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    Homeसाहित्‍यलेखगोवंश नही बचाया तो धरती पर कुछ नही बचेगा ?

    गोवंश नही बचाया तो धरती पर कुछ नही बचेगा ?

                     आत्माराम यादव पीव

           गोरक्षा का प्रश्न भारत के लिए रोटी का प्रश्न है। आज देश के युवा सम्राट किसानपुत्रों से यही रोटी का प्रश्न है कि क्या वे चाहते है कि उनपर ओर देश पर लक्ष्मी की कृपा हो, सरस्वती उनकी सहायक हो, देशवासियों को घी,दूध के नाम पर नकली जहरीला रसायन खिलाने वालों से मुक्ति मिले तो आज ही, अभी से आप सभी को गोरक्षा का संकल्प लेना होगा। अगर आप ऐसा व्रत लेकर अपने संकल्प पर खरे उतरे तो सच मानिए देशवासियों के चेहरे पर आप खुशी ही नही देंगे बल्कि उन्हे निरोगी काया भी दे सकेंगे,जिस दिन आपकी यह संकल्पना साकार हो जाये तो यह निश्चित मानिए आपके पूर्वजों को पूर्ण तृप्ति तो मिलेगी ही वही आकाश से देवताओ का आशीष आप पर बरसना शुरू हो जाएगा जो आपको परमानंद कि तरह आत्मविभोर रखेगा। किसानपुत्र को यह नही भूलना चाहिए कि वह इस देश कि विभूति ही नही बल्कि इस देश कि चेतना का प्रतीक है जो अन्न उत्पादन करके दुनिया की सभ्यता ओर संकृति का मेरुदंड भी कहलाता है। गोरक्षा के लिए देश में अनेक लोगों ने अपने प्राणों कि आहुती दी है सेकड़ों साल से इस मुहिम को चलाने कि परंपरा को वर्ष 1917 में पंडित भोलानाथ जी शर्मा के प्रयासों से अखिल भारतवर्षीय गोमहासभा का गठन हुआ ओर इस महासभा कि मांग पर सरकार ने पशुओ की गणना करवाई ओर गोधन को विदेश में मांसाहार के लिए कि जाने वाली तस्करी पर रोक लगाने शुरू हुए आंदोलन में देश के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेकर सरकार को झुकने के लिए मजबूर किया। महात्मा गांधी युवाओं के दुबलेपन पर उनसे कहा करते थे कि तुम जवां होकर दुर्बल क्यो लगते हो? जवानी में बूढ़े दिखना बताती है कि हमारी खेती दिनोदिन क्यो कमजोर हो रही है? हम आज क्यो गरीब है?हमारे देश में रोग क्यों फैल रहे है?हम आज क्यो आरक्षित है ,इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि गाय की सेवा ओर रक्षा न करना। आज गाय विनाश के कगार पर खड़ी है ओर मैं विश्वासपूर्वक यह नहीं कह सकता कि हमारी कोशिसे कामयाब ही होंगी लेकिन अगर गाय ही न रही,हम भी नही रह पाएंगे। हम, यानि हमारी संस्कृति –हमारी स्वभाव सिद्ध अहिंसक ओर ग्रामीण संस्कृति। हमारा जीवन हमारे पशुओं के साथ ओतप्रोत हो गया है, हमारे अधिकांश देहाती अपने गाय-बैलों के साथ अक्सर एक ही छप्पर के नीचे रहते है। दोनों साथ रहते है ओर साथ ही भूख के कष्ट सहते है। आज हमारे सामने सबसे बड़ा सबाल अपनी गरीबी ओर फकाकसी मिटाने का है,लेकिन मैंने तो आपके सामने ढोरों की भुंख ओर उनकी गरीबी कि बात की है, हमारे ऋषिगण कह गए है कि गाय कि रक्षा कर सकोगे तो तुम सबकी रक्षा कर सकोगे। “”

