को तेज कर सकता है.

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  6. T.K. Roy

    It may be the right moment to provide more incentives to learn Hindi in Tamil Nadu. The rest of India uses Hindi in general without any resistance. The writer points out some important facts in support of the right atmosphere.

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  7. Dr Ranjeet Singh

    कथन आपका सर्वथा युक्त है। यदि हिन्दी को अपने शुद्ध स्वरूप में रखा जायगा – और प्रस्तुत किया जायगा – तो निश्चय ही इसके विरुद्ध स्वार्थी राजनेताओं द्वारा स्वार्थवश सृजित प्रवर्धित प्रसारित वैर विरोद्ध द्वेषभाव स्वतः घटने/ ह्रास को प्राप्त होने लगेगा। हिन्दी के साथ किञ्चित अपनत्व का भाव भी अङ्कुरित होने लग जायगा – क्योंकि, दक्षिण की भाषाओं में संस्कृत शब्दों का बाहुल्य होने से इसे समझने में भी उन्हें उतनी कठिनाई अनुभव नहीं होगी/ सरलता हो जायगी।

    अर्बी फारसी तुर्की शब्दावली-प्रधान जिस विचित्र सङ्कर भाषा का प्रयोग ‘इण्डियन’ टी० वी० चलचित्रपट आदि पर सम्प्रति किया जा रहा है/ होता देखने सुनने में आ रहा है; उसे हम लोगों – हिन्दीभाषा-भाषी जनों को भी – अनेकधा समझने में कठिनाई होती है। उस भाषा एवं पाकिस्तान के रेडियो टी० वी० नाटक चित्रपट आदि पर बोली जाने वाली भाषा में अधिक भेद अथवा अन्तर प्रतीत नहीं होता/ अनुभव में नहीं आता।

    सादर सविनय,

    डा० रणजीत सिंह (यू० के०)

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  8. ken

    First,Hindi regions need to show that they can technically and scientifically do everything without English in schools.
    By the way how many Devanagari Scripted languages use “hai” in their sentences?
    See How Urdu is preserved and has achieved international status in it’s script with foreign words and Hindi grammar?
    The regional languages may follow Urdu’s example to preserve their languages and scripts
    One may learn Hindi if needed in his/her chosen script through script converter or in India’s simplest nukta and shirorekha free Gujanagari script.

    May be Tamilnadu prefers to learn un-imposed English.

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    • डॉ.अशोक कुमार तिवारी

      हिंदी में सभी समस्याओं का समुचित समाधान है – गुजरात में मैं हिंदी सिखाने का कार्य नि:शुल्क करता हूँ, आवश्यकता पड़ने पर यदि कुछ संस्थाएँ बुलाती हैं तो बाहर जाकर भी हिंदी प्रेमियों की नि:शुल्क मदद करता हूँ !

      कृपया नि:संकोच लिखें : – 8128465092, dr.ashokkumartiwari@gmail.com

      Reply
  9. Rekha Singh

    कहते है यदि इच्छा शक्ति है तो रास्ता भी निकल आता है ।( If their is will , then their is way )
    (1) हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री जी स्वयं राष्ट्र भाषा का सम्मान करते हुए हिन्दी मे बोलते है । इतने बड़े बहुमत से जीतने का श्रेय उनकी हिन्दी को भी जाता है ।
    (२ )हिन्दी का ज्ञान दक्षिण भारत के नव युवको को उत्तर भारत मे अधिक सफल बनाएगा ।
    (३) राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए तमिलनाडू मे हिन्दी विद्दार्थियो को आर्थिक मदद आवश्कतानुसार एक सार्थक कदम होगा ।
    (४) बालक – बालिकाओ मे अदभुत क्षमता होती है , एक उम्र से ही तमिल के साथ हिन्दी का अध्ययन संभव है ।
    (५) दक्षिण भारत मे ही तो अभी भी वेद पाठी परम्परा जीवित है क्योकि कम उम्र से ही तो बच्चो को उसका ज्ञान दिया जाता है।
    लेखक के हिन्दी प्रचार प्रसार के सभी बिंदु विचारणीय है । आशा है वर्तमान केंद्र सरकार से इस दिशा मे प्रगतिशील कदम ।

