लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ‘‘शादाब’’

शाही इमाम अहमद बुखारी का ये कहना कि अन्ना के आन्दोलन में जाने से मुसलमान परहेज करे क्यो कि वहा वंदे-मातरम् और भारत माता की जय के नारे लगाये जा रहे।एक ओर जहा ये बयान इमाम साहब की कटटरपंथी सोच को दर्शाता है वही उनका ये बयान उन को देशद्रोही की हद तक भी ले जाता है। उनका कहना है कि इस्लाम में किसी देश धरती की पूजा करने की इजाजत नही, यह धर्म(इस्लाम) मां की भी पूजा करने कि इजाजत नही देता बच्चा जिस के पेट में पलता है, मुस्लिम कैसे ऐसे आन्दोलन का हिस्सा बन सकते है जहॅा वंदे-मातरम् और भारत माता की जय के नारे लगाये जा रहे हो। पहले में उन से ये सवाल करना चाहॅूगा कि क्या वहा अन्ना हजारे या कोई और पार्टी मुसलमानो को वंदे मातरम् या भारत माता की जय के नारे लगाने के लिये मजबूर कर रही है। अन्ना हजारे मुस्लिमो से कह रहे है कि तुम्हारी देश भक्ति का पता तब चलेगा जब तुम ये नारे लगाओगे। इमाम साहब देश की जंगे आजादी में उल्लेमाओ ने बढ चढकर हिस्सा लिया अंग्रेज सरकार ने हजारो मुस्लिम उल्लेमाओ को सरेआम पेडो पर लटका कर फांसी दी। क्यो क्या उस वक्त वंदे मातरम् के गीत नही गाये जा रहे थे, कं्रात्रिकारी भारत माता की जय के नारे नही लगा रहे थे। इमाम साहब किस इस्लाम कि बात कर रहे है मेरा इस्लाम मजहब तो ये कहता है कि वतन परस्ती इमान का निस्फ (आधा) हिस्सा है यानी आप जब तक अपने मुल्क से मौहब्बत नही करेगे आप का इमान मुकम्मल ही नही होगा।

रही बात वंदे मातरम् और भारत माता की जय की बैरिस्टर अब्दुल रसूल को क्या कहेगे जिन्होने 1906 मै पूर्वी बंगाल असम प्रान्तीय काग्रेस के अध्यक्ष के रूप मै वंदेमातरम पर अग्रेजो से मार खाई। तिलक युग मै हकीम अजमल खान और बैरिस्टर अंसारी, कोलकता के मौलवी लियाकत हुसैन आदि नेताओ ने वदेमातरम के लिये अपना खून सडको पर बहा दिया। खिलाफत युग (1920.1923)मै मौलाना अकरम खॉ ने वंदेमातरम का झन्डा बुलन्द रखा अषफाक उल्ला खॉ इसी वंदेमातरम की खातिर हस्ते हस्ते फॉसी पर चढ गये। मौलाना आजाद, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, शौकत अली, रफी अहमद किदवाई, मौलाना करीम छागला ने सदा वंदेमातरम का सम्मान किया। बंगाल के काजी नजरूल इस्लाम ने इसी वंदेमातरम के सम्मान मै पूरा काव्य रचा। इमाम साहब वंदे मातरम् के ये सारे दिवाने मुसलमान थे।

10 मई 1957 को बहादुरशाह जफर ने एक अपील हिदुस्तानियो से कि थी जो कुछ इस प्रकार थी‘‘ हिन्दुस्तान के हिंदुओ और मुसलमानो! उठो!! भाईयो उठो!! खुदा ने जितनी बरकते इन्सान को अता कि है उन में सब से कीमती बरकत आजादी है। क्या वह जालिम शासक जिसने धोखा देकर यह बरकत हम से छीन ली है, हमेशा के लिये हमे उस से महरूम रख सकेगा? हिंदुओ को गंगा, तुलसी और शालिग्राम की षपथ है और आप सब मुसलमानो को कुरान की!’’। बहादुर शाह जफर ने यह अपील हिंदू और मुसलमानो को देश कि जंगे आजादी की लडाई एकजुट होकर लडने और संघर्ष करने के लिये की थी। क्या बहादुर शाह जफर मुसलमान नही थें। आज हम करोडो मुसलमानो में से शायद कोई एक या दो ही बहादुर शाह जफर जैसा देश भक्त मुसलमान हो या शायद ना भी हो इस हकीकत को भी देश के मुसलमानो को मानना चाहिये। दरअसल जब हम गुलाम थे तब हम सब एक थे, हिन्दुस्तानी थे, भाई भाई थे, पर आज देश आजाद होने के बाद इन सारे बंधनो से हम आजाद हो गये फिरको में बट गये। मन्दिर मस्जिदो पर लडने लगे जरा जरा सी बात पर एक दूसरे के खून के प्यासे बन गये क्यो ? इस का जवाब आज किसी के पास नही है। हमारे दिलो से देश भक्ति गायब हो गई। अन्ना हजारे ने जो देश को भ्रष्टचार से मुक्त करने का संकल्प लिया है उस में हम सब लोगो को उन की मदद करनी चाहिये।