           मैंने अमेरिका के होर्ड्स डेलीमेन के संपादक की एक टिप्पणी पढ़ी जिसमें उन्होने लिखा कि- “”गाय हमारे दुग्धभवन की देवी है। वह भूखों को खिलाती है, नंगों को पहनाती है ओर बीमारों को अच्छा करती है,उसकी ज्योति चिरतन है“” तभी गोवंश को लेकर यह लिखने की प्रेरणा मिली। मैंने पाया कि प्राचीन समय से गोवंश कि महिमा को वेदों ने, ऋग्वेदों ने, पुराण ओर शास्त्रों ने गाया है। ऋग्वेद कहता है- ““गोर्मे माता  वृषभ: पिता मे, दिव: शर्म जगती मे प्रतिष्ठा:”” अर्थात गाय मेरी माता है, बैल मेरे पिता है ,ये स्वर्ग में मेरा कल्याण करे ओर संसार में मुझे सुखी रखे। ऋग्वेद के एतरेय ब्राह्मण में लिखा है –“”आज्यम वै देवानां,सुरभिघातम मनुष्यानाम,आयुताम पितृनां,नवनीतम गर्भाणाम।“” –अर्थात-घी, दूध, मक्खन देवता,पितर,मनुष्य तथा गर्भस्थ बालकों को भी प्रिय है। शास्त्रो में कहा है –‘’गाय रुद्रों की माता वसुओं की पुत्री, अदितिपुत्रों कि बहिन ओर घृतरूप अमृत का खजाना है।‘’ प्रत्येक विचारशील मनुष्य को चाहिए की वे निरपराध एवं अवध्य गाय का वध न करे। अथर्ववेद में लिखा है कि- गाय के शरीर में समस्त देवताओं का निवास है,इसलिए सर्वदेवस्वरूप गाय कि सेवा करने से नारायण प्रसन्न होते है “”यस्या शिरसी ब्रम्हास्ते स्कन्धदेशे शिव: स्थिति:। पृष्ठे विष्णुस्थता तस्थौ श्रुतस्यचर्णेशु स। या अन्या देवता: काश्चितस्या लोमसु संस्थिता:। सर्वदेवमयी गौस्तु तुस्यपेत्तद भक्तितोहरि:।“’ गाय से सिर में ब्रम्हा,कंधे में शिव, पीठ में बिष्णु, चारों चरणों में चारो वेद ओर सम्पूर्ण देवता सभी रोमों में वास करते है। विनोबा भावे ने गाय को लेकर चिंता व्यक्त करते हुये लिखा था कि- “”हिंदुस्तानी सभ्यता का नाम ही गौसेवा है। लेकिन आज गाय कि हालत हिंदुस्तान मे उन देशों से कहीं अधिक खराब है, जिन्होने गौसेवा का नाम नहीं लिया था। हमने नाम तो लिया पर काम नहीं किया। जो हुआ सो हुआ पर अब तो गाय को लेकर चेते।“” आज सरकार गौहत्या पर प्रतिबंध नहीं लगा सकी लेकिन इतिहास हमें आश्चर्यचकित करता है है कि मुगल सम्राट अकबर के समय मे गौहत्या करने वाले को मृत्यु दंड दिया जाता था इस बात कि पुष्टि के लिए अकबर के राजदरवारी कवि का यह हिन्दी छ्ंद इसकी गवाही देता है- “” नरहरि कवि सो गऊ की विनती सुनि,

           सांची गुन खलन पै कै मति उकस सी।

           अकबर जारी परवाने किये मारिवे को,

           चारिहु महीपन लखानी बात हक सी॥

           व्यापि गयो हुकुम दिल्लीपति को हिन्दभरि,

           बाजिवी विचारि मन अति के करकसी।

           जीवन कसाइन को गाइन को देत भयो,

           गाइन को मौत ले कसाइन को न बकसी॥

           गाय हमारी संस्कृति की प्रतीक है। बचपन से ही गाय कि आंखो में मुझे एक आकर्षण सा लगा, मानों वे मुझे कोई मूक संदेश देकर कहना चाहती हो। जब में पाँच वर्ष का रहा था तब मेरी दादी के पास एक पीली पंडा नाम की गाय थी, जिसे में दुहने जाता तो वह मुझे देखती ओर अम्मा कहती टांग मारेगी, उसने कभी नही मारा, उसके बाद विध्या गाय थी जो बहुत मरखनी थी,चरवाहा उसे देख डरता था तब गुस्से में पिता जी ने उसे बुदनी तहसील के गाँव बघवाड़ा मामा के यहा भेज जी लेकिन बरसात में जब नर्मदा में बाढ़ आई थी ओर पानी दोनों किनारे था तब विध्या उस पार से तैरकर इस पार आ गई ओर घर आकार खूँटे पर खड़ी हो गई । मैं कई बार विध्या गाय कि आँखों में झाँकता तो पाता कि उसकी आंखे कितनी निर्दोष है, कितनी भोली है, कितनी मनोहर है, जैसे पावनता का झरना उसकी आंखो से बहता हो, विध्या गाय जैसी निर्दोष आंखे सभी गायों की होती तभी मुझे सभी गाये पवित्र ओर देवी स्वरूप दिखती ओर अमृतमयी दुग्ध देने के कारण मैं सदैव गाय की पूजा करने लगा ओर अब भी करता हूँ। आज गाय की उपयोगिता को समझकर दूध,घी,छाछ, मक्खन, दही आदि अमृततुल्य होकर शक्तिवर्धक भोज्य व पेय बने हुये है। गौमूत्र, गोबर को लेकर पतंजलि सहित कई उत्पाद बाजार मे करोड़ो कमा रहे है। गौमूत्र अनेक रोगों को दूर करता है। गोबर खाद बनकर खेतों मे पहुचकर सोना उत्पन्न करती है। इसके उपले हवन कुंड के अलावा अब गोकाष्ट बनाकर अंतिम संस्कार के रूप मे उपयोगी है ओर पर्यावरण को भी सुरक्षित रखे हुये है। लोककवि घाघ ने भी गाय को लेकर कहा कि –भुईया खेड़े हर हेह्य चार, घर होय गियथिन दुधार।

