मानव तस्‍करी से मुक्‍ति के लिए केंद्र के प्रयास

इन दिनों जिस तरह केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने मानव तस्करी रोधी विधेयक के मसौदे को कैबिनेट के पास भेजा है। उसे देखते हुए यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत सरकार इस विषय और इससे जुड़े अपराध को जड़ से समाप्त करने के लिए संकल्पित हो उठी है। संसद में इस बिल पर मोहर लग जाने के बाद उम्मीद यही की जा सकती है कि इसके सख्त कानून के दायरे में आने से अपराधियों में भय व्याप्त होगा और वे छोटी-मोटी सजा के बजाय लम्बी एवं जीवनभर की सजा पाने के भय से इस अपराध से दूर रहेंगे।

traffickingडॉ. मयंक चतुर्वेदी
मानवता के लिए मानव तस्करी को अभिशाप कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इंसानी दुनिया में वस्तुओं की तस्करी अर्थ के लोभ के चलते की जाती रही है और पकड़े जाने पर अपराधियों को सजा भी मिलती है, यहां तक तो बात समझ में आती है। किंतु इंसान अपने स्वार्थों के लिए अपने ही रक्त से जुड़े लोगों की तस्करी में संलिप्त हो जाए, यह कहीं से भी स्वीकार्य योग्य नहीं। इस अपराध में जितनी भी सजा दी जाए, वह कम ही होगी। आज मानव व्यापार पूरी दुनिया के लिए चुनौती बन गया है। संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार किसी व्यक्ति को डराकर, बलप्रयोग कर या दोषपूर्ण तरीके से भर्ती, परिवहन या शरण में रखने की गतिविधि तस्करी की श्रेणी में आती हैं।