इमाम साहब आप और आप जैसे मुसलमान ही आज ये सोचते है कि आजादी के लिये हमारे बुर्जुगो ने जो कुरबानिया दी आखिर उन सब का सिला हमे क्या मिला। गुलामी कि जंजीरे काटने के बाद फॉसी के फंदां को चूमने के बाद भी हम देश में सिर्फ तमाशाई बन कर क्यो रह गये। मुसलमानो के वो सारे सपने जिन्हे उन्होने अपनी ऑखो में सजाकर आजादी कि लडाई लडी सीने पर गोलिया खाई। देश को आजादी दिलाने के लियें अपनी जिन्दगी, अपना कुन्बा, अपना घर बार सब कुछ कुर्बान कर दिया। पर इस का सिला उस को क्यो नही मिला। आज आजादी के 65 बरस गुजरने व भारत कि मिट्टी में रचने बसने के बाद भी उसे पाकिस्तान परस्त क्यो समझा जाता है। दरअसल जब जब हमे हमारे देश में हिन्दू मुस्लिम एकता खंडित होती दिखाई देती है तब तब हमारे दिलो में ये सारे सवाल उठने लगते है। जो कि सरासर गलत है ऐसा कभी भी किसी भी मुसलमान को नही सोचना चाहिये। हिंदुस्तान में मुसलमान को अन्य लोगो कि तरह ही समान अधिकार प्राप्त है। इस्लाम के रास्ते पर चलने कि पूरी आजादी है।

इमाम साहब आज इस भयानक मंहगाई के दौर में आगरा के ताज महल की मस्जिद के पेश इमाम को सिर्फ पंद्रह रूपये महीना तन्खाह दी जाती है क्या कभी आप ने इस पर बयान दिया। आज तालीम और सरकारी नौकरियो में मुस्लिम किस कदर पिछड चुका है क्या कभी इस पर आपने गौर किया। अन्ना हजारे जैसे देशभक्त की आप को रामलीला मैदान पहॅुच कर हौसला अफजाई करनी चाहिये और आप मोदी का दुखडा रो रहे है। दस दस साल के मुस्लिम बच्चे रोजा रखकर अन्ना को अपना सर्मथन देने रामलीला मैदान पहॅुच रहे है। इमाम साहब भला इस से बडी हिन्दुस्तानी हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल दुनिया के सामने क्या पेश की जा सकती है कि मुस्लिम भाई दिल्ली के रामलीला मैदान में रोजा अफ्तार करने के साथ ही अल्लाह हो अकबर के नारे और नमाज अदा कर रहे है। शायद आप ने ये सब टीवी पर नही देखा वरना ऐसा बयान नही देते जिस से देश के सेक्ूलर मुसलमानो का सर शर्म से झुक गया।

इमाम साहब आज आजादी के 65 साल बाद भी मुसलमान की सामाजिक, आर्थिक और तालीमी हैसियत में कोई खास बदलाव नही आया है आजादी के बाद जो मुसलमान तालीम और सरकारी नौकरियो में आगे था वो मुसलमान आज कहा है रेलवे ,बैंको और प्रशासनिक नौकरियो में इन की हिस्सेदारी सिर्फ पॉच और 3।5 प्रतिशत क्यो रह गई। गृह मन्त्रालय के 40 बडे अफसरो में एक भी मुसलमान अफसर क्यो नही है। फौज में मुस्लिम सिर्फ ढाई प्रतिशत है और कारगिल के षहीदो में मुसलमानो की हिस्सेदारी आठ प्रतिशत है इन बातो पर आप ने न तो कभी बयान दिया और न शायद कभी सोचा। आप के ऐसे बयानो से कंाग्रेस या केंद्र सरकार ही खुश हो सकती है हम जैसे मुसलमान नही। इमाम साहब आप की हकीकत सिर्फ और सिर्फ इतनी है।