    अरहर के दालि जड़हाँ के भात,गागल निबुया ओ घिय तात ॥

    सई रस खड़ दही जो होय, बाँके नयन परोसे जोय॥

    कहे घाघ तब सब ही झूठा ऊहा छाड़ी इहवे बैकुंठा॥

    आज हम गौवंश को बचाने के लिए चिंतित नहीं है, ऐसा करके हम इस दुनिया के विनाश कि ओर अग्रसर हो चुके है। हमारे पूर्वज कहा करते थे कि यहा कभी दूध दही कि नदिया बहा करती थी, सोचिए आखिर वह भारत कहा खो गया जहा दूध दही कि नदी में सराबोर होकर हमारे पूर्वज इतने ताकतवर थे कि देवता ओर दैत्य भी इनसे पंगा लेने के लिए अनेक बार सोचते थे। देवताओ ओर दैत्यों को अपने कदमों रखने वाले हमारे पूर्वज आज हमें इस निरीह अवस्था में देखकर गाय कि दुर्दशा देखते है तो वे हमे धिक्कारते होंगे। आज दुनियाभर में गाय की चिंता कर उसे पाला पौसा जा रहा है, उसे भरपूर भोजन दिया जा रहा है लेकिन भारत में मनुष्यता शर्मसार है जो गाये भूखी रहती है, सड़कों पर घूमती है, उनके चारे के लिए चरनोई भूमि को देश ओर प्रदेश कि सरकारे अपनी वोटबैंक की राजनीति के लिए मिटा चुकी है ओर अब देश के प्रत्येक प्रदेश के जिलों के गांवों में यह चरनोई भूमि अतिक्रमण कि शिकार हो चुकी है तो कही हरिजन आदिवासी को देकर सरकार गांवो के जानवरों को तिलांजलि दे चुकी है।  कुछ लोग है जो गाय की सेवा करते डेहरी उधयोग चलाकर सेवा करते दिखते है असल में उन लोगों ने गायों को जंगल-खेतों से दूर रखकर एक कैदखाना मुहैया कराकर उन्हे श्रपित जीवन दिया है ओर वे एक ही छत के नीचे प्रजनन का इंजेक्शन से गाय बछड़ा जनने, दूध देने के लिए है। उन्हे कुछ समय के लिए खोलकर जिस कैदखाने में है वह से मुक्त कर उसकी सफाई के लिए दूसरे कैदखाने में घंटा आधे घंटे के लिए रखा जाता है, वही वे उठने बैठने से पैदल न चल पाने से पैरो कि अकड़न का शिकार होकर बूढ़ी होते ही कसाईघर पहुचा दी जाती है, जिसपर सभी ने आंखे मुँदी है। सरकारी गौशालाए असल में गौओं के नाम पर आने वाले खर्च को नेताओ के पेट भरने का साधन बनकर रह गए है। गोशाला चलाने वाले नराधम सेकड़ों की संख्या में गायों के भूखे मरने पर उनकी चरम ओर हड्डी का कारोबार कर मौज कर रहे है ओर सरकार का संरक्षण पाकर कई संगठन गायों को कत्लखाने भिजवाने के नाम पर वसूली करते है ओर कई वसूली न होने पर ऐसे वाहनों को रोकते है जो कत्लखाने जा रहे हो ओर उनसे सौदेवजी चलती है,लेनदेन के बाद वे लोग वाहनों को सब किस समय किस मार्ग से ले जाना है यह सब सुविधाए जुटाकर गौमाता के प्राणों के लिए घातक बने है, इनमें से कोई लोग नैतिक ज़िम्मेदारी समझ गायों के संकटों को बचाने में अपने प्राण लगा सकेंगे यह हालत दूर तक नजर नहीं आते है।

