लेखक परिचय

आशीष कुमार ‘अंशु’

आशीष कुमार ‘अंशु’

हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया हमपर किसी खुदा की इनायत नहीं रही, हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग रो-रो के बात कहने कि आदत नहीं रही।

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आशीष कुमार ‘अंशु’

वर्ष 2005 में 21 देशों से इस्लामिक विषयों के 40 विद्वान इस्लामाबाद में इकट्ठे हुए. वहां बात होनी थी, मुसलमानों के बीच गर्भ निरोध के सवाल को लेकर. विद्वानों के बीच लंबी चर्चा चलती रही और तीन दिनों के बाद भी सभी 40 विद्वान जनसंख्या नियंत्रण को लेकर एक राय बनाने के बाद भी कायम राय को जगजाहिर करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए.
हालांकि उस समय पाकिस्तान में जनसंख्या संबंधी मामले देखने वाले मंत्री शाहबाज चौधरी ने कहा था कि “सभी विद्वानों के बीच शादी-शुदा जोड़ों के बीच गर्भ निरोधक के इस्तेमाल पर सहमति बन गई है.” लेकिन मंत्री जी पत्रकारों के इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए कि जब सब लोगों की सहमति बन ही गई है तो फिर संयुक्त घोषणा पत्र में यह बात कैसे नहीं आई?

यह खबर सूत्रों हवाले से बाहर आई कि जो विद्वान इस्लामाबाद में इकट्ठे हुए थे, वे सभी गर्भ निरोध के इस्तेमाल पर सहमत तो हो गए थे लेकिन अपने-अपने मुल्क के कट्टर मुसलमानों के डर की वजह से वे अपनी बात को खुल कर नहीं रख पाए, जिसकी वजह से यह बात संयुक्त घोषणा पत्र में शामिल नहीं हो पाई.

मुसलमानों के बीच तेजी से बढ़ती जनसंख्या के पीछे समाजशास्त्री रोगर और पैट्रिका जेफरी उनके सामाजिक आर्थिक और धार्मिक वजहों को देखते हैं. उनके अनुसार भारतीय मुस्लिम अपने हिन्दू साथियों के मुकाबले गरीब हैं और कम पढ़े-लिखे हैं. वहीं भारतीय समाजशास्त्री बीके प्रसाद कुछ अलग बात करते हैं- “भारतीय मुस्लिम आबादी अपने हिन्दू साथियों के मुकाबले अधिक शहर केन्द्रित है. शिशु मृत्यु दर की बात करें तो यह मुसलमानों में 12 फीसदी है, जबकि हिन्दूओं में इससे अधिक है.” लेकिन क्या शहर में रहने से उनकी साक्षरता दर बढ़ जाती है. माना जाता है कि ऐसा दरअसल रोज़ी रोटी की जुगत की खातिर लोग करते हैं.

‘द फ्यूचर ऑफ ग्लोबल मुस्लिम पोपुलेशन’ की रिपोर्ट को सही माना जाए तो अगले दो दशको में गैर मुस्लिमों की तुलना में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर दोगुनी होगी. वर्तमान में दुनिया की आबादी में मुस्लिमों की भागीदारी 23.4 प्रतिशत (6.9 बिलियन) है, जिसकी 2030 तक बढ़कर 26.4 प्रतिशत (8.3 बिलियन) होने की संभावना है. द पियू फोरम ऑन रिलिजन एंड पब्लिक लाइफ की रिपोर्ट के अनुसार इस वक्त 72 देशों में मुस्लिम आबादी दस लाख से ज्यादा है, यदि जनसंख्या विकास दर यही रही तो 20 साल में 79 देश ऐसे होंगे, जहां मुस्लिम आबादी 10 लाख से अधिक होगी.

zakir-husainमुस्लिम समाज में जनसंख्या वृद्धि के इस पैटर्न को समझने के लिए हाल में ही हरियाणा के मुस्लिम बहुल मेवात के कुछ गांवों में जाना हुआ. इस यात्रा की शुरूआत हुई मोहम्मद इसाक साहब के घर से, जो पिछले एक से अधिक साल से मीडिया से दूरी बनाए हुए हैं, वरना उससे पहले अपने तेईस बच्चों की वजह से वे देसी नहीं, विदेशी मीडिया के लिए भी आकर्षण का केन्द्र रहे हैं. इसाक साहब से मिलने के लिए दिल्ली के अपने एक फोटोग्राफर मित्र राहुल की संगत में मेवात में उनके गांव अकेड़ा (नूंह) गया था.