 

बंगले से निकले कार में मस्जिद का रूख किया।

मालुम ऐसा होता है शाही इमाम है।।

 

 

 

 

 

8 Responses to “शाही इमाम का बयान बचकाना”

  1. GGShaikh

    सच्चर समिति चिन्हित चक्की में पिस रहे, घुट रहे
    मुस्लिम समाज को आपके जैसे रहनुमाओं की
    जरुरत हैं शादाब साहब…

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  2. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    साहब मेने अपनी एक कमेन्ट में आप पर बहुत कटु टिपण्णी में कहा था की जाकर मुल्ले मौलवियों को समझाना …………वास्तव में आपने ये काम कर दिया है इससे ये प्रमाणित होता है की आप वाकये में एक संवेदनशील इन्सान है जिसको जहा बुरे दिखाई देती है उसकी आलोचना जरुर करता है पर साहब ये जरुरी नहीं की जो आपको दिखाई दे वहा बुरे हो ही …………….बाबा की बात पर आप गच्चा खा गए थे ………………बाबा वास्तव में संत है ………..खैर इस इमाम के पुराने आचरण जैसे मिडिया के सामने ही एक उर्दू के पत्रकार को गालिया देते हुवे पीटने को देखते हुवे मुझे आपके इस लेख का लेखन बहुत ही साहसिक व् विचारशील कार्य लगा अत: निश्चित रूप se आप इसके लिए बधाई व् साधुवाद के पात्र है समय मिला तो काजी नरुल इस्लाम की कविता जरुर लिंखुगा यहाँ पर ………….

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    • अभिषेक पुरोहित

      abhishek purohit

      काजी नज़रुल इस्लाम की यह कविता जिसे मेने वचनेश जी मे त्रिपाठी की पुस्तक पढ़ा था जिसे मे वहाँ से ही उद्धृत कर रहा हूँ

      बल,वीर-
      बल,उन्नत मां शिर|
      शिर नेहारि आमरी,नतशिर आई शिखर हिमाद्रिर|
      बल,वीर-
      बल,महाविश्वर महाकाश फाड़ी
      चंद्र -सूर्य-गृह-तारा छाड़ी
      भूलोक-ध्युलोक-गोलोक छेदिया
      खोडर आरसन “आरश” भेदिया
      उठियाछी चीर विस्मय आमी विश्वविधात्रीर
      मां ललाट रुद्र भगवान ज्वाले राज-राज टीका दीप्त जयश्रीर!
      बल,वीर-
      आमि चिर उन्नत शिर !
      आमि चिर दुरदाम दुविर्नित-नृशंस,
      महाप्रलयेर आमि नटराज,आमि ‘साइक्लोन’,आमि ध्वंस,
      आमि महाभाय,आमि अभिशाप पृथिविर!
      आमि दुर्वार
      आमि भेडे.करि सब चूर मार!
      आमि अनियम उच्छ्र्ङ्खल
      आमि डाले जाइ यात बंधन,यात नियम कानून श्रंखल
      आमि मानि नाको कोनी ‘आईन’
      आमि भरा-तरी करि भरा-डूबी
      आमि ‘टारपीडो’,आमि भीम भासभान ‘माइन ‘

      आमि धुर्जटि,आनि एलोकेशेझ्ड़,अकाल-वैशाखीर!
      आमि विद्रोही,आमि विद्रोही सूट विश्व विध्याभीर !!!!

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  3. Anil Gupta,Meerut,India

    शादाब जफ़र शादाब जी को और उनके विचोरों को तहेदिल से सलाम. खुदा करे की अहमद बुखारी को उनके बेतुके और देशद्रोही बयां का माकूल जवाब मुस्लिम समाज ही दे. और उन्हें अपनी हैसियत का सही पता लग सके. लेकिन दिक्कत ये है की कुछ स्वार्थी और सियासी लोग सियासी फायदे के लिए मुसलामानों को बरगलाने में कामयाब हो जाते हैं. शुक्र है की वुस्तान्वी के मसले पर पैदा हुई बहस और अब बुखारीजी के बयां पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों का रुख बदलते हुए माहौल का परिचय दे रहा है.ये जज्बा आगे भी कायम रहे.