    आज देश के स्वास्थ्य,धर्म ओर धन, इन तीनों का दारोमदार गोरक्षा पर है इसलिए प्रत्येक भारतवासी को भारत में घी,दूध ओर अन्न की अधिकता के लिए गोरक्षा का दायित्व पूरी निष्ठा से पालन करने कि शपथ लेकर अभी से उसकी पालना कि ओर अग्रसर हो जाना चाहिए। गाय को माता की तरह पूजने वाले इस भारत देश में जिसप्रकार गोवंश को कत्लखाने पहुचाया जाकर आने वाली पीढ़ी को विशुद्ध रूप से स्वस्थ पर्यावरण से दूर रख दूषित हवा-जल प्रदूषण का आदि बनाकर अस्वस्थ बनाने की होड लगी है उसे धार्मिक दृष्टि के आईने से न देखकर आर्थिक विचार से भी गोवंश की रक्षा करके रोका जाना जरूरी है। आज देश दुनिया की गोमाता हमारी ओर करुणा लिए सजल नयनों से निहार रही है। गोहत्या को रोकने का काम हिन्दू रोके यह बाध्यता समाप्त होनी चाहिए,बल्कि गोरक्षा का काम इस धरती की सारी मनुष्यजाति के जिम्मे है, यदि मनुष्यता को इस धरा पर जीवित चाहते हो तो गोहत्या के साथ हर निरीह जीव की हत्या पर रोक लगनी चाहिए,तभी हम प्रकृति ओर ईश्वर को सम्मान दे सकेंगे। आज जिस प्रकार देश का किसान गोमाता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से बचकर आधुनिक खेती की ओर कदम रखते हुए कृषि यंत्रों का प्रयोग करके गोधन को खेती कार्य से बाहर कर चुका है, वही उसकी सोच गोधन के प्रति प्रेम भी टूट गया है ओर पहले कभी जहा देश के हर गाँव में प्रत्येक किसानो के घरों में गोधन की अधिकता थी ओर उन गोधन के लिए खेती से हटकर उनके चारे के लिए बीढ़े ओर खुला जंगल उनके चरने के लिए होता था,आज अधिक उपज पाने के लिए किसानों ने गोधन के हक का जंगल ओर बीढ़े नष्ट कर उसपर खेती करके लाभ पा रहा है। लालच ने किसानों को इतना अंधा कर दिया की खेतों के चारों ओर तथा खेत के बीच में गोवंश को प्रतिदिन हरा चारा उपलब्ध कराने के लिए उनके पूर्वजों द्वारा रखी जाने वाली मेढ़/मेड जिससे उसकी पत्नी, माँ, हरवाहे या नौकर हरा चारा काटकर ले जाते वे सारी मेढ़े/मेडे मिटने से घरों से गोवंश हट गया ओर जो अब कत्लखाने की भेंट चढ़ने लगा है।

           अगर आज हम गाय की सुरक्षा को लेकर नहीं सोचेंगे तो यकी मानिए गाय के विनाश के साथ पूरी मनुष्यजाति का विनाश निश्चित है। गाय माता को कष्ट पहुचाना महापाप है, उच्छृखलतावश जो गौहिंसा कर गौमांस खाते है ओर कसाई को गाय मारने के लिए बेचते है, या गाय मारने की सलाह देते है वे सभी महान पाप के भागी होते है तथा जितने गौ के रोये होते है उतने वर्षों तक नरक में पड़े रहते है। आज गोवंश के विनाश के इस दौर में लोग अपने को सुखी मानते है,पर सच्चाई वे ही जानते है कि वे कितने सुखी है? लोग भूल क्यो जाते है कि भगवान श्रीकृष्ण ने गायों की सेवा करने के साथ खुद गौचारण कर जंगलों में गए ओर माखन का सेवन कर बड़े बड़े राक्षसों का विनाश किया? कृष्ण सच्चे गौसेवक थे ओर उन्होने इस आदर्श को पालन किया तब इसी समाज ने उन्हे एक नया नाम गोपाल भी दिया, यदि आपके मन में कृष्ण के प्रति भक्ति है ओर उनका सेवक कहलाने में गौरव महसूस करते हो तो याद रखिए यह तभी सार्थक होगी जब कृष्ण कि ही तरह शरीर ओर मन से गाय की सेवा कर अपने शरीर ओर मन को भी आप पवित्र कर सकते हो। थोड़ा सा इतिहास में झाँकने कि आवश्यकता है, कुछ पुराणों कि कथाये आपको मार्गदर्शन देकर आपके जीवन चरित्र को उज्ज्वल कर सकती है जिसमें वे गौभक्त राजागण जो गायों की सेवा करके अपनी प्रजा कि रक्षाकरते हुये अपने राज्य कि वृद्धि कर गौसेवा कि महिमा को महामंत्र बताते थे उनका अनुसरण करने की जरूरत है। हमारे धर्मग्रंथ खुद मार्गदर्शन देते है ओर बताते है कि गौ सेवा से पुण्यलाभ ओर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 

    आत्माराम यादव पीव
    आत्माराम यादव पीव
    स्वतंत्र लेखक एवं व्यंगकार

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