महिला सशक्तिकरण के नाम पर अभिनेत्रियों का भोंड़ापन

Sonam-Kapoor
महिला सशक्तिकरण के नाम पर अभिनेत्रियों का भोंड़ापन

समाज का सुन्दर एवं सुव्यवस्थित स्वरुप प्रदान करने में महिला समाज का अद्वितीय स्थान है। शायद इसी वजह से भारतीय संस्कृति मातृ प्रधान है। हमारी संस्कृति में अगर देवताओं के नाम भी लिए जाते हैं तो पहले शक्तिस्वरुपा उनकी पत्नियों के नाम लिए जाते हैं, यथा सीताराम, राधे कृण्ण। वैसे सामाजिक तौर पर भी घर की मालकिन महिलाएं ही हुआ करती हैं। बच्चों के लिए भी मां को जो स्थान है, वह प्रथम रहता है। धरती को मां के रुप में आकाश को पिता के रुप में माना जाता है। देश की नदियों को भी मातृ स्वरुप में पूजा जाता है। ऐसी संस्कृति के बीच कतिपय अभिनेत्रियां खुद को महिलाओं के रोल मॉडल के रुप में प्रस्तुत कर रही हैं। मेरे ख्याल से यह लोकप्रियता हासिल करने का एक भोंड़ा तरीका होने के अलावा और कुछ भी नहीं हो सकता। वैसे भी अभिनेत्रियों का उद्देश्य कम से अधिक पैसा और सोहरत कमाना ही होता है। ऐसी अभिनेत्रियां अब महिला सशक्तिकरण के बहाने भोंड़ापन दिखा रहीं हैं।

पिछले दिनों 98 महिलाओं के साथ बॉलिवुड ऐक्ट्रेस दीपिका पादुकोण के एक ऐसे वीडियो ‘माई चॉइस’ की खबर सुर्खियों में रही, जिसमें महिलाओं के बारे में पुरुषों की कुंठित सोच को बदलने का आह्वान करती दिखीं थीं दीपिका। अब उनके इस वीडियो के लिए एक जवाबी विडियो तैयार किया गया है, जिसमें पुरुषों ने अपने मन की बातें ठीक दीपिका वाले वीडियो के अंदाज में ही रखी हैं। ‘माई चॉइस’ के इस मेल वर्जन वाले वीडियो को भी लोग खूब देख और पसंद भी कर रहे हैं। ब्रैट हाउस फिल्म्स द्वारा तैयार इस वीडियो में दीपिका वाले वीडियो की तरह ही कई पुरुष नजर आते हैं। ब्लैक ऐंड वाइट इस वीडियो में महिलाओं की तरह ही पुरुष भी अपने मन मुताबिक फैसले लेने की आजादी को लेकर आवाज बुलंद करते दिखे हैं। दीपिका के वीडियो को मिले इस जवाबी विडियो में लड़कों को आप यह कहते हुए पाएंगे, यह मेरा शरीर है, इसलिए इससे जुड़े फैसले भी मेरे हैं। मैं ऐसे कपड़े पहनूं जो मुझे पसंद हैं, न कि वह जो तुम्हें पसंद हो। मैं रोज जिम जाऊं या फिर तोंद रखूं, यह मेरी चॉइस है। मेरा पड़ोसी इंजिनियर है, लेकिन मैं नहीं, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। मेरी गाड़ी की साइज कितनी बड़ी है, यह ज्यादा अहम है। जिस तरह दीपिका ने अपने ‘माई चॉइस’ वीडियो में यह कहा है कि वह शादी से पहले सेक्स करें या फिर विवाहेतर सेक्स संबंध रखें, यह उनकी चॉइस है, तो इस बात को भी यहां उनके ही अंदाज में जवाब दिया गया है। इस वीडियो के मेल वर्जन में पुरुषों का कहना है, मैं अपनी प्रेमिका बदलता रहूं या फिर हमेशा के लिए प्यार करूं, यह मेरी चॉइस है। मेरी कार, मेरा घर मैं बदल सकता हूं, लेकिन तुम्हारे लिए मेरा प्यार कभी नहीं बदल सकता। मेरी मर्जी कि मैं तब घर आऊं जब मेरा मन करे, यदि मैं बाहर हूं और तुम्हारा कॉल नहीं उठा रहा तो यह न सोचो कि मैं चीट कर रहा हूं। मेरी मर्जी, मैं शादी करूं या फिर नहीं। मेरी मर्जी की मैं शादी से पहले सेक्स करूं या फिर विवाहेतर सेक्स संबंध रखूं। आखिर में इस वीडियो में एक ऐसे कपल को दिखाया गया है, जिसमें लड़की अपने धोखेबाज प्रेमी से लड़ रही है। इस वीडियो के अंत में लिखा है कि महिला और पुरुषों का सम्मान करें, हम विश्वासघात या व्याभिचार का समर्थन नहीं करते।