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  4. vimlesh

    सादाब जी

    कटु किन्तु सत्यपरक निष्पक्ष लेख के लिए हार्दिक बधाई.

    सत्य हमेशा कड़वा होता है इसे कहने के लिए अदंम्य सहस की जरुरत होती है .जिसे सादाब जी ने बखूबी दिखाया .
    इस सास्वत सत्य के लिए एक बार पुनः बधाई

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  5. gautam chaudhary

    बहुत खुब शादाब साहब। हम आपके कायल हैं। आपकी टिप्पणी काबिले गौर है। आप जैसे मुस्लमानों के जायज जंग से ही हिन्दुस्तानी तेग लंदन तक चलेगी। मैं तो समझ रखा था कि मुस्लमानों की ताषीर कमजोर हो गयी है और बौद्धिक ताकत कुंद, लेकिन आपने मुझे मुस्लमानों के प्रति नये सिरे से सोचने के लिए बाध्य कर दिया है। कई दोस्त हमारे मुस्लमान हैं। तुफैल अहमद खां कादरी से अच्छी बनती थी। कई बार इस्लाम के एकेष्वरवाद पर बोल चुका हूं लेकिन आपकी इस राष्ट्रवादी व्याख्या ने मुझे झकझोर कर रख दिया है। दअषल इमाम साहब के पुर्वज बुखारा से आये थे। इसलिए इमामा साहब आजतक इस देष को समझ नहीं पाये। शायद वे समझना भी नहीं चाहते हैं। अहमदाबाद में आरिफ साहब को सुनने का मौका मिला उन्होंने इस देष की संस्कृति को हमारी संस्कृति कह कर संबोधित किया। हम हिन्दू यह मानते हैं कि इस्लाम एक अलग पंथ है लेकिन हमारी संस्कृति तो साझी है। यही नहीं हमारा खूंन भी एक ही है। हम मस्जिद में नमाज पढे या नहीं लेकिन किसी रोजिद, सुलेमान, इमरान के बेटे – बेटियों की शादी में तो षिरकत करना ही होता है। हम उनके विष्वास पर भोजन भी कर लेते हैं। वे हमारे हाली में आते हैं हम उनके मुहर्रम में तलवार भांजते रहे रहे हैं। पता है आपको लाठी और बाना चलाना सबसे पहले मुझे अकरामुल मियां ने सिखाया। आपकी आवाज में मैं अपने आत्मा की आवाज महसूस कर रहा हूं। इन्हीं शब्दों के साथ

    आदाब ! जय हिन्द ! बंदे मातरम !

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  6. विजय

    शादाब साहब ने इंसानियत-परस्त रुख लेकर ईमाम बुखारी के बयान की मजम्मत की। मगर वन्देमातरम गाने पर इस्लामी नाराजगी बड़ी पुरानी है। बल्कि इसीलिए वह राष्ट्र-गीत न हो सका। आज जरूरत यह भी कहने की है कि इस्लामी उसूलों के सिवा भी सच्चे, अच्छे उसूल हैं। उनकी भी इज्जत करनी चाहिए। गैर-इस्लामी चीजें, बातें, रिवाज ‘कुफ्र’ नहीं। काबिले मजम्मत नहीं। इसलिए जियो और जीने दो। अपनी इबादत करो, और दूसरों को अपनी करने दो। इस्लाम ही एक मात्र सच्चा मजहब नहीं, दूसरे धर्म-विश्वास भी उतने ही सच्चे हैं। बस यह एक बात दुनिया के इस्लामी रहनुमा खुलकर मान लें। फिर सब झगड़े मिट जाएंगे। तभी ईमामों, अयातुल्लाओं को अपना सही ठिकाना मिलेगा। उससे पहले तक तो शादाब साहब की नहीं, बुखारी साहब की ही चलेगी। नहीं तो पाकिस्तान नहीं बनता। लाखों शादाबों पर एक इकबाल, एक जिन्ना, एक सुहरावर्दी भारी पड़े थे। वही आज भी होता है। इसकी जड़ में वही ‘एक मात्र सही’ वाला मजहबी-पोलिटिकल अंधविश्वास है। जब तक वह बना रहेगा, अशफाक उल्ला मुस्लिमों के हीरो नहीं बन सकते। क्योंकि वह वतन के लिए मरे थे, मजहब के लिए नहीं।

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