देश में ‘सड़ता अनाज’ भूखे पेट पर लात

-अंजू सिंह

‘दो साले पहले दुनिया के सबसे ताकतवर और प्रभावशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति ने दुनिया में होती अनाज की कमी पर कहा था कि ‘हमें अनाज की किल्लत इसलिए हो रही है क्योंकि भारत का मधयम वर्ग सम्पन्न हो रहा है।’ ये बयान सच भी है क्योंकि भारत की 52 से 55 प्रतिशत जो जनसंख्या कृषि कार्य से अपनी जीविका चलाती थी वो आज सम्पन्न होने के कारण कृषि करने से परहेज करने लगी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए ये तारीफ कही जा सकती है कि भारत, विश्वभर के लिए अनाज का निर्यात करता है। लेकिन अफसोस तो यह कि दुनिया भर में निर्यात करने वाले देश में ही 30 करोड़ गरीब जनता भूखी सोती है। फिर हम इस खुशफहमी में कैसे जी सकते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है, जो सबका पेट भरता है। अगर वाकई ऐसा है तो हमारा देश भूखा क्यों हैं? आज भी छत्ताीसगढ़, बुंदेलखंड, कालाहांड़ी, उड़ीसा, झारखंड व बिहार में भुखमरी का प्रतिशत ज्यादा क्यों बना हुआ है!

व्यंग्य ही सही पर कहना पड़ रहा है कि मौजूदा ‘अनाज सड़ने’ के हालातों के बाद देश अपना पेट भर ले तो काफी है? एक तरफ देश में भुखमरी का खतरा मंडरा रहा है वहीं सरकारी लापरवाही के चलते लाखों टन अनाज आए बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है। यह तो बीतों सालों के आंकड़ों का कहना है, जबकि इस साल तो अनाज सड़ने के इतने बड़े आंकड़े सामने आए हैं कि दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हैं। हाल फिलहाल इतना अनाज सड़ चुका है कि उससे सालभर करोड़ों भूखों का पेट भर सकता था, जो भ्रष्टाचार के गलियारों में पनपती लापरवाही की सीलन में सड़ गया। इस साल अनाज सड़ने की शुरूआत का अनुमान, जयपुर से लगया गया जहां गोदाम में शराब रखने के लिए करीब 70 लाख टन अनाज बाहर फेंक दिया गया जिससे वह सड़ गया। इसके बाद राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तारप्रदेश में अनाज सड़ने के कई मामले सामने आए। लेकिन ठोस कारवाई अभी तक किसी पर नहीं हुई। इस मामले पर संसद और राजनीतिक सभाओं में तो बयानबाजी होती रही और ले-देकर कुछ आध्किारियों को सस्पेंड कर कार्रवाई का फर्ज पूरा कर दिया। किंतु इससे हापुड़ में सड़े 5 लाख टन गेहूं की पूर्ति नहीं की जा सकती है, करीब ढ़ाई करोड़ का यह गेहूं, 40 लाख बोरियों में भरे-भरे पूरे एक सप्ताह तक खुद के सहेजने का इंतजार करता है और अतंत: बारिश में भीगने के बाद सड़ ही गया! उदयपुर में भी रेलवे स्टेशन पर करीब 5 करोड़ का 10 लाख टन अनाज भी कुछ इसी तरह सड़ गया! उत्तार प्रदेश में भी करीब 25 करोड़ का अनाज फिर से एक बार बारिश के कारण बेकार हो गया! मायापुरी में भी 6 लाख टन अनाज बर्बाद हो गया! इस 6 लाख टन अनाज से करीब 1 करोड़ लोगों की 1 साल तक की भूख को मिटाया जा सकता था। पंजाब और हरियाणा में कुछ इसी तरह के मामले आए और गए। हैरानी वाली बात है कि करीब दो साल पहले आटे का दाम 12-14 रूपए किलो था और आज आटे की कीमत 19 रूपए किलो है महज दो सालों में आटे की कीमत की बढ़ोतरी में 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। अब कुकुरमुत्तो की तरह लगातार बढ़ती महंगाई और अनाज की बेकद्री में गरीब लोगों को नमक की रोटी के लाले पड़ जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है। क्योंकि मधयम वर्ग से चलती हुई सम्पन्नता ने उच्च वर्गों के घरों में अपना डेरा डाल दिया है, जबकि गरीब जनता आज भी 50 रूपए से 70 रूपए की मामूली दैनिक आय के मुहाने पर ही खड़ी है तो फिर वो 19 रूपए किलो का आटा खाए तो कैसे खाए?

