लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

ताजा खबर यह है कि विश्व हिंदी सम्मेलन का 11 वां अधिवेशन अब मोरिशस में होगा। मोरिशस की शिक्षा मंत्री लीलादेवी दोखुन ने सम्मेलन की वेबसाइट का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि ‘आज हिंदी की हालत पानी में जूझते हुए जहाज की तरह हो गई है।’ अच्छा हुआ कि उन्होंने डूबते हुए जहाज नहीं कहा। पिछले 70 सालों में यदि हमारी सरकारों का वश चलता तो वे हिंदी के इस जहाज को डुबाकर ही दम लेतीं। स्वतंत्र भारत की सरकारों को कौन चलाता रहा है ? नौकरशाह लोग ! ये ही लोग असली शाह हैं। हमारे नेता तो इनके नौकर हैं। हमारे नेता लोग शपथ लेने के बाद दावा करते हैं कि वे जन-सेवक हैं, प्रधान जन-सेवक! यदि सचमुच जनता उनकी मालिक है तो उनसे कोई पूछे कि तुम शासन किसकी जुबान में चला रहे हो ? जनता की जुबान में ? या अपने असली मालिकों, नौकरशाहों की जुबान में ? आज भी देश की सरकारों, अदालतों और शिक्षा-संस्थाओं के सारे महत्वपूर्ण काम अंग्रेजी में होते हैं। संसद में बहसें हिंदी में भी होती हैं, क्योंकि हमारे ज्यादातर सांसद अंग्रेजी धाराप्रवाह नहीं बोल सकते और उनके ज्यादातर मतदाता अंग्रेजी नहीं समझते। लेकिन संसद के सारे कानून अंग्रेजी में ही बनते हैं। हिंदी के नाम पर बस पाखंड चलता रहता है।

43 साल पहले जब पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में हुआ था, तब मैंने ‘नवभारत टाइम्स’ में संपादकीय लिखा था- ‘हिंदी मेलाः आगे क्या?’ उस संपादकीय पर देश में बड़ी बहस चल पड़ी थी लेकिन जो सवाल मैंने तब उठाए थे, वे आज भी मुंह बाए खड़े हुए हैं। हर विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रस्ताव पारित होता है कि हिंदी को संयुक्तराष्ट्र की भाषा बनाओ। वह राष्ट्र की भाषा तो अभी तक बनी नहीं और आप चले, उसे संयुक्तराष्ट्र की भाषा बनाने ! घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने !! इस सम्मेलन पर हमारे विदेश मंत्रालय के करोड़ों रु. हर बार खर्च हो जाते हैं लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकलता।

हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज स्वयं हिंदी की अनुपम वक्ता हैं और मेरे साथ उन्होंने हिंदी आंदोलनों में कई बार सक्रिय भूमिका निभाई है लेकिन वे क्या कर सकती है ? हिंदी के प्रति उनकी निष्ठा निष्कंप है लेकिन वे सरकार की नीति-निर्माता नहीं हैं।वे सरकार नहीं चला रही हैं। सरकार की सही भाषा नीति तभी बनेगी, जब जनता का जबर्दस्त दबाव पड़ेगा। लोकतंत्र की सरकारें गन्ने की तरह होती हैं। वे खूब रस देती हैं, बशर्ते कि उन्हें कोई कसकर निचोड़े, मरोड़े, दबाए, मसले, कुचले ! यह काम आज कौन करेगा ?

4 Responses to “हिंदी के नाम पर पाखंड”

  1. हिमवंत

    सिर्फ हिंदी ही देश की भाषा नही है. सभी भारतीय भाषाओं को प्रति सम्मान के साथ मैं अपनी बात रखना चाहता हूं. वास्तव में सरकारी प्रयास और धन का व्यय सिर्फ औपचारिकता भर बन कर रह गए है. कांग्रेस काल अवधि में मैं आनन्द शर्मा जैसे लोगो से अधिक अपेक्षा नही करता था. लेकिन सुषमा जी से मेरी अपेक्षाए बड़ी है क्योंकि उनकी क्षमताएं बड़ी है उनका संकल्प बड़ा है. हिंदी विश्व भाषा बनने को अग्रसर है. लेकिन हमारे भारतीय डिप्लोमैटिक मिशन ही इसे भारत की भाषा बनाने का काम कर रही है, जबकि वास्तव में यह अनेक देशों की भाषा है. मेरी बात का अर्थ थोड़ा धीरे समझ आएगा, आ जाए तो बेहतर है.

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    • इंसान

      हिमवंत जी, आपकी टिप्पणी में “केवल” शब्द आपके वक्तव्य में उलझन पैदा करते दिखाई देता है| हिंदी भाषा के संदर्भ में सुषमा स्वराज जी से अपेक्षा करते क्या आप कहना चाहते हैं कि उसके विपरीत (लेकिन) हमारे भारतीय डिप्लोमैटिक मिशन ही इसे भारत की भाषा बनाने का काम कर रही है?

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  2. इंसान

    मैं यहां हिंदी के नाम पर नहीं विद्वत्ता के नाम पर क्षतिपूर्ण पाखण्ड देखता हूँ| चिरकाल से विभिन्न धर्म जाति रीती-रिवाजों और भाषाओँ में बंटे परंपरागत भारत में चौपाल अथवा पनवाड़ी की दूकान पर लगी गोष्ठियों में हो रही गप्प यदि मेरी जिज्ञासा नहीं मिटा पाती तो विचलित मन मैं समय की दिनचर्या में खो जाता रहा हूँ| लेख पढ़ते अनायास बचपन में सुनी जन-कथा मुझे याद हो आई| संक्षिप्त में, कथा एक युवक की है जो गाँव में एक पेड़ की ऊँची डाली पर बैठा उसे काटने में लगा था जब उधर से गुजरते गाँव के एक बुजर्ग ने उसे चेतावनी देते कहा कि ऐसा करते गिर उसके सिर माथा फूटने की सम्भावना बनी रहेगी| युवक तपाक से बोला, “चलो, जाओ, अपना काम करो; तुम्हारी छोरी का भी ब्याह देखा था!” जीवन में कई एक ऐसी घटनाओं ने मुझे सोचने को बाध्य कर जीवन के अर्थ को विश्लेषणात्मक ढंग से समझने के योग्य बना दिया है|

    भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर प्रधान जन-सेवक के आगमन के पहले के वातावरण में दशकों से हो रही हिंदी व अन्य भारतीय मूल की भाषाओं की दुर्दशा का समाधान देश से दूर यदि मॉरीशस में विश्व हिंदी सम्मलेन के अधिवेशन अथवा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा भाषा की स्वीकृति के उपक्रम द्वारा संभव हो जाए तो उसमें क्या बुराई है? लेखक से मेरा अनुरोध है कि अपने लेख को बार बार पढ़ें और यदि हो सके तो विषय पर अपनी मान्यता अथवा उसमें हुई कोई भूल-चूक को पाठकों से सांझा करें|

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