लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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मनमोहन कुमार आर्य

गो की महिमा वेदों सहित पुराण आदि समस्त ग्रन्थों में गायी गई है। आधुनिक युग के निर्माता महर्षि दयानन्द जी ने भी गोकरूणाविधि पुस्तक लिख कर गो की ओर देश व विश्व के शासकों एवं मनीषियों का ध्यान आकर्षित किया है। गो पालन को जीवन में सद्कर्म के रूप में मान्यता प्राप्त है। पौराणिक बन्धु तो यहां तक मानते हैं कि मृत्यु होने पर प्रत्येक व्यक्ति को वैतरणी नदी पार करनी होती है जिसे गो की पूंछ पकड़ कर ही पार किया जा सकता है। अलंकारिक रूप से इस वर्णन को समझने का प्रयत्न करें तो तो गो की पूंछ अर्थात् गोसेवा से ही मनुष्य जीवन का कल्याण होता है। अतः प्रत्येक मनुष्य को गोपालन, गोसेवा व गोरक्षा के उपायों पर ध्यान देना चाहिये और गोरक्षकों के प्रति श्रद्धा का भाव रखकर उन्हें सहयोग व समर्थन देना चाहिये। गोरक्षा व गोसेवा करते हुए हम देखा जाये तो मानवता की ही सेवा करते हैं। मानवता दूसरे प्राणियों की रक्षा को ही कहते हैं। जो मनुष्य दूसरे प्राणियों को पीड़ा देता है या उनको मार व मरवा कर उनके मांस का भोजन कर तृप्त होता है उसे मनुष्य कदापि नहीं कह सकते। वह मूर्ख मनुष्य यह नहीं सोचता कि उसे तो सुई चुभने पर भी दुःख होता है, उस पीड़ा से वह हमेशा बचता है तब वही व्यक्ति किसी दूसरे प्राणी की गरदन पर छूरा कैसे चला व चलवा सकता है? मांसहारी मनुष्यों के कारण देश व विश्व में लाखों पशुओं को अकारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है जिसका पाप उन मांसाहारियों व कसाईयों के सिर पर ही होता है। अतः सभ्य व कुलीन मनुष्यों को यह पाप नहीं करना चाहिये और दूसरों से इस पाप को रूकवाने सहित जो लोग पशु व गो रक्षा के कार्य करते हैं उन्हें पूर्ण समर्थन व सहयोग करना चाहिये।

 

बहुत से लोग यह कह सकते हैं कि उन्हें पशुओं की हत्या करने और मांस खाने का अधिकार है। हम उनसे पूछते हैं कि क्या पशुओं को माता-पिता व मनुष्यों के समान परमात्मा की प्रजा मानने वालों को उन प्राणियों की रक्षा का अधिकार है या नहीं? यदि है तो फिर उन्हें यह अपराध करना ही नहीं चाहिये। और यदि वह कहते हैं कि उनको अधिकार नहीं है क्यों नहीं है? जब उनकी आत्माओं में परमात्मा पशु हत्या को रोकने का भाव उत्पन्न करता है तो संसार का कोई भी कानून परमात्मा की उस प्रेरणा को रोक कर परमात्मा व उसकी सृष्टि/प्रकृति का विरोधी कार्य ही करता है। अहिंसा धर्म है और हिंसा पाप है। हिंसा तभी जायज हो सकती है जब वह किसी प्राणी के प्राणों की रक्षा में की जाये व पागल व विषैले प्राणियों से रक्षा के लिए की जाये। मांस खाने के लिए की जाने व करायी जाने वाली हिंसा महापाप एवं अक्षम्य है। विचार करने पर यह भी ज्ञान होता है कि अहिंसक पालतू प्राणियों को यदि पाला जाये और उनकी हिंसा न की जाये तो इससे प्रकृति का सन्तुलन बना रहता है और इसके पोषक परिवारों व मनुष्यों को भी धार्मिक व आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं। इसकी गणना स्वामी दयानन्द जी महाराज ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तक गोकरूणानिधि में की है। सभी मनुष्यों को उसका एक बार अवश्य अध्ययन करना चाहिये। यजमान पशुओं गो, बकरी, भेड़, मुर्गी, मुर्गा, सूअर आदि की किन्हीं भी परिस्थितियों में हत्या व उनके मांस का सेवन उचित नहीं है न ही यह धर्म सम्मत है। यह पूर्णतः निन्दनीय व अनुचित है तथा ऐसा करने वाले मनुष्य इस सृष्टि को बनाने व चलाने वाले तथा मनुष्य सहित पशुओं आदि को उत्पन्न करने वाले परमात्मा के अपराधी व दण्डनीय होते हैं।