बहरहाल, देश के ये हालात कोई नए नहीं है, आजादी के छह दशक बाद भी गरीबों के पेट की भूख लगातार बढ़ी, कुपोषण में भी बढ़ोतरी हुई, भुखमरी से मरने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ? इसी के साथ देश के लिए चुनौती पूर्ण सवाल ये है कि आखिर खाद्य सामग्री की सुरक्षा किस स्तर से हो रही है! खुले में पड़े लाखों टन अनाज को मात्र तिरपाल और चादरों के सहारे सुरक्षित रखने की समझ किसी नासमझी से कम नहीं है। मगर साल दर साल इसी तरीके से सब कुछ हो रहा है। देश में कुपोषण का प्रतिशत साल-दर-साल बढ़ रहा है। यूनिसेफ की एक रिर्पाट के अनुसार, विश्वभर में करीब पांच साल से कम 25 प्रतिशत बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। शर्म की बात है कि इन 25 प्रतिशत बच्चों का सबसे बड़ा प्रतिशत भारत के हिस्से में आता है। दुनिया में कुल भुखमरी के शिकार लोगों में 40 फीसदी लोग भारत के हैं! जिसमें से 46 फीसदी बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में हैं और यह दर सहारा-अफ्रीका से दो गुना ज्यादा है। अब देश की कुपोषण वाले आंकड़े को देखकर बस यही कहा जा सकता है कि जहां देश में करोड़ों जनता दो जून की रोटी नहीं है, तो उनके पोषक भोजन की पूर्ति करना और करवाना दोनों ही मजाक लगता है! वहीं भूखे देश में अनाज की इतनी बेकद्री संप्रग सरकार के द्वारा भोजन पूर्ति के लिए ‘राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा कानून अधिकार’ के लागू होने से पहले ही धज्जियां उड़ा रहा है।

3 thoughts on “देश में ‘सड़ता अनाज’ भूखे पेट पर लात

  1. अंजुसिंह के रिपोर्ट बताती है की जिस देश में सत्ताईस करोड़ लोगों को मानक आहार नहीं मिल रहा है .जिस देश में तेतीस करोड़ लोगों की क्रय क्षमता २० रुपया रोज से कम है .उस देश में लाखों कुँनटल गेहूं रेलवे पटरियों के किनारे सड़ता हुआ हम सब देख रहें .जिम्मेदारी जिनकी है बे खीसें निपोरकर भण्डारण क्षमता नहीं होने का रोना रो रहे हैंब .मामूली समझ का आदमी भी जानता है की नरेगा के तहत चल रहे विकाश कार्यों का शहरों तक माकूल विस्तार कर भण्डारण क्षमता बढ़ाई जा सकती थी .मजदूरों को काम भी मिलता और सरकारी व्यय में रूपये की जगह अनाज देने से भूंखे को रोटी मिलती .सरकारी रुपया चोट्टों की जेब में जाने से भी कुछ तो बचत होती .
    देश को जिन सवालों पर त्वरित कारवाही करना चाहिए वह यही है जिसे अंजुसिंह ने प्रस्तुत किया और बुद्धिजीवियों ने संज्ञान लिया .

  2. महोदय , अनाज सड राहा है तो सडने दो . आप क्यों परेशान हो रहे है.ये सड़े हुवे अनाज का कमाल का उपयोग हमारे महाराष्ट्र के राजकारणी नेता लोगोने धुंड निकाला है. हमारे महाराष्ट्र में लगभग हर नेता कांग्रेस राष्ट्रवादी कांग्रेस भाजपा नेता सड़े हुवे अनाज से शराब बनाने की इकाई लगा रहा है. और इस इकाई के लिये कच्चा माल RAW MATERIAL यह सडा हुवा अनाज ही है . अब इतनी इकाई के लिये सडा हुवा अनाज तो लगेगा. अच्छा अनाज वे नेता USE करेंगे तो आप पत्रकार फिर हमला करेंगे. इसीलिए ये अनाज सडाया जा रहा है. सस्ते मै फैक्ट्री को कच्चा माल मिलेगा. और अनाज नाही खाने को मिला तो क्या हुवा? सड़े अनाज से बनी शराब तो जनता पि सकती है ना? और शराब पीके गम भुला सकती है ? समजे क्या?

  3. अंजू सिंह जी बिल्कुल सहि कह रहि है. लाखो टन अनाज सड रहा है और करोडो लोग भुखे मर रहे है. इस्का एक हि कारन है भ्रष्टाचाज. दोषी अधिकारिओ को फ़ासी या कम से कम उम्र केद कि सजा हो जाय तो देखिये अग्ले साल एक भी अनाज का बोरा सड्ता है क्या.

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