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  10. डॉ.अशोक कुमार तिवारी

    मैं लेखक से सहमत हूँ — “राजनीति के कारण ही विरोध हो रहा है” : ———————–

    जयललिता जी इसलिए यूजीसी के हिंदी से सम्बंधित निर्देशों का विरोध कर रही हैं कि उसे यूपीए सरकार के समय भेजा गया है और उनकी विरोधी द्रमुक यूपीए का हिस्सा थी (( अब देखना है एनडीए ( मोदी ) उस निर्देश को पुन: पास करवाकर भेजते हैं या नहीं )) ( देखिए राजस्थान पत्रिका – 19-9-14, पेज -14 ) :——

    तमिलनाडु में परिजनों और स्कूलों की मांग, ‘हमें हिंदी चाहिए’
    NDTVcom, Last Updated: जून 16, 2014 06:43 PM IST
    ‘We Want Hindi’, Say Parents, Schools in Tamil Naduचेन्नई: तमिलनाडु में हिंदी को अनिवार्य बनाए जाने के खिलाफ 60 के दशक में हिंसक विरोध प्रदर्शन देखने को मिले थे। हालांकि अब यह मामला उल्टा पड़ता दिख रहा, जहां राज्य में कई छात्र, उनके परिजन और स्कूलों ने तमिल के एकाधिकार के खिलाफ लड़ाई शुरू कर दी है। उनका कहना है कि उन्हें हिंदी चाहिए।
    स्कूलों और परिजनों के एक समूह ने डीएमके की तत्कालीन सरकार की ओर से साल 2006 में पारित एक आदेश को चुनौती दी है, जिसमें कहा गया था कि दसवीं कक्षा तक के बच्चों को केवल तमिल पढ़ाई जाएगी।
    इस संबंध में पांच जून को दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य की एआईएडीएमके सरकार से जवाब मांगा है।
    इस मामले में चेन्नई के छात्रों का कहना है कि हिंदी या अन्य भाषाएं नहीं जानने से भारत में अन्य स्थानों पर और विदेश में उनके रोजगार के अवसरों को नुकसान पहुंचता है।

    नौंवी कक्षा में पढ़ने वाले अनिरुद्ध मरीन इंजीयरिंग की पढ़ाई करना चाहते हैं और उनका कहना है, ‘अगर मैं उत्तर भारत में काम करना चाहता हूं तो मुझे हिंदी जाननी होगी।’
    Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…

    फिर भी जयललिता इसलिए यूजीसी के हिंदी से सम्बंधित निर्देशों का विरोध कर रही हैं कि उसे यूपीए सरकार के समय भेजा गया है और उनकी विरोधी द्रमुक यूपीए का हिस्सा थी (( अब देखना है एनडीए ( मोदी ) उस निर्देश को पुन: पास करवाकर भेजते हैं या नहीं )) ( देखिए राजस्थान पत्रिका – 19-9-14, पेज -14 ) !!!

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  11. Vishwa Mohan Tiwari

    Aapane kahaa, “यदि आप तमिलनाडु में हिन्दी को प्रवेश करवा दें, तो शेष भारत में विशेष समस्या नहीं होगी। ”
    kintu mere anubhawa men shesh Bharat men samasyaa naheen hai.

    Main Hindi men kahaaniyaan sunaane, saare Bharat main prati warsh jata hoon (abhee tak kewal Tamilnadu hee hai jahaan ki main naheen jaa payaa hoon – _yah raajnaitik kaaranon se naheen, waran asuwidha ke karn hai).

    Reply
    • डॉ.अशोक कुमार तिवारी

      तमिलनाडु में हिंदी प्रवेश कर चुकी है ! आम जन सीखना चाहते हैं – बस राजनीति आड़े आ रही है :—-

      Reply
  12. Bal Ram Singh

    Very good points and worthwhile effort. Parents of Tamil children should be apprised of successful Tamil community in north India.

    Reply

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