‘अपने ही लोगों ‘ के सामने घुटने टेकने को मजबूर है सरकार

केंद्र सरकार को चाहिए कि वो नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में गंभीरता से सोचे, सिर्फ बैठकें कर लेने और मीडिया के सामने बयानबाजी कर देने से इस समस्या का समाधान नहीं होने वाला है । ठोस कार्रवाई वक्त की मांग है। देश के मंत्रीगण – राजनेता और आला – अधिकारी किसी बड़े नक्सली हमले के बाद शहीदों के शवों पर श्रद्धाञ्जलि के नाम पर फूलों का बोझ ही तो बढ़ाने जाते हैं ? और नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए लम्बी – चौड़ी मगर खोखली बातें करते हैं । लेकिन जब नक्सलवाद के खिलाफ ठोस रणनीति या कार्रवाई करने का समय आता है तो हमारे नेता ” गांधीवादी राग ” अलापने लगते हैं।

#छत्तीसगढ़ के #सुकमा के कल के #नक्सली हमले ने एक बार पुनः ये साबित कर दिया कि नक्सल उन्मूलन के मोर्चे पर केन्द्र व राज्यों की सरकार और सुरक्षा बलों में बेहतर तालमेल का अभाव है l राजनीति तिकड़मबाजी इस के मूल में है l नक्सल प्रभावित प्रदेशों में अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए राजनेताओं और नक्सलियों के बीच संबंध कोई नयी बात नहीं है l

यह कड़वी सच्चाई है कि नेताओं ने नक्सलियों से अपने कलुषित हितों की पूर्ति के लिए सहमति बनायी है । सहमति जब असहमति में बदलती है तो नक्सली बड़ी घटना को अंजाम देते हैं। झारखंड, छतीसगढ़ , ओडिशा और बिहार में कई राजनेता अपने व्यावसायिक एवं राजनीतिक हितों के सुचारू संचालन के लिए नक्सलियों को मोटी रकम देते हैं । विरोधियों की हत्या भी नक्सलियों के हाथों करवाते हैं । चुनावों के वक्त करोडो़ं रुपये देकर एक-एक विधानसभा में बढ़त हासिल करते हैं । नक्सल उन्मूलन की शुरुआत राजनीति और नक्सल गँठजोड़ को खत्म करने से की जाए तब ही इस समस्या का समूल विनाश सम्भव है l

नक्सल समस्या के समूल उन्मूलन के लिए राजनीतिक बिरादरी , विशेषकर केंद्र सरकार, की ओर से एक ईमानदार और पारदर्शी प्रयास की जरूरत है l सुरक्षा – बलों के साथ-साथ आम नागरिकों पर बदस्तूर जारी नक्सली हमलों के बावजूद अभी तक कोई भी सरकारी नीति साफ नजर नहीं आ रही है l नक्सल समस्या के उद्भव के बाद से किसी भी सरकार ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कोई भी सार्थक प्रयास नहीं किया l केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच सदैव समन्वय का अभाव रहा है l

हर साल हजारों करोड़ रुपया अर्ध-सैनिक बलों की नक्सल क्षेत्र में तैनाती पर खर्च कर दिया जाता है। अगर यही पैसा नक्सल प्रभावित राज्यों की पुलिस के आधुनिकीकरण में प्रयोग किया जाये तो परिणाम कई गुना बेहतर मिल सकते हैं। नक्सली आंदोलन अधिकारी, नेताओं और उद्योगपतियों के लिए दुधारू गाय है । वे नहीं चाहते कि ये आंदोलन खत्म हो क्योंकि नक्सल उन्मूलन के नाम पर मोटी रकम विकास के लिए आवंटित होती है । इसे यह त्रिकोण सबसे पहले चाट जाता है । पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर मोटी रकम खर्च होती है। इसे भी पुलिस, अधिकारी और नेता मिलकर डकार जाते हैं ।