 

हम पालतू पशुओं के प्रतिनिधि रूप में गाय से होने वाले लाभों पर साधारण दृष्टि से विचार करते हैं। मनुष्यों की तरह परमात्मा ने ही गाय को भी उत्पन्न किया है। परमात्मा ने ही गाय के लिए मनुष्यों से भिन्न भोजन घांस व वनस्पतियों आदि को उत्पन्न भी किया है। गाय के भोजन के पदार्थों से हमारे किसी स्वार्थ को हानि नहीं पहुंचती। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गाय से हमें ज्ञानवर्धक, बुद्धिवर्धक व शरीर का पोषक अमृततुल्य दुग्ध मिलता है। संसार में इसके समान अन्य कोई पोषक पदार्थ नहीं है। बिना दांत वाला बच्चा व बूढ़ा भी गोदुग्ध पीकर स्वस्थ व सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है। गोदुग्ध से अनेक पदार्थ बनते हैं जिनका मनुष्य के पोषण, स्वाद एवं भोजन आदि में उल्लेखनीय महत्व व योगदान है। दुग्ध से दही, मक्खन, छाछ, घृत, पनीर, मट्ठा, मिल्ककेक, मावा आदि पोषक पदार्थ बनते हैं जो हमें अन्यथा व वैकल्पिक रूप से कहीं से प्राप्त नहीं होते। गाय की सेवा करने से मनुष्य को परिश्रम करना पड़ता है जिससे वह निरोग व स्वस्थ तथा दीर्घजीवी होता है। गाय को भोजन रूप में हमें घांस व भूसा आदि देना होता या फिर पानी पिलाना होता है जो परमात्मा ने संसार में सर्वत्र बड़ी मात्रा में उपलब्ध कराया है।

 

गोमूत्र व गोबर का भी मनुष्य जीवन में अनेक प्रकार से उपयोग होता है। गोमूत्र अनेक रोगों की औषध है। यहां तक की कैंसर के रोग में भी यह उपयेगी सिद्ध होता है और अनेक रोगी इसके सेवन से स्वस्थ हुए हैं। गोमूत्र त्वचा रोगों की भी एक महत्वपूर्ण औषधि है। अन्य अनेक रोगों में भी इसका उपयोग बनता है। गोमूत्र का पंचगव्य में भी उपयोग होता है जो स्वयं में एक महौषधि है। इसी प्रकार से गोबर भी कीटाणुनाशक होने के साथ अन्न उत्पादन में सर्वोत्तम औषधि के रूप में काम आता है। गोबर की खाद से उत्पन्न अन्न सर्वाधिक पौष्टिक एवं रोग रहित होता है। गोबर से ही आजकर बायोगैस भी बनती है जिससे रसोईगैस के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। बायोगैस के बाद गोबर का जो अवशिष्ट बचना है वह उत्तम खाद होता है। गोबर से उपले भी बनते हैं जो एक प्रकार का ईंधन होता है। इसकी सहायता से ग्रामों में चूल्हे का प्रयोग कर सभी प्रकार का भोजन बनाया जा सकता है। सृष्टि की आदि से कुछ सौ पहले तक सारा संसार गोबर के बने उपलों व लकड़ियों को ईघन के रूप में प्रयोग में लाता रहा है जिससे हमारे सभी पूर्वज पुष्ट व ज्ञानी बनते रहे और भारत न केवल सोने की चिड़िया ही था अपितु आध्यात्मिक ज्ञान में भी विश्व का गुरु था। सारे संसार के लोग विद्या ग्रहण करने भारत में ही आते थे। ऐसे अनेक उपयोग गोरक्षा व गोपालन आदि से होते हैं।

 

