लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

ऋग्वेद (10/85/47) ने पति-पत्नी को जल के समान मिलने की बात तो कही ही है, साथ ही इनके मिलन को और भी अधिक सुंदर और उपयोगी बनाते हुए एक उपदेश और दिया है। जिसमें ‘सं मातरिश्वा’ की बात कही गयी है। इसका अभिप्राय है कि तुम दोनों परस्पर मिलकर ऐसे रहो जैसे दो वायु परस्पर मिल जाते हैं और उनके मिलने के पश्चात फिर उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। दो प्राण (वायु) मिलें और संसार के समक्ष प्राणरूपता का आदर्श प्रस्तुत करें। प्राणरूपता से अधिक उत्तम उदाहरण पति-पत्नी के प्रेम को प्रकट करने के लिए और कोई नहीं हो सकता। पर वेद तो वेद ही है उसके पास उपायों का भी भण्डार है। पहले उसने पति-पत्नी को जल के समान मिलकर रहने की बात कही, फिर वायु के समान मिलकर रहने की बात कही, उसके पश्चात प्राणरूपता की बात कही और आगे कह रहा है ‘संधाता’ = जैसे जगत का धारण करने वाला परमात्मा सब जगत को अच्छी प्रकार से धारण करता है-उसी प्रकार पति-पत्नी एक दूसरे को अच्छी प्रकार धारण करें अर्थात पोषण करें। उसके पश्चात वेद एक और उपदेश कहता है-‘समुदेष्ट्री दधातु नौ’- अर्थात जैसे एक अच्छा उपदेशक उपदेश करते हुए अपने श्रोताओं से प्रीतिपूर्ण व्यवहार करता है और अपने वाकसंयम् का पूर्ण ध्यान रखते हुए ही वाणी का उच्चार करता है और श्रोता उस उपदेशक की बातों में श्रद्घापूर्ण प्रीति का प्रदर्शन करते हैं-वैसे ही पति-पत्नी को भी परस्पर व्यवहार रखना चाहिए।

आजकल परिवारों में टूटन और बिखराव का क्रम जारी है। इसका कारण केवल एक ही है कि परिवार का वैदिक आदर्श लोगों ने विस्मृत कर दिया है। परिवार रूपी इस संस्था को वेद ने सुदृढ़ स्वरूप प्रदान किया और इसी पर मानवता के विश्व परिवार का भवन तैयार किया। परिवार से संस्कार लेकर बालक बाहर निकलता है। जैसा परिवेश वह घर में देखता है वैसा ही बाहर बनाने का प्रयास करता है। यही कारण है कि वेद ने घर के परिवेश को पूर्णत: सुख-शान्ति और आनन्द की वर्षा करने वाला बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। परिवार में सदस्य बढ़ेंगे तो परिवारों का विस्तार होगा, विस्तार होगा तो अलग-अलग घर बनेंगे, गांव बनेंगे-शहर और देश बनेंगे। एक से अनेक होते चले जाएंगे-हम। पर जैसा कि गांवों में आज भी कहा जाता है कि सब कुछ बंट सकता है-पर एक चीज नहीं बंटती और वह है-परिवार का सम्मान। उसी प्रकार सब कुछ बंटता बढ़ता जाएगा-पर एक चीज ऐसी रहेगी जो अब भी सबमें समान रूप से मिलती जाएगी और वह है परिवार का वह संस्कार जो आज भी सबको एक ही परिवार के सदस्य के रूप में देखता है। यह संस्कार ही राष्ट्र की मूल चेतना हुआ करता है और यही एक परिवार से निकलकर विश्व स्तर पर जाकर मानवता में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार राष्ट्र में या संसार में मानवतावाद का मूल परिवार का वह संस्कार है जो सबको अपना मानने की शिक्षा देता है।
आज संसार में जितने भर भी कानून हैं वे सब इस परिवार रूपी संस्था को उजाडऩे का कार्य कर रहे हैं। क्योंकि वे निरंतर पति-पत्नी के तलाक करा रहे हैं, माता-पिता के लिए वृद्घाश्रम बनवाते जा रहे हैं और भाई-भाई के बीच चल रहे संपत्ति विवादों को भी किसी न किसी प्रकार बढ़ा रहे हैं। उनके पास समस्या को बढ़ाने के लिए एक और समस्या तो है पर उसका समाधान नहीं है। इस प्रकार ऐसे कानून और कानूनी व्यवस्था दोनों ही निरर्थक और अनर्गल समझे जाने चाहिएं। कानून और कानूनी व्यवस्था मानव और मानवीय समाज को मर्यादित, संतुलित और शान्तिपूर्ण जीवन जीने के लिए व्यवस्था बनाने वाली होनी चाहिए। यदि हम पुन: वेद की शरण में जायें तो समाधान मिल सकता है। क्योंकि वेद का उपदेश ही समस्या का समाधान है और उसका उपदेश ही अपने आप में विधि है। उसी विधि और उपदेश को अपनाकर कभी विश्व आगे बढ़ा था।
जैसा कि हमने प्रारंभ में ही कहा है कि संपूर्ण संसार को परिवार रूपी संस्था हमने दी है तो उसे विश्व ने अपनाया और अपना कुछ जंगली स्वरूप छोडक़र मानवतावाद को अपनाया। यद्यपि हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जब सारा संसार भारत से शासित और अनुशासित होता था-तब सारे संसार में एक ही व्यवस्था कार्य करती थी, पर जब किन्हीं कारणों से भारत का शेष विश्व से संपर्क कट गया तो वहां भारतीय परम्पराएं मिटने लगीं और जंगली स्वरूप में आ गये। वे लोग परिवार नाम की संस्था से अपरिचित थे और उनके यहां माता-पिता या पति-पत्नी, भाई-बहन का कोई पता नहीं होता था। संतान को माता का कुछ ध्यान रहता था पर समय आने पर वह भी छूट जाती थी। पिता के विषय में तो माता भी नहीं बता पाती थी कि तेरा पिता कौन है? यूरोप को उस स्थिति से बाहर निकालकर लाने में हमारी संस्कृति ने भारी परिश्रम किया और इसके लिए यूरोप को भारतीय संस्कृति के प्रति और वैदिक विद्वानों के प्रति आभारी भी होना चाहिए।
आज के भौतिकवादी परिवेश में विश्व समाज भारत के दिये संस्कारों को छोड़ता जा रहा है। जिससे सबसे अधिक दुष्प्रभाव इस परिवार नामक संस्था पर ही पड़ा है। अच्छा हो कि पश्चिमी जगत पुन: भारत को अपना मार्गदर्शक मानकर परिवार रूपी संस्था की पवित्रता को पुनस्र्थापित करे। आज के विश्व के भीतर से विश्व चेतना का वह मौलिक संस्कार लुप्त हो गया है जो सबको अपना मानने की सीख देता है। इस मौलिक संस्कार के लुप्त हो जाने से संसार का मानसरूपी हंस रो रहा है। कहने का अभिप्राय है कि वह भीतर ही भीतर दु:खी है और इस दु:ख का कारण उसे ज्ञात नहीं है। यदि वह समझ ले तो वह दु:ख का कारण परिवार रूपी संस्था का नष्ट हो जाना ही है। इसके बिखराव को रोककर सारा संसार पुन: सुख शान्ति के स्वैर्गिक आनन्द को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार भारत आज भी अपने वैदिक ज्ञान के बल पर विश्व का मार्गदर्शन कर सकता है। नेतृत्व के लिए भारत को भी आगे आना ही चाहिए। अब किसी प्रकार की हिचकिचाहट दिखाने की आवश्यकता नहीं है।