अब मीडिया से दूरी क्यों बनाई, इसके जवाब में वे कहते हैं कि शरियत उन्हें तस्वीर की इजाजत नहीं देता. जबकि एक साल पहले तक तमाम देसी-विदेशी मीडिया में छपी अपनी तस्वीरों के लिए वे कोई सफाई नहीं दे पाते. जब उनसे तेईस बच्चों को लेकर बातचीत होती है तो इसाक साहब फिर एक बार शरियत का हवाला देते हैं. लेकिन जब उनसे इस्लाम के जानकार मौलाना वहीदुद्दीन साहब का जिक्र करते हुए मैंने पूछा कि इस्लाम में गर्भनिरोध का इस्तेमाल नहीं, बल्कि भ्रूण हत्या गैर इस्लामी है. बर्थ कंट्रोल और एबॉर्शन को एक पलड़े में नहीं रखा जा सकता है.

मैंने उन्हें तर्क दिया कि इस्लाम में महिलाओं द्वारा गर्भ से बचने के लिए गर्भ निरोध पर पाबंदी नहीं रही है. इस्लाम पुरुष नसबंदी और कंडोम के इस्तेमाल की भी इजाजत देता है.

इस्लाम में पाक कुरआन के बाद दूसरी पाक किताब मानी गई है, ‘बुखारी’. बुखारी के अनुसार रसुल्लाह के साथी इस बात का ख्याल रखते थे कि उनकी महिला साथी गर्भवती ना हों. इसके लिए वे कुछ तरकीब इस्तेमाल करते थे. जिसके लिए मोहम्मद साहब ने कभी मना नहीं किया. यदि किसी बात को जानते हुए रसूल मना ना करें तो इसे इस्लाम में उनकी मौन सहमति मानी जाती है.

जब इसाक साहब के सामने इन सारी बातों का जिक्र आया तो वे कुछ नहीं बोले.

इस समय उनकी बहू और पत्नी दोनों गर्भवती हैं, यानि तेइसवें के बाद चौबीसवें की तैयारी है. वैसे इसाक साहब की शादी को अभी पैंतालीस साल हुए हैं.

हम अकेड़ा से निकल कर कुछ अन्य गांवों से होते हुए हतीम के खाइका गांव पहुंचे. यह क्षेत्र मेवात के अंदर पलवल जिले में आता है. यहां मिले जाकिर हुसैन साहब और दूसरे नजीर अहमद साहब. इन दोनों के क्रमशः बारह और तेरह बच्चे हैं.

जाकिर साहब को क्रम से याद नहीं है कि कौन सा बच्चा पहले आया और कौन सा बाद में. नजीर साहब को तो अपने बच्चों के नाम तक याद नहीं हैं. जब असमंजस में होते हैं तो बच्चे से ही पूछ लेते हैं कि तुम्हारा नाम क्या है? लेकिन इस बात पर दोनों की सहमति है कि खुदा दे रहा है तो हम कौन होते हैं, उसके दिए को अस्वीकार करने वाले. जाकिर साहब चुटकी लेते हुए कहते हैं- “अपना इरादा तो ट्वेंटी-ट्वेंटी का है. ट्वेंटी मेरे और ट्वेंटी नजीर साहब के.”
नजीर साहब और जाकिर साहब खुद को सच्चा मुसलमान कहते हैं. यदि उन्हें यह किसी ने बताया होता कि मुसलमानों के चार प्रमुख इमामों में से एक इमाम हजरत मलिक ने भी गर्भ निरोध को उचित ठहराया है तो वे शायद कभी मजाक में भी ‘ट्वेंटी-ट्वेंटी’ की बात न करते.

कुरआन की सूरत बकरा की एक आयत को लेकर गांव में इस्लाम में विश्वास रखने वाले लोग गर्भनिरोध से बचते हैं, वह है- “तुम्हारी बीवियां तुम्हारी खेतियां हैं, बस अपनी खेतों में जैसा चाहो, आओ.” अब इसमें यह तो नहीं कहा गया कि नसबंदी या गर्भनिरोध का इस्तेमाल ना करो. फिर भी इस आयत की व्याख्या कुछ इस तरह समाज में की गई है कि लोग बाग गर्भ निरोध के विरोध में इस पूरी कहानी को देखते हैं.

