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    हमशक्ल

    हे ईश्वर किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। कटक के बाद जिस चेहरे को बामुश्किल से भूल पाया था, आज फिर से हूबहू मेरे सामने था। लेकिन मुझसे अंजान, क्यों कि सिर्फ चेहरा मिलता था? जिसने घाव को कुरेद दिया। मुझे उसकी बिसरी यादों की झलक दिखने लगी।वर्षों पहले लगे जख़्म भर गए थे। अब थोड़ा चैन सुकून मिलने लगा था। दोस्तों के बीच समय बिताना, हंसना, पार्टी में । लग ही नहीं रहा था । यह वही लड़का है । जो कुछ वर्षों पहले इतना ख़ामोश हो गया था। इतना ख़ामोश कि इस बार मौत को इंतजार करना पड़ रहा था। हालत को देखकर जिंदगी भले उदास थी और मौत के अश्क बह रहे थे। समय के बदलाव ने मुस्कुराहट तो वापस कर दी थी। लेकिन बीती यादें कभी कभार दस्तक दे देती थी। उन यादों को भुलाना आसान भी नहीं था। खुश तो रहने लगा,सबकी खुशियों में भाग लेने लगा। लेकिन क्या पता था कि ऊपर वाले ने एक बार फिर खेल खेलने की ठान ली है।शहर बदल गया, हालात बदल गए, लेकिन नहीं बदला वो चेहरा जो मुझे पिपली में मिला था। यह खुदा का दिया हुआ इक और दर्द था। 
    उड़ीसा का शहर कटक, देखने में बहुत ही खूबसूरत। जितनी तारीफ करें कम ही लगेगी। समय के पहिये ने इस बार कर्मभूमि वहीं की चुनी। न चाहते हुए भी, दबे मन से या कहें मरे मन से यात्रा की शुरुआत हुई। दिल में उलझनों का बाजार था। यह ऐसा बाजार था। जिसमें मैं ही दुकानदार, मैं ही खरीददार था। तरह तरह के ख्यालों की ख्वाहिशें लेकर, नए शहर में दायित्वों को निभाने जब पहुंचा। मेरे सामने सारे अंजान चेहरे खड़े थे। कितना मुश्किल होता है, नये वातावरण और नये लोगों के बीच खुद को ढ़ालना। उम्मीद थी बेहतर अनुभव की। कर्मभूमि पर अपने कर्तव्य को निभाने की। सब कुछ ठीक था। वातावरण में घुनने लगा था। लेकिन जिस चीज से हम कभी परे नहीं थे। वह मेरे सामने आ गया। एक अजनबी सी मुलाकात। नशीली निगाहें। मासूमियत से भरा चेहरा। जिसे देखने के बाद मैं उस रात तो बिल्कुल भी नहीं सोया। बस सोचता रहा उसी के बारे में। ऐसा लगता था कि इस पूरे कायनात में वही है इतनी मासूम। कुछ पल की मुलाकात ने बदल दिया। मेरे काम में फर्क आने लगा। खोने लगा। दोस्तों से दूरियाँ बढ़ने लगी। रिसर्च धरी की धरी रह गई। मेरे रिसर्च में बस उसको जानने की चाहत थी। कहाँ रहती है? क्यों उदास है? यह मेरा भ्रम था।या फिर ऊपर वाले ने उसे ऐसे ही बनाया।कुछ भी हो जहाँ वह मिली थी। हर शाम वहाँ जाता। शाम रात में बदल जाती। लेकिन उसका कोई निशाँ नहीं मिलता। मेरे रिसर्च ने मुझे आखिर उस दौर में पहुंचा दिया। जहाँ उसका आशियाना था। जिसे देखकर उसके दर्द का एहसास मुझे पहली बार हुआ। उसके मासूम से चेहरे की हंसी खोने का एकलौता कारण कहीं यह तो नहीं। अब मेरी जिज्ञासा और बढ़ती जा रही थी। उसे जानने की। समझने की। मेरी खुद की खोज का कुछ पता नहीं। कई बार उससे बात करने की कोशिश की। लेकिन नाकाम रहा। मेरी भाषा को वह ठीक से नहीं समझ सकती थी। उसकी भाषा तो मेरे पल्ले भी नहीं पड़ी। फिर लगता था कि वह बोलती रहे और मैं सुनता रहूँ। महीनों गुजर गए उसे समझने में। लेकिन जितना समझता उतना उलझ जाता। टूटी फूटी हिंदी समझने से मेरे लिए बात करना थोड़ा आसान था। उसकी जुबां से निकले हिंदी के शब्द सुनकर इक अलग ही एहसास होता। हमारी बातचीत शुरू हो गई। काम से वापस लौटने के बाद उसका इंतजार रहता था। कब इधर से गुजरेगी।इक नज़र देख लूं। हम अच्छे दोस्त तो बन गए थे। लेकिन उसने कभी अपने दर्द को नहीं बताया। क्यों मासूम सा चेहरा उतरा रहता है? जाने कब दोस्ती प्यार में बदली। अक्सर हम दोनों बहुत देर तक बातें करते। उसकी नशीली आंखों में खोए रहते। इश्क की यह हवा फैलने लगी। दोस्त मुझे चिढ़ाने लगे। बारात लेकर अब फिर यहीं आना होगा। न जाने क्या , क्या कहने लगे? काम का दबाव बढ़ता जा रहा था। अचानक संबलपुर जाने का प्रोग्राम बन गया। दिल तो नहीं कर रहा था। लेकिन करता भी क्या? एक आवारा बादल जैसी जिंदगी बन गई। जिसे हम अपने हिसाब से नहीं जी सकते थे। उस दिन वह पहली बार मुझसे नाराज हुई। अपनी भाषा में क्या क्या बोला मुझे पता तक नहीं चला। मैं अपने सफर पर निकल पड़ा।गुस्सा मैं भी था न जाने की जिद मैं मान नहीं सका। आखिरी बार देखना, मिलना भी नहीं हुआ। सुबह गाड़ी पर बैठा और चला गया।

