परम्परागत खेलों को मिले प्रोत्साहन

देवेंद्रराज सुथार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ”मन की बात” के 44वें संस्करण में परम्परागत खेलों को प्रोत्साहन देने की बात कही है। हमारे देश में बरसों से खेलें जाने वाले पारंपरिक खेलों की कम होती लोकप्रियता और आधुनिक युग के बच्चों का मोबाइल व कंप्यूटर के खेलों के प्रति बढ़ते रूझान को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि ”यदि पारंपरिक खेलों को नहीं बचाया गया था तो बचपन भी नहीं बच पाएगा।” गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ”मन की बात” कार्यक्रम के 35वें संस्करण में भी आउटडोर गेम्स को लेकर चिंता जाहिर करते हुए उन्हें संरक्षण प्रदान करने की बात कही थी। तब उन्होंने कहा था कि ”एक जमाना था जब मां बेटे से कहती थी कि बेटा, खेलकर घर वापस कब आओगे। और एक आज का जमाना है जब मां बेटे से कहती है कि बेटा, खेलने के लिए घर से कब जाओगे।”

निश्चित ही, बदलते तकनीकी दौर में आज की पीढ़ी का मैदान के खेलों के प्रति उत्पन्न होती अरुचि और मोहभंग हर किसी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। गौर करें तो इस स्थिति के पीछे के कई कारण सामने आते हैं। पहला तो यह है कि इलोक्ट्रॉनिक उपकरण (स्मार्ट फोन, मोबाइल, लेपटॉप) इत्यादि के उपयोग में तीव्रगामी परिवर्तन आना। छोटी उम्र में बच्चों के हाथों में मोबाइल आने के बाद वे अपना सारा समय इसमें ही गंवा देते हैं। उनका खेलना, खाना-पीना सबकुछ ऑनलाइन होता जाता है। वहीं अधिक समय तक अधिक रोशनी वाले उपकरण पर दिमाग खपाने से उनकी आंखों की रोशनी पर विपरीत प्रभाव पड़ता जाता है। वस्तुतः उम्र से पहले ही आंखों पर चश्मा आना इसी का एक परिणाम समझा जाये। यह भी प्रायः देखा गया है कि मोबाइल के खेल खेलने से अक्सर बच्चें चिड़चिड़ेपन से ग्रस्त हो जाते हैं और अकेलापन महसूस करते हैं। बात-बात पर आक्रोश की मुद्रा धारण करना और नकारात्मक हो जाना इसी का दुष्परिणाम है। मैदान के खेलों का क्रेज खत्म होने का दूसरा कारण मैदानों की निरंतर कमी होना है। भौतिकवादी सुविधाओं के मोह में मैदानों की जगह दस-बारह मंजिल की अट्टालिका का निर्माण किया जाने लगा है। गांव में तो आज भी खुली जगह बच्चों को खेलने के लिए आमंत्रण देती है लेकिन, शहर की घुटन भरी जिंदगी में निकटवर्ती कोई मैदान बच्चों के खेलने के लिए सुरक्षित नही रहा है। जिसके कारण बच्चें खाली समय में बोरियत कम करने के लिए अनायास ही मोबाइल और कम्प्यूटर के खेलों के शिकार हो जाते हैं।

तीसरा कारण यह भी है कि हमारे समाज में अक्सर बड़े-बुजुर्गो के मुंह से कहावत सुनने को मिलती है कि “खेलोगे कूदोगे तो बनोगे खराब और पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब” बच्चों को केवल किताबों तक ही संकुचित करती हैं। पढ़ाई के साथ खेल भी बहुत ही जरूरी है। मानव मस्तिष्क एक हद तक पढ़ाई कर सकता है। अतः मन को हरा-भरा रखने और शरीर को तरोताजा करने के लिए खेलों को खेलना भी अतिआवश्यक है। चौथा कारण है अभिभावक के पास समय का अभाव होना। रोजमुर्रा की जिंदगी में धनार्जन करने की प्रवृत्ति ने हर किसी को व्यस्त कर दिया है। दूसरों के लिए तो छोड़िए, स्वयं और परिवार के लिए भी समय निकालना व्यक्ति के लिए दूभर होता जा रहा है। ऐसे में आज के मासूमों को कौन बचपन के खेल (डिब्बा स्पाइस, सतोलिया, लुका छिपी, लगंड़ी, कबड्डी, खो-खो) इत्यादि के बारे में बतायेगा? जिससे मासूम मन में इन खेलों के प्रति खेलने की जिज्ञासा उत्पन्न हो सके। बेशक, कुछ गलतियां तो अभिभावक की भी है, जिन्हें समय रहते सुधारा जा सकता है। अगर समय रहते हम बालमन के मनोवैज्ञानिकता को लेकर सचेत नहीं हुए तो ”ब्लू व्हेल” नामक खूनी खेल हमारे देश के नौनिहालों की जान के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे।

आज जरूरत है कि मैदान के खेलों के प्रति बाल और युवा पीढ़ी का ध्यान आकर्षित किया जायें। उन्हें बताया जायें कि मोबाइल और कम्प्यूटर पर क्रिकेट खेलने से कई अधिक मजा मैदान में जाकर क्रिकेट खेलने से है। भारत सदैव से ही खेल परंपरा का संवाहक रहा है। यहां मिल्खा सिंह से लेकर मेजर ध्यानचंद जैसे हॉकी के जादूगर ने जन्म लिया है। सचिन से लेकर साइना तक और मिताली से लेकर कृष्णा पूनिया तक के खिलाड़ियों ने दमखम के साथ विश्वपटल पर तिरंगे का नाम ऊंचा किया है। आज इन्हीं सब से प्रेरणा लेकर बच्चों में खेलों के प्रति उत्साह और आशा का माहौल बनाने की जरूरत है। क्योंकि देश की एकता को बरकरार रखने के लिए भाईचारे, प्रेम और मैत्री की भावना इन्हीं खेलों से विकसित की जा सकती है। इसलिए खेल संस्कृति को एक बार फिर से जीवित करने की जरूरत है।

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