मेवात के इन गांवों में छह-सात-आठ बच्चों वाले परिवार आम-सी बात हैं. जो एक खास बात नजर आई इन गांवों में वह यह कि इतनी संख्या में बच्चों की वजह मजहब नहीं है, बल्कि गांव वालों के बीच शिक्षा का अभाव है. समाज में जागरुकता नहीं है. राह चलते कोई सड़क छाप विद्वान कोई बात कह गया तो गांव के लोग उस बात को दिल से लगाकर बैठ जाते हैं. अशिक्षा के कारण ऐसा हिन्दू समाज में भी देखा जाता है. वहीं देश के आदिवासियों के बीच भी जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कोई सोच विकसित नहीं हो सकी है.

ऐसे जोड़े भी मेवात के जिलों में बहुतायात हैं, जिन्होंने सही देख-भाल के अभाव में अपने छोटे छोटे बच्चे खोए हैं. जब हम नजीर साहब से बात कर रहे थे, उसी वक्त पता चला कि एक दिन पहले ही उन्होंने अपना एक बच्चा खोया है. गाँव वाले बिल्कुल निर्दोष जान पड़े क्योंकि वे उस विद्वान की बात माने बैठे हैं, जिन्हें खुद इस्लाम की समझ नहीं है. खैर, यह बात हम गांव से निकलते-निकलते ही जान पाए कि पूरे समय हमारे साथ जो नजीर साहब गांव के सरपंच बने घूमते रहे, वास्तव में उनकी पत्नी फजरीजी गांव की सरपंच थीं.

यह आलेख खत्म होते-होते अल-शेख मोहम्मद इब्न का एक फतवा हाथ लगा, जिसके अनुसार- यदि किसी बीमारी, कमजोरी या शरीर के किसी कमी के कारण प्रत्येक साल गर्भवती होने से उसकी जान को खतरा हो या फिर पति की इजाजत से डॉक्टर से सलाह लेकर कोई महिला गर्भ निरोध का इस्तेमाल कर सकती है. पढ़े लिखे लोगों के बीच जागरूकता आई है. हमें लगता है कि शिक्षा के प्रचार प्रसार की सख्त ज़रुरत है.

3 Responses to “अगर अल्लाह पैदा करना चाहेगा…..”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    Iqbal hindustani

    अंशु जी
    आपने बिलकुल ठीक लिखा है शिक्षित मुस्लिम अन्य वर्गों की तरह ही परिवार नियोजन अपना रहा है। इसमें एक तथ्य और जोड़ लीजिये सम्पन्न और आधुनिक अनपढ़ मुस्लिम भी तेज़ी से बच्चे कम पैदा कर रहा है। मज़हब का बढ़ती आबादी में मामूली रोल हो सकता है लेकिन अगर सरकार छोटे परिवारों के लिये कुछ प्रोत्साहन योजनाएं घोषित करे तो मुस्लिम समाज और तेज़ी से सब के साथ फैमिली प्लानिंग में हिस्सा लेगा।

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  2. mahendra gupta

    इस्लाम धर्म जितना अच्छा है उतना ही विवादस्पद इसके अनुयाइयों ने इसे बना दिया है , ख़ास कर इन मुल्ला मौलवियों ने , संस्कार वश या शिक्षा के अभाव में जब सामान्य जन इनसे सवाल पूछतेहैं तो वे अपने ही तर्क देकर उसे विवादास्पद बना देते हैं , इसका एक कारण उनके अध्ययन में कमी भी रहा है ,हिन्दू धर्म में भी यह कार्य कुछ पंडितों के द्वारा कर दिया जाता है , लेकिन इस्लाम में कटटरता कुछ अधिक होने के कारण ऐसे अजीब अजीब फतवे आते रहते हैं जिस से हास्यास्पद स्थिति भी बन जाती है , व अनुयाई बेचारा ज्यादा धर्म संकट में पड़ जाता है ,इसमें इस्लामिक विद्वानो द्वारा पहल कर समाज के बदलते स्वरुप को देखते हुए स्पष्टीकरण करना चाहिए ताकि आम मुसलमान भ्रमित न हो सके

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  3. suresh karmarkar

    इन्हे ”अल्लाह ,और केवल अल्लाह ”ही समझा सकता है, किन्तु जिन मुस्लिम परिवारोंमें शिक्षा का प्रसार हुआ है उनमे परिवार के विकास की और कल्याण की सोच जाग्रत हुई है. मेरे परिचित लगभग ३०/४० मुस्लिम मित्र हैं इनमे ३/४ बच्चों से अधिक नहीं हैं. और एक दो के यहां तो १ या दो बच्चे ही हैं. समय के साथ जागृति आयेगी.

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