वेदों में विज्ञान
भारत ने अपने वेदों के माध्यम से संसार को बहुत कुछ दिया है। इस अध्याय में हम वेदों में विज्ञान विषय पर संक्षिप्त चर्चा करेंगे। वेद ज्ञान से संसार को पता चला है कि इस प्रकृति का निर्माण पांच तत्वों अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश से मिलकर हुआ है। विश्व ने भारत की इस बात को स्वीकार किया है। तभी तो संसार का कोई भी वैज्ञानिक ऐसा कोई छठा पदार्थ खोजकर नहीं ला सका-जिसे इन पांच तत्वों के साथ मिलाकर कहा जा सके कि प्रकृति का निर्माण पांच तत्वों से न होकर छह तत्वों से हुआ है।
संसार को आग के विषय में सबसे पहले हमने ही बताया। विश्व इतिहास को आप उठाकर देखें तो कई काल्पनिक बातें आपको तथाकथित विद्वानों की ओर से कही गयी मिलेंगी। जिनसे पता चलेगा कि पहले मानव जंगली अवस्था में था और उसे कोई ज्ञान नहीं था। जब उसे कुछ-कुछ ज्ञान होना आरंभ हुआ तो उसने जिन वस्तुओं को अपने लिए आवश्यक और उपयोगी माना उनमें अग्नि भी एक थी। अग्नि के लिए मनुष्य ने पत्थर को पत्थर से रगड़ा तो उसे ज्ञान हुआ कि इसमें अग्नि है। बाद में धीरे-धीरे उसने अग्नि की खोज की और उसका उपयोग अपने लिए भोजन पकाने के रूप में करना आरंभ किया।
हमने इस प्रकार की धारणा को काल्पनिक इसलिए माना है कि ऐसे अवैज्ञानिक ढंग से मानव का विकास पृथ्वी पर नहीं हुआ। ना ही उसे ईश्वर ने जंगली रूप में अर्थात असुरक्षित ढंग से कहीं से फेंक दिया था। यदि ईश्वर ने ऐसा किया होता तो उसकी व्यवस्था में अवैज्ञानिकता का दोष लगना निश्चित है। मनुष्य को ईश्वर ने अपनी ओर से ज्ञान-विज्ञान दिया। वेद के माध्यम से उसे अनेकों पदार्थों और तत्वों के विषय में गंभीर और सूक्ष्म ज्ञान प्रदान किया। ऋग्वेद ने अपने पहले मंत्र का शुभारंभ ही अग्नि से किया।

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