गाय लगभग डेढ़ वर्ष में बछड़ी व बछड़े के रूप में हमें अपनी सन्तानें देती है जो बड़े होकर गाय या बैल बनते हैं। बड़ी होकर बछड़ी से गाय बनने पर उस गाय से होने वाले सभी लाभ प्राप्त होते है तो बैल हमारे खेत जोतते हैं जिससे हमें भोजन के प्रायः सभी पदार्थ मिलते हैं। बैलों द्वारा खेत जोतने सहित बैलगाड़ी व अन्य गाड़ियों में भी माल ढुलाई आदि में इनका उपयोग लिया जाता है। इनक मल व मूत्र भी किसान के खेत में खाद का काम करता है। बैलों व गाय से हमें चर्म मिलता है जो हमारे जूतों के निर्माण में काम आता है। बैलों व गाय से प्राप्त होने वाले पदार्थों के गुणों पर भी वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय अनुसंधान किये जाने की आवश्यकता है। स्वामी दयानन्द जी ने अपनी गोकरूणानिधि पुस्तक में बैलों से खेतों की जुताई में होने वाले लाभों को गणित की दृष्टि से गणना कर अनुमान लगाया है कि एक बैल के जीवन से खेतों की जुताई व बुआई से जो अन्न उत्पन्न होता है वह लाखों लोगों का एक समय के भोजन के बराबर होता है जबकि एक बैल के मांस से सौ व कुछ अधिक लोग ही एक बार में तृप्त हो सकते हैं। हानि यह होती है कि मांस खाने वाले की बुद्धि प्रदुषित, विकृत व विषाक्त होती है जिससे उसी की हानि होती है। इसी प्रकार एक गो की एक पीढ़ी के दूध से भी लाखों मनुष्यों, 4 लाख से अधिक, का एक समय का भोजन होना सिद्ध होता है जबकि मांस से कुछ लोग ही एक समय में तृप्त होते हैं। अतः गोहत्या व इसी प्रकार से भैंस, ऊंटनी, बकरी, भेड़, घोड़ा, गधा, खच्चर आदि से भी अनेक लाभ होते हैं। अतः इन्हें मारना व इनका मांस खाना निषिद्ध होना चाहिये।

 

हमने गाय आदि पशुओं के महत्व के बारे में संक्षेप में लिखा है। गाय से मनुष्यों को इतने लाभ होते है ंतो हमारा भी कर्तव्य है कि हम उनका लालन पालन सावधानी व श्रद्धा से करें। उनकी नस्ल सुधार करने तथा दूध की मात्रा व गुणों में सुधार के भी उपाय करें। इसके लिए विज्ञान की सहायता लें। इन्हीं सब पर विचार करने व उसे क्रियान्वित करने के लिए ही प्राचीन समय में ‘गोवर्धन पूजा’ का पर्व नियत किया गया प्रतीत होता है। वेद गोरक्षा व गोपूजा की प्रेरणा करते हैं और गो को अवध्य घोषित करते हैं। वेद सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर द्वारा दिया गया ज्ञान है। वेद में मनुष्यों के कर्तव्यों व अकर्तव्यों का ज्ञान कराया गया है। ईश्वर हमारे पूर्व जन्मों व परजन्मों को जानता है। इसी कारण उसकी आज्ञायें हमारे लिए धर्म हैं। उसका वह ज्ञान केवल वेदों में ही उपलब्ध है। वेदों में बतायें कर्तव्य व अकर्तव्य ईश्वर की मनुष्यों को आज्ञायें हैं। इनका हमें पालन करना है व देश देशान्तर में प्रचार करना है। ऋषि दयानन्द ने भी अपने जीवन में यह कार्य किया। उन्होंने अपने समय के बड़े बड़े अंग्रेज अधिकारियों को भी गोरक्षा रोकने की प्रेरणा की थी, उन्हें सहमत भी किया था और करोड़ों हस्ताक्षर कराकर उसे इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया को भेजने का अभियान चलाया था। आक्समिक मृत्यु के कारण यह अभियान सफलता प्राप्त नहीं कर सका। वर्तमान में देश में हमारी स्वदेशीय सरकार है। सभी देशवासियों को गोहत्या रोकने के लिए आगे आना चाहिये। यह पुण्य का कार्य है। इससे हमारा इहलोक व परलोक दोनों सुधरेगा। गाय बचेगी वा रहेगी तभी हमें गोघृत मिलेगा, हम यज्ञ कर सकेंगे और वैदिक धर्म व संस्कृति भी सुरक्षित तभी रह पायेगी। गाय के प्रति अपने कर्तव्य का विचार करें। किसी मिथ्या प्रचार से प्रभावित न हों। गाय हमारी माता है और उसकी रक्षा हमारा कर्तव्य है। गोहत्या राष्ट्र हत्या है। राष्ट्र हत्या न करें न होने दें। ओ३म् शम्।

 

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