निःसंदेह आज नक्सल आंदोलन अपने मूल विचारधारा से भटक चुका है और ऊगाही (लेवी ) इस का मुख्य उद्देश्य है , अगर केन्द्र और नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारें दुष्प्रेरित राजनीति का परित्याग कर इनके (नक्सलियों ) आय के स्रोतों पर अंकुश लगाने में सफ़ल हो पाती हैं तो मेरे विचार में ” व्यवस्था परिवर्तन ” का यह “ भटका हुआ आन्दोलन ” स्वतः मृतप्राय हो जाएगा l

मैं भारत के सर्वाधिक नक्सल पीड़ित इलाकों में से एक सारण्डा के जँगलों ( झारखण्ड ) में लगभग तीन सालों तक अपने व्यावसायिक प्रतिबद्धताओं को लेकर रहा हूँ और मैं ने नक्सल आन्दोलन की आड़ में लेवी ऊगाही के इस कारोबार को काफ़ी करीब से देखा भी है एवं इस घिनौने खेल का दंश भी झेला है l खनन उद्योग से जुड़े व्यावसायिक घराने , इन ( व्यावसायिक घरानों ) के उच्च पदाधिकारियों , प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिज्ञों का एक संगठित गिरोह नक्सल हितों की पूर्ति और पोषण में लिप्त है l विकास के फंड का इस्तेमाल नक्सलियों के निर्देश पर होता है। बी.डी.ओ. , सी.ओ. , डी.एम. और एस.पी. सारे नक्सलियों के संपर्क में रहते हैं । थाना प्रभारी को अपनी जान की चिंता होती है। वो थाने से नहीं निकलते हैं । वो नक्सलियों के एरिया कमांडर से ही अपनी सुरक्षा की गुहार लगाते हैं । भयादोहन के इस खेल का संचालन सारी व्यवस्था की आँख में धूल झोंक कर कैसे किया जाता है इस सच्चाई से भी मैं रूबरू हो चुका हूँ l खनन उद्योग से जुड़े व्यावसायिक घरानों के कुछ उच्चाधिकारियों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ जो नक्सलियों के कमीशन्ड एजेन्टों की तरह काम करते हैं और नक्सलियों के नाम पे भयादोहन से जिनकी पौ बारह है l

कुछ वर्ष पहले श्री जयराम रमेश जी के द्वारा दिए गए इस कथन से कि ” नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अगले दस सालों तक खनन का कारोबार बंद कर दिया जाए ” मैं पूर्णतःसहमत हूँ क्यूँकि जो गँठजोड़ आज नक्सलियों की रीढ़ बन चुका है उस का टूटना निहायत ही जरूरी है इनके उन्मूलन के लिए l

नक्सल उन्मूलन से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण पहलू है नक्सलियों के जनाधार को कमजोर करना l नक्सलियों के स्थानीय समर्थन के कारण क्या हैं, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । जरूरत नक्सल प्रभावित इलाकों के स्थानीय ग्रामीणों को मुख्यधारा में लाने की है l अगर केन्द्र और राज्यों की सरकारें नक्सली प्रभाव वाले इलाकों में सही मायनों में विकास के कार्यों को निष्पादित करें तो वहाँ कि स्थानीय जनता में स्वतः ही ये संदेश जाएगा कि विकास से ही उनकी उन्नति के रास्ते खुलते हैं और वे मुख्यधारा से जुड़ना शुरु हो जाएंगे। फिर वे नक्सलियों की मदद करने से अवश्य ही परहेज करेंगे ।

केंद्र सरकार को चाहिए कि वो नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में गंभीरता से सोचे, सिर्फ बैठकें कर लेने और मीडिया के सामने बयानबाजी कर देने से इस समस्या का समाधान नहीं होने वाला है । ठोस कार्रवाई वक्त की मांग है। देश के मंत्रीगण – राजनेता और आला – अधिकारी किसी बड़े नक्सली हमले के बाद शहीदों के शवों पर श्रद्धाञ्जलि के नाम पर फूलों का बोझ ही तो बढ़ाने जाते हैं ? और नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए लम्बी – चौड़ी मगर खोखली बातें करते हैं । लेकिन जब नक्सलवाद के खिलाफ ठोस रणनीति या कार्रवाई करने का समय आता है तो हमारे नेता ” गांधीवादी राग ” अलापने लगते हैं।