दीपिका के इस वीडियो पर सेलिब्रिटीज लगातार ट्वीट कर अपनी प्रतिक्रियाएं जाहिर कर रहे हैं। अमिताभ बच्चन ने अपने ट्वीट में इस वीडियो को नारी सशक्तिकरण का हिस्सा बताते हुए कहा है कि अदजानिया ने दो मिनट के इस वीडियो में उचित मुद्दा उठाया है, वहीं सोनाक्षी सिन्हा इस वीडियो को गलत मान रही हैं। हालांकि शबाना आजमी का कहना है कि यह वीडियो हर किसी को जरूर देखना चाहिए। ‘माई चॉइस’ एक ब्लैक ऐंड वाइट विडियो है, जिसमें 29 साल की दीपिका ने महिलाओं के बारे में पुरुषों की कुंठित सोच को बदलने का आह्वान किया है। विडियो में दीपिका ने कहा है, मैं अपनी पसंद के हिसाब से जैसे चाहती हूं, वैसे जिंदगी गुजार सकती हूं। जैसा चाहती हूं, वैसे कपड़े पहन सकती हूं, यह फैसला कर सकती हूं कि मेरी काया कैसी होगी, कब शादी करना चाहती हूं। यह फैसला मुझे करना है कि मैं स्ट्रेट रहना चाहती हूं या समलैंगिक। इस विडियो में फरहान अख्तर की पत्नी अधुना, बहन जोया अख्तर और होमी की डिजाइनर पत्नी अनीता भी नजर आ रही हैं। विडियो में शामिल सभी 99 महिलाएं काले रंग के परिधान में हैं। सोनाक्षी का कहना है कि महिला सशक्तीकरण का मतलब हर बार यह नहीं होता कि आप किस तरह के पकड़े पहनते हैं। यह भी नहीं कि आप किससे सेक्स करना चाहते हैं या ऐसा ही कुछ और।

सशक्तीकरण का मतलब महिलाओं को रोजगार और मजबूती देने से है। सोनाक्षी ने यह भी कहा, मेरा मानना है कि सशक्तीकरण उन महिलाओं का किया जाना चाहिए, जिन्हें इसकी जरूरत है। यह हम जैसे लोगों के लिए नहीं हैं, जिनकी परवरिश सुख-समृद्धि के माहौल में हुई हो। मशहूर लेखक शोभा डे ने भी एक आर्टिकल में लिखा, दीपिका, वीडियो में शानदार खुले बाल और ब्रा की स्ट्रैप दिखाना नारी सशक्तीकरण नहीं है।

— रमेश पाण्डेय

2 thoughts on “महिला सशक्तिकरण के नाम पर अभिनेत्रियों का भोंड़ापन

  1. अगर सभी कहेंगे मै जो चाहें करूँ मेरी मर्जी, तो सामाजिक मूल्यों का नाश हो जायेगा।हम स्वतंत्रता चाहिये पर विवेकहीन स्वतंत्रता न पुरुष के लियें सही है न महिला के लियें। ये सब भौंडा प्रचार है। हाँ मै उन लोगों का भी विरोध करती हूँ जो कभी जीन्स पर, स्कर्ट पर आपत्ति करते हैं।साड़ी कभी कभी जीन्स से ज्यादा उत्तेजक हो सकती है। अभिनेत्रियों और मौडल्स को जो पहनना है पहने। हमारी लड़कियाँ कब क्या पहनना है जानती हैं। लड़कों को अपनी मानसिकता संभालनी चाहिये, लड़कियों के कपड़ो को बहाना बनाकर वो ग़लत नहीं कर सकते।यहाँ भी ये चित्र डालने का औचित्य नहीं है।

    1. आदिम काल से ही वस्त्र शरीर को ढकने व उसकी रक्षा करने के काम आते रहे है। लेकिन जब उसे विलास की वस्तु बनाकर फैशन के रूप में प्रस्तुत किया गया तो किसकी मानसिकता परिवर्तित न होगी? फैशन को लेकर यहां लड़कों की ही नहीं बल्कि लड़कियों की भी मानसिकता में परिवर्तन आया है। मैं- मेरा शरीर मैं जैसा चाहे इस्तेमाल करूं इत्यादि अनेकों वाक्य जैसे ही हवा में उछलते है। उस समय कथित रूप से इस व्यवसाय से जुड़ा व्यवसायी इसे सही साबित करने के तर्क गढने लगता है। ऐसे में मैं केवल आपसे एक ही बात पूछता है कि कल यदि निक्कर पहन कर अपने शरीर का भौंडा प्रदर्शन करते हुए एक पुरुष घर से बाहर निकले तो क्या वहीं मनस्थिति उन लड़कियों की नहीं होगी जो आज लड़कों की होती है। यह सच है कि आकर्षण दोनों में ही बराबर है। ऐसे में क्या लड़कों को भी मैं मेरा शरीर कहते हुए अर्धनग्नावस्था में बाहर निकलकर उन कन्याओं को आकर्षित नहीं करेगा। अब जैसा कि आप बात कर रही है कि आज की लड़कियां जानती है कि उन्हें कब क्या पहनना चाहिए तो देवीजी/देवता जी एक बात बताईये- फिर ये सवाल पैदा ही क्यों होता कि लड़कियों की अर्धनग्नावस्था पोशाकों को देखने से ही समस्याएं उत्पन्न हो रही है।

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