यह आज नशीली दवाओं और हथियारों के कारोबार के बाद विश्वभर में तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध बनकर उभरा है। दुनिया भर में 80 प्रतिशत से ज्यादा मानव तस्करी यौन शोषण के लिए की जाती है और बाकी बंधुआ मजदूरी के लिए। आधुनिक युग की यह दासता एक व्यापार के रूप में तमाम प्रतिबंधों के बावजूद भारत में भी व्यापक पैमाने पर फलफूल रही है।  भारत में रोजाना औसतन चार सौ महिलाएं और बच्चे लापता हो जाते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर आठवें मिनट में एक बच्चा लापता होता है। ऐसा अनुमान है कि करीब 6 करोड़ तक लोग इसकी चपेट में हैं।
इस अपराध को रोकने के लिए बाकी देशों की तरह भारत में भी कानून बनाए गए हैं। जिसमें अनैतिक तस्करी निवारण अधिनियम के तहत व्यवसायिक यौन शोषण दंडनीय है। इसकी सजा सात साल से लेकर आजीवन कारावास तक की है। भारत में बंधुआ मजदूर उन्मूलन अधिनियम, बाल श्रम अधिनियम और किशोर न्याय अधिनियम लागू हैं। लेकिन यह कानून कभी इतने प्रभावी नहीं हो सके कि इस ह्यूमन ट्रैफिकिंग जैसे संवेदनाओं से जुड़े भयंकर अपराध को रोका जा सकता,अपराधी कानून से भयक्रांत नहीं हैं।
देखाजाए तो वर्तमान भारत एशिया में मानव तस्करी का गढ़ बन गया है। यह निष्कर्ष संयुक्त राष्ट्र नशीली दवा और अपराध कार्यालय के हैं।  भारत और उसके गरीब पड़ोसी देश नेपाल तथा बांग्लादेश से हजारों महिलाओं और बच्चों की तस्करी प्रतिदिन पुलिस एवं कानून व्यवस्था के होते हुए भी हो रही है। इस संदर्भ में आज से दो वर्ष पूर्व एक रिपोर्ट आई थी, उस पर भी गौर कर सकते हैं, उसमें विस्तार से इस बात का खुलासा किया गया था कि भारत में किस तरह मानव तस्करी को अंजाम दिया जा रहा है। युनाइटेड नेशन्स की यह रिपोर्ट जारी होते ही देश में राजनीतिक स्तर पर जरूर तत्कालीन समय में थोड़ा हो-हल्ला हुआ था, मीडिया में भी इस विषय पर कुछ-कुछ छपा, किंतु कुछ दिन बाद फिर किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया।
इस रपट में बताया गया था कि कैसे भारत में चाइल्ड और वुमन राइट्स को बड़ा झटका देते भारत मानव तस्करी का बड़ा बाजार बन चुका है और दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों से किस प्रकार खरीद-फरोख्त को अंजाम दिया जाता है, यहां तक कि महिलाओं और बच्चों को विदेश तक भेज दिया जाता है। एक अन्य पुरानी रिपोर्ट जिसमें साल 2009 से 2011 के बीच के मानव तस्करी के आंकड़े हैं, उनके अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वर्षों बीत जाने के बाद भी कई हजार लापताओं का पता नहीं चल सका है। इन दो वर्षों में 1 लाख 77 हजार 660 बच्चे लापता हुए थे, 55 हजार से ज्यादा बच्चे अभी तक लापता हैं इनमें 35 हजार 615 नाबालिग लड़कियां थीं।लापता महिलाओं में से 56 हजार अब तक नहीं मिल सकी हैं। इस रिपोर्ट के आने के बाद से ओर 5 साल बीत चुके हैं। यानि कि यूएन की इस रिपोर्ट को आधार माना जाए तो हर साल भारत में 1 लाख से अधिक बच्चे, महिलाएं और पुरुष लापता हो जाते हैं। जिनमें से ज्यादातर को लेकर घरवालों की आस ही समाप्त हो जाती है कि जो बिछड़े हैं या गायब कर दिए गए वे कभी घर वापिस लौटकर आएंगे।
भारत में मानव तस्करी की तस्वीर कितनी भयावह है, वह इससे भी समझा जा सकता है कि खुद आगे होकर सुप्रीमकोर्ट मानव तस्करी रोकने तथा महिलाओं और बच्चों को देहव्यापार में धकेलने से बचाने में केंद्र सरकार के सुस्त रवैये पर नाखुशी जाहिर कर चुका है। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से एक साल पूर्व कहा था कि सिर्फ इस संबंध में रोकथाम के लिए राज्यों को पत्र लिखना भर पर्याप्त नहीं है। केंद्र सरकार कोई पोस्ट आफिस नहीं जो केवल सूचनाओं को भेजने का कार्य करे। केंद्र ने राज्यों के टालमटोल वाले जवाब पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। उस समय केंद्र ने राज्यों में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट बनाने के लिए राज्यों को पत्र लिखा था, जिसमें कि अधिकतर राज्यों की ओर से कोई उत्तर तक केंद्र को नहीं भेजा गया था। किंतु अब एक साल बाद इस विषय पर सरकार के जागने से सकारात्‍मक दिशा में आस बंधी है। यह जगी हुई आस कहीं न कहीं विश्‍वास भी दिलाती है कि दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो ह्यूमन ट्रैफिकिंग को पूरी तरह रोका जा सकता है।
इन दिनों जिस तरह केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने मानव तस्करी रोधी विधेयक के मसौदे को कैबिनेट के पास भेजा है। उसे देखते हुए यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत सरकार इस विषय और इससे जुड़े अपराध को जड़ से समाप्त करने के लिए संकल्पित हो उठी है। संसद में इस बिल पर मोहर लग जाने के बाद उम्मीद यही की जा सकती है कि इसके सख्त कानून के दायरे में आने से अपराधियों  में भय व्याप्त होगा और वे छोटी-मोटी सजा के बजाय लम्बी एवं जीवनभर की सजा पाने के भय से इस अपराध से दूर रहेंगे।
वस्तुत: सरकार को विधेयक लाने की जरूरत भी इसलिए पड़ी होगी कि सरकार ने यह बात ठीक से समझ ली कि बिना कड़े कानून बनाए भारत में मानव तस्करी को रोक पाना असंभव जैसा है।  इस मानव तस्करी रोधी (रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2016 के मसौदे में राष्ट्रीय मानव तस्करी रोधी ब्यूरो के गठन का भी प्रस्ताव दिया गया है। इस निकाय का कार्य होगा कि वह राज्यों के बीच गतिविधियों और पुनर्वास को लेकर समन्वय स्थापित करे। निश्चित ही इस विधेयक के पास हो जाने के बाद यह संभव हो सकेगा कि मानव तस्करी के गंभीर मामलों में जो दोषी पाए जाएंगे उन्हें हत्या करने या उसके प्रयासों के लिए दी जाने वाली सजा के समकक्ष तक माना जा सकेगा। साथ ही मानव तस्करी रोधी विधेयक के माध्यम से यह भी एक श्रेष्ठ निर्णय लिया जा रहा है कि इसमें बंधुआ मजूदर से लेकर भीग मंगाने के उद्देश्य से बच्चों का इस्तेमाल कर रहे लोगों एवं शादी के लिए बिना उसकी इच्छा और स्वीकारोक्ति के किसी महिला की तस्करी या उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाये जाने जैसे अपराध को भी सम्मिलित किया गया है।
विधेयक में अपराधियों से जुर्माना वसूलने और गुलामी के दौरान जिन पीड़ितों को उनकी मजदूरी नहीं दी जा रही थी उसकी भरपाई करने का भी प्रावधान है, इसके साथ इसमें तस्करी के लिए मादक पदार्थ खिलाना या शराब पिलाना  और शोषण के लिये रासायनिक पदार्थों या हार्मोन का इस्तेलमाल करना अपराध माना गया है। विधेयक तस्करी के मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के लिये विशेष अदालतों और पीड़ि‍तों को दोबारा सामान्य जीवन शुरू करने में मदद के लिये अधिक आश्रय स्थेलों तथा पुनर्वास कोष का भी प्रावधान करता है।
वस्तुत: इन सभी उपायों से ही मानव तस्‍करी से जुड़े अपराधों को भारत में रोक पाना संभव होगा। केंद्र की मोदी सरकार से देश मानवता के हित में ऐसे ही सख्‍त कानूनों के लागू करने की उम्मीद करता है।

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