छत्तीसगढ़ की ही बात करें तो सियासी बिसात पर नक्सलवाद को जब – तब सहलाया गया , पुचकारा गया है । ये समस्या भी वोट की सियासत में उलझ कर रह गई । पिछले वर्ष ही प्रधानमंत्री जी का एक बयान आया था कि ” देश में नक्सलवाद कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है। ” नक्सलियों को उन्होंने ‘‘ भटके हुए अपने लोगों ’’ की संज्ञा दी थी । अब एक बार फिर इन्हीं ‘‘अपने लोगों ’’ ने केंद्र की सरकार को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया है ।

केंद्र की सरकारें काफी समय से नक्सलवाद को महज कानून और व्यवस्था की समस्या कह कर इसकी भयावहता का सही अंदाजा लगाने में नाकामयाब रही है l छत्तीसगढ़ में तो नक्सली सत्ता के आगे राज्य सरकार बेबस है l छत्तीसगढ़ के ११ जिलों में नक्सलियों का दबदबा है , नक्सलियों की सामानांतर सरकार है l ऐसे में यक्ष – प्रश्न यह है कि ” जब सूबे की बड़ी आबादी नक्सल प्रभावित है , इसके बावजूद भी इस समस्या का हल निकालने के लिए कोई ठोस नीति आज तक क्यों नहीं बनाई गई है ? नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन ग्रीन-हंट जैसा ही कोई प्रभावी अभियान लगातार क्यूँ नहीं चलाया जाता है ? ”निःसंदेह इसका लाभ वहाँ के नक्सली उठाते हैं l अगर ख़ुफ़िया -सूत्रों कि मानें तो “पिछले दो-तीन वर्षों में छत्तीसगढ़ में नक्सलियों कई हमले कई गुना अधिक बढे हैं , सुरक्षा – बलों पर नक्सली हमलों में इजाफा हुआ है और नक्सली अब बड़े हमलों को अंजाम देने पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं …. लेवी वसूली से जुड़े नक्सली हमले तो खबरों की सुर्खियां ही नहीं बन पाती हैं ….इस कारण लोगों का ध्यान इस ओर ज्यादा नहीं जाता है l”

२०१६ -१७ में छत्तीसगढ़ में में लगभग १०० से अधिक सुरक्षा – बल के जवान और लगभग इतने ही नागरिक नक्सली हमलों में मारे गए , छत्तीसगढ़ – पुलिस के एक आला अधिकारी की मानें तो “ये सरकारी – आंकड़े हैं वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है l ” l वहीं हथियारों की लूट भी बड़े पैमाने पर हुई l यहाँ गौर करने वाली बात है कि “२०१३ में पूरे देश में नक्सलियों ने जितने हथियार सुरक्षा – बलों से छिने थे , उसका ५० फीसदी अकेले छत्तीसगढ़ से छीना गया था (२०१३ के बाद के आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं , २०१३ – २०१७ तक के आधिकारिक आंकड़ें उपलब्ध कराने में सरकारी महकमे भी अपने हाथ उठा ले रहे हैं ) l

छत्तीसगढ़ की कल की घटना और देश के अन्य हिस्सों में हो रहे निरंतर नक्सली हमले सरकार और समाज के लिए चेतावनी हैं l इसमें अब कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि ” नक्सली अब केवल ‘क्षेत्र – विशेष’ में फैले निरंकुश एवं असंतुष्ट ‘ अपने ‘ नहीं रह गए हैं , अपितु वे एक ऐसा अनुत्तरित सवाल हो गए हैं, जिसका जवाब ढूँढना न केवल जरूरी है, बल्कि हमारी मजबूरी भी।” अब वक्त आ गया है कि बातों की भाषा न समझने वाले नक्सलियों को उन्हीं की भाषा में सबक सिखाया जाए ।

आलोक कुमार,

 

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