    संबलपुर पहुंचने के बाद मेरा काम पर कम ध्यान उसी की यादों में लगा रहा। दिन कट नहीं रहे थे। लग रहा था काश समय से आगे जाकर उस तारीख को ले आएं । यहाँ का काम खत्म कर उससे मिले। वह समय भी आया प्रोजेक्ट पूरा हुआ। सब वापसी की तैयारी में लग गए। मैंं पिपली जाने की। दिल में खुशी थी। मन रोमांचित महसूस कर रहा था। और प्रसन्नता की उबाल में सफर जैसे कट नहीं रहा था। 3 से 4 घंटे का रास्ता बहुत लंबा लग रहा था। हमेशा गाड़ी तेज चलाने से मना करने वाला। आज ड्राइवर से कह रहा था ज़रा गाड़ी तेज चलाओ। पिपली पहुंचते ही दिल में खुशी उमड़ रही थी। हो भी क्यों न? आखिर महीनों बाद चांद के दर्शन करने जा रहे थे। आसमान का चांद तो हमेशा दिखाई देता है। लेकिन इस जमीन का चांद महीनों से रूठा था। उसे मनाने के लिए बहुत कुछ सोचा था। ऐसा कहेंगे, वैसा कहेंगे। वो जैसे कहेगी, हर हालत में मना लेगें। कदम बहक रहे थे। धड़कनेंं बढ़ रही थी। ऐसा लग रहा था कि दौड़ रहा हूँ। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था। आखिर में वहाँ पहुंचा जहाँ पर उससे मुलाकात हुई थी। वहीं पर जहाँ उसे छोड़कर गया था। वहीं पर जहाँ उसने जाने से मना किया था। वहीं पर जहाँ उसके आंसू गिरे थे। वहीं पर जहाँ उसने जाते वक्त मुझे पलटकर  नहीं देखा। यह वही जगह थी जहाँ हमने ढ़लते हुए सूरज को देखा। साथ बैठकर बातें किया करते और समय का पता नहीं चलता।

    मैं वहाँ पर खड़ा हुआ ही था कि किसी की आवाज़ ने मुझे पलटने पर मजबूर किया। देखा तो मेरा वह संदेश वाहक था जो मेरे संदेश को उस तक पहुंचाया करता था। लेकिन आज वह मेरे लिए जैसे कोई संदेश लेकर आया था।थोड़ा सहमा, थोड़ा घबराया हुआ।उसकी जुबान कुछ कह नहीं पा रही थी। आंखों में नमी दिख रही थी। उस नमी ने मुझे शून्य में पहुंचा दिया। उसकी बातों ने मेरे जिंदा शरीर से प्राण निकल जाने जैसा हाल कर दिया। घुटनों के बल बैठा। ऐसा लगा दिमाग का काम करना बंद। दिल में मलाल था कास न जाता। अश्क बह रहे थे लेकिन पोछने वाला कोई नहीं था। जिस खुशी के साथ मैं वापस आया।उससे कई गुना ज्यादा दर्द मिल गया। यह ऐसा जख़्म था।जो कभी नहीं भर सकता है। बस हर पल हर दिन यादों में खुद को पिरोते रहे। आज भी जब चांद को देखता हूँ तो उसकी याद आ जाती है। क्योंकि मेरा धरती का चांद मुझसे बहुत दूर आसमान पर कहीं किसी बिराने में अपनी रोशनी बिखेर रहा होगा। मैं आज भी उसकी यादों में जी रहा हूँ।और जिंदगी का सफर काट रहा हूँ। हे ईश्वर किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। कटक के बाद जिस चेहरे को बामुश्किल से भूल पाया था, आज फिर से हूबहू मेरे सामने था। लेकिन मुझसे अंजान, क्यों कि सिर्फ चेहरा मिलता था? जिसने घाव को कुरेद दिया। मुझे उसकी बिसरी यादों की झलक दिखने लगी। अब उन यादों को न जगा।उस चेहरे से बहुत कुछ पूछना था। लेकिन सब कुछ खत्म  ?

    रवि श्रीवास्तव
    रवि श्रीवास्तव
    स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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