लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

Posted On by &filed under पर्यावरण.


सिवनी। एक तरफ केंद्र सरकार द्वारा एक के बाद एक कार्यक्रम लागू कर करोडों अरबों रूपए खर्च कर वन्य जीवों के संरक्षण के लिए नित नई योजनाओं को बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में एक के बाद एक बाघों ने दम तोडा है, जिससे यह साबित हो रहा है कि कागजों में तो योजनाएं फलफूल रहीं हैं, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है।

प्रदेश के पेंच राष्ट्रीय उद्यान में पिछले चार महीने में चार बाघ मारे गए हैं। इन बाघों की मौत कैसे हुई है, यह बात अभी उजागर नहीं हो सकी है। गत 27 जनवरी को पेंच में बेयोरथडी बीट के तालाब में एक लगभग सात वर्षीय जवान शेर मृत अवस्था में तैरता पाया गया। वन विभाग द्वारा इसकी सूचना मिलने पर आनन फानन में गोपनीय तरीके से इस शेर का अंतिम संस्कार कर दिया गया था। जब यह मामला मीडिया में उछला तब जाकर वन विभाग ने इसकी आधिकारिक तौर पर जानकारी देना आरंभ किया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार उक्त बाघ के शव परीक्षण के दौरान उसकी किडनी, लीवर एवं हृदय क्षतिग्रस्त पाया गया। आशंका व्यक्त की जा रही है कि उक्त बाघ को जहर देकर मारा गया था। उक्त बाघ बीमार भी नहीं था और वह जहां तैरता पाया गया वहां पानी महज डेढ से दो फिट ही गहरा था। यक्ष प्रश्न आज भी यह है कि अगर बाघ की मौत जहर से हुई है तो जहर बाघ के शरीर में पहुंचा कैसे।

यहां उल्लेखनीय है कि 2003 में जब बाघों की गणना की गई थी, तब पेंच में 45 बाघ थे, जो 2005 में कम होकर 42 हो गए थे। वर्तमान में यहां महज 33 बाघ ही बताए जा रहे हैं। पिछले तीन माहों में दो बाघ के शावकों सहित तीन बाघ काल कलवित हो चुके हैं।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रदेश के बाघ बाघिन को सूबे के वन विभाग द्वारा सेटेलाईट कॉलर से जोड दिया गया है, जिससे इनकी उपस्थिति एवं गतिविधियों पर बराबर नजर रखी जा सकती है। पेंच मेें भी बाघों को इससे जोडने के लिए डब्लू आई आई देहरादून के विशेषज्ञों के दल में शामिल डॉ.शंकर और डॉ.पराग निगम ने बाघों को सेटेलॉईट कॉलर से जोडा था।

मध्य प्रदेश का वन महकमा वन्य जीवों के प्रति कितना संवेदनशील है, इस बात का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि पिछले 13 माहों में प्रदेश में 19 बाघों की मौत हुई है, जिसमें से सिवनी जिले के पेंच राष्ट्रीय उद्यान और कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में चार चार और बांघवगढ के नेशनल पार्क में तीन की मौत हुई थी।

पेंच नेशनल पार्क में जब से पार्क संचालक के.नायक, उपसंचालक ओम प्रकाश तिवारी की पदस्थापना हुई है, तबसे पेंच नेशनल पार्क में वन्य जीवों पर शामत ही आ गई है। बताया जाता है कि वन्य जीवों की तस्करी के लिए अब सिवनी जिले के जंगल ”साफ्ट टारगेट” बनकर उभर रहा है। उधर दूसरी ओर क्षेत्रीय सांसद के.डी.देशमुख और विधायक कमल मस्कोले द्वारा भी वन्य जीवों के बारे में कोई संवेदनाएं नहीं बरती जा रहीं हैं। अब तक सिवनी में मारे गए वन्य जीवों के मामले में किसी की भी जवाबदारी निर्धारित न किया जाना आश्चर्यजनक ही है।

यहां एक और तथ्य गौरतलब है कि सिवनी से होकर गुजरने वाला शेरशाह सूरी के जमाने के मार्ग पर बनने वाले उत्तर दक्षिण गलियारे में लगभग आठ किलोमीटर के मार्ग पर अडंगा लगाया गया है। इस अडंगे का कारण यह है कि इस आठ किलोमीटर के हिस्से में वन्य जीवों के संरक्षण की बात कही गई है। यह मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

-लिमटी खरे

One Response to “13 महीने में 19 बाघ हुए काल कलवित”

  1. krishna kumar mishra

    भाई यहां दुधवा में भी यही हाल है सिर्फ़ संरक्षण की बात होती है काम नही\ अरे इस मुल्क के लोग तो वृक्ष लगाना ही भूल गये है
    जंगल और उनके जीवों की चिन्ता किसे।

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *